Tuesday, August 7, 2012

क्या GOW ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है?


♦ उदय प्रकाश
रात पौने ग्यारह का शो था। डेढ़ के आस-पास छूटा। पूरा हाल ठसा-ठस भरा हुआ था। हर डायलाग पर तालियां और सीटियां। हर डायलाग एक पंचलाइन। शोले के सलीम-जावेद, यहूदी के सोहराब मोदी और अभी हाल वाले कादिरखान के संवादों को बाहर का गेट दिखाती एक डरावनी, हारर, हास्य-फिल्म। एक वायोलेंट कामेडी। फनी … फन-फिल्म।
घर पहुंचते-पहुंचते ढाई बज गये थे।
पिटरौल पंप के पास तड़ातड़ गोलियां। कार के दोनों साइड के कांच तोड़ के, कट्टा और आटोमेटिक तमंचे की नली नीचे करके। गियर बक्सा की साइड पर, सीट की आड़ में भी छुपा हो साला तो छेद डाल।
दाहिनी कनपटी में छेद हो गया है। खून से बायें हाथ का पंजा भीग गया है। दाहिने में पिस्तौल। बनारस में चिरकुट आर्मडीलर यादव को गोली मार कर उड़ाया गया आटोमेटिक पिस्तौल।
कमीज पैंट सब में खून। खूनम खून।
सरदार खान सूरज की चकमक रोशनी के खिलाफ चौंधियाया हुआ, मुंह खोल कर सांस भरता, किसी कदर डगमगाता हुआ ‘जयसवाल बिल्डिंग मेटीरियल’ के छकड़े पर गिर कर ढेर हो जाता है। पंजे से पिस्तौल छूट कर जमीन में गिरती है। छकड़े का पहिया पिस्तौल पर चढ़ता है और उसमें भरी हुई गोली … ढांय …
अपने बाप शाहिद खान के मर्डर का बदला चुकाने लिए सरदार खान ने बचपन में सिर मुंडाया था। उसी सिर में छेद होने से वह छकड़े पर ढेर हो गया है। बदला खतम। जंजीर का एंग्री यंगमैन जो अब कौन बनेगा करोड़पति से लेकर आरो, ब्लैक और चीनी कम है का खसूट बूढ़ा हो चुका है और नवरतन तेल से खोपड़ी की मालिश करता है, उसके शानदार युग का खात्मा हो जाता है। शोले के गब्बर सिंह का भी जमाना फिस्स। ये धनबाद के सुलताना डाकू की पोस्ट-माडर्न छायाएं हैं। प्योर इक्कीसवीं सदी।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड का भिकू म्हात्रे अब धनबाद आ गया है। कोयले की माफियागीरी के बाद अब तालाबों की रंगदारी और मछली की ठेकेदारी। 1941 से 2009 तक फैजल खान की तीन पीढ़ियां धनबाद के बहाने पूरबी हिंदुस्तान की हिस्टरी बताती हैं। लेकिन ये इतिहास तो बिलकुल नहीं है, ये इतिहास का सब-आलटर्न है। कहीं भी कैमरा रख दो सब-आलटर्न पैदा हो जाता है। डेमोक्रेसी का, इतिहास का, साहित्य और धर्म वगैरह का…!
एक जगह बीच में 1947 के जीरो आवर वाला क्लिप भी है। नेहरू … आधी रात … वो … ट्रिस्ट विद डेस्टिनी … किस्मत के साथ जुआ…!
क्या ‘गैंग आफ वासेपुर’ मुंबइया ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है? वो क्या बोलते हैं मेट्रो-अंडरवर्ल्ड का रूरलाइजेशन? बालीवुड का झालीवुड? मतलब ‘सत्या’ और ‘शोले’ का रीमिक्स? राजकपूर के श्री 420 में जो लैंड माफिया का बचपन था, वो हमारे टाइम में मिनरल माफिया में मेच्योर हो गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में अब बिमल राय, सत्यजित राय या ऋत्विक घटक आऊर ऋतुपर्णो, सूजोय राय सब गये …! ‘देव-डी’ में थोड़ा लिहाज था। लेकिन कब तक इगनोर करोगे यार … ? जय हो बिहार के लाला … !
जो सत्या और शूल में नहीं हो सका था, उसे यहां मनोज वाजपेयी ने कर दिखाया। गमछा बांध के।
(उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। ‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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