Thursday, January 31, 2013

विश्वरूपम: जया टीवी को हुआ नुकसान तो ‘सेकुलर’ बनीं जयललिता!


मल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर प्रतिबंध को लेकर कई स्तरों पर बहस चल रही है। न्यायिक से लेकर बौद्धिक और सामाजिक से लेकर सांप्रदायिक स्तर तक। जिस स्तर पर बात नहीं हो रही है वह है राजनीतिक और व्यावसायिक। जयललिता सरकार का प्रतिबंध सिर्फ मुस्लिमों के आहत होने का मामला है या फिर इसके पीछे राजनीति और धंधा भी है?
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तमिलनाडु की राजनीति और जयललिता के राजनीतिक मिजाज को समझने वाले कह रहे हैं कि यह फिल्म विश्वरूपम का मामला नहीं फिल्मकार कमल हासन का मामला है। जिसमें न सिर्फ राजनीतिक चालें चली जा रही हैं बल्कि इसमें व्यवसाय के प्यादे भी वार कर रहे हैं।
जानकार जो कह रहे हैं उसके अनुसार ये तीन वजहें हैं जिसने विश्वरूपम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सैटेलाइट राइट्स का मामला
कमल हासन के करीबी एक पत्रकार का कहना है कि इस फिल्म की मुसीबत उस दिन शुरु हो गई थी जिस दिन कमल हासन ने इसे डीटीएच पर रिलीज करने का ऐलान किया था। इस ऐलान से पहले कमल हासन की फिल्म के सैटेलाइट राइट्स का समझौता जया टीवी से हो चुका था। नाम से जाहिर है कि इस टीवी चैनल का संबंध जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके से है। जया टीवी पर बाकायदा इस फिल्म का आडियो भी रिलीज किया गया। लेकिन जैसे ही कमल हासन ने विश्वरूपम को डीटीएच पर रिलीज करने की घोषणा की, जया टीवी ने सैटेलाइट टीवी के अधिकार खरीदने से इनकार कर दिया।
इस पत्रकार का कहना है कि इसके बाद कमल हासन ने सैटेलाइट टीवी के सारे अधिकार स्टार विजय को बेच दिए। करुणानिधि के बयान ने इस विवाद की पुष्टि कर दी है। हालांकि करुणानिधि का कहना है कि जया टीवी विश्वरूपम के सैटेलाइट अधिकार मिट्टी के मोल खरीदना चाहता था।
जब जयललिता इस बार फिर से मुख्यमंत्री बनीं थीं तो कमल हासन एकमात्र फिल्मकार और अभिनेता थे जिनसे जयललिता ने मिलना स्वीकार किया था। अब वही कमल हासन जया टीवी से बगावत कर रहे थे। ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति किसी भी व्यक्ति को बख्श देने की सिफारिश नहीं करती।
इसके अलावा डीटीएच पर रिलीज के मसले को लेकर थिएटर मालिक भी एकाएक कमल हासन के खिलाफ हो गए कि कहीं वह एक ऐसी परंपरा शुरू न कर दें जिससे भविष्य में धंधा ही चैपट हो जाए। कहा जा रहा है कि इस मामले में उनकी भी अहम भूमिका है।
‘धोती वाला प्रधानमंत्री’
इंटरनेट पर मौजूद सामग्रियां गवाह हैं कि कमल हासन ने न सिर्फ व्यावसायिक गलती की बल्कि राजनीतिक चाल भी गलत चल दी। दिसंबर के अंत में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने एक ओर करुणानिधि की तारीफ की और दूसरी ओर वह किसी ‘धोती वाले’ को प्रधानमंत्री बनने की हिमायत कर बैठे। जाहिर है उनका इशारा पी. चिदंबरम की ओर था।
अगर मशहूर अभिनेत्री रहीं जयललिता को आज दुस्वप्न आते होंगे तो उनमें खलनायक की भूमिका में करुणानिधि और चिदंबरम ही दिखाई देते होंगे। उन्हें तो इतना ही नागवार गुजरता कि कमल हासन इन दोनों के साथ किसी कार्यक्रम में थे। ऐसे में कमल हासन के मुंह से इन दोनों की सरेआम तारीफ जयललिता को क्योंकर बर्दाश्त होती? और ‘धोती वाला प्रधानमंत्री‘ की तरफदारी का साफ मतलब ये था कि वे प्रकारांतर से इस पद पर जयललिता को बिठाने का विरोध कर रहे हैं।
लोग कहते हैं कि फिल्म विश्वरूपम इस गलती की सजा भी भुगत रही है।
वोट की राजनीति
चेन्नई में एक टीवी चैनल के वरिष्ठ पत्रकार का आकलन है कि जयललिता तमिलनाडु से बाहर भले ही मोदी के करीब दिख जाएं और एनडीए में लौटने के मंसूबे बांध रही हों लेकिन वे तमिलानाडु में सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहती हैं। उनका कहना है कि ऐसा इसलिए नहीं कि ये उनकी राजनीतिक विचारधारा है बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें लोकसभा के चुनाव निकट दिख रहे हैं और वो चाहती हैं कि मुसलमान उनके करीब बने रहें।
ऐसा नहीं है कि किसी फिल्म को लेकर किसी समुदाय या संप्रदाय के लोगों ने पहली बार विरोध जताया हो, वो कई बार जताते हैं और अदालत का दरवाजा भी खटखटाते रहे हैं लेकिन आखिर में निर्माता-निर्देशक थोड़ी बहुत कांट-छांट और तब्दीली के लिए तैयार हो जाते हैं। जो कि इस मामले में कमल हासन भी हो गये थे। वे आगे कहते हैं कि लेकिन चूंकि ये मामला मूल रूप से किसी संप्रदाय या समुदाय का नहीं, राजनीति का था इसलिए इस पर भी कोई समझौता नहीं हो सका।
तमिल राजनीति पर नजर रखने वाले एक अन्य पत्रकार का कहना है कि आज कमल हासन भले ही भावुक होकर देश छोड़ने की बातें कह रहे हों लेकिन ऐसा लगता है कि वे सांस्कृतिक और कलात्मक स्वतंत्रता पर भरोसा करते-करते ये भूल गए कि राजनीति एक घर भी नहीं छोड़ती।
और जयललिता तो बिल्कुल भी नहीं।
(बीबीसी हिंदी से साभार)

Saturday, January 26, 2013

सेक्‍स का लती हुआ इंडिया? 37 साल के शख्‍स ने 922 लोगों से बनाया रिश्‍ता।

सेक्स भारत जैसे देश में कई लोगों के लिए बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन अब भारत जैसे देश में सेक्स एडिक्शन यानी लत की शक्ल लेता जा रहा है। 37 साल के सोहन दिल्ली की एक कंपनी में काम करते हैं। शादीशुदा मोहन एक बच्चे के पिता हैं और सामान्य जिंदगी जीते हैं। लेकिन उनके बारे में एक बात बेहद चौंकाने वाली है। वे अब तक 922 पुरुष-महिला के साथ सेक्स कर चुके हैं। 

सोहन के मुताबिक, 'जब मैं स्कूल में था, तब से मैं सेक्स कर रहा हूं। तब मेरा झुकाव पोर्न की तरफ हो गया। तब एक दिन मेरे दोस्तों ने मेरे लिए एक लड़की का इंतजाम किया। जब तक मैं  35 साल का हुआ, मैं 6,500 महिलाओं के साथ चैट कर चुका था। मैं अपना मोबाइल नंबर ऑनलाइन छोड़ देता था। लेकिन जब मैं पुरुषों के साथ सेक्स करने लगा तो मानसिक तौर पर प्रताड़ित महसूस करने लगा और तब मैं यह सब छोड़ना चाहता था।' 

धीरे-धीरे आधुनिकता का लबादा ओढ़ते जा रहे भारत जैसे मुक्त, मोबाइल और अच्छी तरह से कनेक्टेड देश में तमाम युवा सेक्स एडिक्शन के शिकार हैं। नौकरशाह, नेता, फिल्म स्टार, डॉक्टर और छात्र-छात्राएं सेक्स एडिक्शन की चपेट में हैं। लेकिन इस देश में बहुत कम ऐसे क्लीनिक हैं, जहां सेक्स के आदी लोगों के इलाज की व्यवस्था है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के मुताबिक, सामान्य तौर पर पुरुष महिलाओं को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बेकाबू माहौल में जब पुरुष अनियंत्रित होते हैं तो इसका नतीजा यौन शोषण और बलात्कार के तौर पर सामने आती है। सेक्स के आदी पुरुष समाज खासकर महिलाओं के लिए बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। इस बात का अंदाजा देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं से बलात्कार के मामलों में सिर्फ वर्ष 2012 में 24 फीसदी की बढ़ोतरी से लगाया जा सकता है।

जानकार अब इस बात पर सहमत हो रहे हैं 'पैराफीलिया' यानी 'प्रेम से परे' की भावना भारत में कई लोगों के मन में भर गई है। मुंबई के सेक्सुअल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. रंजन भोंसले के मुताबिक, 'पिछले दशक में सेक्स एडिक्शन के मामले दोगुने हो गए हैं।' वहीं, सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. प्रकाश कोठारी का कहना है कि उन्हें पहले एक महीने में सेक्स एडिक्शन के 1-3 मरीज मिलते थे, लेकिन अब यह तादाद 10-12 हो गई है।

भारत की तुलना में ज़्यादा खुला समझने जाने वाले पश्चिमी देश अमेरिका में सेक्स एडिक्शन के मामले कई गुना ज्यादा हैं। सोसाइटी फॉर द अडवांसमेंट ऑफ सेक्सुअल हेल्थ के मुताबिक सेक्स में एक्टिव आबादी का करीब 3-5 फीसदी हिस्सा सेक्स एडिक्शन का शिकार है। लेकिन डॉ. रंजन भोंसले के मुताबिक, भारत में ढोंग है। सेक्स एडिक्शन की वास्तविक संख्या ज़्यादा होगी। ईरान जैसे बेहद परंपरावादी देश में सेक्स के आदी 1,572 लोग हैं जो सेक्साहॉलिक्स एनॉनिमस ग्रुप के सदस्य हैं। वहीं, भारत में इस ग्रुप में सदस्यों की तादाद महज 2 है। सेक्स एडिक्ट्स एनॉनिमस दिल्ली में 28 जनवरी को अपनी पहली बैठक करने जा रहा है। बेंगलुरु के रहने वाले 55 साल के राजीव 11 साल की उम्र से पॉर्नोग्राफी की चपेट में हैं। राजीव दिल्ली में सेक्स एडिक्ट्स की पहली मीटिंग में हिस्सा लेने की तैयारी कर रहे हैं। पेशे से इंजीनियर राजीव के मुताबिक, 'मैं छह महीनों में 20 किलो पॉर्न मैगजीन और सीडी खरीदकर उनको देखता था और फिर उन्हें कूड़े में फेंक देता और नई पत्रिकाएं और सीडी खरीदता था। मेरा पत्नी के साथ कोई रिश्ता नहीं था। चार सालों तक मैं वेश्याओं की सेवाएं लेता था और उन पर 10 लाख रुपये लुटाए थे। मेरा इलाज विदेश में एक रिहैबिलिटेशन सेंटर में हुआ। लेकिन हममें से हर कोई इलाज के लिए विदेश नहीं जा सकता है। हमें ऐसी जगहों की जरूरत भारत में है।

Friday, January 25, 2013

इश्वर सबको सदबुद्धि दे....

मै पलकें नीची किये बगल से गुजर जाऊंगा जब तुम किसी पार्क में --------------.रही होगी, क्योंकि मेरे बाप का क्या जाता है?, मै देख कर भी अनदेखा करूँगा क्योंकि, मुझसे क्या मतलब होगा?...तुम कुछ भी करो, मै अपने काम से काम रखूँगा, जब किसी दीवार के पीछे या झाडियों की ओट से या किसी तनहा कमरे से तुम्हारी आहट मिलेगी क्योंकि, तुम्हें अपना भला-बुरा अच्छी तरह पता है!!..पर याद रखना मै उस वक्त भी चुप रहूँगा जब तुम किसी के एक फोन पर उससे मिलने जाओगी इंडिया गेट, या किसी पब या बार के बाहर जब तुम्हारे कपडे तार-तार हो रहे होंगे या जब किसी चलती बस में तुम्हारा बालात्कार हो रहा होगा ....मुझे डर होगा कही तुम फिर मुझे अपना रास्ता देखने की नसीहत न पकड़ा दो ..... मुझे हमेशा दुख रहेगा उन माँ-बाप के लिए जो तुमपर भरोसा करते है...इश्वर सबको सदबुद्धि दे.

Tuesday, January 22, 2013

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस

63 गणतंत्र का साक्षी बना भारत देश इस महीने 26 जनवरी को 64वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। इस खास मौके को लेकर dainikbhaskar.com एक स्पेशल सीरीज चला रहा है। पाठकों को संविधान, गणतंत्र और तिरंगे से जुड़ी रोचक जानकारियां देंगे। इस सीरीज के पहले दिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि देश की शान तिरंगा आखिर बनता कैसे है? क्यों भारत के सिर्फ एक ही शहर को तिरंगा बनाने का अधिकार दिया गया है। साथ ही हम आपको बताएंगे कि किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरकर आप तक पहुंचता है तिरंगा।


ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
26 जनवरी को गांव के प्रधान से लेकर देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति तक सभी झंडा रोहण करते हैं। हम सभी भी अपने घरों पर शान से झंडा फराते हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड द्वारा राष्ट्रध्वज को तैयार करने के तीन दस्तावेज जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सभी झंडे खादी के सिल्क या कॉटन के होंगे। झंडे बनाने का  मानक 1968 में तय किया गया जिसे 2008 में पुन: संशोधित किया गया। तिरंगे के लिए नौ स्टैंडर्ड साइज तय किए गए हैं। सबसे बड़ा झंडा 21 फीट लंबा और 14 फीट चौड़ा होता है।
 
सबसे पहले बैंगलुरू से लगभग 550 किमी दूर स्थित बगालकोट जिले के खादी ग्रामोद्योग सयुक्त संघ में कपड़े को बहुत ध्यान से काता और बुना जाता है। 
 
इसके बाद कपड़े को तीन अलग-अलग लॉट बनाए जाते हैं। इन को तिरंगे के तीन अलग-अलग रंगो में डाई किया जाता है। 

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
डाई किए हुए  कपड़े बैंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली इकाई में भेज दिए जाते हैं। यहां इन्हें अगल-अलग साइज के अनुसार काटा जाता है। कटे हुए कपड़े को हुबली में ही सिला जाता। यहां लगभग 40 महिलाएं प्रतिदिन 100 के करीब झंडे सिलती हैं।

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
कटे हुए सफेद कपड़े पर चक्र प्रिंट किया जाता है। इसके बाद तिरंगे की तीनों रंग के कपड़े की सिलाई की जाती है। सिलाई के बाद कपड़े को पेस किया जाता है। सबसे बड़े आकार का झंडा 21 फीट लम्बा व 14 फीट चौड़ा होता है। ऐसे ही एक झंडे को हुबली स्थित इकाई में प्रेस कर रहीं हैं ये दो कर्मचारी महिलाएं।

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
21 फीट बाई 14 फीट के झंडे पूरे देश में केवल तीन किलों के ऊपर फहराए जाते हैं। 
 
मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले  में स्थित किला उनमें से एक है। इसके अतरिक्त कर्नाटक का नारगुंड किले और महाराष्ट्र का पनहाला किले पर भी सबसे लम्बे झंडे को फहराया जाता है। 

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल रंग हिन्दुओं के लिए और हरा रंग मुस्लिमों के लिए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मो के लिए सफेद रंग जोड़ा गया।           स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ दिन पहले संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज को  मॉडीफाई किया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली।
इस नए झंडे की देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने फिर से व्याख्या की। 

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस
1951 में पहली बार भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए। 1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम अत्यंत कड़े हैं। केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता। कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी टेस्टिंग की जाती है।
झंडा बनाने के लिए दो तरह की खादी का प्रयोग किया जाता है। एक वह खादी जिससे कपड़ा बनता है और दूसरा खादी-टाट। खादी के केवल कपास, रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है। यहां तक की इसकी बुनाई भी सामन्य बुनाई से भिन्न होती है। 
ये बुनाई बेहद दुर्लभ होती है। इसे केवल पूरे देश के एक दर्जन से भी कम लोग जानते हैं। धारवाण के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में ही खादी की बुनाई की जाती है। जबकी हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहां से झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है।
बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है।बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है। इसके बाद उसे तीन रंगो में रंगा जाता है।  केंद्र में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बिआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है।

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...