Friday, February 28, 2014

स्क्रिप्टरायटर्स लैब देता है मौका



-अजय ब्रह्मात्मज 

देश भर के लेखकों के लिए फिल्म लिखने और निर्देशक बनने की आकांक्षा पूरी करने का एक नया मंच पिछले कुछ सालों से सक्रिय है। इसके बारे में देश के छोटे-मझोले शहरों के लेखक कम जानते हैं। मुंबई और दिल्ली के अलावा देश के अन्य निर्माण केंद्रों से तो इच्छुक लेखक इसमें शामिल होने लगे हैं। उनकी स्क्रिप्ट स्वीकृत और पुरस्कृत हुई हैं। कई स्क्रिप्ट फिल्मों में परिणत होकर देश-विदेश में चर्चित भी रहीं। पिछले साल की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘द लंचबॉक्स’ भी इसी मंच से आई थी। एनएफडसी हर साल स्क्रिनरायटर्स लैब के नाम से असका आयोजन करता है। चुनी गई स्क्रिप्ट को मार्गदर्शन दिया जाता है। कोशिश रहती है कि देश-विदेश के निर्माता और संस्थाएं इन स्क्रिप्ट पर विचार करें और निवेश के लिए तैयार हों।
स्थापित और प्रसिद्ध निर्देशकों को अपेक्षाकृत आसानी से निर्माता मिल जाते हैं। दिक्कत पहनी फिल्म के निर्देशकों की रहती है। अव्यावसायिक फिल्मकारों को भी साधन और धन की कमी रहती है। उनके लिए यह मंच और निर्माण में एनएफडीसी का सहयोग बहुत मानी रखता है। याद करें तो जवाहर लाल नेहरू की पहलकदमी पर कलात्मक और सार्थक फिल्मों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के उद्देश्य से फिल्म फायनेंस कारपोरेशन का गठन हुआ था। यही संगठन बाद में एनएफडीसी नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन के नाम से सक्रिया हुआ। एनएफडीसी के सहयोग से अभी तक विभिन्न भारतीय भाषाओं में 300 से अधिक फिल्मों का निर्माण हो चुका है। सत्यजित राय औा श्याम बेनेगल से लेकर दिबाकर बनर्जी और अनुराग कश्यप तक ने एनएफडीसी के सहयोग से फिल्में बनाई हैं। पहले इप फिल्मों की रिलीज की समस्या थी। आम सिनेमाघरों में रिलीज न हो पाने की वजह से इन्हें फस्टिवल फिल्म के नाम से बदनाम किया गया। मेनस्ट्रीम सिनेमा के फिल्मकारों ने इन्हें दर्शकों से दूर रखने कि लिए कला और शास्त्रीय का ठप्पा अलग से लगा दिया। मल्टीप्लेक्स संस्कृति के प्रसार के बाद सीमित बजट की कलात्मक फिल्मों को थिएटर और दर्शक दोनों मिले।
    स्क्रिप्टरायटर्स लैब में चुनी गई स्क्रिप्ट पर रितेश बत्रा की ‘द लंचबॉक्स’ और ज्ञान कोरिया की ‘द गुड रोड’ पिछले साल काफी चर्चित रही। ऑस्कर के लिए भारत से भेजी जाने वाली फिल्मों में मुख्य प्रतियोगिता इन्हीं दोनों फिल्मों के बीच रही। फिलहाल बिकास मिश्रा की ‘चौरंगा’ और कानू बहल की ‘तितली’ निर्माणाधीन है। 2013 में स्क्रिप्टरायटर्स लैब में छह लेखकों की स्क्रिप्ट चुनी गई। आशीष आर्यन की ‘टी से ताजमहल’, बेला नेगी की ‘काला पानी’, राजेश जाला की ‘चिंगारी’ निखिल महाजन की ‘दैनिक’ शंकर रमन की ‘माय ब्रदर द सेल्समैन एंड आई’ और  वरुण ग्रोवर की ‘मां भगवतिया कोचिंग क्लास’ चुनी जाने के बाद मार्गदर्शन के लिए विशेषज्ञों के पास भेजी गई। इन लेखकों को भी उनके साथ अपनी स्क्रिप्ट की खूबियों और खामियों को समझने के साथ सुधारने का मौका मिला। उम्मीद है जल्दी ही इनमें से कुछ स्क्रिप्ट फिल्मों के तौर पर सामने आएंगी।
    एनएफडीसी ने इस साल भी स्क्रिप्टरायटर्स लैब का आयोजन किया है। यहां पूरी स्क्रिप्ट भेजने की जरूरत नहीं होती। स्क्रिप्ट का कांसेप्ट दो पृष्ठों में          
 screenwriters-lab@filmbazaarindia.com के पास भेजा जा सकता है। इस साल का आयोजन सराजेवो फिल्म फेस्टिवल के सहयोग से हो रहा है। चुने गए लेखकों को पहले सराजेवो और फिर गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में वर्कशॉप का अवसर मिलेगा। आवेदन भेजने की अंतिम तारीख 5 मार्च है। इच्छुक लेखक इस साल अगर भाग नहीं ले पा रहे हैं तो वे इस आयोजन को याद रखें और अगले साल निश्चित ही आवेदन करें। फिल्म लेखन के आकांक्षी लेखकों के लिए यह सुंदर अवसर और एक्सपोजर है।
    फिल्म लेखन मूलरूप से क्राफ्ट है। जरूरी नहीं है कि आप कहानी और उपन्यास लिख लेते हैं तो फिल्म भी लिख लेंगे। यह एक अलग शिल्प है, जिसके अभ्यास और पाठ की भिन्न शर्तें होती हैं। देश के अधिकांश लेखकों की यह समस्या रहती है कि वे कैसे फिल्मकारों तक अपनी कहानियां पहुंचाएं। उनके लिए भी यह आयोजन फिल्म इंडस्ट्री का द्वार खोल सकता है।

Wednesday, February 26, 2014

आमिर खान पहुंचे बिहर के 'माउंटेन मैन' के गांव, नहीं खाया उनके घर का खाना


गहलौर/बिहार: अभिनेता आमिर खान मंगलवार को 'माउंटेन मैन' के नाम से मशहूर दशरथ मांझी के गांव गहलौर पहुंचे. उन्होंने कहा कि माउंटेन मैन के नाम से मशहूर दशरथ मांझी उनकी प्रेरणा और आदर्श हैं. उनके गांव में आकर उन्हें काफी खुशी मिली है.
 
दशरथ मांझी वही शख्स थे, जिन्होंने अपने गांव में अकेले ही एक पहाड़ को काटकर रास्ता बनाया था. अपने कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते-2' के लिए गया जिले के गहलौर गांव पहुंचे आमिर को देखने के लिए बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक मौजूद थे. सभी लोग आमिर की एक झलक देखना चाहते थे.

आमिर ने कहा कि एक अकेला इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण दशरथ मांझी हैं. उन्होंने कहा, "मैं यहां आकर, यहां की मिट्टी को छूकर कर वाकई खुश हूं, जहां एक अकेले इंसान ने अपनी नि:स्वार्थ दृढ़ता का इतना बड़ा उदाहरण पेश किया."

अभिनेता एवं फिल्म निर्माता आमिर ने कहा कि दशरथ मांझी का गांव देखने की उनके ख्वाहिश पूरी हुई. पहाड़ी पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसके पहले भी वे बिहार आए हैं लेकिन इस गांव में आकर उन्हें बेहद खुशी हो रही है.

उन्होंने कहा कि बिहार में कई एतिहासिक और पर्यटक स्थल हैं और दोबारा वे फिर आएंगे. आमिर ने गांव में पर्वत पुरुष की समाधि पर फूल चढ़ाए और उनके परिजनों से मुलाकात की.

कड़ी सुरक्षा के बीच आमिर ने मांझी के बेटे भगीरथ मांझी और बहू बसंती देवी एवं परिवार के दूसरे लोगों के साथ आधे घंटे तक बातचीत की. भगीरथ और बसंती ने आमिर से बातचीत करते हुए क्षेत्रीय बोली मघई में कहा कि वे बेहद गरीबी में जीवन बिता रहे हैं और अपनी स्थिति सुधारने के लिए आमिर की मदद चाहते हैं.

गहलौर के दशरथनगर दलित टोला में रहने वाले भगीरथ और बसंती दोनों शारीरिक रूप से अपंग हैं और स्थानीय स्कूल में मिड डे मील पकाने का काम कर किसी तरह गुजारा चलाते हैं. आमिर से मिलने के बाद भगीरथ ने कहा, "हमने हीरो से कहा कि उन्हें हमारी असल कहानी को दुनिया के सामने लाना चाहिए. शायद इससे सरकार का ध्यान हम पर जाए और हमारी कुछ मदद हो सके."

बसंती ने कहा कि उसने आमिर को अपनी पूरी व्यथा बताई, कि बदतर हालातों में वे गुजर कर रहे हैं. लेकिन उन्हें इस बात का दुख है कि आमिर ने उनका बनाया पारंपरिक खाना नहीं खाया. उसने कहा, "साहब लोगों ने उन्हें (आमिर) खाना खाने नहीं दिया."

आमिर ने घोषणा करते हुए कहा कि दशरथ के परिवार को उनकी यूनिट मदद करेगी और वह यूनिट जल्द ही इसके लिए पहल करेगी. उन्होंने कहा कि सत्यमेव जयते में दशरथ मांझी की चर्चा हुई थी तभी से उनके मन में यहां आने की इच्छा थी.

ज्ञात हो कि दशरथ मांझी ने सिर्फ हथौड़े और छेनी की मदद से दिन-रात एक करके अपने गांव में स्थित पहाड़ को काटकर 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 30 फीट ऊंचा रास्ता तैयार किया था. 2007 में कैंसर से उनकी मौत हो गई थी.

Tuesday, February 25, 2014

हिंदी के लिए बेस्ट सेलर होना इतना आसान क्यूँ ?


विश्व पुस्तक मेला का समापन तो हो गया लेकिन कई सवाल बेजवाब ही रह गए। हिंदी के वर्त्तमान और भविष्य के बारे में कई बातें भी हुई लेकिन बस उम्मीदों के आलावा हिंदी के पास शायद अब कुछ भी नहीं है।हिंदी को लेकर मेरी फ़िक्र बयां करता यह लेख-


मैं ऐसे दर्ज़नों लोगों को जानता हूँ जो इंग्लिश की किताबें खरीदते है लेकिन उसे पढ़ते  नहीं है,वो दुर्जोय दत्ता के ''होल्ड माय हैण्ड'' या ''अफकोस आई लव यू'' जैसे रंगीन कवर पेज देखकर,लाइफ स्टाइल के लिए वो किताबें खरीद लेते है।हिंदी में अच्छा कंटेंट उपलब्ध नहीं है ऐसा बिलकुल नहीं है हिंदी में अच्छा लेखन हो रहा है लेकिन पाठकों की विचारधारा ही हिंदी को लेकर बदल चुकी है वो लेखक की किताबों को फ्री पाने की जोड़तोड़ सीख चुके है। नए लेखक होने का यह मतलब बिलकुल नहीं होता की उसकी किताबें महज गिफ्ट में देने के लिए छापी गयी है। जो हिंदी और इंग्लिश दोनों पढ़ते है वो बताएं की उन्होंने ऑफ़कोर्स आई लव यू में ऐसा क्या पढ़ लिया जो उनकी 5 लाख कॉपी बिक गयी,यह बड़ा ही औसत लेखन है। मेट्रो सिटीज में इंग्लिश बहुत बिक रही है,लेकिन हमारे यहाँ कम से कम हिंदी तो बिकनी ही चाहिए थी मगर ऐसा नहीं हो सका। हिंदी और अंग्रेजी की किताबों के बीच की यह दूरी बस भाषा की दूरी है,लोग हिंदी को दिल से जितना दूर करते जायेगे हिंदी की किताबें उतने ही जल्दी बेस्ट सेलर बनती जायेगी,शायद 100 या दो सौ में भी।जबकि अंग्रेजी के लिए बेस्ट सेलर होने का मतलब दस हज़ार या उससे कहीं जायदा किताबों का बिकना है। 

हिंदी पूरी तरह से टूट रही है,आज फ़िल्में बनती तो हिंदी में है लेकिन कहानी से लेकर डायलॉग तक सब इंग्लिश में लिखे जाते है।चेतन भगत की किताबों पर फ़िल्में बन सकती है मगर प्रेमचंद की किताबों पर नहीं,क्यों ? क्योंकि आज का नया सिनेमा प्रेमचंद या हिंदी के किसी और महान लेखकों को नहीं पढता। हमें लगता है की हम जायदा से जायदा साधनों के माध्यम से हिंदी की किताबों का विस्तार कर पाएंगे,ऐसा नहीं है हम इस तरह से 100 की जगह 120 किताबें बेंच सकते है लेकिन इसे हज़ार या लाख तक ले जाने के लिए हिंदी का विकास जरुरी है,लोगों के दिलों में हिंदी होना जरुरी है।  

हिंदी के लेखकों ने अपने पाठकों के साथ कभी धोखा नहीं किया,उन्होंने हर एक बात को मर्यादा और सच्चाई के साथ पाठकों के सामने रखने कि कोशिश की। जबकि इंग्लिश को जरुरत के हिसाब से सनसनीखेज और आधुनिकता के नाम पर जायदा से जायदा अमर्यादित किया गया। प्यार के नाम पर अश्लीलता परोसी गयी। भारत जिस युवा देश होने का दावा करता है उन युवाओं का कितना फायदा हिंदी को है,शायद कम से भी कम। वो युवा अंग्रेजी को खुद में महसूस करने लगे है,जहाँ हिंदी न उनको रास आ रही है ना वो उसे महसूस करने की जहमत उठाना चाहते है। कुल मिलकर आधुनिकता की की आग में जलने और निखरने की प्रतियोगिता चल रही है,जहाँ फिलहाल तो अंग्रेजी ही निखर रही है।

अमीश त्रिपाठी के पहले उपन्यास के बाद उन्हें उनके दूसरे उपन्यास के लिए अग्रिम तौर पर पांच करोड़ रूपए दिए गए,हिंदी के लेखकों के लिए इतना सुहाना सपना भी नाजायज सा लगता है।आज हमें जहाँ हिंदी के सुनहरें वर्त्तमान की दास्ताँ लिखनी चाहिए थी,वहाँ हम हिंदी को ज़िंदा रखने के तरीके तलाश रहे है। यह बात सुक़ून देने वाली नहीं है। हिंदी के विस्तार और उसके प्रसार के लिए जो युवा पब्लिशर पुराने तौर तरीकों से हटकर हिंदी में नया खून भर रहे है,उनकी मेहनत के नतीजें आने वाले कुछ सालों में हमारे सामने आयेंगे।तब तक हिंदी को लेकर कई उम्मीदें कायम रह सकती है,लेकिन तब भी सवाल बस यही रहेगा की क्या अब हम आखिर तक बस हिंदी को बचाने की स्तिथि में ही रहेंगे,हिंदी का उतार चढाव ही चलता रहेगा उसकी कोई मंजिल होगी या नहीं ?


(संजय सेन सागर। हिंदुस्तान का दर्द ब्लॉग के मोडरेटर। एमबीए के स्‍टूडेंट। साथ ही फिल्म लेखन के लिए प्रयासरत। उनसे mr.sanjaysagar@gmail.com या 09907048438 पर संपर्क किया जा सकता है।)

कल्पेश याग्निक का कॉलम: अच्छा किया जो अंतिम दिन इतनी मर्यादा दिखाई।


एक अच्छा इंसान होना एक बात है और एक अच्छा नेता होना दूसरी। किन्तु हम दोनों बातें किसी एक में ही ढूंढते रहते हैं।
     - अज्ञात
यह सभा समाप्त हुई। भारी मिठास के साथ। मिसाल बनी। पन्द्रहवीं लोकसभा का यह अंतिम दिन था। शुक्रवार 21 फरवरी 2014 को समूची संसद भाईचारे, स्नेह और गरिमा का प्रतीक बन कर उभरी।
बहुत ही अच्छा किया। क्योंकि देशवासी अभी भूले नहीं हैं। मिर्च छिड़कना। माइक को चाकू की तरह इस्तेमाल करना। बाकी सांसदों को आंसू बहाने पर विवश कर देना। अभी कल की ही तो बात है। तेलंगाना को पृथक राज्य बनाने का कानून किसी 'वयस्क' दृश्य की तरह लोकसभा के लाइव प्रसारण से सेंसर कर दिया गया था। कहीं हम देख न लें कि कितने लज्जाजनक हैं हमारे चुने हुए सांसद।
इसलिए अंतिम दिन भाईचारा दिखाना आवश्यक था। अब लोगों के बीच जो जाना है। चुनाव में कोई पूछेगा नहीं कि आपने लोकसभा में तो स्तर गिराया। किन्तु लोगों के मन में कहीं न कहीं यह बात रह जाती है। बड़े नेताओं के लिए ख़तरा हमेशा बना रहता है। हर तरह का। लोग कहेंगे कि वे क्या कर रहे थे? पूछेंगे कि आपका बड़प्पन कहां गया?
इतना स्नेह विरोधियों के बीच में देखना सुखद था। सुखद आश्चर्य। क्योंकि स्तरहीन हंगामे छोड़ भी दिए जाएं तो भी हमारे विपक्ष-पक्ष  के बीच कतई अच्छे संबंध नहीं हैं। अधिकांश के बीच मतभेद ही नहीं, मनभेद भी है। इसलिए इतनी प्रशंसा एक-दूसरे की करते वे सभी अनूठे लगे। और सच कहें तो बनावटी भी। किन्तु इसी बहाने कुछ ऐसा दृश्य उभरा, जो इस लोकसभा को इस तरह से भी यादगार बना गया। इस लोकसभा की एक ऐतिहासिक बात यह रही कि प्रधानमंत्री, सदन के नेता नहीं रहे। वे लोकसभा के सदस्य नहीं थे। पूरे यूपीए के दस साल के कार्यकाल में यह सबसे अधिक परेशान करने वाली बात रही। जनता से सीधे चुनकर न आने वाले प्रधानमंत्री, कहीं न कहीं, स्वत: कमजोर हो जाते हैं। वैसे, राज्यसभा बनाई ही इसलिए गई है ताकि विद्वानों को देश के नीति-निर्धारण में सीधा अधिकार दिया जा सके। चूंकि बुद्धिजीवियों को चुनाव लड़ने और जीतने में आसानी नहीं होगी, इसलिए वे कभी राजनीति में आएंगे ही नहीं तो संसद केवल बहुमत का पशुबल बनकर न रह जाए। बहुमत का बुद्धिबल बने। किन्तु एक प्रधानमंत्री को तो लोकसभा में सीधे चुनकर ही आना चाहिए था।

अंतिम दिन यदि डॉ. मनमोहन सिंह के प्रति सभी पार्टियों के सांसदों ने कुछ अधिक ही सम्मान दिखाया तो उसके मूल में भी कुछ है। वह है पूरे पांच वर्ष डॉ. सिंह के प्रति विपक्ष का अति कठोर रवैया। यदि 2010 में 2जी घोटाले पर विपक्षी सांसदों ने प्रधानमंत्री पर ज़हर बुझे शब्दों का प्रयोग किया तो दो वर्ष बाद तो मानों आग ही धधका दी। कोयला घोटाले के मामले में सदन में आरोपों की ऐसी बौछार हुई कि प्रधानमंत्री बुरी तरह आहत हो गए। चूंकि चिर चुप्पी के लिए चर्चित हुए डॉ. सिंह स्वयं एक भले, ईमानदार और दुनियादारी से दूर सैद्धांतिक व्यक्ति हैं। व्यावहारिक नहीं - इसलिए विपक्ष ने उन्हें विदाई के पलों में इतना महत्व व मान दिया। मान देते समय सांसदों को संभवत: ध्यान रहा हो कि डॉ. सिंह ने अपने अपमान की बात कही थी। उन्होंने कहा था - 'क्या दुनिया में कहीं कोई देश है जहां प्रधानमंत्री का ऐसा अपमान होता हो!'

एक और बात यादगार बना गई अंतिम दिन को। लालकृष्ण आडवाणी का आंसुओं के साथ भावविभोर हो जाना। वयोवृद्ध दक्षिणपंथी राजनेता को वापमंथी संसद ने 'फादर ऑफ हाउस' कहकर जो आदर दिया है वह अभूतपूर्व था। फिर सुषमा स्वराज ने तो उन्हें रुला ही दिया। देखा जाए तो दोनों प्रमुख पार्टियों के अस्सी की उम्र के नेता - दोनों सर्वोच्च स्थिति में - और दोनों के लिए अंतिम दिन - वास्तव में केवल लोकसभा का नहीं था। किन्तु सक्रिय राजनीति, राजनीतिक जिम्मेदारी सभी से विदाई का दिन था। डॉ. सिंह अब प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। आडवाणी भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे। सो, सांसद दोनों को ससम्मान विदा कर रहे थे। बहुत अच्छा किया।
अब एक बात उस पर जिस पर भारी आश्चर्य जताया जा रहा है। सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी की प्रशंसा कर डाली! वही सुषमा, जिन्होंने घोषणा की थी कि यदि सोनिया प्रधानमंत्री बनती हैं तो वे अपना सर मुंडवा लेंगी। इसी तरह सुशील कुमार शिंदे ने सुषमा के लिए कहा कि सदन में लड़ती हैं, नाराज़ इतना हो जाती हैं कि लगता है बात करना बंद कर देंगी - लेकिन बाहर निकलते ही मिठाई से भी मीठी हैं सुषमा! वही शिंदे जो 'भगवा आंतक' कहने पर सुषमा के, समूची भाजपा के कोपभाजन का शिकार बने थे। माफी मांगने पर विवश किए गए थे।
इसके भी मूल में कुछ-कुछ डॉ. सिंह-आडवाणी जैसा ही भाव है। उतना नहीं, किन्तु नरेंद्र मोदी के उभरने के बाद सुषमा स्वराज अब किनारे पर जा चुकी हैं। फिर लोकसभा में लौंटेगी। पार्टी में अच्छी भूमिका में भी रहेंगी। किन्तु जब मोदी होते हैं तो सिर्फ मोदी ही होते हैं। एक से दस तक वे ही। ग्यारहवें नंबर से फिर कोई शुरू होगा। इसलिए, शिंदे उन्हें सोनिया की तरफ से, कांग्रेस की तरफ से गरिमामय बता रहे थे। उचित कर रहे थे।
वैसे ही बात सोनिया के लिए कही जा सकती है। वे अब उतनी सक्रिय, गतिशील नहीं रहीं। सबकुछ राहुल गांधी के कंधों पर डाल चुकी हैं। अगले तीन माह सबसे भारी हैं। सर्वे, एक के बाद एक, कांग्रेस को 'अब तक की सबसे बड़ी हार की ओर' बढ़ते हुए बता रहे हैं। विदाई। इसलिए भी सुषमा उन्हें कुछ अपनी तरह की स्थिति में पाती होंगी। परस्पर सम्मान।

सांसद इतने भावुक हों, संवेदना से भरे हों - असंभव है। किन्तु होना ही होगा। हमें बढ़ावा देना होगा। क्योंकि आपस में संवेदनशील होंगे - तो ही हम साधारण नागरिकों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो सकेंगे। हमारी वेदना यही तो है कि हमारे नेता, किसी कारण से ही - स्वार्थ से ही, मर्यादा दिखाने लगें। काश, सोलहवीं लोकसभा मर्यादित हो। जनता की तरह।
                                                                                          (लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...