Saturday, May 12, 2012

ज्ञानपीठ अपमान !


हिंदी के युवा लेखक गौरव सोलंकी को साहित्‍यिक संस्‍था भारतीठ ज्ञानपीठ ने पिछले साल 'नवलेखन पुरस्कार' देने की घोषणा की थी. हाल ही में गौरव ने यह पुरस्कार ठुकरा दिया है और अपनी दो किताबों का प्रकाशन अधिकार भी वापस ले लिया है. भारतीय ज्ञानपीठ को लिखा गौरव का वह बेबाक पत्र जिसमें उन्होंने पुरस्कार को सम्मान की बजाय अपमान बताते हुए इसे वापस करने की वजहें बताई हैं
अपने पत्र में गौरव ने ज्ञानपीठ से यह आग्रह भी किया है कि वह खुद को कुछ लोगों की संकीर्ण राजनीति का गढ़ न बनने दे और अपनी प्रतिष्ठा बचाए.

आदरणीय ...... ,
भारतीय ज्ञानपीठ
खाली स्थान इसलिए कि मैं नहीं जानता कि भारतीय ज्ञानपीठ में इतना ज़िम्मेदार कौन है जिसे पत्र में सम्बोधित किया जा सके और जो जवाब देने की ज़हमत उठाए. पिछले तीन महीनों में मैंने इस खाली स्थान में कई बार निदेशक श्री रवीन्द्र कालिया का नाम भी लिखा और ट्रस्टी श्री आलोक जैन का भी, लेकिन नतीजा वही. ढाक का एक भी पात नहीं. मेरे यहां सन्नाटा और शायद आपके यहां अट्टहास.
 खैर, कहानी यह जो आपसे बेहतर कौन जानता होगा लेकिन फिर भी दोहरा रहा हूं ताकि सनद रहे.
 पिछले साल मुझे मेरी कविता की किताब ‘सौ साल फिदा’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ ने नवलेखन पुरस्कार देने की घोषणा की थी और उसी ज्यूरी ने सिफारिश की थी कि मेरी कहानी की किताब ‘सूरज कितना कम’ भी छापी जाए. जून, 2011 में हुई उस घोषणा से करीब नौ-दस महीने पहले से मेरी कहानी की किताब की पांडुलिपि आपके पास थी, जो पहले एक बार ‘अज्ञात’ कारणों से गुम हो गई थी और ऐन वक्त पर किसी तरह पता चलने पर मैंने फिर जमा की थी.
मां-बहन को कम से कम यह तो खुद तय करने दीजिए कि वे क्या पढ़ें या क्या नहीं. उन्हें आपके इस उपकार की ज़रूरत नहीं है. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए. उन्हें यह 'अश्लीलता' पढ़ने दीजिए कि कैसे एक कहानी की नायिका अपना बलात्कार करने वाले पिता को मार डालती है. लेकिन मैं जानता हूं कि इसी से आप डरते हैं
ख़ैर, मार्च में कविता की किताब छपी और उसके साथ बाकी पांच लेखकों की पांच किताबें भी छपीं, जिन्हें पुरस्कार मिले थे या ज्यूरी ने संस्तुत किया था. सातवीं किताब यानी मेरा कहानी-संग्रह हर तरह से तैयार था और उसे नहीं छापा गया. कारण कोई नहीं. पन्द्रह दिन तक मैं लगातार फ़ोन करता हूं और आपके दफ़्तर में किसी को नहीं मालूम कि वह किताब क्यों नहीं छपी. आखिर पन्द्रह दिन बाद रवीन्द्र कालिया और प्रकाशन अधिकारी गुलाबचन्द्र जैन कहते हैं कि उसमें कुछ अश्लील है. मैं पूछता हूं कि क्या, तो दोनों कहते हैं कि हमें नहीं मालूम. फिर एक दिन गुलाबचन्द्र जैन कहते हैं कि किताब वापस ले लीजिए,यहां नहीं छप पाएगी. मैं हैरान. दो साल पांडुलिपि रखने और ज्यूरी द्वारा चुने जाने के बाद अचानक यह क्यों? मैं कालिया जी को ईमेल लिखता हूं. वे जवाब में फ़ोन करते हैं और कहते हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है, बस एक कहानी 'ग्यारहवीं ए के लड़के' की कुछ लाइनें ज्ञानपीठ की मर्यादा के अनुकूल नहीं है. ठीक है, आपकी मर्यादा तो आप ही तय करेंगे, इसलिए मैं कहता हूं कि मैं उस कहानी को फ़िलहाल इस संग्रह से हटाने को तैयार हूं. वे कहते हैं कि फिर किताब छप जाएगी.
 लेकिन रहस्यमयी ढंग से फिर भी ‘कभी हां कभी ना कभी चुप्पी’ का यह बेवजह का चक्र चलता रहता है और आख़िर 30 मार्च को फ़ोन पर कालिया जी कहते हैं कि ज्ञानपीठ के ट्रस्टी आलोक जैन मेरे सामने बैठे हैं और यहां तुम्हारे लिए माहौल बहुत शत्रुतापूर्ण हो गया है, इसलिए मुझे तुम्हें बता देना चाहिए कि तुम्हारी कहानी की किताब नहीं छप पाएगी. मैं हैरान हूं. 'शत्रुतापूर्ण' एक खतरनाक शब्द है और तब और भी खतरनाक, जब 'देश की सबसे बड़ी साहित्यिक संस्था' का मुखिया पहली किताब के इंतज़ार में बैठे एक लेखक के लिए इसे इस्तेमाल करे. मुझसे थोड़े पुराने लेखक ऐसे मौकों पर मुझे चुप रहने की सलाह दिया करते हैं, लेकिन मैं फिर भी पूछता हूं कि क्यों? शत्रुतापूर्ण क्यों? हम यहां कोई महाभारत लड़ रहे हैं क्या?आपका और मेरा तो एक साहित्यिक संस्था और लेखक का रिश्ता भर है. लेकिन इतने में आलोक जैन तेज आवाज में कुछ बोलने लगते हैं. कालिया जी कहते हैं कि चाहे तो सीधे बात कर लो. मैं उनसे पूछता हूं कि क्या कह रहे हैं 'सर'?
तो जो वे बताते हैं, वह यह कि तुम्हारी कहानियां मां-बहन के सामने पढ़ने लायक कहानियां नहीं हैं. आलोक जी को मेरा 'फ्रैंकनैस' पसंद नहीं है, मेरी कहानियां अश्लील हैं. क्या सब की सब? हां, सब की सब. उन्हें तुम्हारे पूरे 'एटीट्यूड' से प्रॉब्लम है और प्रॉब्लम तो उन्हें तुम्हारी कविताओं से भी है,लेकिन अब वह तो छप गई. फ़ोन पर कही गई बातों में जितना अफसोस आ सकता है, वह यहां है. मैं आलोक जी से बात करना चाहता हूं लेकिन वे शायद गुस्से में हैं, या पता नहीं. कालिया जी मुझसे कहते हैं कि मैं क्यों उनसे बात करके खामखां खुद को हर्ट करना चाहता हूं? यह ठीक बात है. हर्ट होना कोई अच्छी बात नहीं. मैं फ़ोन रख देता हूं और सन्न बैठ जाता हूं.
 जो वजहें मुझे बताई गईं, वे थीं 'अश्लीलता' और मेरा 'एटीट्यूड'.
अश्लीलता एक दिलचस्प शब्द है. यह हवा की तरह है, इसका अपना कोई आकार नहीं. आप इसे किसी भी खाली जगह पर भर सकते हैं. जैसे आपके लिए फिल्म में चुंबन अश्लील हो सकते हैं और मेरे एक साथी का कहना है कि उसे हिन्दी फिल्मों में चुम्बन की जगह आने वाले फूलों से ज़्यादा अश्लील कुछ नहीं लगता. आप बच्चों के यौन शोषण पर कहानी लिखने वाले किसी भी लेखक को अश्लील कह सकते हैं. क्या इसका अर्थ यह भी नहीं कि आप उस विषय पर बात नहीं होने देना चाहते. आपका यह कृत्य मेरे लिए अश्लील नहीं, आपराधिक है. यह उन लोकप्रिय अखबारों जैसा ही है जो बलात्कार की खबरों को पूरी डीटेल्स के साथ रस लेते हुए छापते हैं, लेकिन कहानी के प्लॉट में सेक्स आ जाने से कहानी उनके लिए अपारिवारिक हो जाती है (मां-बहन के पढ़ने लायक नहीं), बिना यह देखे कि कहानी की नीयत क्या है.
 मां-बहन को कम से कम यह तो खुद तय करने दीजिए कि वे क्या पढ़ें या क्या नहीं. उन्हें आपके इस उपकार की ज़रूरत नहीं है. उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए. उन्हें यह 'अश्लीलता' पढ़ने दीजिए कि कैसे एक कहानी की नायिका अपना बलात्कार करने वाले पिता को मार डालती है. लेकिन मैं जानता हूं कि इसी से आप डरते हैं.मेरा एक पुराना परिचित कहता था कि वह खूब पॉर्न देखता है, लेकिन अपनी पत्नी को नहीं देखने देता क्योंकि फिर उसके बिगड़ जाने का खतरा रहेगा. क्या यह मां-बहन वाला तर्क वैसा ही नहीं है? अगर हमने उनके लिए दुनिया इतनी ही अच्छी रखी होती तो मुझे ऐसी कहानियां लिखने की नौबत ही कहाँ आती? यह सब कुछ मेरी कहानियों में किसी जादुई दुनिया से नहीं आया, न ही ये नर्क की कहानियां हैं. और अगर ये नर्क की, किसी पतित दुनिया की कहानियां लगती हैं तो वह दुनिया ठीक हम सबके बीच में है. मैं जब आया, मुझे दुनिया ऐसी ही मिली,अपने तमाम कांटों, बेरहमी और बदसूरती के साथ. आप चाहते हैं कि उसे इगनोर किया जाए. मुझे सच से बचना नहीं आता, न ही मैंने आपकी तरह उसके तरीके ईज़ाद किए हैं. सच मुझे परेशान करता है, आपको कैसे बताऊं कि कैसे ये कहानियां मुझे चीरकर, रुलाकर, तोड़कर, घसीटकर आधी रात या भरी दोपहर बाहर आती हैं और कांच की तरह बिखर जाती हैं. मेरी ग़लती बस इतनी है कि उस कांच को बयान करते हुए मैं कोमलता और तथाकथित सभ्यता का ख़याल नहीं रख पाता. रखना चाहता भी नहीं. 
आख़िर 30 मार्च को फ़ोन पर कालिया जी कहते हैं कि ज्ञानपीठ के ट्रस्टी आलोक जैन मेरे सामने बैठे हैं और यहां तुम्हारे लिए माहौल बहुत शत्रुतापूर्ण हो गया है 
 लेकिन इसी बीच मुझे याद आता है कि भारतीय ज्ञानपीठ में 'अभिव्यक्ति' की तो इतनी आज़ादी रही कि पिछले साल ही 'नया ज्ञानोदय' में छपे एक इंटरव्यू में लेखिकाओं के लिए कहे गए 'छिनाल' शब्द को भी काटने के काबिल नहीं समझा गया. मेरी जिस कहानी पर आपत्ति थी, वह भी 'नया ज्ञानोदय' में ही छपी थी और तब संपादकीय में भी कालिया जी ने उसके लिए मेरी प्रशंसा की थी. मैं सच में दुखी हूं, अगर उस कहानी से ज्ञानपीठ की मर्यादा को धक्का लगता है. लेकिन मुझे ज़्यादा दुख इस बात से है कि पहले पत्रिका में छापते हुए इस बात के बारे में सोचा तक नहीं गया. लेकिन तब नहीं, तो अब मेरे साथ ऐसा क्यों? यहां मुझे खुद पर लगा दूसरा आरोप याद आता है- मेरा एटीट्यूड.
मुझे नहीं याद कि मैं किसी काम के अलावा एकाध बार से ज़्यादा ज्ञानपीठ के दफ़्तर आया होऊं. मुझे फ़ोन वोन करना भी पसंद नहीं, इसलिए न ही मैंने 'कैसे हैं सर, आप बहुत अच्छे लेखक, संपादक और ईश्वर हैं' कहने के लिए कभी कालिया जी को फ़ोन किया, न ही आलोक जी को. यह भी गलत बात है वैसे. बहुत से लेखक हैं, जो हर हफ़्ते आप जैसे बड़े लोगों को फ़ोन करते हैं, मिलने आते हैं, आपके सब तरह के चुटकुलों पर देर तक हँसते हैं,और ऐसे में मेरी किताब छपे, पुरस्कार मिले, यह कहाँ का इंसाफ़ हुआ? माना कि ज्यूरी ने मुझे चुना लेकिन आप ही बताइए, आपके यहाँ दिखावे के अलावा उसका कोई महत्व है क्या?
ऊपर से नीम चढ़ा करेला यह कि मैंने हिन्दी साहित्य की गुटबाजियों और राजनीति पर अपने अनुभवों से 'तहलका' में एक लेख लिखा. वह शायद बुरा लग गया होगा. और इसके बाद मैंने ज्ञानपीठ में नौकरी करने वाले और कालिया जी के लाड़ले 'राजकुमार' लेखक कुणाल सिंह को नाराज कर दिया. मुझे पुरस्कार मिलने की घोषणा होने के दो-एक दिन बाद ही कुणाल ने एक रात शराब पीकर फ़ोन किया था और बदतमीजी की थी. उस किस्से को इससे ज़्यादा बताने के लिए मुझे इस पत्र में काफ़ी गिरना पड़ेगा, जो मैं नहीं चाहता. ख़ैर, यही बताना काफ़ी है कि हमारी फिर कभी बात नहीं हुई और मैं अपनी कहानी की किताब को लेकर तभी से चिंतित था क्योंकि ज्ञानपीठ में कहानी-संग्रहों का काम वही देख रहे थे. मैंने अपनी चिंता कालिया जी को बताई भी, लेकिन ज़ाहिर सी बात है कि उससे कुछ हुआ नहीं.   
वैसे वे सब बदतमीजी करें और आप सहन न करें, यह तो अपराध है ना? वे राजा-राजकुमार हैं और आपका फ़र्ज़ है कि वे आपको अपमानित करें तो बदले में आप 'सॉरी' बोलें. यह अश्लील कहाँ है? ज्ञानपीठ इन्हीं सब चीजों के लिए तो बनाया गया है शायद! हमें चाहिए कि आप सबको सम्मान की नज़रों से देखें, अपनी कहानियां लिखें और तमाम राजाओं-राजकुमारों को खुश रखें. मेरे साथ के बहुत से काबिल-नाकाबिल लेखक ऐसा ही कर भी रहे हैं. ज्ञानपीठ से ही छपे एक युवा लेखक हैं जिन पर कालिया जी और कुणाल को नाराज़ कर देने का फ़ोबिया इस कदर बैठा हुआ है कि दोनों में से किसी का भी नाम लेते ही पूछते हैं कि कहीं मैं फ़ोन पर उनकी बातें रिकॉर्ड तो नहीं कर रहा और फिर काट देते हैं. अब ऐसे में क्या लिक्खा जाएगा?हम बात करते हैं अभिव्यक्ति, ग्लोबलाइजेशन और मानवाधिकारों की.
ख़ैर, राजकुमार चाहते रहे हैं कि वे किसी से नाराज़ हों तो उसे कुचल डालें. चाहना भी चाहिए. यही तो राजकुमारों को शोभा देता है. वे किसी को भी गाली दे सकते हैं और किसी की भी कहानी या किताब फाड़कर नाले में फेंक सकते हैं. कोलकाता के एक कमाल के युवा लेखक की कहानी आपकी पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के एक विशेषांक में छपने की घोषणा की गई थी, लेकिन वह नहीं छपी और रहस्यमयी तरीके से आपके दफ़्तर से, ईमेल से उसकी हर प्रति गायब हो गई क्योंकि इसी बीच राजकुमार की आंखों को वह लड़का खटकने लगा. एक लेखक की किताब नवलेखन पुरस्कारों के इसी सेट में छपी है और जब वह प्रेस में छपने के लिए जाने वाली थी, उसी दिन संयोगवश उसने आपके दफ़्तर में आकर अपनी किताब की फ़ाइल देखी और पाया कि उसकी पहली कहानी के दस पेज गायब थे. यह संयोग ही है कि उसकी फ़ाइनल प्रूफ़ रीडिंग राजकुमार ने की थी और वे उस लेखक से भी नाराज़ थे. किस्से तो बहुत हैं. अपमान, अहंकार, अनदेखी और लापरवाही के. मैं तो यह भी सुनता हूं कि कैसे पत्रिका के लिए भेजी गई किसी गुमनाम लेखक की कहानी अपना मसाला डालकर अपनी कहानी में तब्दील की जा सकती है.
लेकिन अकेले कुणाल को इस सबके लिए जिम्मेदार मानना बहुत बड़ी भूल होगी. वे इतने बड़े पद पर नहीं हैं कि ऊपर के लोगों की मर्ज़ी के बिना यह सब कर सकें. समय बहुत जटिल है और व्यवस्था भी. सब कुछ टूटता-बिगड़ता जा रहा है और बेशर्म मोहरे इस तरह रखे हुए हैं कि ज़िम्मेदारी किसी की न रहे.
नामवर जी, आप सुन रहे हैं कि मेरी 'सम्मानित'की गई किताब क्या है? वह जिसके बारे में अखबारों में बड़े गौरवशाली शब्दों में कुछ छपा था और जून की एक दोपहर आपने फ़ोन करके बधाई दी थी, वह ख़ालिस गंदगी है.
मैं फिर भी आलोक जैन जी को ईमेल लिखता हूं. उसका भी कोई जवाब नहीं आता. मैं फ़ेसबुक पर लिखता हूं कि मेरी किताब के बारे में भारतीय ज्ञानपीठ के ट्रस्टी की यह राय है. इसी बीच आलोक जैन फ़ोन करते हैं और मुझे तीसरी ही वजह बताते हैं. वे कहते हैं कि यूं तो उन्हें मेरा लिखा पसंद नहीं और वे नहीं चाहते थे कि मेरी कविताओं को पुरस्कार मिले (उन्होंने भी पढ़ी तब प्रतियोगिता के समय किताब?), लेकिन फिर भी उन्होंने नामवर सिंह जी की राय का आदर किया और पुरस्कार मिलने दिया. (यह उनकी महानता है!) वे आगे कहते हैं, "लेकिन एक लेखक को दो विधाओं के लिए नवलेखन पुरस्कार नहीं दिया जा सकता." लेकिन जनाब, पहली बात तो यह नियम नहीं है कहीं और है भी, तो पुरस्कार तो एक ही मिला है. वे कहते हैं कि नहीं, अनुशंसा भी पुरस्कार है और उन्होंने 'कालिया' को पुरस्कारों की घोषणा के समय ही कहा था कि यह गलत है. उनकी आवाज ऊंची होती जाती है और वे ज्यादातर बार सिर्फ 'कालिया' ही बोलते हैं. 
वे कहते हैं कि एक बार ऐसी गलती हो चुकी है, जब कालिया ने कुणाल सिंह को एक बार कहानी के लिए और बाद में उपन्यास के लिए नवलेखन पुरस्कार दिलवा दिया. अब यह दुबारा नहीं होनी चाहिए. तो पुरस्कार ऐसे भी दिलवाए जाते हैं? और अगर वह ग़लती थी तो क्यों नहीं उसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया जाता और वह पुरस्कार वापस लिया जाता? मेरी तो किताब को ही पुरस्कार कहकर नहीं छापा जा रहा. और यह सब पता चलने में एक साल क्यों लगा? क्या लेखक का सम्मान कुछ नहीं और उसका समय?
यह सब पूछने पर वे लगभग चिल्लाने लगते हैं कि वे हस्तक्षेप नहीं करेंगे, कालिया जी जो भी 'गंदगी' छापना चाहें, छापें और भले ही ज्ञानपीठ को बर्बाद कर दें. नामवर जी, आप सुन रहे हैं कि मेरी 'सम्मानित' की गई किताब क्या है? वह जिसके बारे में अखबारों में बड़े गौरवशाली शब्दों में कुछ छपा था और जून की एक दोपहर आपने फ़ोन करके बधाई दी थी, वह ख़ालिस गंदगी है. इसके बाद आलोक जी गुस्से में फ़ोन काट देते हैं. ज्ञानपीठ का ही एक कर्मचारी मुझसे कहता है कि चूंकि तकनीकी रूप से मेरे कहानी-संग्रह को छापने से मना नहीं किया जा सकता, इसलिए मुझे उकसाया जा रहा है कि मैं खुद ही अपनी किताब वापस ले लूं, ताकि जान छूटे.
सब कुछ अजीब है. चालाक, चक्करदार और बेहद अपमानजनक. शायद मेरे बार-बार के ईमेल्स का असर है कि आलोक जैन, जो कह रहे थे कि वे कभी ज्ञानपीठ के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करते, मुझे एक दिन फ़ोन करते हैं और कहते हैं, "मैंने कालिया से किताब छापने के लिए कह दिया है. थैंक यू." वे कहते हैं कि उनकी मेरे बारे में और पुरस्कार के बारे में राय अब तक नहीं बदली है और ये जो भी हैं - बारह शब्दों के दो वाक्य - मुझे बासी रोटी के दो टुकड़ों जैसे सुनते हैं. यह तो मुझे बाद में पता चलता है कि यह भी झूठी तसल्ली भर है ताकि मैं चुप बैठा रहूं.
फ़ोन का सिलसिला चलता रहता है. वे अगली सुबह फिर से फ़ोन करते हैं और सीधे कहते हैं कि आज महावीर जयंती है, इसलिए वे मुझे क्षमा कर रहे हैं. लेकिन मेरी गलती क्या है? तुमने इंटरनेट पर यह क्यों लिखा कि मैंने तुम्हारी किताब के बारे में ऐसा कहा? उन्हें गुस्सा आ रहा है और वे जज्ब कर रहे हैं. वे मुझे बताते जाते हैं, फिर से वही, कि मेरी दो किताबों को छापने का निर्णय गलत था, कि मैं खराब लिखता हूं, लेकिन फिर भी उन्होंने कल कहा है कि किताब छप जाए, इतनी किताब छपती हैं वैसे भी. मैं अपना पक्ष रखना चाहता हूं कि मेरी क्या गलती है, मुझे आप लोगों ने चुना, फिर जाने क्यों छापने से मना किया, फिर कहा कि छापेंगे, फिर मना किया और अब फिर टुकड़े फेंकने की तरह छापने का कह रहे हैं. और जो भी हो, आप इस तरह कैसे बात कर सकते हैं अपने एक लेखक से? लेकिन मैं जैसे ही बोलने लगता हूं, वे चिल्लाने लगते हैं- जब कह रहा हूं कि मुझे गुस्सा मत दिला तू. कुछ भी करो, कुछ भी कहो, कोई तुम्हारी बात नहीं सुनेगा, कोई तुम्हारी बात का यक़ीन नहीं करेगा, उल्टे तुम्हारी ही भद पिटेगी. इसलिए अच्छा यही है कि मुझे गुस्सा मत दिलाओ. यह धमकी है. मैं कहता हूं कि आप बड़े आदमी हैं लेकिन मेरा सच, फिर भी सच ही है,लेकिन वे फिर चुप करवा देते हैं. बात उनकी इच्छा से शुरू होती है, आवाज़ें उनकी इच्छा से दबती और उठती हैं और कॉल पूरी. 
कभी तू, कभी तुम, कभी चिल्लाना, कभी पुचकारना, सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने की बात करना और फ़ोन पर दुतकारकर बताना कि तुम कितने मामूली हो- हमारे पैरों की धूल. मुझे ठीक से समझ नहीं आ रहा कि नवलेखन पुरस्कार लेखकों को सम्मानित करने के लिए दिए जाते हैं या उन्हें अपमानित करने के लिए. यह उनका एंट्रेंस टेस्ट है शायद कि या तो वे इस पूरी व्यवस्था का 'कुत्ता' बन जाएं या फिर जाएं भाड़ में. और इस पूरी बात में उस 'गलती' की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता, जब आप अपने यहां काम करने वाले लेखक को यह पुरस्कार देते हैं, दो बार. और दूर-दराज के कितने ही लेखकों की कहानियां-कविताएं-किताबें महीनों आपके पास पड़ी रहती हैं और ख़त्म हो जाती हैं. बहुत लिख दिया. शायद यही 'एटीट्यूड'और 'फ्रैंकनैस' है मेरा, जिसकी बात कालिया जी ने फ़ोन पर की थी. लेकिन क्या करूं, मुझसे नहीं होता यह सब. मैं इन घिनौनी बातचीतों, मामूली उपलब्धियों के लिए रचे जा रहे मामूली षड्यंत्रों और बदतमीज़ फ़ोन कॉलों का हिस्सा बनने के लिए लिखने नहीं लगा था, न ही अपनी किताब को आपके खेलने की फ़ुटबॉल बनाने के लिए. माफ़ कीजिए, मैं आप सबकी इस व्यवस्था में कहीं फिट नहीं बैठता. ऊपर से परेशानियां और खड़ी करता हूं. आपके हाथ में बहुत कुछ होगा (आपको तो लगता होगा कि बनाने-बिगाड़ने की शक्ति भी) लेकिन मेरे हाथ में मेरे लिखने, मेरे आत्मसम्मान और मेरे सच के अलावा कुछ नहीं है. और मैं नहीं चाहता कि सम्मान सिर्फ़ कुछ हज़ार का चेक बनकर रह जाए या किसी किताब की कुछ सौ प्रतियाँ. मेरे बार-बार के अनुरोध जबरदस्ती किताब छपवाने के लिए नहीं थे सर, उस सम्मान को पाने के लिए थे, जिस पर पुरस्कार पाने या न पाने वाले किसी भी लेखक का बुनियादी हक होना चाहिए था. लेकिन वही आप दे नहीं सकते. मैं देखता हूं यहाँ लेखकों को - संस्थाओं और उनके मुखियाओं के इशारों पर नाचते हुए, बरसों सिर झुकाकर खड़े रहते हुए ताकि किसी दिन एक बड़े पुरस्कार को हाथ में लिए हुए खिंचती तस्वीर में सिर उठा सकें. लेकिन उन तस्वीरों में से मुझे हटा दीजिए और कृपया मेरा सिर बख़्श दीजिए. फ़ोन पर तो आप किताब छापने के लिए तीन बार ‘हां’ और तीन बार ‘ना’ कह चुके हैं, लेकिन आपने अब तक मेरे एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया है. आलोक जी के आख़िरी फ़ोन के बाद लिखे गए एक महीने पहले के उस ईमेल का भी, जिसमें मैंने कालिया जी से बस यही आग्रह किया था कि जो भी हो, मेरी किताब की अंतिम स्थिति मुझे लिखकर बता दी जाए, मैं इसके अलावा कुछ नहीं चाहता. उनका एसएमएस ज़रूर आया था कि जल्दी ही जवाब भेजेंगे. उस जल्दी की मियाद शायद एक महीने में ख़त्म नहीं हुई है.
मैं जानता हूं कि आप लोग अपनी नीयत के हाथों मजबूर हैं. आपके यहां कुछ धर्म जैसा होता हो तो आपको धर्मसंकट से बचाने के लिए और अपने सिर को बचाने के लिए मैं ख़ुद ही नवलेखन पुरस्कार लेने से इनकार करता हूं और अपनी दोनों किताबें भी भारतीय ज्ञानपीठ से वापस लेता हूं, मुझे चुनने वाली उस ज्यूरी के प्रति पूरे सम्मान के साथ, जिसे आपने थोड़े भी सम्मान के लायक नहीं समझा. कृपया मेरी किताबों को न छापें, न बेचें. और जानता हूं कि इनके बिना कैसी सत्ता, लेकिन फिर भी आग्रह कर रहा हूं कि हो सके तो ये पुरस्कारों के नाटक बन्द कर दें और हो सके, तो कुछ लोगों के पद नहीं, बल्कि किसी तरह भारतीय ज्ञानपीठ की वह मर्यादा बचाए रखें, जिसे बचाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
सुनता हूं कि आप शक्तिशाली हैं. लोग कहते हैं कि आपको नाराज़ करना मेरे लिए अच्छा नहीं. हो सकता है कि साहित्य के बहुत से खेमों, प्रकाशनों,संस्थानों से मेरी किताबें कभी न छपें, आपके पालतू आलोचक लगातार मुझे अनदेखा करते रहें और आपके राजकुमारों और उनके दरबारियों को महान सिद्ध करते रहें, या और भी कोई बड़ी कीमत मुझे चुकानी पड़े. लेकिन फिर भी यह सब इसलिए ज़रूरी है ताकि बरसों बाद मेरी कमर भले ही झुके, लेकिन अतीत को याद कर माथा कभी न झुके, इसलिए कि आपको याद दिला सकूं कि अभी भी वक़्त उतना बुरा नहीं आया है कि आप पच्चीस हज़ार या पच्चीस लाख में किसी लेखक को बार-बार अपमानित कर सकें, इसलिए कि हम भले ही भूखे मरें लेकिन सच बोलने का जुनून बहुत बेशर्मी से हमारी ज़बान से चिपककर बैठ गया है और इसलिए कि जब-जब आप और आपके साहित्यिक वंशज इतिहास में, कोर्स की किताबों में,हिन्दी के विश्वविद्यालयों और संस्थानों में महान हो रहे हों, तब-तब मैं अपने सच के साथ आऊं और उस भव्यता में चुभूं.
तब तक शायद हम सब थोड़े बेहतर हों और अपने भीतर की हिंसा पर काबू पाएँ.

गौरव सोलंकी
11/05/2012

(गौरव सोलंकी। आईआईटी रूड़की से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद पूर्णकालिक लेखक। हिंदी की प‍त्र-‍पत्रिकाओं में कहानियां लिखते हैं और तहलका में सिनेमा पर स्‍तंभ।
रोटी कपड़ा और सिनेमा नाम के ब्‍लॉग पर इनकी लेखनी की विविध छटाएं देखी जा सकती हैं।
उनसे aaawarapan@gmail.com पर संपर्क करें।)

हिंदी सिनेमा- 100 साल :इतिहास रचती यह 13 फ़िल्में।



जरा याद कीजिए ‘पड़ोसन’फिल्म का वह सीन जिसमें गुरू उर्फ किशोर कुमार, सुनील दत्त को गाना सिखाने की कोशिश करते हैं। या, ‘प्यार किए जा’ का वह क्लासिकल सीन जिसमें महमूद, ओमप्रकाश को अपनी फिल्म की कहानी सुनाते हैं। ‘जाने भी दो यारों’ के ओमपुरी हों या गोलमाल के रामप्रसाद-लक्ष्मण प्रसाद।


इन बातों को पढ़ते-पढ़ते ही आपके चेहरे पर हंसी खिल आई होंगी। कॉमेडी फिल्मों की तासीर ही कुछ ऐसी होती है। भारतीय सिनेमा के सौ साल के इतिहास में एक से बढ़कर एक फिल्में बनीं। एक्शन, रोमांस, हॉरर या कॉमेडी। लोग कभी सेल्युलॉयड के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाए। पीढ़ी दर पीढ़ी इसका नशा चढ़ता गया।


हम हिंदी सिनेमा के इन्हीं विषयों पर एक खास सीरिज़ लेकर आए हैं, जिसकी शुरूआत कर रहे हैं हम कॉमेडी फिल्मों से।


हमने एक्सपर्ट्स की राय और सर्वे के आधार पर 13 सबसे बेहतरीन कॉमेडी फिल्में चुनी हैं। इनकी खासियत यह है कि सभी फिल्म अपने जमाने में ट्रेंडसेटर रहीं। हम बिल्कुल यह दावा नहीं करते कि यह सूची अंतिम है। आप अपनी मर्जी से इसमें फिल्में जोड़-घटा सकते हैं। इस बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें बताएं।

 इन फिल्मों के यादगार सीन्स के यूट्यूब वीडियो लिंक्स भी हम साथ में दे रहे हैं। आप पूरी फिल्म इंटरनेट पर या डीवीडी में देख सकते हैं।

1) हाफ  टिकट (1962)

स्टार कास्ट: किशोर कुमार और मधुबाला

किशोर कुमार और मधुबाला की यह फिल्म 1962 में बनी थी।इसे किशोर कुमार की बेहतरीन कॉमेडी फिल्मों में शुमार किया जाता है। विजय (किशोर कुमार) नामक युवक की कहानी है, जो नियमित जिंदगी नहीं जी सकता। उसके फितूरों से परेशान होकर पिता उसे घर से निकाल देते हैं।

देखें फिल्म का एक मजेदार ट्रेलर...
उसके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह मंबई का टिकट भी खरीद सके। वह हाफ टिकट लेता है और बारह साल के मोटे-तगड़े लड़के का वस्त्र धारण करता है।

वह ऐसा बच्चा, जिसका शरीर बड़ा हो गया है, लेकिन दिमाग किसी बच्चे का ही है। सफर शुरू होने के समय ही एक बदमाश किस्म का व्यक्ति विजय (प्राण)का चाचा बन जाता है और उसकी जेब में दो लाख का हीरा डाल देता है।

पुलिस के डर से वह ऐसा करता है। बाद में हीरा वापस लेने के लिए वह विजय के पीछे पड़ता है।

विजय की अचानक मुलाकात रजनी से होती है। वह रजनी (मधुबाला) से प्रेम करने लगता है। बाद में पता चलता है की जिस लड़की के पिता को विजय ने भगा दिया था,आशा वही लड़की है। इस तरह हंसी-मजाक में फिल्म खत्म होती है।किशोर कुमार की बहुमुखी प्रतिभा के दर्शन के लिए यह फिल्म निश्चित रूप से देखनी चाहिए।

एक्सपर्ट की राय 

जय प्रकाश चौकसे:खास कॉमेडी नहीं, फूहड़ कॉमेडी

(रूमी जाफरी: जाने मने लेखक और निर्देशक):इस फिल्म में किशोर कुमार ने इतने समर्पित भाव से काम किया था कि उनकी एक्टिंग कॉमेडी फिल्मों के लिए एक मिसाल है।
2) पड़ोसन  (1968)
स्टार कास्ट:सुनील दत्त, किशोर कुमार, सायरा बानो,महमूद

कहानी: इस फिल्म को बॉलीवुड की श्रेष्ठ कॉमेडी फिल्मों में शुमार किया जाता है| फिल्म की कहानी गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने को उतावले भोला (सुनील दत्त),  के इर्द गिर्द घूमती है| उसका दिल चुरा बैठी है उसकी पड़ोसन बिंदु (सायरा बानो), बिंदु पर उसका म्यूजिक टीचर पिल्लई (मेहमूद) भी फिदा है|
देखिए फिल्म का एक मज़ेदार सीन

इनके साथ ही फिल्म में एक और किरदार था, विद्यापति उर्फ गुरु का जिसे किशोर कुमार ने जीवंत किया| बिंदु को पटाने में यह भोला की मदद करते हैं और इसी दौरान कई दिलचस्प कॉमेडी सींस आपको  हंसने पर मजबूर कर देते हैं|

एक्सपर्ट की राय

 जय प्रकाश चौकसे: अद्भुत फिल्म

रूमी जाफरी:महमूद की कॉमेडी टाइमिंग बेहतरीन। किशोर कुमार अद्वितीय।
3)चुपके चुपके(1975)

स्टार कास्ट:धर्मेन्द्र ,ओम प्रकाश,अमिताभ बच्चन,शर्मिला टैगोर, जया बच्चन

 ऋषिकेश मुखर्जी की 'चुपके-चुपके' (1975) हर उस सूची में शामिल होती है जो हिन्दी सिनेमा की श्रेष्ठतम कॉमेडी फिल्मों को गिनाने के लिए बनाई जाती है। मजेदार कहानी, चुस्त पटकथा, बेहतरीन संवाद और उम्दा अभिनय। इस सबके साथ ऋषिकेश मुखेर्जी का सटीक निर्देशन।

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'चुपके-चुपके' की जान थे धर्मेंद्र और ओमप्रकाश। प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी (धर्मेंद्र) इस बात से परेशान है कि उसकी नई-नवेली बीवी सुलेखा (शर्मिला) अपने जीजाजी (ओमप्रकाश) को दुनिया का सबसे चतुर इंसान समझती है और दावा करती है कि जीजाजी को कोई बुद्धू नहीं बना सकता।

परिमल जीजाजी को बुद्धू बनाने का बीड़ा उठाता है और पहुंच जाता है उनके यहां  ड्राइवर प्यारेमोहन बनकर। जीजाजी ने न दामाद साहब को देखा है और न उनकी तस्वीर, सो वे आ जाते हैं झाँसे में। आगे कई ऐसे मोड़ आते हैं जो आपको हंसने पर मजबूर कर देते हैं|
एक्सपर्ट की राय 

जय प्रकाश चौकसे: धर्मेन्द्र-अमिताभ की जबरदस्त कॉमेडी टाइमिंग, बेहतरीन फिल्म

रूमी जाफरी:स्क्रीनप्ले के नज़रिए से हिंदी सिनेमा की सबसे सशक्त कॉमेडी फिल्मों में से एक।
4) ‘गोलमाल(1979)

स्टार कास्ट:अमोल पालेकर, बिंदिया गोस्वामी, उत्पल दत्त, डेविड, दीना पाठक, शुभा खोटे

इस फिल्म में कलाकार अमोल पालेकर ने जुड़वां भाइयों वाला डबल रोल किया था। वहीं फिल्म की सुंदर और प्यारी सी हीरोइन बिंदिया गोस्वामी की मासूमियत भरी अदा थी तो हीरोइन के पिता के रूप में उत्पल दत्त थे। जो कि एक गर्ममिजाज शख्स थे।

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आपको बता दें कि फिल्म की कहानी बिल्कुल साधारण सी थी। मगर इसे प्रस्तुत करने के अंदाज की बदौलत ही ये फिल्म आज भी लोकप्रिय है। वैसे भी इसके लिए निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी को श्रेय जाता है।

जय प्रकाश चौकसे:साधारण कहानी, ऋषि दा का अद्भुत निर्देशन
 5) चश्मे-बद्दूर(1981)

स्टार कास्ट:फारूख शेख, राकेश बेदी, रवि बासवानी, दीप्ति नवल
चश्मे-बद्दूर सई परांजपे निर्देशित शानदार रोमांटिक कामेडी फिल्म है जिसकी कहानी दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन छात्र सिध्दार्थ (फारूख शेख), ओमी (राकेश बेदी) और जय (रवि वासनानी ) के इर्द गिर्द घूमती है और गर्मी की छुट्टियो के दौरान इनके जीवन में एक लडकी नेहा (दीप्ति नवल) के आने की स्थितियो को बयां करती है।

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तीनों उसे पाना चाहते हैं और इसी जद्दोजहद  में ऐसे दिलचस्प कॉमेडी सीन्स उभरकर सामने आते हैं कि आप इस फिल्म को जितनी बार देख लें बोर नहीं होंगे|
एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):इस फिल्म की खासियत यह है कि इसमें कुछ भी फिल्मी नहीं। सबकुछ आस-पड़ोस सा लगता है।

जय प्रकाश चौकसे: भारतीय सिनेमा के इतिहास में बेहतरीन फिल्म 



6)अंगूर:(1982)

स्टार कास्ट:संजीव कुमार, देवेन वर्मा,मौसमी चटर्जी,अरुणा ईरानी
कहानी: अंगूर ऐसी फिल्म है जिसे देखकर हास्य स्वयं ही दर्शक के अंदर से उमड़ने लगता है।गुलज़ार साब ने निर्देशक के तौर पर केवल एक ही ऐसी फिल्म बनायी है को पूर्ण रूप से कॉमेडी फिल्म है और उनका इकलौता प्रयास हिंदी सिनेमा को एक अनूठी हास्य फिल्म दे गया है|
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फिल्म दो जुड़वाँ लोगों की कहानी है जो जन्म लेते ही बिछड़ गए थे और किस तरह परिस्तिथियां बदलती है जब वे बड़े होकर एक दूसरे के सामने आते हैं|

एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):यह संजीव कुमार और देवेन वर्मा के ही वश की बात थी कि बिना लाउड हुए इस फिल्म में उन्होंने संजीदा कॉमेडी की इबारत रच दी।

जय प्रकाश चौकसे: संजीव कुमार की लाजवाब अदाकारी
7)जाने भी दो यारों(1983)

स्टार कास्ट:
  नसीरुद्दीन शाह, रवि वासवानी,पंकज कपूर,सतीश शाह

कहानी: यह कहानी है दो भले फोटोग्राफरों विनोद और सुधीर (नसीरुद्दीन शाह, रवि वासवानी) की, जिन्हें 'खबरदार' की संपादक शोभा (भक्ति बर्वे) खास काम सौंपती है। उन्हें बिल्डर तरनेजा (पंकज कपूर) और भ्रष्ट म्यूनिसिपल कमिश्नर डिमेलो (सतीश शाह) की मिलीभगत का भंडाफोड़ करना है।

एक दिन अनजाने में विनोद और सुधीर ऐसा फोटो खींच लाते हैं जिसमें तरनेजा एक आदमी का खून करते हुए नजर आ रहा है। खोजबीन करने पर पता चलता है कि खून डिमेलो का हुआ है। वे डिमेलो की लाश ताबूत समेत ढूँढ निकालते हैं लेकिन यह लाश जैसे एक जगह न टिकने की कसम खाकर कब्र से बाहर आई है। वह बार-बार विनोद-सुधीर के हाथ से निकल जाती है और बार-बार वे उसे  फिर  हथिया लेते हैं।

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 फिल्म का क्लाइमेक्स तो दर्शकों को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देता है, जिसमें विनोद व सुधीर लाश को स्केट्स पर चलाकर, बुर्के में ढंककर एक सभागार में ले आते हैं, जहाँ 'महाभारत' का मंचन चल रहा है। पीछे-पीछे तमाम अन्य पात्र भी चले आते हैं। सबको लाश पर कब्जा करना है और लाश इधर-उधर होती हुई चीरहरण के लिए लाई गई द्रौपदी बन मंच पर जा पहुंचती है!

एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):मेरी नज़र में यह ऐसी फिल्म थी जिसमें अद्भुत ब्लैक कॉमेडी है।

जय प्रकाश चौकसे:अव्वल दर्जे की कॉमेडी, कलाकारी शानदार

8)चमेली की शादी(1986)

स्टार कास्ट:
अनिल कपूर,अमृता सिंह,अमजद खान,पंकज कपूर

चमेली की शादी बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म है| फिल्म के मुख्य कलाकार अनिल कपूर,अमृता सिंह,अमजद खान,पंकज कपूर हैं|

चरणदास अपने बड़े भाई भजनदास और भाभी के साथ एक छोटे नगर में रहता है| वह बेरोजगार है और खुद को उस्ताद मस्तराम पहलवान के साथ कुश्तीबाज मानता है और पहलवान से चरणदास ने वादा की है वह चालीस साल की उम्र तक कुंवारा रहेगा|लेकिन जब चरणदास की मुलाकात स्कूल की एक छात्रा चमेली से होती है तो वह उसे चाहने लगता है|

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दोनों एक दूसरे को बेहद पसंद करने लगते हैं, साथ घूमने जाते हैं, प्रेम पत्र लिखते हैं और शादी करने का फैसला करते हैं| लेकिन चमेली के माता पिता चमेली की शादी वकील माखन से करना चाहते है जो उन्ही की जात का है| परिस्तिथियाँ बिगड़ने लगती हैं और अब चरणदास को फैसला करना है कि वह पूरी उम्र मजनू बनकर जीना चाहता है या पृथ्वीराज चौहान बनकर अपनी चमेली को सबके बीच से भगा ले जायेगा| फिल्म में सीए इतने रोचक तरीके से फिल्माया गया कि दर्शक हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए|
एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):अनिल कपूर का वर्सेटाइल टैलेंट दिखा। अमृता के साथ उनकी केमेस्ट्री लाजवाब थी।
9) अंदाज अपना-अपना (1994) :

स्टारकास्ट:सलमान खान, आमिर खान, रवीना टंडन,करीना कपूर

 कई बार देखने पर भी यह फिल्म बोर नहीं करती। आमिर-सलमान की कैमेस्ट्री खूब जमी। इस फिल्म में आमिर के अंदर का हास्य अभिनेता उभरकर सामने आया।

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विनय सिन्हा ने 1994 में सलमान और आमिर को लेकर ‘अंदाज अपना अपना’ का निर्माण किया था। इसके निर्देशक थे राजकुमार संतोषी। इस फिल्म को ‘बॉम्बे टू गोवा’ और ‘पड़ोसन’जैसी हास्य फिल्मों की तर्ज पर खास स्थान प्राप्त है।
एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):आमिर-सलमान की कैमेस्ट्री खूब जमी।

10) हेरा फेरी (2000)

स्टार कास्ट:अक्षय कुमार, परेश रावल, सुनील शेट्टी,तब्बू, ओम पूरी, असरानी, मुकेश खन्ना

 हास्य के दौर मे, गंभीर फिल्मों के लिए जाने जाने वाले प्रियदर्शन ने भी दर्शकों को एक हास्य फिल्म दी है, एक ऐसी फिल्म जो रोते को भी हँसने पर मजबूर कर देगी |

फिल्म की कहानी दिलचस्प है जो राजू(अक्षय कुमार), श्याम(सुनील शेट्टी), बाबूराव(परेश रावल) और अनु(तब्बू) के इर्द गिर्द घूमती रहती है | चारों ऊपर से नीचे तक कर्ज़े मे डूबे हुए है और जिंदगी बसर करने के लिए उन्हे पैसों की सख़्त ज़रूरत है | श्याम और राजू बाबू राव के घर पर किरायदार की तरह रहते है |

देखिए फिल्म का एक मज़ेदार सीन

फिल्म की कहानी सिर्फ़ एक ग़लत फोन कॉल पर टिकी है | पर प्रियदर्शन का निर्देशन दर्शकों को कुर्सी से बाँधे रखने मे ना सिर्फ़ सफल होता है पर उन्हे 3 घंटे तक गुदगुदाने को मजबूर कर देता है |
एक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):पहली बार सुपरस्टार्स ने मध्यमवर्गीय परिवेश में कॉमेडी की। परेश रावल लाजवाब।
11)मुन्नाभाई एमबीबीएस (2003)

कलाकार:संजय दत्त, ग्रेसी सिंह,सुनील दत्त, बोमन ईरानी

'मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस' के बाद जादू की झप्पी बंटने लगी। सोशल डिक्शनरी में 'मामू', 'रुलाएगा क्या', 'बोले तो', 'सर्किट' और 'गुड मार्निंग मुंबई' जैसे शब्द एड हो गए। लोगों को इस फिल्म में संजू बाबा का बिलकुल अलग अंदाज देखने को मिला और यह हिंदी सिनेमा की श्रेष्ठ कॉमेडी फिल्मों में शुमार हो गई|

देखिए फिल्म का एक मज़ेदार सीनएक्सपर्ट की राय (रूमी जाफरी):राजकुमार हीरानी बेहद संजीदा बात को बहुत हल्की-फुल्की कॉमेडी में कहने का हुनर रखते हैं।
12)भेजा फ्राई (2007)

स्टार कास्ट- रजत कपूर, विनय पाठक, सारिका, मिलिंद सोमन, रणवीर शौरी

स्मॉल बजट की इस कॉमेडी फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने ना सिर्फ अच्छी-खासी कमाई की बल्कि इसके सिक्वल भी बने। यह फ्रेंच फिल्म की रीमेक थी।

देखिए फिल्म का एक मज़ेदार सीन

इस फिल्म की कहानी म्यजिक प्रोड्यूसर रणजीत और उनकी सिंगर बीवी शीतल के इर्द-गिर्द घूमती है। रणजीत अपने दोस्तों के साथ हर शुक्रवार को एक पार्टी करते हैं जिसमें वह किसी ऐसे को पकड़ लाते हैं, जो ज्यादा टैलेंटेड नहीं है।

लेकिन, ये लोग उनको बहुत टैलेंटेड बताकर खूब मजा लेते हैं। ऐसे ही एक दिन रणजीत के दोस्त की मुलाकात इंकम टैक्स डिपार्टमेंट के एक इंस्पेक्टर भारत भूषण से होती है, जो सिंगर बनना चाहते हैं। शुक्रवार को होने वाली पार्टी में अब भारत को बुलाया जाता है। उसके बाद इस कॉमेडी फिल्म में बहुत सारी ऐसी घटनाएं होती हैं कि दर्शक हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते हैं।


13) इडियट्स (2009)

स्टारकास्ट: आमिर खान, शर्मन जोशी,आर माधवन, करीना कपूर

कहानी : 45 वर्ष के आमिर ने 20 वर्ष के स्टुडेंट की भूमिका निभाई। रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़ के रूप में उन्होंने ऐसा अभिनय किया जो क्रिटिक्स से लेकर आम दर्शकों तक को खूब भाया। ‘3 इडियट्स’ का नाम भारत की सफलतम फिल्मों की सूची में दर्ज हो गया।

देखिए फिल्म का एक मज़ेदार सीन

मनोरंजन के साथ-साथ एजुकेशन सिस्टम पर इस फिल्म के जरिये सवाल उठाए गए। इस फिल्म में आपको सबसे ज्यादा हंसाने वाला कोई ‘इडियट’ नहीं बल्कि ‘चतुर’ था मतलब चतुर रामलिंगम।
'चतुर' इस फिल्म का एक ऐसा किरदार है जिसके बिना फिल्म की कहानी अधूरी है। वो किरदार जिसने दर्शकों को सबसे ज्यादा हंसाया। जिसके जुबां खोलने भर से दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। फिर चाहे उसका हिंदी का ज्ञान हो या फिर उसके रटने की पावर। हर किरदार में SILENCER रहे सबसे फिट।

एक्सपर्ट की राय 

जय प्रकाश चौकसे:कॉमेडी के जरिए सामाजिक संदेश, जबरदस्त फिल्म

(रूमी जाफरी):राजकुमार हीरानी बेहद संजीदा बात को बहुत हल्की-फुल्की कॉमेडी में कहने का हुनर रखते हैं।

साभार:दैनिक भास्कर डोट कॉम 

भाग बोस डी के आमिर खान !

मुझे अब भी बचपन में पढ़े गए अखबारों के बीच के पन्नों पर छपे मेरी स्टोवस  क्लिनिक के वो विज्ञापन याद है जिनमे सुरक्षित गर्भपात के दावे किये जाते थे |मैंने आमिर खान का “सत्यमेव जयते भी देखा है और उनकी “देल्ही बेली भी देखी है |जिसमे हीरो बेशर्मी से “इसने मेरा चूसा है और मैंने इसकी ली है  “जैसे जुमले इस्तेमाल करता नजर आता है |आमिर खान इसी फिल्म में हमारे यहाँ बनारस में दी जाने वाली एक गाली  को  सीधे न कहकर उसे बोस डी के कहकर जनता का मनोरंजन करते हैं ,मनोरंजन उनके इस नए धारावहिक में भी हैं |दरअसल टेलीविजन ने हिन्दुस्तान में आंसुओं  को भी बाजार की चीज बना दिया है |किसी रियल्टी शो में डांस बाहर हो जाने के बाद रो रहे प्रतियोगी के आंसू हो ,चाहे जिंदगी लाइव की एंकर ऋचा अनिरुद्ध के आंसू हो या फिर आमिर खान के आंसू मैं इनमे कोई अंतर नहीं मानता |जितने आंसू ,उतनी टीआरपी ,उतनी बिकवाली |ये वो बाजार है जिसमे थका हार आदमी समय ,समाज और सरोकारों से जुडी बातों के लिए भी नायकों की तलाश करता हैं |भ्रूण हत्या रोकने के लिए आमिर खान ,की |कंडोम पहनने के लिए सनी लियोन की , साबुन के इस्तेमाल को जानने के लिए करीना कपूर की,तो  पोलियो उन्मूलन को सफल बनाने के लिए अमिताभ बच्चन की जरुरत होती है |ये कामयाबी उस वक्त और भी बढ़ जाती है जब इन विज्ञापनों में महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता है |सीधे कहें तो आंसू ,महिलाएं और नायकों को मिला दीजिए सौ फीसदी सफल एपिसोड तैयार |लेकिन इन सबके बीच   ये सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन  विज्ञापनों ,इन धारावाहिकों से करोड़ों रूपए की कमाई करने वाले ये नायक हमारे प्रति उतने ही ईमानदार है ,जितने हम इनके लिए हैं ?क्या सचमुच करीना कपूर लक्स से ही नहाती हैं या अमिताभ बच्चन नवरत्न  तेल ही इस्तेमाल करते हैं ?या फिर आमिर खान अपनी निजी जीवन में भी स्त्री अधिकारों के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं जितने सत्यमेव जयते में दिखते हैं ?
आज फेसबुक पर मित्र शीबा असलम फहमी का स्टेटस पढ़ा वो “देल्ही बेली “को प्रसंगवश रखते हुए कहती हैं “आमिर खान से मेरा सवाल है की कोई कैसे एक महिला का बाप या भाई  बनने की हिम्मत करे जब इसी कारण उसे गाली से नवाज़े जाने की संभावना बनती हो? आज वे 3 करोड़ प्रति एपिसोड की दर से नारी-चिंता में कामयाबी के झंडे गाड़ रहे हैं. महिलाओं के ज़रिये कामयाब होना है बस, ‘वैसे’ नहीं तो ‘ऐसे’! पहले गाली दे कर, अब गाली दी गई औरत पर ग्लीसरीन बहा कर! ताज्जुब ये कि बड़े-बड़े पत्रकार और लेखक भी इस आमिर-गान में पीछे नहीं! शीबा का तर्क वाजिब है |स्त्री को गाली देना और फिर उसके अस्तित्व के लिए झंडा उठाने की बात करना सीधे तौर पर बेईमानी है ,और मीडिया में फैले बाजारवादी तंत्र की शातिराना चालों का एक हिस्सा है |आमिर इस तर्क को ये कहकर भी खारिज नहीं कर सकते कि फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन मात्र हैं और हम जो सत्यमेव जयते में दिखा रहे हैं वो वास्तविक जिंदगी |दोनों ही मनोरंजन है एक में आप औरत को गाली देते हैं दूसरे में उसकी हत्या पर टेसुएँ बहाते हैं ,चालाकी  यहीं खत्म नहीं होती अमीर दर्शकों से चिट्ठी लिखने की अपील करते हुए सौदे को और भी मजबूत बना देते हैं |

आमिर खान नायक हैं लेकिन वो जन नायक बनना चाहते हैं |और ये धारावाहिक उनकी इस महत्वांक्षा को पूरा करने का प्लेटफार्म है |अम तौर पर मीडिया से दूर भागने वाले आमिर ,मीडिया का ही इस्तेमाल कर इस सारी कवायद को अंजाम दे रहे हैं और पारंपरिक मीडिया को जनता से गाली  भी सुनवा रहे हैं कि अब तक इन लोगों ने ऐसा कुछ करके क्यों नहीं दिखा दिया ?अरे क्या दिखा दें !लगभग डेढ़ दशक की पत्रकारिता में मैं दो ऐसे लोगों से मिला हूँ जिन्होंने प्रसवपूर्व लिंग परिक्षण कराया था ,दोनों की पहले से तीन-तीन बेटियां थी और इन दोनों महिलाओं में माँ ही ये परिस्खन कराना चाहती थी ,अपनी मनमर्जी से !अपराध घोषित होने के बाद से प्रसव पूर्व  लिंग परीक्षण करने की  हिम्मत बहुत कम चिकित्सक दिखा पाते हैं |आम तौर पर शहरी माध्यम वर्ग दो से ज्यादा बच्चे पैदा करना नहीं चाहता .दो बच्चे लड़का हों चाहे लड़की ,चाहे खुशी से चाहे नाखुशी से ,आगे की प्लानिंग करने का न तो उसमे साहस है न ही जेब इजाजत देती है ,गाँवों में परिवार नियोजन कोई विषय ही नहीं है ,लड़का हो चाहे लड़की सभी राजी -खुशी |ऐसे में लिंग परिक्षण कराने वालों की तादात पिछले दो दशकों के दौरान  तेजी से घटी है |ऐसे में कल को अपनी सफलता में एक और तमगा जोड़ने के लिए अगर अमीर खान कह दें कि हमने भ्रूण हत्या रुकवा दी तो उसे आप क्या कहेंगे ?
जो लोग भी इस मुगालते में हैं कि आमिर खान इस धारावहिक के माध्यम से सामाजिक क्रान्ति करने जा रहे हैं |उन्हें ये जान लेना चाहिए कि पर्दों के नायक ,वास्तविक जिंदगी में भी नायक हो ऐसा हिंदुस्तान में आज तक नहीं हुआ |हमें अभिनेता और व्यक्ति के फर्क को समझना होगा ,और उन चालाकियों  को भी ,जिनसे संवेदनाएं बाजार का हिस्सा बन जाती है |इस धारावाहिक की विषय-वस्तु से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ,लेकिन आमिर को जन नायक ठहराने  पर आपत्ति जरुर है |अब तक आमिर खान ने दवा नहीं किया था कि वो जन नायक बनने जा रहे हैं ,लेकिन अब वो उस और बढ़ रहे हैं |कन्या भ्रूण हत्या पर अशोक गहलौत से मुलाक़ात उसकी एक बानगी भर हैं ,शिवराज सिंह चौहान ने भी मौके का सही इस्तेमाल करते हुए आमिर को मध्य प्रदेश आने का न्यौता दिया है ,ब्रांडिंग चल निकली है ,जनता ,नेता ठीक उसी तरह से पागल हो रहे हैं ,जैसे अन्ना की रामलीला के वक्त हो रहे थे |आप स्वागत करें तो करें हम तो यही कहेंगे भाग बोस डी के आमिर खान.



Awesh Tiwari(आवेश‍ तिवारी। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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