Monday, March 18, 2013

पलाश से संवाद !




श्रीमति रानी विशाल जी के
ब्लाग  काव्यतरंग से साभार

                     पलाश तुम भी अज़ीब हो कोई तुम्हैं  वीतरागी समझता है तो कोई अनुरागी. और तुम हो कि बस सिर पर अनोखा रंग लगाए अपने नीचे की ज़मीन तक  को संवारते दिखते हो. लोग हैरान हैं... सबके सब अचंभित से तकते हैं तुमको गोया कह पूछ रहे हों.. हमारी तरह चेहरे संवारों ज़मीन को क्यों संवारते हो पागल हो पलाश तुम ..
                      जिसके लिये जो भी हो तुम मेरे लिये एक सवाल हो पलाश, जो खुद तो सुंदर दिखना चाहता है पर बिना इस बात पर विचार किये ज़मीन का श्रृंगार खुद के लिये ज़रूरी साधन से करता है.. ये तो वीतराग है. परंतु प्रियतमा ने कहा था –
आओ प्रिय तुमबिन लौहित अधर अधीर हुए
अरु पलाश भी  डाल-डाल  शमशीर हुए.
रमणी हूं रमण करो फ़िर चाहे भ्रमण करो..
फ़ागुन में मिलने के वादे प्रियतम अब तो  तीर हुए ...!!
                  मुझे तो तुम तो वीतरागी लगते हो.. ये तुम्हारा सुर्ख लाल  रंग जो हर सुर्ख लाल रंग से अलग है.. अपलक देखता हूं तो मुझे लगता है... कोई तपस्वी युग कल्याण के भाव  लिये योगमुद्रा में है. तुम चिंतन में होते हो पलाश और फ़ागुन की मादक बयार के सताये  प्रेमी तुमको चिंतनरत देख चिंतित नज़र आते हैं. ऐसा भ्रम मत फ़ैलाओ पलाश तुम योगी हो. यदि तुम योगी न होते तो वेदपाठी ब्राह्मण  पुत्र तुम्हैं याज्ञिक  न मानते .
                    मन कवि के विचार प्रवाह तब अचानक और तीव्रता से प्रवाहित होने लगे जब वन पथ से गुज़रती गाड़ी से दाएं-बांए एक पूरा विस्तृत पलाश वन दिखा अलमस्त पलाश जिसे कुछ लोग कहते हैं.. दहकते पलाशों से झरित रोगन सारी वन भू को रंगोली की तरह सजाया.. ! 
            तुमको किंसुक , पर्ण , याज्ञिक , रक्तपुष्पक , क्षारश्रेष्ठ , वात-पोथ , ब्रह्मावृक्ष , ब्रह्मावृक्षक , ब्रह्मोपनेता , समिद्धर , करक , त्रिपत्रक , ब्रह्मपादप , पलाशक , त्रिपर्ण , रक्तपुष्प , पुतद्रु , काष्ठद्रु , बीजस्नेह , कृमिघ्न , वक्रपुष्पक , सुपर्णी कहा जाता है.. तुम लता, वृक्ष , और क्षद्म रूप में प्रकृति को सजाते हो. तो कहीं वैद्य के लिये तुम से सर्वसुलभ कोई वनस्पति नहीं होती जो कई रोग से मुक्ति दे. 
      तुम्हारी जड़ के रेशे अघोर-तापस की जटाओं से कम नहीं हैं पलाश. वनचारी जानते हैं कि नारियल के तंतुओं को तुम्हारी जड़ में छिपे रेशे मात देते हैं. उनसे ऐसी डोर बुनी जाती जो लोहे के तारों से को भी पराजित करतीं हैं. तुम्हारी छाल के रेशों से पाल-नौकाओं, जहाज़ों की दरारों से आते पानी को रोकना प्राचीन सभ्यता को ज्ञात था.  
            पर्ण विहीन होते होकर माधव महीने में तुम ऐसा अदभुत रूप रखते हो कि सदेह बैरागी भी भावातुर हो जाए. चलो पलाश इस बार इतना ही .. तुम मेरी नज़र और नज़रिये से भले वीतरागी हो पर प्रणयातुर कामिनी और उसके प्रियतम के लिये प्रेमातुर ही आभासित होना.. प्रेम के प्रतीकों में कमी आ जाएगी जो आज़ के हिंसक एवम कुंठित समय के लिये अधिक घातक होगा. और हां कवियों को भी माधव माह में तुम्हारे बिना कौन सा प्रतीक मिलेगा तुम उन सबकी दृष्टि में अनुरागी थे हो और बने रहना ..........  

































1 comment:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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--- संजय सेन सागर

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