Monday, March 18, 2013

पलाश से संवाद !




श्रीमति रानी विशाल जी के
ब्लाग  काव्यतरंग से साभार

                     पलाश तुम भी अज़ीब हो कोई तुम्हैं  वीतरागी समझता है तो कोई अनुरागी. और तुम हो कि बस सिर पर अनोखा रंग लगाए अपने नीचे की ज़मीन तक  को संवारते दिखते हो. लोग हैरान हैं... सबके सब अचंभित से तकते हैं तुमको गोया कह पूछ रहे हों.. हमारी तरह चेहरे संवारों ज़मीन को क्यों संवारते हो पागल हो पलाश तुम ..
                      जिसके लिये जो भी हो तुम मेरे लिये एक सवाल हो पलाश, जो खुद तो सुंदर दिखना चाहता है पर बिना इस बात पर विचार किये ज़मीन का श्रृंगार खुद के लिये ज़रूरी साधन से करता है.. ये तो वीतराग है. परंतु प्रियतमा ने कहा था –
आओ प्रिय तुमबिन लौहित अधर अधीर हुए
अरु पलाश भी  डाल-डाल  शमशीर हुए.
रमणी हूं रमण करो फ़िर चाहे भ्रमण करो..
फ़ागुन में मिलने के वादे प्रियतम अब तो  तीर हुए ...!!
                  मुझे तो तुम तो वीतरागी लगते हो.. ये तुम्हारा सुर्ख लाल  रंग जो हर सुर्ख लाल रंग से अलग है.. अपलक देखता हूं तो मुझे लगता है... कोई तपस्वी युग कल्याण के भाव  लिये योगमुद्रा में है. तुम चिंतन में होते हो पलाश और फ़ागुन की मादक बयार के सताये  प्रेमी तुमको चिंतनरत देख चिंतित नज़र आते हैं. ऐसा भ्रम मत फ़ैलाओ पलाश तुम योगी हो. यदि तुम योगी न होते तो वेदपाठी ब्राह्मण  पुत्र तुम्हैं याज्ञिक  न मानते .
                    मन कवि के विचार प्रवाह तब अचानक और तीव्रता से प्रवाहित होने लगे जब वन पथ से गुज़रती गाड़ी से दाएं-बांए एक पूरा विस्तृत पलाश वन दिखा अलमस्त पलाश जिसे कुछ लोग कहते हैं.. दहकते पलाशों से झरित रोगन सारी वन भू को रंगोली की तरह सजाया.. ! 
            तुमको किंसुक , पर्ण , याज्ञिक , रक्तपुष्पक , क्षारश्रेष्ठ , वात-पोथ , ब्रह्मावृक्ष , ब्रह्मावृक्षक , ब्रह्मोपनेता , समिद्धर , करक , त्रिपत्रक , ब्रह्मपादप , पलाशक , त्रिपर्ण , रक्तपुष्प , पुतद्रु , काष्ठद्रु , बीजस्नेह , कृमिघ्न , वक्रपुष्पक , सुपर्णी कहा जाता है.. तुम लता, वृक्ष , और क्षद्म रूप में प्रकृति को सजाते हो. तो कहीं वैद्य के लिये तुम से सर्वसुलभ कोई वनस्पति नहीं होती जो कई रोग से मुक्ति दे. 
      तुम्हारी जड़ के रेशे अघोर-तापस की जटाओं से कम नहीं हैं पलाश. वनचारी जानते हैं कि नारियल के तंतुओं को तुम्हारी जड़ में छिपे रेशे मात देते हैं. उनसे ऐसी डोर बुनी जाती जो लोहे के तारों से को भी पराजित करतीं हैं. तुम्हारी छाल के रेशों से पाल-नौकाओं, जहाज़ों की दरारों से आते पानी को रोकना प्राचीन सभ्यता को ज्ञात था.  
            पर्ण विहीन होते होकर माधव महीने में तुम ऐसा अदभुत रूप रखते हो कि सदेह बैरागी भी भावातुर हो जाए. चलो पलाश इस बार इतना ही .. तुम मेरी नज़र और नज़रिये से भले वीतरागी हो पर प्रणयातुर कामिनी और उसके प्रियतम के लिये प्रेमातुर ही आभासित होना.. प्रेम के प्रतीकों में कमी आ जाएगी जो आज़ के हिंसक एवम कुंठित समय के लिये अधिक घातक होगा. और हां कवियों को भी माधव माह में तुम्हारे बिना कौन सा प्रतीक मिलेगा तुम उन सबकी दृष्टि में अनुरागी थे हो और बने रहना ..........  

































Monday, March 11, 2013

छोटे शहरों से आये लेखक-निर्देशक सिनेमा बदल रहे हैं.



पटकथा-संवाद लेखक संजय चौहान से पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत
संजय चौहान भोपाल से दिल्ली होते हुए मुंबई आये। दिल्ली में जेएनयू की पढ़ाई के दिनों में उनका संपर्क जन नाट्य मंच से हुआ। कैंपस थिएटर के नाम से उन्होंने जेएनयू में थिएटर गतिविधियां आरंभ कीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के लिए कुछ दिनों अध्यापन भी किया। मन नहीं लगा तो पत्रकारिता में लौट आये। लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद टीवी लेखन से जुड़े। फिर बेहतर मौके की उम्मीद में मुंबई आ गये। सफर इतना आसान नहीं रहा। छोटी-मोटी शुरुआत हुई। एक समय आया कि फिल्मों और टीवी के लिए हर तरह का लेखन किया। कुछ समय के बाद तंग आकर उन्होंने अपनी ही पसंद और प्राथमिकताओं को तिलांजलि दे दी। सोच-समझ कर ढंग का लेखन करने के क्रम में पहले ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ आयी। उसके बाद ‘आई एम कलाम’ से एक पहचान मिली। पिछले साल ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘पान सिंह तोमर’ से ख्याति मिली। इन फिल्मों के लिए उन्हें विभिन्न पुरस्कार भी मिले। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठा बढ़ी।
Sanjay Chouhan with Tigmanshu Dhulia
फिल्‍मकार तिग्‍मांशु धूलिया के साथ संजय चौहान
कुछ सालों पहले आपने फैसला किया था कि अब गिनी-चुनी मन की फिल्में ही करेंगे। आखिरकार उस फैसले ने आप को पहचान और प्रतिष्ठा दी?
मेरे ख्याल में वह सही फैसला था। यह ऊपर से आया कोई दबाव नहीं था। मुझे अपने मन की फिल्में लगन से करनी थीं। इत्तेफाक हुआ कि इस तरह की फिल्में मिलीं और प्रशंसित हुईं। दर्शकों ने उन्हें पसंद किया। अगर चालू किस्म की फिल्मों से जुड़ा रहता, तो संख्या बढ़ जाती। पैसे कमा लेता। उन्हें दर्शक नहीं देखते। पुरस्कारों की ज्यूरी की नजर नहीं पड़ती। आप देखें कि इन छोटी-बड़ी फिल्मों के पीछे का थॉट बहुत खास था।
कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में पहचान और कामयाबी से सभी का नजरिया बदल जाता है। ऐसा कुछ दिख रहा है क्या?
बिल्कुल, मैं इसे महसूस कर रहा हूं। ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ के संवादों की तारीफ हुई, तो लोगों का नजरिया और मिलने का अंदाज बदल गया। मुझे एक नयी दुनिया में प्रवेश मिला। ‘पान सिंह तोमर’ बहुत जमीनी फिल्म थी। बॉयोपिक थी और एक अनजान व्यक्ति पर थी, फिर भी सभी ने उसे सराहा। अपने यहां बॉयोपिक ऊब पैदा करते हैं। दर्शक उनसे अटैच नहीं हो पाते। ‘पान सिंह तोमर’ के बाद मुझे अनेक कॉल आये। कुछ लोगों ने तो किताबें भिजवायीं। वे चाहते थे कि मैं उन जीवनियों पर काम करूं। सभी को लगा कि मैं अच्छा राइटर हूं। साथ काम करने के मुझे अनेक प्रस्ताव मिले। उन दिनों अपनी व्यस्तता की वजह से मैंने थोड़ा समय मांगा तो वे इंतजार करने के लिए भी तैयार मिले।
कुछ नाम बताएंगे?
सबसे पहले इंदर कुमार का फोन आया था। पिछले मार्च में उनसे बात हुई थी। फिर दीया मिर्जा ने एक बॉयोपिक की बात की। अनुराग कश्यप भी एक बॉयोपिक चाहते थे। फिलहाल उस पर काम चल रहा है। व्यक्ति और फिल्म का नाम अभी नहीं बता सकता। इन सभी के फोन अपनी तरफ से आये। शायद ऐसा पहले नहीं होता। मुझे संपर्क करना पड़ता। बताना पड़ता।
पहचान और प्रतिष्ठा के बावजूद अभी आपको वे पैसे नहीं मिले, जो एक कमर्शियल फिल्म से मिल जाते हैं। नया राइटर दुविधा में रहता है कि वह कौन सी राह चुने। प्रतिष्ठा हासिल करे या पैसे कमाये?
मुझे लगता है इस मामले में सभी की व्यक्तिगत वजहें होती हैं। अगर किसी को ‘राउडी राठोड़’ लिखने में मजा आता है तो उसे वही लिखना चाहिए। वे ‘पान सिंह तोमर’ की संवेदनशीलता नहीं अपना पाएंगे। आरंभ में सभी को कम पैसे मिलते हैं। हिट या तारीफ होने के बाद पैसे बढ़ते हैं। अभी भी कुछ राइटर हैं, जो विदेशी फिल्मों को तोड़-मरोड़ कर लिखने में आनंद लेते हैं। शायद उनकी वैसी मानसिकता होगी। ऐसे लेखकों को किसी का जीवन सुनाएं या कोई किताब पढऩे के लिए दें तो हो सकता है कि उनकी समझ में ही न आये।
ज्यादातर नये लेखक सरवाइवल का बहाना लेकर चालू किस्म की फिल्में करते रहते हैं। उनकी पहचान नहीं बन पाती। आप की तरह मन का फैसला लेना नये राइटर के लिए शायद संभव न हो?
यह तो उन्हें तय करना होगा। मुंबई में अगर नये लेखक हैं तो 20-25 हजार का मासिक खर्च आएगा ही। अगर फाइनेंसियल सपोर्ट नहीं है तो पहला काम हर महीने इतना धन जुटाना है। नये राइटर को ढंग से पैसे भी नहीं मिलते। अलर्ट रहने की जरूरत है और इसी भीड़ में अपनी पहचान बनती है। हो सकता है कई बार अच्छा काम मुफ्त में करना पड़े।
अगर मैं आपकी बात पूछूं तो यह सफर कैसा रहा? और फिर कैसे पहचान बनी या राह मिली?
मैंने ‘बिग ब्रदर’, ‘करम’ और ‘राइट या रौंग’ जैसी फिल्में भी लिखी हैं, लेकिन उनके साथ सुधीर मिश्र की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ से भी जुड़ा रहा। बहुत ही कम पैसे में मैंने ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ लिखी। इस सफर में कई दफा समझौते करने पड़े। मुझे भी एक डीवीडी की कॉपी करनी पड़ी।
कभी डर नहीं रहा कि मेरे नाम पर धब्बा लग जाएगा?
बिल्कुल नहीं। मेरा मानना है कि आप जितना लिखेंगे, उतना निखरेंगे। दर्शक आप की अच्छी फिल्में ही याद रखते हैं। साधारण और बुरी फिल्में भूल जाते हैं। कितने लोगों को याद है कि मैंने ‘सिसकियां’ भी लिखी है। सभी को ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ याद है। कमर्शियल फिल्मों के बीच अपनी ईमानदारी की चवन्नी भी बची रहे, तो ठीक है। ऐसा न हो कि पूरी तरह से भ्रष्ट हो जाएं। बेहतर काम के लिए समझौते करना बुरी बात नहीं है। यों समझें कि आग का दरिया है और डूब के जाना है। मैंने ‘आई एम कलाम’ को कम पैसों में तीन महीने दिये, लेकिन उसका परिणाम देख लें। इस चुनाव में परिवार का सपोर्ट बहुत जरूरी है। कुछ महीने सिर्फ दाल-रोटी खानी पड़ सकती है।
फिल्म लेखन का परिवेश अभी कैसा है?
अच्छी बात है कि दूसरी तरह की फिल्में पसंद की जा रही हैं। मेरी राय में विदेशी कंपनियों और कारपोरेट हाउस के आने से फर्क पड़ा है। फॉरेन स्टूडियो भारत आ गये हैं। इन वजह से डीवीडी की चोरियां रुकी हैं। अब महेश भट्ट और अब्बास-मस्तान भी राइट खरीद कर नकल कर रहे हैं। चोरी रुकने से ही दक्षिण की फिल्मों का हिंदी में चलन बढ़ा है। मौलिक और नयी कहानियों की मांग बढ़ी है। मेरा मानना है कि ‘एक था टाइगर’, ‘राउडी राठोड़’ और ‘बोल बच्चन’ जैसी फिल्में भी दर्शकों को चाहिए। उनकी कामयाबी से इंडस्ट्री में रवानी आती है। गंभीर फिल्ममेकर भी एक हिट फिल्म चाहता है।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर को तीन ही युवा लेखक-निर्देशक दिखे – आदित्य चोपड़ा, करण जौहर और फरहान अख्तर। वे मौलिकता और विविधता का रोना रो रहे थे?
मुझे नहीं मालूम कि किस संदर्भ में उन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया। आप स्वयं देखें कि नयी फिल्में नये कथ्य और शिल्प के साथ आ रही हैं। सिनेमा का नया विश्व आया है। जावेद साहब उन तीन को नजदीक से जानते हैं। तीनों फिल्म इंडस्ट्री के हैं। फिल्मों में वास्तविक बदलाव छोटे शहरों से आये लेखक और निर्देशक कर रहे हैं। अगले दस सालों में यह आमद और बढ़ेगी। थोड़ा वक्त लगेगा, भेड़चाल होगी, लेकिन उनके बीच ही नयी चीजें सामने आएंगी। बाहर से आये फिल्ममेकर की जड़ें गहरी हैं। उनकी कहानियां जमीनी और सहज हैं। ठीक है कि उनकी फिल्में 100 करोड़ नहीं कमा रही हैं, लेकिन जब इतिहास लिखा जाएगा तो उनका ही उल्लेख होगा। इतिहास में 100 करोड़ और 200 करोड़ की कमाई नहीं देखी जाएगी। पिछले साल की ही फिल्में देख लें। आप दोबारा किन फिल्मों को देखना चाहेंगे?
क्या एक्टर को स्क्रिप्ट की समझ होती है?
बहुत कम होती है। मजेदार तथ्य है कि इक्का-दुक्का एक्टर ही स्क्रिप्ट पढ़ते हैं। सब सुनते हैं। हिंदी फिल्मों में नैरेशन और स्टोरी सीटिंग की लंबी परंपरा है। अब चूंकि वे सालों से कहानियां सुनते आ रहे हैं, इसलिए पुराने अनुभवों के आधार पर ही नयी फिल्में चुनते हैं। नये विषय पर फिल्म करने की हिम्मत कम एक्टर दिखाते हैं। स्क्रिप्ट पढ़ कर ज्यादातर एक्टर फिल्म नहीं समझ पाते।
स्क्रिप्ट लेखन में सबसे बड़ा बदलाव क्या आया है?
अभी सेट या लोकेशन पर लिखने का चलन कम हो रहा है। हर फिल्म को लिखने के लिए दो-चार महीने का समय दिया जा रहा है। पहले राइटर को सेट पर सीन सुना दिया जाता था और वह फट से डायलॉग लिख देता था। ज्यादातर हिंदी फिल्मों का लेखन डायलॉग पर निर्भर करता है।
हां, कहानी किसी की, स्क्रिप्ट किसी की और डायलॉग किसी और के … ऐसा क्यों है?
हिंदी फिल्मों में इसके खास कारण हैं। पहले पंजाब, बंगाल और दक्षिण से निर्माता-निर्देशक आये। उनके पास आइडिया थे, लेकिन वे उन्हें हिंदी में नहीं लिख सकते थे। इस वजह से स्क्रिप्ट राइटर और डायलॉग राइटर की मांग बढ़ी। आज भी कई मशहूर लेखक और निर्देशक अंग्रेजी में लिखते हैं। उनकी लिखी फिल्मों का हिंदी में अनुवाद किया जाता है। इस वजह से संवाद में हिंदी की रवानी नहीं होती। हिंदी फिल्मों में मुहावरों का प्रयोग कम होता जा रहा है। देसी शब्दों और लहजों की कमी है।
आप की पृष्ठभूमि हिंदी की है। हिंदी में अनेक लेखक चाहते हैं कि वे स्वयं फिल्में लिखे या उनकी कृतियों पर फिल्में बने। इस दबी इच्छा के बावजूद वे फिल्म लेखन को दोयम दर्जे का मानते हैं। ऐसा विरोधाभास क्यों है?
इस विरोधाभास की जड़ें हिंदी समाज में हैं। लेखकों को ईश्वर सदृश माना जाता है, जबकि फिल्मों को घटिया विधा माना जाता है। हर हिंदी लेखक साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार चाहता है। साथ में पैसों और ख्याति के लिए फिल्में भी करना चाहता है। हिंदी साहित्य की यह स्थिति है कि मशहूर लेखकों को भी प्रति पुस्तक 10-12 हजार से ज्यादा नहीं मिलते, जबकि फिल्मों में पारिश्रमिक लाखों में है। मेरी सलाह है कि हिंदी लेखकों को डिफेंस मैकेनिज्म छोड़कर फिल्म लेखन में उतरना चाहिए। सबसे पहले वे फिल्मी लेखन की इज्जत करें और इसके शिल्प को सीखें। अगर कोई फिल्मकार आपकी पुस्तक ले रहा है तो आजादी दें। मैं काशीनाथ सिंह की तारीफ करूंगा। उन्होंने ‘काशी का अस्सी’ का अधिकार डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी को देने के बाद स्क्रिप्ट में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। मैंने सुना है कि ‘मोहल्ला अस्सी’ बहुत ही सारगर्भित और मनोरंजक फिल्म बनी है।
साधिकार चवन्‍नी चैप

Monday, March 4, 2013

book review: novel: mujhe jeena hai critic acharya sanjiv verma 'salil'


कृति चर्चा:
मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज ''मुझे जीना है''
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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(कृति विवरण: मुझे जीना है, उपन्यास, आलोक श्रीवास्तव, डिमाई आकार, बहुरंगी सजिल्द आवरण, पृष्ठ १८३, १३० रु., शिवांक प्रकाशन, नई दिल्ली)
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                  विश्व की सभी भाषाओँ में गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा उपन्यास है। उपन्यास शब्द अपने जिस अर्थ में आज हमारे सामने आता है उस अर्थ में वह प्राचीन साहित्य में उपलब्ध नहीं है। वास्तव में अंगरेजी साहित्य की 'नोवेल' विधा हिंदी में 'उपन्यास' विधा की जन्मदाता है। उपन्यास जीवन की प्रतिकृति होता है। उपन्यास की कथावस्तु का आधार मानवजीवन और उसके क्रिया-कलाप ही होते हैं। आलोचकों ने उपन्यास के ६ तत्व कथावस्तु, पात्र, संवाद, वातावरण, शैली और उद्देश्य माने हैं। एक अंगरेजी समालोचक के अनुसार- 'आर्ट लाइज इन कन्सीलमेंट' अर्थात 'कला दुराव में है'। विवेच्य औपन्यासिक कृति 'मुझे जीना है' इस धारणा का इस अर्थ में खंडन करती है कि कथावस्तु का विकास पूरी तरह सहज-स्वाभाविक है।

                  खंडकाव्य पंचवटी  में मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है: 

'जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला, 
गौरव गंध उन्हें उतना ही यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला'।

                     उपन्यास के चरित नायक विजय पर उक्त पंक्तियाँ पूरी तरह चरितार्थ होती हैं।  छोटे से गाँव के निम्न मध्यम खेतिहर परिवार के बच्चे के माता-पिता का बचपन में देहावसान, दो अनुजों का भार, ताऊ द्वारा छलपूर्वक मकान हथियाकर नौकरों की तरह रखने का प्रयास, उत्तम परीक्षा परिणाम पर प्रोत्साहन और सुविधा देने के स्थान पर अपने बच्चों को पिछड़ते देख ईर्ष्या के वशीभूत हो गाँव भेज पढ़ाई छुड़वाने का प्रयास, शासकीय विद्यालय के शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहन, गाँव में दबंगों के षड्यंत्र, खेती की कठिनाइयाँ और कम आय, पुनः शहर लौटकर अंशकालिक व्यवसाय के साथ अध्ययन कर अंतत: प्रशासनिक सेवा में चयन... उपन्यास का यह कथा-क्रम पाठक को चलचित्र की तरह बाँधे रखता है। उपन्यासकार ने इस आत्मकथात्मक औपन्यासिक कृति में आत्म-प्रशंसा से न केवल स्वयं को बचाया है अपितु बचपन में कुछ कुटैवों में पड़ने जैसे अप्रिय सच को निडरता और निस्संगता से स्वीकारा है।

                   शासकीय विद्यालयों की अनियमितताओं के किस्से आम हैं किन्तु ऐसे ही एक विद्यालय में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थी के प्रवेश देने के पूर्व उसकी योग्यता की परख किया जाना, अनुपस्थिति पर पड़ताल कर व्यक्तिगत कठिनाई होने पर न केवल मार्ग-दर्शन अपितु सक्रिय सहायता करना, यहाँ तक की आर्थिक कठिनाई दूर करने के लिए अंशकालिक नौकरी दिलवाना... इस सत्य के प्रमाण है कि शिक्षक चाहे तो विद्यार्थी का जीवन बना सकता है। यह कृति हर शिक्षक और शिक्षक बनने के प्रशिक्षणार्थी को पढ़वाई जानी चाहिए ताकि उसे अपनी सामर्थ्य और दायित्व की प्रतीति हो सके। विपरीत परिस्थितियों और अभावों के बावजूद जीवन संघर्षों से जूझने और सफल होने का यह  यह कथा-वृत्त हर हिम्मत न हारनेवाले के लिए अंधे की लकड़ी हो सकता है। कृति में श्रेयत्व के साथ-साथ प्रेयत्व का उपस्थिति इसे आम उपन्यासों से अलग और अधिक प्रासंगिक बनाती है।

                  अपनी प्रथम कृति में जीवन के सत्यों को उद्घाटित करने का साहस विरलों में ही होता है। आलोक जी ने कैशोर्य में प्रेम-प्रकरण में पड़ने, बचपन में धूम्रपान जैसी घटनाओं को न छिपाकर अपनी सत्यप्रियता का परिचय दिया है। वर्तमान काल में यह प्रवृत्ति लुप्त होती जा रही है। मूल कथावस्तु के साथ प्रासंगिक कथावस्तु के रूप में शासकीय माडल हाई स्कूल जबलपुर के शिक्षकों और वातावरण, खलनायिकावत  ताई, अत्यंत सहृदय और निस्वार्थी चिकित्सक डॉ. एस. बी. खरे, प्रेमिका राधिका, दबंग कालीचरण, दलित स्त्री लक्ष्मी द्वारा अपनी बेटी के साथ बलात्कार का मिथ्या आरोप, सहृदय ठाकुर जसवंत सिंह तथा पुलिस थानेदार द्वारा निष्पक्ष कार्यवाही आदि प्रसंग न केवल कथा को आगे बढ़ाते हैं अपितु पाठक को प्रेरणा भी देते हैं। सारतः उपन्यासकार समाज की बुराइयों का चित्रण करने के साथ-साथ घटती-मिटती अच्छाइयों को सामने लाकर बिना कहे यह कह पाता है कि अँधेरे कितने भी घने हों उजालों को परास्त नहीं कर सकते।   

               उपन्यासकार के कला-कौशल का निकष कम से कम शब्दों में उपन्यास के चरित्रों को उभारने में है। इस उपन्यास में कहीं भी किसी भी चरित्र को न तो अनावश्यक महत्त्व मिला है, न ही किसी पात्र की उपेक्षा हुई है। शैल्पिक दृष्टि से उपन्यासकार ने चरित्र चित्रण की विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाया है तथा पात्रों की मानसिक-शारीरिक स्थितियों, परिवेश, वातावरण आदि का विश्लेषण स्वयं किया है। वर्तमान में नाटकीय पद्धति बेहतर मानी जाती है जिसमें उपन्यासकार नहीं घटनाक्रम, पात्रों की भाषा तथा उनका आचरण पाठक को यह सब जानकारी देता है। प्रथम कृति में शैल्पिक सहजता अपनाना स्वाभाविक है। उपन्यास में संवादों को विशेष महत्त्व नहीं मिला है। वातावरण चित्रण का महत्त्व उपन्यासकार ने समझा है और उसे पूरा महत्त्व दिया है।

                  औपन्यासिक कृतियों में लेखक का व्यक्तित्व नदी की अंतर्धारा की तरह घटनाक्रम में प्रवाहित होता है। इस सामाजिक समस्या-प्रधान उपन्यास में प्रेमचंद की तरह बुराई का चित्रण कर सुधारवादी दृष्टि को प्रमुखता दी गयी है। आजकल विसंतियों और विद्रूपताओं का अतिरेकी चित्रण कर स्वयं को पीड़ित और समाज को पतित दिखने का दौर होने पर भी आलोक जी ने नकारात्मता पर सकारात्मकता को वरीयता दी है। यह आत्मकथात्मक परिवृत्त तृतीय पुरुष में होने के कारण उपन्यासकार को चरित-नायक विजय में विलीन होते हुए भी यथावसर उससे पृथक होने की सुविधा मिली।

                   मुद्रण तकनीक सुलभ होने पर भी खर्चीली है। अतः, किसी कृति को सिर्फ मनोरंजन के लिए छपवाना तकनीक और साधनों का दुरूपयोग ही होगा। उपन्यासकार सजगता के साथ इस कृति को रोचक बनाने के साथ-साथ समाजोपयोगी तथा प्रेरक बना सका है। आदर्शवादी होने का दम्भ किये बिना उपन्यास के अधिकांश चरित्र प्रेमिका राधिका, माडल हाई स्कूल के प्राचार्य और शिक्षक, मित्र, ठाकुर जसवंत सिंह, पुलिस निरीक्षक, पुस्तक विक्रय केंद्र की संचालिका श्रीमती मनोरमा चौहान (स्व. सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्रवधु) आदि पात्र दैनंदिन जीवन में बिना कोई दावा या प्रचार किये आदर्शों का निर्वहन अपना कर्तव्य मानकर करते हैं। दूसरी ओर उच्चाधिकारी ताऊजी, उनकी पत्नी और बच्चे सर्व सुविधा संपन्न होने पर भी आदर्श तो दूर अपने नैतिक-पारिवारिक दायित्व का भी निर्वहन नहीं करते और अपने दिवंगत भाई की संतानों को धोखा देकर उनके आवास पर न केवल काबिज हो जाते हैं अपितु उन्हें अध्ययन से विमुख कर नौकर बनाने और गाँव वापिस भेजने का षड्यंत्र करते हैं। यह दोनों प्रवृत्तियाँ समाज में आज भी कमोबेश हैं और हमेशा रहेंगी।

                  यथार्थवादी उपन्यासकार इमर्सन ने कहा है- ''मुझे महान दूरस्थ और काल्पनिक नहीं चाहिए, मैं साधारण का आलिंगन करता हूँ।'' आलोक जी संभवतः इमर्सन के इस विचार से सहमत हों। सारतः मुझे जीना है मानवीय जिजीविषा का जीवंत और सार्थक दस्तावेज है जो लुप्त होते मानव-मूल्यों के प्रति और मानवीय अस्मिता के प्रति आस्था जगाने में समर्थ है। उपन्यासकार आलोक श्रीवास्तव इस सार्थक कृति के सृजन हेतु बधाई के पात्र हैं.
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लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...