Monday, March 24, 2014

वीर जवानों को नमन

कपकपाती ठण्ड में
जो कभी ठहरा नहीं
चिलचिलाती धूप में
जो कभी थमा नहीं

गोलियों की बौछार में
जो कभी डरा नहीं
बारूदी धमाकों से
जो कभी दहला नहीं

अनगिनत लाशों में
जो कभी सहमा नहीं
फर्ज के सामने
जो कभी डिगा नहीं

आंसुओं के सैलाब से
जो कभी पिघला नहीं
देश के आन ,मान ,शान में
मिटने से जो कभी पीछे हटा नहीं

ऐसे वीर जवानों को
शत -शत नमन ।।

Saturday, March 8, 2014

महिला दिवस पर महिला केंद्रित दो फिल्में


जयप्रकाश चौकसे|



आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है और शुक्रवार को प्रदर्शित तीन फिल्मों में से दो फिल्मों में केंद्रीय पात्र महिलाएं हैं। ‘क्वीन’ की नायिका मध्यम वर्ग की मामूली तौर पर थोड़ी सी पढ़ी-लिखी है और एक लंबी विदेश यात्रा में स्वयं को खोजने का प्रयास कर रही है। गुलाब गैंग की नायिका रज्जू बचपन से ही पढ़ने की इच्छा जाहिर करने पर अपनी सौतेली मां से पिटती रही है। उसने जीवन को पाठशाला में आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा है और इत्तेफाक से यही पाठ ‘क्वीन’ की नायिका भी पढ़ती है।
रज्जू इस नतीजे पर पहुंची है कि अन्याय आधारित असमानता से पीड़ित बीमार समाज में अधिकार छीनना पड़ता है और घुंघरू, पायल के बदले तलवार उठानी पड़ती है। वह हिंसा को न्यायसंगत नहीं मानती परंतु लाख प्रार्थना करने पर भी बात नहीं बनती तो हथियार उठाती है। वह अपने समान दमित स्त्रियों का दल संगठित करती है। उसका बचपन से चला आ रहा सपना कस्बे में स्कूल की स्थापना करना है।
 
इसी फिल्म में शहर की पढ़ी लिखी श्रेष्ठि वर्ग के राजनैतिक परिवार की महत्वाकांक्षी और निर्भय महिला के हृदय में इस कदर लोहा समाया है कि उसने अपने नेता पति की हत्या करके उसकी राजनैतिक विरासत पर हक जमा लिया है। एक दलित स्त्री को लगता है कि स्कूल की स्थापना समाधान है परंतु हम देखते हैं कि पढ़ी-लिखी मैडम साम, दाम और दंड की नीति अपनाकर सता के माध्यम से अपने लालच को ही भरती है। शायद ऐसे ही किसी संदर्भ में निदा फाजली ने कुछ इस आशय की पंक्तियां लिखी थीं कि इन मासूम बच्चों को भारी-भरकम किताबों से बचा लो, दो-चार किताबें पढ़कर ये हमारी तरह ही कमीने हो जाएंगे। 
 
शिक्षा के लिए ललक काबिले तारीफ है परंतु जिस शिक्षा के लिए शोर है, सारा हंगामा है, उस शिक्षा का स्वरूप क्या है? क्या वह नैतिक मूल्य सिखाती है या महज अंकगणित और अक्षर ज्ञान देकर आपकी सोच पर महज एक मुलम्मा चढ़ाती है। भारत में शिक्षा संस्थान बहुत खुले हैं परंतु वे सिखा क्या रहे हैं? हाल ही में प्रकाशित एक आकलन में विश्व के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में भारत की विशाल संख्या में खुली संस्थाओं में मात्र तीन को महत्वपूर्ण माना गया है। बहरहाल गुलाब गैंग में अशिक्षित परंतु नेन नीयत वाली रज्जू (माधुरी) की जंग शुरू होती है, शिक्षित श्रेष्ठि वर्ग की अनुभवी मैडम (जूही चावला मेहता) से और यह द्वंद अत्यंत रोचक और मनोरंजक है। निर्देशक सौमिक सेन ने कथा-पटकथा एवं गीत भी लिखे हैं और उनकी धुनें भी बनाई हैं। उन्होंने लोकगीतों का अत्यंत प्रभावोत्पादक उपयोग किया है। रज्जू की नजदीकी सहेली की भूमिका और अभिनय कमाल का है और उसकी मृत्यु हृदयविदारक है तथा यह कड़वा तथ्य भी रेखांकित करती है कि पुरुष प्रेम को भी एक जाल की तरह इस्तेमाल करता है और प्रेम का यह पाखंड उसकी जन्मना कमतरी को पूरा करने का प्रयास मात्र है।
 
इस फिल्म में दोनों महिला पात्रों के बीच संवादबाजी कुछ इस तेवर की है मानो सलमान खान और शाहरुख खान ‘वन अप मैन शि का खेल खेल रहे हो’। अगर रज्जू के पास शब्दों के तीर हैं तो मैडम की मुस्कान उनका दंश निकाल देती है। फिल्मकार ने सारा वजन रज्जू को दिया है परंतु मैडम का असर गहरा है क्योंकि पहली बार एक स्वार्थी खलनायिका चीखती नहीं है, वह बस मुस्कराती है जिसमें हजार अर्थ छुपे होते हैं। यह सोफिस्टिकेशन के साथ बुरे काम करना अदाकारी का एक नया अंदाज है जिसका श्रेय फिल्मकार और जूही दोनों को ही जाता है। इस फिल्म के सारे कलाकारों ने मंजा हुआ अभिनय किया है और भूमिकाएं भी सुस्पष्ट परिभाषित हैं। फिल्मकार के सामने कोई धुंध नहीं। सब कुछ स्पष्ट और मुखर है। रज्जू और साथियों के संवाद ठेठ गांवठी है और उनमें कोई बनावट नहीं है। मैडम कत्ल भी करती हैं तो इस कदर मासूमियत से मानो केक काट रही हों।
 
हर वर्ष महिला दिवस पर लेख लिखे जाते हैं, शोर शराबा होता है और स्त्री केंद्रित फिल्में भी प्रदर्शित होती हैं परंतु यथार्थ की जमीन पर कुछ नहीं बदलता। सात मार्च के पहले और नौ मार्च के बाद रज्जू हमेशा पिटती रहती है, उसकी मुंहफुट तेज-तर्रार सहेली प्रेम के द्वारा छली और मारी जाती है।
 
एक युवा अय्याश को दंड देने के लिए उसका एक अंग काट दिया जाता है परंतु उस अंग की सारी शक्ति तो जाहिल दिमाग में है जो नदी के किनारे का ऐसा पत्थर है कि सदियों से परिवर्तन की लहरें उस पर अपना माथा फोड़ती आ रही है और टूटा नहीं वरन् मात्र चिकना हो गया है। समाज की इसी चिकनाई पर प्रहार करती है गुलाब गैंग। आज के प्रदर्शन में ‘क्वीन’ और गुलाब गैंग के दर्शकों में पुरुष अधिक थे और यही तो सारे नारी केंद्रित प्रयासों की कड़वी हकीकत है।

Sunday, March 2, 2014

रेलवे करता है बॉलीवुड से भी वसूली, 1 ट्रेन से कमाता है ढाई लाख रुपए रोज


रेलवे करता है बॉलीवुड से भी वसूली, 1 ट्रेन से कमाता है ढाई लाख रुपए रोज
मुंबई।  गुंडे, चेन्नई एक्सप्रेस, जब वी मेट और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में ट्रेन एक सेंट्रल रोल में थी। हर महीने वह एक न एक फिल्म में अहम भूमिका निभा रही है। मेहनताना सवा लाख रुपए रोज। मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सिर्फ इंजन और एक डिब्बे के लिए। चार डिब्बों वाली ट्रेन का ढाई लाख रुपए प्रतिदिन। अच्छे-अच्छे अभिनेताओं से भी ज्यादा। रेलवे को हर साल दो करोड़ से ज्यादा कमाई सिर्फ शूटिंग से हो रही है।

 गुंडे, चेन्नई एक्सप्रेस, जब वी मेट और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में ट्रेन एक सेंट्रल रोल में थी। हर महीने वह एक न एक फिल्म में अहम भूमिका निभा रही है। मेहनताना सवा लाख रुपए रोज। मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सिर्फ इंजन और एक डिब्बे के लिए। चार डिब्बों वाली ट्रेन का ढाई लाख रुपए प्रतिदिन। अच्छे-अच्छे अभिनेताओं से भी ज्यादा। रेलवे को हर साल दो करोड़ से ज्यादा कमाई सिर्फ शूटिंग से हो रही है।
सीएसटी रेलवे स्टेशन की डिमांड है सबसे ज्यादा -
सबसे ज्यादा डिमांड छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (सीएसटी) रेलवे स्टेशन की है। इसकी बिल्डिंग वर्ल्ड हेरिटेज साइट की लिस्ट में शामिल है। मुंबई रेलवे के ट्रैक्स पर सालभर में 50 फिल्म से ज्यादा फिल्मों की शूटिंग होती है। हर दिन की शूटिंग के लिए फीस एक लाख से 2.5 लाख है। जो लोकेशन की डिमांड पर निर्भर करती है। कुछ छोटे स्टेशन पर फीस 60-70 हजार प्रतिदिन भी है। फीस के अलावा 5 लाख का सिक्योरिटी डिपॉजिट और 5 करोड़ का इंश्योरेंस भी जरूरी है। 
द बर्निग ट्रेन की शूटिंग के बाद लगती है फीस -
पहले रेलवे शूटिंग के लिए इंश्योरेंस और सिक्योरिटी डिपॉजिट नहीं लेता था। लेकिन द बर्निग ट्रेन की शूटिंग के दौरान हुए हादसे और नुकसान के बाद यह जरूरी कर दिया गया। तब शूटिंग की फीस सिर्फ 100 रुपए रोज थी। बीआर चोपड़ा ने एक महीने की इज़ाज़त  ली थी। यानी 3000 हजार रुपए। लेकिन सीन को ज्यादा वास्तविक बनाने के लिए उन्होंने ट्रेन के डिब्बों में सचमुच आग लगा दी। यही नहीं शूटिंग के बाद उसका हर्जाना भी नहीं भरा। उसी के बाद से रेलवे ने नए सिरे से नियम बना डाले। 
बोनी कपूर ने फिल्माया था सबसे महंगा सीन -
शूटिंग की परमिशन लेने के लिए स्क्रिप्ट जमा करनी पड़ती है। रेलवे संभावित खतरों, नुकसान और अपने टाइमिंग और ट्रैफिक को देखते हुए ही इज़ाज़त देता है। फिल्मों में ट्रेन का इस्तेमाल पहली फिल्म से ही होना शुरू हो गया था। लूमियर ब्रदर ने जब 1895 में दुनिया की पहली फिल्म बनाई तो उसके दूसरे भाग में रेल का सीन था। हमारे यहां सबसे पहली बार ट्रेन 1936 में अछूत कन्या नाम की फिल्म में दिखाई दी थी। लेकिन ट्रेन का सबसे महंगा सीन था बोनी कपूर की फिल्म 'रूप की रानी चोरों का राजा' में। जिसमें अनिल कपूर को हेलिकॉप्टर से मालगाड़ी पर कूदकर पैसा लूटना था। वहीं शोले में ट्रेन डकैती शूट करवाने के लिए हॉलीवुड से एक्सपर्ट बुलवाए गए थे। इसकी शूटिंग में सात हफ्ते लगे थे।
दिल्ली मैट्रो में भी बढ़ रही है शूटिंग की डिमांड -
वहीं, शाहरूख खान ने फिल्म 'दिल से' के गाने छैंया छैंया की शूटिंग ट्रेन की छत पर कर नया ट्रेंड शुरु किया था। रॉ वन फिल्म में ट्रेन के एक शॉट के लिए 23 कैमरों का इस्तेमाल किया गया। कुछ समय पहले मुंबई के वेस्टर्न रेलवे ने कंगना राणावत की मुंबई के आईएएस विश्वास पाटिल निर्देशित फिल्म रज्जो के लिए लोकल ट्रेनें कैंसिल कर दी थीं। इन दिनों दिल्ली की मैट्रो में शूटिंग की भी काफी डिमांड है। फिल्म पा में अमिताभ बच्चन अपनी मां विद्या बालन के साथ मैट्रो में सफर करते थे। सोनम कपूर की दिल्ली-6 में, बेवफा, चीनी कम और देव डी की शूटिंग भी मैट्रो में हुई है। 
रेखा को 18 बार लेना पड़ा था रीटेक -
ट्रेन पर शूटिंग करना आसान नहीं होता। फिल्म 'घर' की शूटिंग बाम्बे सेंट्रल की शूटिंग हो रही थी। रेखा को दौड़कर विनोद मेहरा के पास आना था। कभी वे धीमी दौड़ती, कभी ज्यादा तेज। परफेक्ट शॉट लेने के लिए रेखा को 19 बार प्लेटफॉर्म पर दौडऩा पड़ा। यह इस फिल्म का मुहूर्त शॉट था। लेकिन फिल्म में सबसे आखिरी में दिखाया गया था।


लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...