Thursday, December 6, 2012

तलाश उर्फ खूबसूरत आत्मा का खूनी बदला !!


आमिर के बारे में कहा जाता है वे पटकथा पढ़कर किसी फिल्म के लिए हां करते हैं, आमिर इस मामले में बहुत सजग माने जाते हैं। आमिर की फिल्में कुछ अलग होती हैं, उनके ट्रीटमेंट, कहानी आदि सब में कुछ नयापन होता है। आमिर पर भरोसा करने वाले तलाश देखने भी इसी उम्मीद से जायेंगे कि आमिर अपने छवि पर खरा उतरेंगे। पर यह फिल्म आमिर की साख के अनुरूप बिलकुल नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में सिनेमा ने दर्शकों की पसंद को समृद्ध भी किया है, आमिर भी अच्छा सिनेमा देने के लिए, दर्शकों की रूचि परिष्कृत करने के लिए जाने जाते हैं, लिहाजा यह फिल्म उल्टी पड़ गयी है। दर्शक को आमिर से यह उम्मीद तो नहीं ही होगी। इस फिल्म में आप कहानी की ‘तलाश’ करते रह जायेंगे। ‘तलाश’ फिल्म एक भुतहा या हारर फिल्म नहीं भी कही जाए पर आत्मा के विश्वास पर केंद्रित तो है ही।

‘तलाश’ की कहानी
फिल्म स्टार अरमान कपूर की कार समन्दर में डूब जाती है। कार खुद अरमान चला रहा था, वह आत्महत्या नहीं कर सकता था फिर ऐसा क्या हुआ कि रात में सुनसान सडक पर तेज गति से दौड़ती हुई गाड़ी अचानक समंदर की ओर घूम गयी और सीढियां तोड़ते हुए समंदर में जा घुसी…! क्यों हुआ ऐसा…! क्या अरमान की किसी ने हत्या की? लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी डूबने के कारण मौत होना बताया गया। अरमान उस रास्ते पर गया ही क्यों जो उसके घर का रास्ता भी नहीं था..और वह कार खुद क्यों चला रहा था जबकि वह कार चलाना पसंद नही करता, हमेशा उसका ड्राइवर ही कार चलाता था..!! इस हाई प्रोफाइल केस को हल करने का जिम्मा है पुलिस अधिकारी सुरजन सिंह शेखावत का। शेखावत का एक अधीनस्थ बताता है, साहब ये केस फाइनल रिपोर्ट लगा कर बंद कर दीजिये। इस रास्ते में कुछ ‘गड़बड़’ है। यहां ऐसी कई मौतें हुई हैं, किसी का पता ही नहीं चल पाया।

शेखावत की पत्नी रोशनी उदास रहती है क्योंकि उसका आठ साल का बेटा करन पानी में डूब कर मर गया। बच्चे की मौत के लिए शेखावत खुद को जिम्मेदार मानता है और रात-रात भर सो नही पाता, न ही बच्चे के बारे में पत्नी से कोई बात करता है। इस डिप्रेशन से उबरने के लिए शेखावत पत्नी को मनोवैज्ञानिक के पास भी भेजता है। रोशनी की पड़ोसन आत्माओं से बात करा सकती है, वह करन की आत्मा से रोशनी की बात कराती है। शेखावत को जब यह पता लगता है वह रोशनी और अपनी पड़ोसन पर बहुत नाराज होता है। और कहता है मरने के बाद कोई वापस नहीं आता, सब खत्म हो जाता है। बहरहाल- इसी बीच करीना कपूर को भी आना है सो वह सिमरन उर्फ रोजी के किरदार में अवतरित होती हैं…। कालगर्ल रोजी की मदद से शेखावत अरमान कपूर की रहस्यमय मौत की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करता है।




फिल्म का अंत पराभौतिक शक्तियों के वजूद को साबित करता है। इन सबमें यकीन नहीं रखने वाले शेखावत को भी मानना पड़ता है कि आत्मा होती है और वह अपनी मौत का बदला ले सकती है, रात-रात भर उसे घुमा सकती है। भीड़ में, अकेले में, समन्दर किनारे, आधी रात में और भरी दोपहरी में उससे मीठी-मीठी बातें कर सकती है… और वह सब कुछ कर सकती है जो रामगोपाल वर्मा की आत्माएं करती हैं ,… अब रहा इसका अच्छा पक्ष – तो निजाम सिद्दीकी का अभिनय अच्छा है, करीना कपूर बेशक बहुत खूबसूरत और आर्कषक लगी हैं, करने को जो मिला वह उन्होंने किया है। गाने कब बजते हैं, कब खामोश हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। फिल्म की गति बेहद धीमी है, आखिरी आधे घंटे की फिल्म ठीक है अगर आप पहले के दो घंटे की फिल्म झेल लें तो…
मामला सिर्फ आत्मा का नहीं है। फिल्म की कहानी पूरे ढाई घंटे अपनी दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखने में काययाब नहीं लगती है। कहानी को बेवजह खींचा गया है। इस कहानी पर एक घंटे का सीरियल कहीं ज्यादा ठीक बनता। आत्मा के अस्तित्व के विशवास को पटकथा में मजबूती से न उतार पाना निर्देशक और पटकथा लेखक की कमजोरी है। हालीवुड की फिल्म ‘ट्यूलाइट’ है जिसमें वैम्पायर की ही कहानी है लेकिन पूरी फिल्म जबरदस्त है। दर्शकों ने ‘सुपरमैन’ भी देखी है। ये फिल्में काल्पनिक कथाओं पर ही आधारित थीं लेकिन फिल्म निर्माण आर प्रस्तुति के लिहाज से तार्किक थीं, जो यह फिल्म बिलकुल नहीं है। मैं आमिर की फिल्मो की प्रशंसक हूं लेकिन इस फिल्म को लेकर एक शिकायत है। जितनी मेहनत उन्होंने फिल्म के प्रचार-प्रसार में की, उसका सौवां हिस्सा भी पटकथा पर करते तो कुछ ठीक-ठाक बन जाता। अगर मुझे इस फिल्म के बारे में कहना हो तो मैं कहूंगी – बेकार।
संध्या नवोदिताकवि, अनुवादक, व्यंग्य लेखक और पत्रकार। छात्र- जीवन से सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। संध्या ने छात्र राजनीति में भी सक्रिय रूप से भाग लिया और वर्तमान में कर्मचारी राजनीति में सक्रिय हैं। आकाशवाणी में बतौर एनाउंसर -कम्पीयर जिम्मेदारी निभाई। फिलहाल समाचार-पत्र, पत्रिकाओं ,ब्लॉग और वेब पत्रिकाओं में लेखन।)
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित 

शाहरुख का विस्तार और नियति की सीमाएं

धन एक अजीब उद्दीपक है। यह हठ को अकड़ देता और बुद्धि को नरम करता है, जबकि इसका उल्टा ज्यादा उपयोगी हो सकता था। इसमें थोड़ी-सी चेहरे की पहचान भी मिला लीजिए, जिसके लिए सेलिब्रिटी बड़े बेकरार रहते हैं और प्रतिमा-भक्त जिसकी पेशकश करते हैं। और फिर जो कॉकटेल बनता है, वह इतना प्रचंड होता है कि ठीक आपके चेहरे पर फटने में इसे बस एक पल ही लगता है। 

चूंकि सेलिब्रिटी दोष स्वीकार करना अपनी सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं, इसलिए ढिठाई भी एक ही कदम दूर होती है। हर सुपरस्टार इस बीमारी का शिकार नहीं होता, लेकिन मौके-बेमौके उन्माद का हमला होने पर बचाव के चंद रास्ते ही होते हैं।

मैं शाहरुख खान से दो बार मिला हूं। एक बार हाल ही में। और तीसरे मौके पर संभवत: कुछ क्षण के लिए। निश्चित तौर पर यह निकटता का सबूत नहीं है, इसलिए इसे बस जान-पहचान ही रहने दीजिए। परंतु मैं जितना भी थोड़ा-बहुत जानता हूं, उससे पहले प्रभाव की पुष्टि होती है। 

वे बेहद दिलकश और बुद्धिमान शख्स हैं। उनका बेहतरीन गुण है मृदु हास्यबोध। तीखी और यहां तक कि कटु टिप्पणी इस हास्यबोध के आड़े आती है। लेकिन वे रिश्तों पर चोट पहुंचाए बगैर दुनिया पर हंस सकते हैं, क्योंकि दुनिया में वे खुद को भी शामिल करते हैं। उनमें न तो विशिष्टता रही, न उन्होंने बादलों के रहवासियों की तरह बातचीत की। यदि उन्हें प्रतिमास्थल पर बिठा दिया जाए, तो वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उस ऊंचे ठिकाने से उनके पैर जमीन को छूते रहें। यही चीज उन्हें गुमनामी से परे ले जाती है। 

उन्होंने वानखेड़े स्टेडियम में अपना आपा क्यों खो दिया, इसके कई स्पष्टीकरण होंगे। इनमें से एक अहम सफाई तनाव हो सकती है। वे अब युवा नहीं रहे। परदे पर उनका पहला गीत एक-चौथाई सदी पहले गाया गया था और जैसा कि टीवी पर कोई भी म्यूजिक चैनल बताएगा कि वे गीत अब पुराने गानों के बीच ही नजर आते हैं। उम्र हर उस अभिनेता के लिए डरावना रसातल है, जिसने अपने चाहनेवालों से चिरयौवन का वादा कर रखा है। स्वभाववश चुगली करने वाली मांसपेशियों की दशा से उम्र छिपाने के लिए कष्टदायक कसरत की जरूरत होती है। 

उम्र को छद्म आवरण में लपेटना एक दुष्कर काम है और यंत्रणा महज इसलिए कम तीखी नहीं हो जाती कि यह स्वयं के द्वारा ही थोपी गई है। गुरुत्वाकर्षण के अनुसार लटकती चर्बी की ओर अपने शरीर के स्वाभाविक झुकाव को नकारने के लिए आपको शरीर पर चाबुक फटकारने होते हैं। 

जब मध्ययुगीन कैथोलिक मठवासी खुद को कोड़े मारते थे, तो इसमें उन्हें यह दिलासा तो रहती थी कि वे ऐसा ईश्वर के लिए कर रहे हैं। मैं नहीं मान सकता कि उस मध्यमवर्गीय बालक के लिए धन अब और कुछ भी अहमियत रखता होगा, जिसने बड़े होकर उतना ज्यादा कमा लिया, जितना कि शाहरुख ने। इसलिए उकसावा तो सिर्फ अहंकार का ही हो सकता है और ऐसे शिखर पर बने रहने की उन्मादी लालसा का, जो महज सबसे ऊंचा न होकर प्रतिस्पर्धा से परे भी हो। 

महत्वाकांक्षा एक खरा गुण है। इसके बगैर हमने ज्यादा तरक्की नहीं की होती। लेकिन जब आप अपने ही उत्पाद होते हैं और आपके मूल्य का पैमाना एक ऐसी छवि से संचालित होता है, जिसे क्षय से नहीं बचाया जा सकता, तो फिर बुद्धिमानी इसी में है कि सीमाओं को पहचान लिया जाए। आह! ऐसा करने की तुलना में लिखना कहीं आसान है। 


कल्पना लोक का हीरो खुशामद के मनमोहक उत्सव पर बहता चला जाता है, भले ही वह निजी दैत्यों से संघर्ष भी करता है, जो उन घंटों में बहुत भयंकर बन जाते हैं, जब किसी व्यक्ति को खुद के साथ ही बने रहना चाहिए। अपराध-बोध के कई आयाम होते हैं। जिनका अस्तित्व औरों की सराहना पर टिका होता है, वे इस बात की सलीब भी ढोते हैं कि उन्होंने दूसरों को कितना ज्यादा प्यार दिया है। 

इन दूसरों में उनके बच्चे भी शामिल होते हैं। आप और आपके बच्चे, दोनों एक साथ बड़े होते हैं और एक बिंदु पर जब बच्चे अपने खुद के बच्चों के लिए आगे बढ़ते हैं, तो भीतरी विभाजन होता ही है। वक्त दोनों ओर के समीकरण को संक्षिप्त करता है। आपके बच्चे की आंखों में संदेहभरा सवाल एक क्षणभंगुर मृगतृष्णा के संसार की चमक-दमक को घटाता है। और शायद चापलूस दुनिया पर ताकत दिखाकर बच्चे का दिल जीतने का प्रलोभन ऐसा हो जाता कि उससे बचा ही न जा सके। 

शाहरुख खान के महान पूर्ववर्तियों ने ऐसे राष्ट्रीय कीमियागरों की तलाश की, जो उन्हें दैत्यों से मुक्त करा सकें। कभी-कभी रातें व्यामोह में गुजर जाती हैं और दिन खुद से छल करते हुए। प्रामाणिक जीनियस, राजकपूर ने वहीदा रहमान के साथ ‘सुनो जी सुनो, हमारी भी सुनो’ गाते हुए बहुत प्रतिभाशाली ढंग से डांस किया था, लेकिन गालों के आसपास के फुलाव ने ‘श्री 420’ में नादिरा और भारत, दोनों को सम्मोहित करने वाले उस चेहरे को बदल दिया था। 

दिलीप कुमार ने पीढ़ियों को अपने पीछे चलाया, लेकिन ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘गंगा जमुना’ में अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी लंबे समय तक चलते रहने से वे खुद को रोक नहीं पाए। देवआनंद ने सोचा कि ऊंचे कॉलर और स्कार्फ से र्झुीदार त्वचा को छुपाकर वे वक्त को हरा सकते हैं। वक्त के पास एक कड़वा जवाब था : 

उपहासजनक नकल। देवआनंद को 80 के पूरे दशक में बड़ी होशियारी से कदम रखने चाहिए थे और 90 के दशक में कभी कदम ही नहीं धरना चाहिए था, फिर 21 सदी को तो अकेला ही छोड़ दीजिए। सदाबहार कही जाने वाली कोई चीज नहीं होती। बस सूखी लकड़ी ही मरने में लंबा समय लेती है। 

जो लोग सीमित जीवन का आधा हिस्सा तय कर चुके हैं, उनके लिए जीवन का उद्देश्य जरूर बदलना चाहिए। शाहरुख खान को यादों में आनंद के प्रतीक के रूप में जिंदा रहना चाहिए, न कि गुस्से के। मैं नहीं मान सकता कि वे दौलत के अहंकार के अधीन हो सकते हैं। यह बहुत ज्यादा मायूसी की बात होगी। 

इंसान जो भी देखता, जांचता-परखता है, वह पूरा कभी भी उसके हाथ में नहीं होता, लेकिन उसे यह समझने की बुद्धि मिली है कि नियति को किसी मंजिल पर ठहरना ही होता है। शाहरुख खान ने ऐसी छवि गढ़ी है, जिसने हमें असाधारण आनंद दिया है। उनके लिए वह क्षण आ गया है कि वे खुद को पुन: गढ़ें।

मोबाशर जावेद अकबर जाने माने पत्रकार और लेखक हैं। वे साप्ताहिक अखबार 'द संडे गार्जियन' अखबार के एडिटर-इन-चीफ हैं और अंग्रेज़ी साप्ताहिक मैगज़ीन 'इंडिया टुडे' के एडिटोरियल डायरेक्टर भी रह चुके हैं। साथ ही वे 'द एशियन एज' अखबार के संस्थापक और पूर्व एडिटर-इन-चीफ भी हैं। उन्होनें कई किताबें भी लिखी हैं जिनमें 'बायलाइन', 'नेहरू:द मेकिंग ऑफ इंडिया', 'कश्मीर:बिहाइंड द वेल, रायट आफ्टर रायट' और 'इंडिया:ए सीज विदइन' जैसी फेमस किताबें शामिल हैं। हाल ही में उनकी किताब 'ब्लड ब्रदर्स' भी प्रकाशित हुई है जो हिंदु-मुसलमान के बदलते रिश्तों पर प्रकाश डालती है।

‘कोल’गेट की काली राजनीति


मान लें कि आप एक विशाल संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के सदस्यों में मतभेद हैं, फिर भी वे एक इकाई की तरह साथ रहते हैं। परिवार एक विशाल ज्वैलरी शॉप का मालिक है, जो बहुमूल्य रत्न-आभूषणों और पारिवारिक खजाने से भरपूर है। इस शॉप को चलाने के लिए परिवार एक मैनेजर को नियुक्त करते हुए उसे इसका पूरा नियंत्रण सौंप देता है। 

यहां तक कि मैनेजर को इन गहनों को बेचना भी नहीं पड़ता। वह तो चयन संबंधी कुछ मानदंडों (जो मैनेजर द्वारा खुद ही तैयार किए गए हैं) की कसौटी पर जिसे चाहे हीरे-मोती जैसे ये बेशकीमती नगीने दे सकता है। इस तरह मैनेजर अपने पसंदीदा लोगों को रेवड़ियां बांट सकता है और चाहे जिसे ठुकरा सकता है। 

जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में कोई भी मैनेजर क्या करेगा? जाहिर तौर पर वह पहले अपने मित्रों व सगे-संबंधियों को बुलाकर यह सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में रत्न-आभूषण मिल जाएं। मैनेजर उन लोगों को भी गहने वगैरह बांटेगा, जो उसे बदले में नकद लाभ या उपहार वगैरह दे सकें। इस तरह जल्द ही दुकान लुट जाएगी और परिवार को भारी घाटा झेलना होगा। इसके बाद, मान लें कि परिवार पहले मैनेजर को बाहर का रास्ता दिखाते हुए दूसरे मैनेजर को नियुक्त करता है। 

नियम पहले जैसे ही रहते हैं, यानी ‘गहनों का वितरण मैनेजर के विवेक पर निर्भर है’। जाहिर तौर पर एक समय के बाद दूसरा मैनेजर भी अपने मित्रों व सगे-संबंधियों की तिजोरियां भरने लगता है। एक दिन परिवार को अपने ऑडिटर के जरिए पता लगता है कि उसका काफी खजाना लुट चुका है। जब वे मौजूदा मैनेजर के समक्ष यह बात रखते हैं तो वह कहता है कि इसकी शुरुआत तो पिछले मैनेजर ने की थी। पहला मैनेजर दूसरे मैनेजर पर ज्यादा लालची होने का आरोप लगाता है। भ्रमित परिवार उनकी टेनिस मैच स्टाइल की बहस को सुनता रहता है, जहां पर दोनों मैनेजर गलती को एक-दूसरे की ओर ठेलने में लगे हैं। जल्द ही परिवार के सदस्य दोनों मैनेजरों के खेमों में बंटते हुए आपस में उलझने लगते हैं। मैनेजरों की लूट चलती रहती है। 

आपको यह स्टोरी हास्यास्पद लग सकती है? खैर, यह है भी। लेकिन कोयला घोटाले के मामले में यही तो हो रहा है। हम भारतीय एक विभाजित मगर फिर भी संयुक्त परिवार जैसे हैं। हमारे कोयले के विशाल भंडार ज्वैलरी शॉप की तरह हैं। भाजपा और कांग्रेस मैनेजर हैं, जिन्हें आप किसी भी क्रम में रख सकते हैं। नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने तो सिर्फ कोयले में नुकसान की मात्रा बताई है। घोटाला तो दशकों से हो रहा है। इसी तरह के घोटाले अन्य प्राकृतिक संसाधनों में भी हो रहे हैं। वैश्विक बाजार में इनकी उच्च कीमतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये संसाधन हमारे लिए बेशकीमती हैं, जिनसे हमारे देश का कायाकल्प हो सकता है। इनके त्रुटिपूर्ण आवंटन से देश को भारी नुकसान होता है। यही कारण है कि खनिज संपदा के लिहाज से दुनिया के सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्रों में से एक होने के बावजूद हमारी गिनती गरीब देशों में होती है। 

हालांकि यह हमारे राजनेता ही हैं, जो इन संसाधनों से सबसे ज्यादा फायदा ले रहे हैं। इनमें अनाप-शनाप पैसा है। फिर भी हमने अपने राजनेताओं को विवेक के आधार पर इन संसाधनों के आवंटन की छूट दे दी। हम उनकी टेनिस मैच स्टाइल में एक-दूसरे पर आरोप ठेलने की राजनीति देखते रहते हैं। कांग्रेस हो या भाजपा, हम सोचते हैं कि हमारी पसंदीदा पार्टी इस समस्या को खत्म कर सकती है। हालांकि यह पार्टी-विशेष की समस्या नहीं है। यह तो संसाधनों के आवंटन के नियमों से जुड़ी है। 

लिहाजा हमें यह देखना होगा कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन बिलकुल निष्पक्ष और सर्वाधिक उत्पादक तरीके से होना कैसे सुनिश्चित किया जाए? नीलामी एक स्वाभाविक तरीका है। हालांकि खनिज भंडारों, इनके अंतिम इस्तेमाल और उत्खनन दरों की अनिश्चितता को देखते हुए कई बार खदान का मूल्यांकन आसान नहीं होता। ऐसी स्थिति में रॉयल्टी साझा करने का मॉडल कारगर हो सकता है। खनिज संपदा से भरपूर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जान लिया है कि कैसे जनहित से समझौता किए बगैर खनन क्षेत्र को विकसित किया जाए। हम भी यह कर सकते हैं। राजनीतिक दल देश की संपदा के मैनेजर हैं, मालिक नहीं। हम देशवासियों और मीडिया को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के ‘यह उसने किया, मैंने नहीं’ के ड्रामे पर ध्यान देने के बजाय भविष्य के लिए सही समाधान तलाशने पर फोकस करना चाहिए। 

इन दलों को भी अपनी नीतियां बदलनी होंगी। कोयला घोटाले के मुद्दे पर भाजपा ने स्मार्ट पॉलिटिक्स खेली। कोयले पर यूपीए सरकार की धांधलियों के बारे में लगातार बोलते हुए उसने यूपीए के मुंह पर कालिख पोत दी। हालांकि उसे पता होना चाहिए कि कहां पर रुकना है। भाजपा ने भी खराब नियमों का फायदा उठाया है। क्या भाजपा खुद को बदलना चाहती है? क्या यह सत्ता में रहने के एक बड़े फायदे यानी बेशकीमती संपदाओं पर पूर्ण नियंत्रण को छोड़ने के लिए तैयार है? अब राजनीतिक अवसर कांग्रेस को चोर साबित करने में नहीं है, बल्कि यह दिखाने में है कि भाजपा राष्ट्रीय हितों के लिए त्याग करने को तैयार है। 

कांग्रेस भी कुछ सकारात्मक कदम उठाते हुए अपने चेहरे की कालिख को थोड़ा साफ कर सकती है। पहला, हालिया कोल आवंटनों को रद्द या कम से कम उनका पुनमरूल्यांकन किया जाए। हां, यह उन निजी उद्यमियों और निवेशकों के साथ नाइंसाफी होगी, जिन्होंने कोल आवंटनों के आधार पर परियोजनाओं की फंडिंग की है। लेकिन यदि कांग्रेस अपना चेहरा बचाना चाहती है तो उसे अपने हाथ खींचने होंगे, अभी। दूसरा, वह प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की नई नीति पेश करे। तीसरा और साधारण उपाय, उसे अपनी अक्खड़ता में कमी लानी होगी। सत्ता में होना और सही होना दो अलग-अलग बातें हैं। सत्ता के शीर्ष में बैठे कुछ कांग्रेसी नेता स्पष्ट तौर पर गलत होते भी बेहद अक्खड़ तरीके से सामने आते हैं। गलती करने के बाद अक्खड़ता दिखाना और बड़ी गलती है। इससे मतदाताओं में चिढ़ पैदा होती है। सत्ता में होने का मतलब यह नहीं कि आप लोकसेवक नहीं हैं। विनम्रता, तार्किकता और संभव हो तो थोड़ी नैतिकता का प्रदर्शन करना होगा। 

कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि कोयला घोटाला नाटकीय घटनाओं से ओत-प्रोत कोई सोप ओपेरा नहीं है। इस ड्रामे को छोड़ें और समाधान के लिए साथ बैठकर चर्चा करें। जो ऐसा नहीं करता, वह २क्१४ के लिए संभवत: खुद ही अपने लिए गहरी खाई खोद लेगा।

चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द कॉल सेंटर', 2008 में 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ', 2009 में 'टू स्टेट्स' और 2011 में 'रेवोल्यूशन 2020' भी रिलीज़ होते ही बेस्टसेलर बनी। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़े चेतन भगत की पहचान एक लेखक से ज़्यादा यूथ आईकॉन के रूप में है। उनके कॉलम्स अंग्रेज़ी और हिंदी अखबारों में छपते रहते हैं। एक इंवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर उन्होनें अपना करियर शुरू किया था पर 2009 से वे पूर्ण तौर पर लेखन कर रहे हैं। 

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...