Saturday, September 29, 2012

राजनीतिक पार्टी बनाने का पहला सुझाव अन्‍ना का ही था




इमेज पर चटका लगा कर तहलका का मूल इंटरव्यू पढ़ें।
म धारणा यह है कि अरविंद केजरीवाल राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते हैं जबकि अन्ना हजारे इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन अन्ना से अलग होने के बाद पहली बार दिये एक विस्तृत साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने तहलका को बिल्कुल अलग कहानी बतायी। 19 सितंबर 2012 को इंडिया अगंस्ट करप्शन के कोर ग्रुप की बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस में अन्ना हजारे ने घोषणा की थी कि वे राजनीतिक दल बनाने के समर्थन में नहीं हैं और अगर अरविंद केजरीवाल कोई राजनीतिक पार्टी बनाते हैं, तो न तो अन्ना हजारे का नाम इस्तेमाल करें, न ही उनका फोटो। मगर अरविंद केजरीवाल ने तहलका को कहा है कि राजनीतिक पार्टी बनाने का विचार सबसे पहले अन्ना हजारे ने दिया था, उन्होंने नहीं और बाद में अन्ना अपनी ही बात से पीछे हट गये हैं।
अन्ना ने राजनीतिक पार्टी बनाने पर राय लेने के लिए जनता के बीच किये गये सर्वेक्षण और उसे करने के तरीके पर भी सवाल उठाये थे। लेकिन तहलका के साथ बातचीत में अरविंद का कहना है कि जनता के बीच सर्वेक्षण करवाने का विचार अन्ना हजारे ने स्वयं ही दिया था। वे आगे कहते हैं, ‘अन्ना ने ही इस सर्वेक्षण का तौर-तरीका भी सुझाया था। हमने उन्हीं के सुझाव के आधार पर सर्वेक्षण करवाया।’ राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले से पीछे हटने के बारे में जब कोर कमेटी की बैठक में अन्ना से पूछा गया तो बकौल अरविंद उनका जवाब था, ‘पहले मैं वह कह रहा था अब यह कह रहा हूं। जब पहले मेरी बात मान ली थी तो अब भी मान लो।’
अरविंद यह भी दावा करते हैं कि अन्ना की तरफ से राजनीतिक दल के गठन का सुझाव जब उन्हें मिला, तो वे चौंक गये थे। वे कहते हैं, ‘अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का मन बनाने के बाद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूं इस बारे में। यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी इसलिए मैंने अन्ना से सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा था। बाद में मैं भी उनके विचार से सहमत हो गया।’ अरविंद बताते हैं, ‘अन्ना ने पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ जनवरी महीने में हुई एक बैठक के बाद राजनीतिक दल का नाम भी तय कर लिया था। इस दल का नाम उन्होंने रखा था ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’।’
तहलका से साक्षात्कार में पहली बार केजरीवाल ने जो बातें कही हैं, वे बिंदुवार हैं…
 तहलका को दिये साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि राजनीतिक पार्टी बनाने का विचार सबसे पहले अन्ना हजारे ने दिया था। हजारे ने राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ जनवरी महीने में हुई एक बैठक के बाद लिया था। लेकिन अब अन्ना हजारे पीछे हट गये हैं।
 अरविंद का यह भी कहना है कि अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने का मन बनाने के बाद मुझसे पूछा था कि मैं क्या सोचता हूं इस बारे में। यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी, इसलिए मैंने अन्ना से सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा था। बाद में मैं भी उनके विचार से सहमत हो गया।
 अरविंद केजरीवाल ने तहलका को बताया कि अन्ना ने पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ बैठक के बाद राजनीतिक दल का नाम भी तय कर लिया था। इस दल का नाम उन्होंने रखा था ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’।
 19 तारीख को कंस्टीट्यूशन क्लब में टीम अन्ना के कोर ग्रुप के सदस्यों की हुई बैठक पर रोशनी डालते हुए अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि बैठक में हम सबने उनसे यही कहा कि अन्ना आप ही तो सबसे पहले कहते थे कि हम राजनीतिक पार्टी बनाएंगे तो अब यह बदलाव क्यों। उनका जवाब था कि पहले मैं वह कह रहा था, अब यह कह रहा हूं। जब पहले मेरी बात मान ली थी तो अब भी मान लो।
 जुलाई 2012 में हुए अनशन के बाद टीम अन्ना ने एक सर्वेक्षण की बात कही थी। इस सर्वेक्षण में अस्सी फीसदी लोगों ने राजनीतिक पार्टी का समर्थन किया था। गौरतलब है कि अन्ना हजारे ने इस सर्वे की वैधता और वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करके इसे खारिज कर दिया था। लेकिन अरविंद केजरीवाल तहलका को बताते हैं कि जनता के बीच सर्वेक्षण करवाने का विचार अन्ना हजारे ने स्वयं ही दिया था। इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि अन्ना ने ही इस सर्वेक्षण का तौर-तरीका भी सुझाया था। हमने उन्हीं के सुझाव के आधार पर सर्वेक्षण करवाया। पर अब अन्ना ने अपना मन बदल लिया है। मुझे इसकी कोई वजह समझ में नहीं आती।
 अरविंद ने यह भी बताया कि आगामी दो अक्टूबर 2012 को उनकी टीम जनता के सामने अपनी भावी राजनीतिक पार्टी का प्रारंभिक मसौदा रखेगी। इसके बाद देश भर से लोगों से सुझाव मांगे जाएंगे। उन सुझावों के आधार पर नयी पार्टी का स्वरूप तय किया जाएगा।
 अन्ना हजारे से दोबारा जुड़ने के सवाल पर अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि अन्ना एक देशभक्त व्यक्ति हैं। देश के लिए जो भी अच्छा काम होता है अन्नाजी उसका समर्थन जरूर करेंगे ऐसा मुझे विश्वास है।
 राजनीतिक पार्टी के स्वरूप के सवाल पर अरविंद केजरीवाल बताते हैं कि यह आंदोलन ही रहेगा। पहले आंदोलन के पास तीन-चार हथियार थे – अनशन एक हथियार था, धरना एक हथियार था, याचिका दायर करना एक हथियार था। अब उसके अंदर राजनीति एक और हथियार जुड़ गया है। इसका मुख्य मकसद आंदोलन ही है, राजनीति बस एक अतिरिक्त हथियार के तौर पर जुड़ जाएगी।
प्रेस विज्ञप्ति

Tuesday, September 25, 2012

सिनेमा सोल्यूशन नहीं सोच दे सकता है: टीम चक्रव्यूह


निर्देशक प्रकाश झा ताजातरीन मुद्दों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते रहे हैं। जल्द ही वे दर्शकों के सामने नक्सल समस्या पर आधारित फिल्म चक्रव्यूह लेकर हाजिर हो रहे हैं। फिल्म में अर्जुन रामपाल पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं तो अभय देओल और मनोज वाजपेयी नक्सल कमांडर की भूमिका में। फिल्म की लीड स्टारकास्ट से लेकर निर्देशक प्रकाश झा से पैनल बातचीत:


अभय देओल
मैं अपने करियर की शुरुआत से ही ऐक्शन भूमिकाएं निभाना चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई किरदार मुझे नहीं मिला। यदि मिला भी तो उसमें ऐक्शन भूमिका का वह स्तर नहीं था। हिंदी सिनेमा में अक्सर ऐसा होता है कि लोग ऐक्शन के बहाने में कहानी लिखते हैं और उसको ऐक्शन फिल्म का नाम दे देते हैं। मुझे ऐसा किरदार बिल्कुल ही नहीं निभाना था। चक्रव्यूह में कहानी के साथ ऐक्शन गूंथा हुआ है। मुझे अभिनय का स्केल भी यहां अन्य फिल्मों से अलग लगा। मुझे यह नहीं पता था कि मेरा लुक कैसा होने वाला है। मैंने कई बार सोचा कि अगर नक्सल बनने वाला हूं तो कौन सी वर्दी पहनूंगा और कितनी फटी हुई होगी। फिर यहीं पर प्रकाश जी अन्य निर्देशकों से अलग हो जाते हैं। मैंने और प्रकाश जी ने बैठकर रीडिंग और डिस्कशन किए। प्रकाश जी की खासियत है कि आप किरदार के बारे में इनकी स्क्रिप्ट पढक़र जान जाते हैं। मसलन नक्सल विचारधारा और सोनी सोरी के बारे में फिल्म की स्क्रिप्ट पढऩे के बाद ही मुझे पता चला।

प्रकाश झा- मैं एक ऐसे राज्य से संबंध रखता हूं जहां के लोगों के लिए यह विचारधारा और इससे जुड़ा आंदोलन नई बात नहीं है। इस आंदोलन से जुड़े लोंगों से मेरी मुलाकात काफी पहले से होती रही है। बिहार और झारखंड में जहां-जहां नक्सल गतिविधियां है उसके बारे में मुझे पता है। 2003 में जब अंजुम रजबअली ने मुझे यह कहानी सुनाई तो मुझे लगा था कि इस पर बिना रिसर्च के फिल्म नहीं बन सकती है। यह कहानी दो ऐसे दोस्तों की कहानी है, जो समान सोच रखते हंै। एक पुलिस अधिकारी है जबकि दूसरा कानून की रेखा के दूसरी ओर जाकर नक्सली बन जाता है। फिल्म में समाज और उसकी व्यवस्था से जुड़े कई सवाल हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दंगे। साठ साल की आजादी के बाद अब जब लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं तो इस तरह के संकेत खतरनाक है।

अर्जुन रामपाल
मैं हिंदू कालेज से पढ़ा हूं, मैंने अपने कई दोस्तों को इस विचारधारा का सपोर्ट करते हुए देखा है। मुंबई आने के बाद मैं कॉमर्शियल सिनेमा करता रहा और महानगर में रहने की वजह से मुझे इतनी जानकारी नहीं थी कि नक्सल क्या होते हैं और क्या करते हैं लेकिन मुझे पता चल गया। दर्शक को भी इस फिल्म के बाद पता चल जाएगा। प्रकाश जी के साथ काम करके एक ट्यूनिंग बन गई है। राजनीति प्रकाश छह साल पहले बनाना चाहते थे लेकिन उसमें देर हुई। छह साल पहले ही वो पृथ्वी के किरदार के लिए मेरे पास आए थे। जब फिल्म बनने लगी तो भी वो किरदार उन्होंने मुझे फिर से इस फिल्म का ऑफर दिया। एक निर्देशक का उम्र के इस पड़ाव में डेडिकेशन देखते बनता है। उनकी स्तर की रिसर्च करने वाले बहुत ही कम निर्देशक हैं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में। मुझे और अभय को तो उन्होंने कई बाद ऐसी स्थिति में डाल दिया कि अरे यार अब यह कैसे होगा?

मनोज बाजपेयी
मैंने तो इस विचारधारा के साथ जीवन के कई साल बिताए हैं। मेरे लिए नक्सली का किरदार निभाना बहुत मुश्किल नहीं रहा। किरदार का लुक कैसा होगा? किरदार कैसे बोलेगा, हां इस पर जरूर थोड़ी बात हुई। बाकी प्रकाश झा के साथ काम करके अच्छा लगता है। अपने गांव- देश के हैं और दूसरी चीजों को लेकर उनकी समझ एकदम स्पष्ट है। इस मसले पर किसी भी तरह का स्टैंड लेना गलत होगा। जिसकी जमीन छीनी जा रही है, वह अपने हक के लिए लड़ेगा ही जबकि राज्य सत्ता के विरूद्ध जाना प्रजातंत्र के खिलाफ जाना है। हमें इस मसले पर बीच का रास्ता निकालना होगा अन्यथा स्थितियां विकट होती जाएंगी।

प्रकाश झा
फिल्म का काम है समस्या को उजागर करना न कि समाधान बताना। कोई फिल्मकार समाधान कैसे बता सकता है। वह भी एक ऐसी समस्या का जिसकी चपेट में देश के 250 जिले आते हों। शहरों में बैठकर हमें समस्या जितनी सरल लगती है उतनी सरल है नहीं। आजादी के बाद जो कुछ भी हुआ है इस देश में वह लगभग गलत हुआ है। आज साठ साल की आजादी के बाद हम लोकतंत्र पर सवाल उठा ही चुके हैं। पिछले सात-आठ सालों में जितना घूमता रहा हूं उतना ही रिसर्च किया है। गडचिरोली से लेकर बालाघाट तक और झारखंड के इलाकों में उसको देखकर लगता है समस्या इतना सरल नहीं है। मैंने जमीनी रिसर्च को ही कहानी में पिरोने की कोशिश की है। मसलन, नक्सलों की सबसे बड़ी आमदनी वसूली से आती है, पुलिस के फेक इनकाउंटर से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के सलवा जुडूम के गठन तक की कहानी फिल्म की मूल कहानी को कहीं न कहीं इंस्पायर तो करती ही हैं। साथ ही इस फिल्म में गरीब और अमीर के बीच बढ़ती जा रही खाई की वजह से जो हिंसक विचारधारा पनप रही है उसकी भी बात की गई है।

अभय देओल
मुझे लगता है कि यही पटकथा की खासियत है जो प्रकाश जी ने दो दोस्तों के माध्यम से कहने की कोशिश की है। दो दोस्तों की कहानी है जो विचारधारा अलग होने की वजह  से अलग हो जाते हैं और फिर जब उनमें दुश्मनी होती है तो वे कैसे एक दूसरे से पेश आते हैं। दो लाइन में कहूं तो यही फिल्म की कहानी है। नक्सल विचारधारा के साथ् कहानी को कैसे गूंथा जाए, ये प्रकाश जी का कमाल है। वो अपनी फिल्मों का अंत दर्शकों के ऊपर छोड़ देते हैं। एक निर्देशक के तौर पर उन्हें पता है कि क्या गलत है और क्या सही है लेकिन दर्शकों के सामने उनकी किसी भी फिल्म का एक अंत नहीं होता। यह दर्शकों पर होता है कि उन्हें इस फिल्म से क्या सीख लेनी है।

अर्जुन रामपाल
फिल्म में मेरा एक संवाद है कि देश को सीमा पार के दुश्मनों से उतना खतरा नहीं है जितना अंदर बैठे दुश्मनों से है। एक आईपीएस अधिकारी अधिकारी का किरदार निभाने के दौरान मुझे पता लगा कि किसी भी पुलिस अधिकारी को काम करने में कितनी मुश्किल होती होगी। इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पूरे देश को पता है कि सिस्टम फेल हो रहा है तो क्या सिस्टम को सुधारा ही नहीं जा सकता। करप्शन से पूरा देश परेशान है लेकिन उसका समाधान कैसे होगा? एक लडक़ा अपना हक पाने के लिए नक्सली बनता है लेकिन उसकी विचारधारा की आड़ में भी करप्शन पनप रहा है। ऐसे कई मुद्दे इस फिल्म के माध्यम से उठाए गए हैं। दर्शकों के लिए यह फिल्म एक सीख के तौर पर भी है कि एक फिल्म की कहानी के जरिए देश में घटित हो रही चीजों की भी जानकारी आपको मिल रही है।


प्रकाश झा
लोग कहते हैं कि राजनीति के बाद से मैंने फिल्मों में स्टैंड लेना बंद कर दिया है। मैंने अपनी किसी फिल्म में कभी कोई स्टैंड नहीं लिया है। मैंने अपनी हर  फिल्म में किरदारों या कहानी के जरिए तथ्यों को पेश किया है। मृत्युदंड का उदाहरण लें तो पाएंगे कि तीन औरतें आर्थिक उदारीकरण और मंडल कमीशन के बाद के दौर में जूझ रही हैं लेकिन मैंने वहां भी नहीं बताया कि मंडल कमीशन गलत है या सही या फिर आर्थिक उदारीकरण गलत है या सही। मुझे कहानी के माध्यम से जो समीकरण सही लगता है वही दर्शकों के सामने पेश करता हूं। मैंने आज तक कभी कोई स्टैंड नहीं लिया यहां तक कि दामुल में भी मैंने दर्शकों के सामने स्पष्ट तौर पर कोई निर्णय दिया।

मनोज वाजपेयी
हमारे मुल्क में इतनी विविधताएं हैं और अलग-अलग विचारधाराओं के लोग हैं। आप एक विवादित मसले पर अपना फैसला किसी फिल्म के जरिए नहीं सुना सकते हैं। जिस नक्सल कमांडर का किरदार मैं निभा रहा हूं वह एकबारगी आपको देश के कई नक्सल कमांडरों का मिक्स वर्जन लगेगा लेकिन इसका किरदार ही ऐसा है कि आप किसी एक नाम नक्सल कमांडर से इसको कनेक्ट न कर सकें। हमारे देश में इतने पढ़े- लिखे लोग हैं कि न जाने किसकी विचारधारा कहां से आहत हो जाए? सिनेमा के जरिए स्टैंड लेना मुझे नहीं लगता कि उचित है। 

- दुर्गेश सिंह

Wednesday, September 12, 2012

अनुराग की उड़ान के कुछ पुराने पन्ने.


   8 JULY 2010
बहस तो होती ही रहती है और बहस तो होती ही रहेगी। इस पूरी कवायद में ये हुआ कि अनुराग कश्‍यप थोड़े उघड़े। निर्देशक, सर्जक के रूप में हमने उन्‍हें पहले ही अपने वोट उन्‍हें दे रखे हैं, एक खुले इंसान और दोस्‍त की तरह हमारे बीच आकर उन्‍होंने बेतकल्‍लुफ बातचीत की – इससे उनका एक नया अंतरंग भी हमारे सामने उपस्थित हुआ। अभी उनकी फिल्‍म उड़ान आने वाली है। जैसा कि इस फिल्‍म की कहानी के बारे में कहा जा रहा है, ये उस किशोर की कहानी है जो जीवन के बारे में अपने फैसले खुद लेता है। कहा ये भी जा रहा है कि इसकी कहानी अनुराग के अपने जीवन से मिलती-जुलती है। मोहल्‍ला लाइव के पास अपने माता-पिता के नाम अनुराग की लिखी चिट्ठी हाथ लगी है, जिसमें उन्‍होंने अपने जीवन की दिशा को लेकर परिजनों को स्‍पष्‍ट संकेत दिया था। यह चिट्ठी अनुराग ने 1993 में लिखी थी : मॉडरेटर

चिट्ठी की एक कतरन

हाल में एक एड फिल्‍म की शूटिंग के दौरान
आदरणीय पापा एवं मम्मी जी,
सादर प्रणाम,
मैं यहां कुशलता से हूं और आशा करता हूं कि आप मेरे लिए ज़्यादा चिंतित नहीं होंगे। मैंने अपना कार्य शुरू कर दिया है। अपने भविष्य को एक मजबूत नींव देने के लिए, मैंने दूरदर्शन के एक कुशल और कार्यबद्ध निर्देशक श्री कृष्ण राघव जी को एक सहायक के रूप में ज्वाइन किया है। इस नई शुरुआत से मुझे काफी हिम्मत बंधी है। मैं इस समय आगरा में हूं। राघव जी ने टीवी पर दो सीरियल निर्देशित किए हैं। “रागदरबारी” एवं “चरित्रहीन”। इस समय वे एक नया धारावाहिक बना रहे हैं और मैं ऐक्टिंग कुछ दिनों के लिए त्याग कर, इनसे जुड़ गया हूं। मैं इस समय डायरेक्ट (सीधे) असिस्टेंट डायरेक्टर हूं। इसके लिए मुझे तनख्वाह भी मिलेगी। पर कार्य समाप्त होने पर, एक साथ सितंबर के बाद। उस दौरान अगस्त-सितंबर में मेरे खाने व रहने का इंतजाम वो करेंगे। लेकिन उनसे काफी कुछ सीखूंगा। मुझे सिर्फ आप लोगों का इमोशनल सपोर्ट चाहिए। यदि फाइनेंस आप लोगों के लिए मुश्किल है तो मैं खुद कोशिश करूंगा।
अभी आगरे में हम लोग शूटिंग के लिए लोकेशन खोज रहे हैं। अभी छुट्टी मिलते ही मैं शायद बॉम्बे (मुंबई) जाऊं। कुछ दिनों के लिए। मैंने एक सीरियल “पुराना अंदाज नया आगाज़” के लिए मेन रोल की शूटिंग भी की, मगर डायरेक्टर ने मुझे बिना पैसा दिए काम निकाला। अब पहली बार मैं सही आदमी के साथ जुड़ा हूं। पर फिलहाल मुझे तो चाहिए ही होंगे।
अनुभूति ने जो चिट्ठी में लिखा है कि दो चार लाईन ही लिख लो। ऐसा नहीं है कि मैं लिखना नहीं चाहता। लेकिन कुछ करके दिखाऊं तब न लिखूं। अब लिख रहा हूं क्योंकि मैं सोचता हूं अब एक शुरुआत हो चुकी है। अब मैं पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाहता।
आप लोग सोचते हैं मुझे आप लोग याद नहीं आते। पर ऐसा नहीं है। सिर्फ मेरे और आपके सोच विचारों का दायरा अलग है। आप लोगों के लिए एक नौकरी, एक घर बहुत जरूरी है। घर के बाहर आप लोग सोचते नहीं और सोचते हैं तो यही कि लोग आपके और आपके बेटों के बारे में क्या कहते हैं। मैं अगर सारा समय अन्‍य देशों की काफी फिल्‍में देखता हूं तो आवारागर्दी तो नहीं करता ना? मुझे यही करना है, क्योंकि यही मेरी दुनिया है, जिसका मौजूदा चेहरा बदलना चाहता हूं। मुझमें अगर आज इतना ज्यादा कॉन्फिडेंस है तो (…) की वजह से है। अभिनव (छोटा भाई) ने इतना सपोर्ट किया है जितना कोई भाई आज नहीं करता। वो भी मेरी खुशी में बेहद खुश है। और दुख में दुखी। आप यहां उसे और (…) को लड़ते, एक दूसरे से प्यार करते देखेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा। (…) को सिर्फ अभिनव और डॉली ही नहीं सारा हॉस्टल प्यार करता है। अभिनव और उसके सारे दोस्त उसे दीदी कहते हैं। मेरे आइडिया सुन कर राघव जी, मोहन राकेश की वाइफ और सारे बड़े लोग बोलते हैं यह कुछ करेगा, मेरा नाम रोशन करेगा तो जरूर कुछ देखा होगा।
इस फील्ड में मैं जब भी कोई बात करता हूं तो हर कोई सुनता है। ध्यान से सुनता है। ये सब कॉन्फिडेंस कुछ करने का शौक बड़े लोगों को मुंह पर क्रिटिसाइज करने की हिम्मत, अपनी बात सामने रखने की हिम्मत सिर्फ (…) से आयी है। मैं उससे सिर्फ प्यार ही नहीं उसकी इज्जत करता हूं। जब आपने (…) को ढेर सारा प्यार भेजा तो मुझे अब लगा कि आप अब मुझे समझने की कोशिश करेंगे। इसलिए यह चिट्ठी लिख रहा हूं। अगर आप मुझे समझेंगे, मुझ पर विश्वास करेंगे तो हमेशा लेटर लिखूंगा। और आपसे चाहूंगा इमोशनल होकर नहीं बल्कि खुलकर डांटकर चिट्ठी लिखें। आपका बेटा आपको हमेशा की तरह बहुत प्यार करता है। और करेगा। आपको छोड़ूंगा, भूल जाऊंगा, ऐसा सोचिएगा भी मत। इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि मेरे डायरेक्टर ने दस दिन मुझे ऑब्जर्व करके कमेंट किया था “लगता है तुम अपने फादर-मदर से बहुत अटैच्ड हो।”
मेरे लिए भी घर, प्यार, पैसा जरूरी है। पर मुझे उससे ज्यादा करना है। मैं ज़िंदगी सोसायटी या समाज के हिसाब से नहीं, अपने विचारों के हिसाब से जीना चाहता हूं। मुझे मेरा मकसद मिल गया है। मैं बंधा नहीं रह सकता। मुझे न केवल आर्थिक आज़ादी के लिए मेहनत करनी है बल्कि मानसिक, कार्मिक आज़ादी के लिए भी।
अभी सीख रहा हूं इसलिए आपसे फाइनेंस लेना पड़ता है। बिना किसी डिग्री के अपने दिमाग, क्रिएटिविटी के दम पर कुछ करना चाहता हूं। ऐसी लाइन में जहां सबकुछ मेरा हो। न कोई रिश्वत देनी पड़े। न अहसान लेना पड़े। जरूरत पड़ी तो लिखूंगा, सब करुंगा पर कभी भी किसी कीमत पर सरकारी जॉब, एमबीए, नौ से पांच रुटीन ऑफिस जॉब नहीं करूंगा। वही करुंगा जो अच्छा लगता है।
जब फुरसत मिलेगी सीधे घर आऊंगा क्योंकि मुझे आप लोगों से बेइंतहा प्यार है। अगर आप लोग डॉली से ऐसी चिट्ठी लिखवाएंगे तो मैं बेवजह परेशान ही होऊंगा। आप लोग प्यार से इनकरेजिंग चिट्ठी लिखेंगे तभी मैं कुछ कर पाऊंगा। आप लोग मेरी वजह से इतने इनसिक्योर होते हैं इसीलिए मैंने निश्चय किया है कि कुछ भी करूंगा, जो सही सोचूंगा वही करूंगा पर आपको रेग्युलर चिट्ठी लिखूंगा। अब आप लोगों को मुझसे शिकायत नहीं होगी।
आपको सिर्फ मेरे ऊपर भरोसा रखना होगा। इतना कि आप सोचें मैं जो भी करूंगा अपने भले के लिए ही करूंगा। आपके प्यार के लिए। आपकी इज्जत के लिए। आप भी नहीं चाहोगे कि आपकी खुशी के लिए कुछ ऐसा करूं कि मैं सारी ज़िंदगी त्रस्त रहूं। कुढता रहूं। वो न कर सकूं जो मैं तहे दिल से चाहता हूं।
मां, मुझे सिर्फ मेरी आज़ादी दे दो। रो कर या प्यार से मुझे वापस न बुलाओ। मैं घर आने से सिर्फ इसलिए डरता हूं कि अगर घर पर ये सब बातें कहूं तो आप लोगों की आंखों में आंसू आ जाते हैं और मैं खुद को गलत साबित करने लग जाता हूं। परेशान होता हूं। जब नॉर्मल हालात में सोचता हूं तो यही ख्याल में आता है कि आपने पूरी आज़ादी तो दी है पर मैं मानसिक तौर पर अब भी अपने आपको आपकी सोच विचारों से आज़ाद नहीं कर पाया हूं। हमारे बीच में प्यार है, इमोशन है। सब है। पर साथ ही में एक कम्यूनिकेशन गैप भी है। मैं कोई औरों के बेटे की तरह आवारा नहीं हूं। नालायक नहीं हूं, पर मैं जो सोचता हूं, जो इच्छा रखता हूं वो करना चाहता हूं। मुझे अपनी रिस्पॉन्सबिलिटी ज्ञात हैं पर अभी उन्हें भूल कर सीखना चाहता हूं। मैं आपका नाम ऊंचा करना चाहता हूं। सिर्फ चाहने से तो कुछ नहीं होगा। करना भी होगा। और अगर काम में बिजी रहता हूं खाली वक्त में पढ़ता हूं, सोचता हूं तो कोई गुनाह नहीं करता।
((…)) तो हर पल यही कहती है घर जाओ, चिट्ठी लिखो। अभी तो खैर दस दिन से न ((…)) न अभिनव, किसी से नहीं मिला।
मैं आगरा सिर्फ 40 रुपये लेकर आया था। पर फाइव स्टचार में रह रहा हूं। सारा खर्चा एक-एक चीज का, मेरा डॉयरेक्टर उठा रहा है। पर जब तक काम है तब तक। बीस अप्रैल से अगस्त तक आपको पैसे भेजने होंगे। इसलिए मांग रहा हूं कि पहली बार आज मुझे फील हुआ है कि मांग सकता हूं। मेरे फादर का ही पैसा है इसलिए मेरा भी है। बुरा मत मानिएगा, पर यकीन मानिए आज तक हमेशा ऐसा लगा है कि आपसे मैंने पैसा मजबूरी में लिया या किसी से उधार लिया जो कभी चुकाना है। क्योंकि हमेशा आपकी डिमांड साथ में रहती थी। आज पहली बार हक समझ कर मांग रहा हूं। और सिर्फ तभी भेजिएगा जब बेटों पर भरोसा हो। उसे लायक समझते हों। सिर्फ प्यार काफी नहीं है। आप मुझे भरोसा दीजिए, मैं आपको दुनिया से वो सब दिलवाऊंगा जो एक सच्चा दोस्त देता या दिलवाता है। अपना बेटा न समझ कर, एक दोस्त समझिए जो जिंदगी में स्ट्रगल करके ऊपर आना चाहता है।
आइंदा मेरा पत्र आपको टाइम पर पहुंचेगा। बशर्ते आप भी महीने में एक चिट्ठी लिखें, भरोसा करके। मैं आपसे डरकर नहीं रहना चाहता। हां मुझे महीने का 900 रुपये खाने का, 650 रुपये किराया, 40 रुपया धुलाई, 200 रुपये पिक्‍चर देखने का और जेबखर्च।
मुझे मालूम है ज़्यादा है पर मेरा महीने का खर्चा 1600-1750 रुपये तब आएगा जब मकान का किराया ???… कब तक मेरा दोस्त मुझे मुफ्त में रखेगा। इससे दोस्ती में दरार आती है।
डॉली को ढेर सारा प्यार। उसे समझा देना।
दादीजी और सबको प्रणाम। मैं क्या कर रहा हूं किसी को कहने की जरूरत नहीं।
पत्र जरूर लिखना। ढेर सारा प्यार।
आपका हमेशा
रिंकू
पुन :
आपकी याद बहुत आती है। आपका फोटोग्राफ फ्रेम में लगा हमेशा सामने पड़ा रहता है। मुझे वक्त मिला घर आऊंगा। आपको मिले तो आप आना।
मिंकू के पते पर चिट्ठी लिखना। दोनों लोग अलग अलग। एवम लंबी चिट्ठी दिल खोल कर चिट्ठी पर रख देना। सारी शिकायतें व नाराजगी। सारा प्यार। पक्का।
इंतजार में,
रिंकू
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित। 

Tuesday, September 4, 2012

लेखकों के सम्‍मान की लड़ाई



-अजय ब्रह्मात्‍मज 

आजकल जितने टीवी चैनल, लगभग उतने अवार्ड। ये अवार्ड टीवी सीरियल और शो में उल्लेखनीय काम कर रहे कलाकारों, लेखकों, तकनीशियनों और निर्माता-निर्देशकों को दिए जाते हैं। याद करें कि क्या आपने किसी टीवी अवार्ड समारोह में किसी लेखक को पुरस्कार ग्रहण करते देखा है? न तो किसी लेखक का नाम याद आएगा और न ही उनका चेहरा, जबकि टीवी और फिल्म का ब्लू प्रिंट सबसे पहले लेखक तैयार करता है।

फिल्मों के अवार्ड समारोह में अवश्य लेखकों को पुरस्कार लेते हुए दिखाया जाता है। टीवी के लेखकों को यह मौका नहीं दिया जाता। क्यों..? टीवी लेखकों का एक समूह मुंबई में यही सवाल पूछ रहा है। उनके संगठन ने सदस्य लेखकों का आवान किया है कि वे अपने सम्मान के लिए पुरस्कार समारोहों का बहिष्कार करें। वे अपने नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों को ठुकरा दें। उनकी अनेक शिकायतें हैं। पुरस्कारों के लिए नामांकित लेखकों को समारोहों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन उन्हें पुरस्कार ग्रहण करने के लिए मंचपर नहीं बुलाया जाता। उन्हें रिहर्सल के दौरान ही पुरस्कार देते हुए शूट कर लिया जाता है और आग्रह किया जाता है कि पुरस्कार समारोह की शाम भी उसी कपड़े में आएं। अगर कभी मंच पर बुलाया भी जाता है तो उन्हें पुरस्कार देने के लिए किसी नामचीन हस्ती को नहीं चुना जाता। इतना हो भी गया तो पुरस्कार समारोह के प्रसारण से लेखकों का फुटेज काट दिया जाता है। 

लेखकों ने इस अपमानजनक स्थिति को बदलने का बीड़ा उठा लिया है। हाल में दो लेखकों के नाम पुरस्कारों की भी घोषणा हुई, लेकिन उन्हें समारोह में बुलाना उचित नहीं समझा गया। लेखकों को संदेश दिया गया कि उनकी ट्रॉफी उनके घर भिजवा दी जाएगी। आत्मसम्मान के धनी उन लेखकों ने पुरस्कार लेने से ही मना कर दिया।

इस साल फिल्मफेयर अवार्ड समारोह में आई ऐम कलाम के लेखक ने पुरस्कार ग्रहण करने के बाद चुटकी ली थी। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ने तो यह समझ कर उनके साथ शादी की थी कि लेखक हैं तो क्रिएटिव व्यक्ति होंगे। मुझे आज पता चला कि मैं टेक्नीकल आदमी हूं। लेखन एक क्रिएटिव प्रॉसेस है, लेकिन अवार्ड समारोहों ने उसे टेक्निकल कैटेगरी में डाल दिया है। गलत पहचान की पीड़ा बहुत तकलीफदेह होती है। संजय चौहान ने अपनी चुटकी में जिस दर्द को बयां किया था, वही दर्द टीवी लेखकों को भी है। उनकी मांग है कि लेखकों को कहानी, संवाद और पटकथा के लिए अलग-अलग पुरस्कार दिए जाएं। उनके पुरस्कार को निर्देशन के पुरस्कार की तरह का सम्मान मिले। वास्तव में यह सम्मान की लड़ाई है, जिसमें वे एकजुट होते नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों मुंबई में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के मानद महासचिव कमलेश पांडे ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।

गौर किया जाए तो टीवी हो या फिल्म.., दोनों ही माध्यमों में लेखक की भूमिका बुनियादी होती है। वही नींव रखता है, जिसके ऊपर मनोरंजन की इमारत खड़ी की जाती है। लेखकों की महती भूमिका के बावजूद उन्हें अपने योगदान की तुलना में कभी सम्मान नहीं मिला। सलीम-जावेद की हिट जोड़ी एक जमाने में अवश्य प्रभावशाली रही, लेकिन वे अपवाद ही बन कर रह गए। आज भी यदा-कदा कुछ लेखकों का नाम बताया और पोस्टर पर लिखा जाता है। ज्यादातर फिल्मों और टीवी शो में लेखकों के नाम क्रेडिट रोल में चलते हैं। फिल्म या टीवी शो के प्रचार में उनकी भूमिका गौण मानी जाती है। 

गीतकार तो फिर भी चर्चा में आ जाते हैं, लेकिन लेखक गुमनाम ही रह जाता है। अपने किरदारों को उनका वाजिब हक दिलाने में कामयाब लेखक अपने हक की लड़ाई में अभी तक हारते ही रहे हैं। वक्त आ गया है कि मनोरंजन जगत में उनके महत्व को नए सिरे से आंका जाए। उन्हें क्रेडिट और उचित सम्मान दिया जाए। साथ ही पुरस्कार समारोहों में भी उन्हें समुचित प्रतिष्ठा मिले। अभी यह आवाज टीवी के लेखकों ने उठाई है। कल फिल्म के लेखक भी जगेंगे..।

जिंदगी का जश्न है ‘बर्फी’-अनुराग बसु






अनुराग बसु की ‘बर्फी’ आम हिंदी फिल्मों से अलग दिख रही है। स्वयं अनुराग बसु की पिछली फिल्मों से इसकी जमीन अलग है और किरदार भी। अनुराग बसु खुद बता रहे हैं ‘बर्फी’ के बारे में ़ ़ ़
पहला ट्रेलर आया ताक लगाा कि यह सायलेंट फिल्म है। फिल्म में ताजगी और उल्लास है। गानों के आने के बाद जिज्ञासाएं और बढ़ गईं हैं। क्या है यह 
फिल्म?

ट्रेलर में फिल्म की सारी बातें क्लियर नहीं की जा सकतीं। एक ही कोशिश रहती है कि फिल्म का सही इमोशन दर्शकों में जेनरेट हो जाए और एक इंटरेस्ट रहे। यह सायलेंट फिल्म तो नहीं है, लेकिन संवाद बहुत कम हैं। मेरी फिल्मों में आप कई बार ऐसे लंबे दृश्य देखेंगे, जिनमें कोई संवाद नहीं होता।

 ‘गैंगस्टर’ में 20 मिनट का एक ऐसा ही सीन था। ‘बर्फी’ की कहानी लिखते समय चुनौती रही कि कैसे बगैर संवादों को बातें रखी जाए। इसका अलग मजा और नशा है। शब्दों को भाव और एक्सप्रेशन में बदल देना। रणबीर के होने की वजह से मुझे सुविधा हुई। वे कमाल के एक्टर हैं। उनका कैरेक्टर ट्रेलर में भी समझ में आता है। झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) को ऑटिज्म है। वह दुनिया को एकदम अलग तरीके से देखती है। बहुत ही शुद्ध है। श्रुति (इलियाना डिक्रुजा) एक सामान्य लडक़ी है। उसे मालूम नहीं है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए? उसे यह नहीं मालूम है कि छोटी-छोटी बातों में बड़ी खुशियां होती हैं। यह फिल्म 1970 में शुरू होती है। सारे किरदारों की आज तक की जर्नी फिल्म में दिखाई गई है। 

-आप की फिल्म पीरियड का फील दे रही है। आप ने बताया भी कि यह 1970 से अभी तक की जर्नी है। हम सभी जानते हैं कि 1970 के बाद के बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल रही है। क्या आप की फिल्म के बैकड्रॉप में ऐसी कोई बात है?

शुरू में हमने सोचा था कि बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करेंगे। कम से कम उसे छूते हुए निकल जाएंगे। बाद में लगा कि फिल्म का मूड थोड़ा अलग है। ‘बर्फी’ वास्तव में जिंदगी का जश्न है। इस फिल्म की कहानी की बहुत छोटी सी शुरुआत हुई थी। लिखते समय किरदारों ने ही इसे ढाला। आज का समय हर लिहाज से इतना प्रदूषित हो चुका है कि ऐसी फिल्म की कल्पना करना भी मुश्किल है। आज कल महानगरों में फेसबुक से प्रेम आरंभ होता है। कार की बैक सीट पर वह जवान होता है और कोर्ट में जाकर वह दम तोड़ देता है। सोशल प्रेशर, क रियर, इगो,आमदनी ़ ़ ़ इन सबके बीच मनुष्य अपनी शुद्धता खो चुका है। ‘बर्फी’ के सारे किरदार इस दुनिया से अलग जिंदगी जीते हैं। मैंने फिल्म में दार्जीलिंग की पृष्ठभूमि रखी है। वैसे ये किरदार कहीं भी हो सकते हैं। दरअसल मैंने इस कहानी की शुरूआत दार्जीलिंग में की थी,इसलिए मेरा हीरो भी वहीं का हो गया। दार्जीलिंग की यह कहानी उत्तर बंगाल से सफर करते हुए कलकत्ते तक आती है।

-आप की फिल्मों में कोई पैटर्न नहीं दिखता। हर फिल्म दूसरी फिल्म से थोड़ी अलग हो जाती है। क्या किसी खास तलाश में हैं आप?
मेरे लिए हर नई फिल्म अंधेरी गुफा में घुसने की तरह होता है। एक हफ्ते की शूटिंग के बाद उसी अंधेरे में चीजें दिखनी लगती हैं और एक राह मिलती है। मेरी ज्यादातर फिल्में बनने के दौरान ही शेप लेती हैं। यही वजह है कि मैं फिल्म की कहानी नहीं सुना पाता। अभी तक मैंने जो फिल्में की थीं, वे ज्यादातर डार्क और इमोशनल कंफ्लिक्ट की फिल्में की। यह फिल्म बिल्कुल अलग है। यहां ताजगी है, रौशनी है और खुशी है। ‘काइट्स’ के बाद जब मैंने यह फिल्म शुरू की तो मेरे दोस्तों ने मुझे डराया भी कि कोई सेफ फिल्म करो। मैं आशंकाओं के बावजूद यही फिल्म करना चाहता था, क्योंकि इसके किरदारों से मुझे प्यार हो गया था। कोई भी फिल्म डेढ़ से दो साल में बनती है। अगर फिल्म के कंटेंट से डायरेक्टर का प्यार न हो तो फिल्म बनाना मुश्किल हो जाए। फिर तो लगेगा यार जल्दी काम खत्म करो और फिल्म को रिलीज कर दो। आखिरी दिन की शूटिंग में भी पहले दिन का जोश दिखे, तो आप मान लीजिए कि आप की फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी।

-क्या यूनिट के सभी सदस्यों से आप फिल्म का कंटेंट शेयर करते हैं?
क्या फिल्म बन रही है, यह तो सभी को मालूम रहता है। बाकी नैरेशन देने से मैं बहुत घबराता हूं। इसके लिए बदनाम भी हूं कि मैं प्रोड्युसर और एक्टर को ठीक से कहानी नहीं सुनाता। फिल्म शुरू होने के पहले यूनिट के सारे सदस्यों को एक साथ सारी बात समझा देता हूं। उसके बाद वे अपने काम की जिम्मेदारी और प्लैनिंग खुद ही तय करते हैं। एक्टर को अलग से सुनाना-समझाना और राजी करना होता है। सीन इम्प्रोवाइज करने की मेरी बुरी आदत से सभी परेशान रहते हैं। अब सोचा है कि अगली फिल्म से यह आदत बदल दूंगा। मंै एक्टर के पीछे नहीं पड़ता। उन्हें फील समझा देता हूं। सीन करते समय वे जो भी गरमागरम इमोशन साथ लेकर आएं। मैं मेथर और प्रिपेरेशन में बहुत ज्यादा यकीन नहीं करता।

-आप की फिल्मों के ज्यादातर किरदार अनगढ़ होते हैं। उनमें परफेक्शन की कमी रहती है। हिंदी फिल्मों में हमें किरदारों को ब्लैक एंड ह्वाइट में देखने की आदत रही है। यही कारण है कि आप की फिल्में इंटररेस्टिंग होने के बावजूद नार्मल नहीं लगती?
समाज में ही देख लें, कितने लोग परफेक्ट हैं। हमलोग परफेक्ट होने का ढोंग रचते हैं। मैंने अपनी फिल्मों के किरदारों को इसी समाज से लिया है। मुझसे लोग कहते हैं कि मेरे किरदारों के हाव-भाव से उनके कैरेक्टर का सही अनुमान नहीं लगता। पता नहीं रहता कि वे आगे क्या करने वाले हैं। हम सभी लोग अपनी नार्मल जिंदगी में भी इतने ही अस्पष्ट होते हैं। हमें नहीं मालूम होता कि अगले दस सालों में क्या होगा? हमारे निजी संबंधों में क्या बदलाव आएंगे?



(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखते हुए उसके विपुल प्रभाव को समझने की कोशिश में वे फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आये। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क !

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