Friday, August 31, 2012

देश के सबसे महंगे कवि : कुमार विश्वास


कवि का नाम सुनते ही झोला लटकाए और कुरता-पाजामा पहने दाढ़ी वाले एक बेबस और गरीब आदमी की छवि सामने आ जाती है लेकिन 42 वर्षीय युवा कवि कुमार विश्वास पर ये बातें लागू नहीं होतीं. कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है... कविता से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास इस समय देश के सबसे महंगे कवि हैं. हिंदी, इंग्लिश या किसी भी भाषा का कवि तीन घंटे के कवि सम्मेलन के 4 लाख रु. मांगने की शायद सोच भी नहीं सकता. वे कवि सम्मेलनों में अपनी खुद की टोयोटा इनोवा कार से जाते हैं. वैसे उनके पास टाटा आरिया भी है. वे एपल की मैकबुक इस्तेमाल करते हैं.
2010 में जब अण्णा हजारे के आंदोलन की नींव तैयार हो रही थी, उसी दौरान इस आंदोलन से युवाओं को जोड़ने के लिए कुमार को याद किया गया. और हुआ यह कि आंदोलन के साथ कुमार विश्वास का कद भी बढ़ता गया. 2010 तक वे एक कवि सम्मलेन में भाग लेने के लिए जहां 40,000- 50,000 रु. लिया करते थे, अण्णा आंदोलन के बाद तो उनके भाव आसमान पर जा पहुंचे. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि फेसबुक पर पिछले हफ्ते केंद्र सरकार को लताड़ते हुए नौकरी छोड़ने का ऐलान करने वाले उनकी पोस्ट को लगभग 25 हजार लोगों ने लाइक किया है. यही नहीं, करीब 2,670 लोगों ने उनकी इस पोस्ट पर टिप्पणी की. फेसबुक पर उन्हें पौने दो लाख से ज्‍यादा लोग पसंद करते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है. खुद कुमार के ही शब्दों में,  ''अण्णा आंदोलन से पहले मुझे केवल युवा ही कवि के रूप पहचाना करते थे. आंदोलन से जुड़ने के बाद मुझे और ज्‍यादा लोग पहचानने लगे. इस साल सिर्फ जुलाई में 48 कार्यक्रमों में बुलावा आया.''
गाजियाबाद के पिलखुवा कस्बे के एक मामूली से शर्मा परिवार की पांचवीं संतान कुमार ने जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छोड़ने का फैसला किया तो एक डिग्री कॉलेज में प्रोफव्सर उनके पिता को बेहद निराशा हुई. कविताओं के पीछे भागने वाले कुमार ने बीए करने की इच्छा जाहिर की तो नाराज पिता ने इसकी फीस खुद जुटाने का फरमान सुना दिया. 1988 के आसपास की बात है. वे हापुड़ में अपने एक दोस्त के घर गए जहां कवि सम्मलेन चल रहा था. कुमार ने भी वहां कविता सुनाई, जिसे खूब पसंद किया गया. दोस्त के पिता ने खुश होकर उन्हें 100 रु. दिए. यह कुमार की पहली कमाई थी, जिससे उन्होंने बीए की फीस भरी. वे कविताओं के लिए बुलाए जाने लगे. सिलसिला चल पड़ा.
नाम तो होने लगा पर उन्हें कुछ खटक रहा था. कवि सम्मलेन सुनने और सुनाने वाले दोनों अधेड़ उम्र के होते. उन्होंने तय किया कि कैसे भी हो युवाओं में कविता के प्रति प्रेम जगाना है. कॉलेजों में जाकर कवि सम्मेलन करना शुरू कर दिया उन्होंने पहला आयोजन 2002 में एनआइटी दिल्ली में किया. यहीं पर उन्होंने अपनी कविता कोई दीवाना कहता है...सुनाई और साथ में जब यह जुमला जोड़ा कि इस बार के सेमेस्टर में यह कविता आने वाली है तो हॉल तालियों से गूंज उठा. युवाओं से उन्हीं की भाषा में बात करना, उनके जैसे ही कपड़े पहनना, उन्हीं की तरह बोलना, मजाक करना, कुमार की इन्हीं खासियतों ने उन्हें युवाओं में लोकप्रिय बना दिया.
युवाओं की तरह तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करने वाले कुमार ट्विटर और यू ट्यूब पर प्रमुखता से मौजूद हैं. गूगल पर उनके नाम पर 11,30,000 रिजल्ट सामने आते हैं तो यू ट्यूब  पर 2,740. वे हिंदी के शायद पहले कवि हैं, जिन्होंने अपना बिजनेस मैनेजर (विशाल) और ब्रांड मैनेजर (रुचि) रखा हुआ है. उनका दावा है कि वे देश के पहले कवि हैं जिनके प्रशंसक उनकी कविताओं की कॉलर रिंग बैंक टोन (ष्टक्चञ्ज) अपने सर्विस प्रोवाइडर से ले सकते हैं.
उनके प्रशंसकों में फिल्मकार अनुराग कश्यप, क्रिकेटर सुरेश रैना और अभिनेता शेखर सुमन भी शामिल हैं. कश्यप ने तो उनकी कविता एक पागल लड़की थी के अधिकार मांगे हैं. फिल्म निर्माता सुनील बोहरा ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि ''कोई भी कुमार विश्वास का मुझसे बड़ा फैन हुआ तो मैं उसे गोली मार दूंगा.'' कुमार के दावे के मुताबिक, वे इकलौते कवि हैं, जिन्हें कॉर्पोरेट शो के लिए बुलाया जाता है. जापान, विएतनाम, न्यू जर्सी समेत दुनिया में वे शो करते हैं. इसी साल न्यू जर्सी में हुआ उनका शो हाउसफुल था. जिसे देखने से वंचित रह गए प्रशंसकों की मांग पर आयोजकों को उसी हफ्ते एक और शो करना पड़ा.
पर उनके चाहने वालों की तादाद के साथ-साथ उनके 'दुश्मन' भी बढ़ने लगे. 2004 से 2009 का उनका समय खासा संघर्ष भरा रहा. ''स्थापित कवियों को मेरी लोकप्रियता अच्छी नहीं लग रही थी. इसी बीच 15-20 कवियों ने मिलकर तय किया कि जहां मुझे बुलाया जाएगा, वहां वे नहीं जाएंगे. सरकारी सम्मेलनों में तो मुझे आज भी नहीं बुलाया जाता.'' लेकिन अण्णा आंदोलन ने उन्हें निडर बनाया और बेबाक भी. तभी तो वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कुशल प्रशासक और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तुलना मंदबुद्धि बच्चे से कर पाते हैं. आंदोलन के दौरान तो उन्हें उनके करीबियों तक के जरिए तरह-तरह की धमकियां दिलवाई गईं: ''ये हिंदुस्तान है. ट्रक मारकर चला जाएगा, पता भी नहीं चलेगा.'' कुमार विश्वास का विवादों से भी नाता रहा है. अण्णा आंदोलन के दौरान उन पर मंच से भड़काने वाले बयान देने के आरोप लगे. रामलीला मैदान में जब उन्होंने इस आशय की कविता पढ़ी कि पटना की गलियों से ये आवाज आती है, जिसको चरानी है भैंस वो सरकार चलाते हैं तो उन पर जातिवादी टिप्पणी करने के आरोप लगे. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के फेसबुक पेज को उनकी यह कविता हटानी पड़ी.
साहिबाबाद के लाला लाजपत राय कॉलेज में हिंदी के इस एसोसिएट प्रोफव्सर की पत्नी मंजू शर्मा राजस्थान के भरतपुर में प्रोफेसर हैं. आंदोलन के लिए कॉलेज से 'वैधानिक छुट्टी' पर होने के बावजूद उन पर कॉलेज न आने के आरोप लगे. ''मेरे हस्ताक्षर काट दिए गए. एक दिन में 11-11 कारण बताओ नोटिसों के जवाब दिए मैंने.'' हाल के दिनों में उन्हें लग रहा था कि नौकरी छोड़ देनी चाहिए. उन्होंने कॉलेज को इस्तीफा दे दिया है जो अभी मंजूर नहीं हुआ है. फिलहाल वे छुट्टी पर ही रहेंगे.
अण्णा आंदोलन ने कुमार को एक साधारण कवि से सेलेब्रिटी बना दिया. 2005 तक 20,000 रु. का मामूली इनकम टैक्स भरने वाला इस साल 10 से 12 लाख रु. टैक्स भरने जा रहे हैं. जाहिर है, अण्णा आंदोलन और कुमार विश्वास दोनों को एक-दूसरे का फायदा मिला है.
गीत जो चढ़ा युवाओं की जुबां पर
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है,
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है.
मैं तुझसे दूर कैसा हूं, तू मुझसे दूर कैसी है,
ये तेरा दिल समझता है, ये मेरा दिल समझता है,
के मोहब्बत एक एहसासों की पावन-सी कहानी है,
कभी कबिरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है.
यहां सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आंसू हैं,
जो तू समझे तो मोती हैं, जो ना समझे तो पानी हैं
-------
भ्रमर कोई कुमुदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा,
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का,
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा
---------
बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पाए, कभी मैं कह नहीं पाया
मैं उसका हूं वो इस एहसास से इनकार करता है,
भरी महफिल में भी रुसवा मुझे हर बार करता है,
यकीं है सारी दुनिया को, खफा है मुझसे वो लेकिन,
मुझे मालूम है, फिर भी मुझी से प्यार करता है
मैं जब भी तेज चलता हूं, न.जारे छूट जाते हैं,
कोई जब रूप गढ़ता हूं तो सांचे टूट जाते हैं,
मैं रोता हूं तो आकर लोग कंधा थपथपाते हैं,
मैं हंसता हूं तो मुझसे लोग अक्सर रूठ जाते हैं.
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे आगे,
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे.
समंदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता,
ये आंसू प्यार के मोती हैं, इसको खो नहीं सकता,
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले,
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

आज तक लाइव से साभार :

Tuesday, August 28, 2012

लो क सं घ र्ष !: प्रेम और सौहार्द्र का विकास भी होगा



दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्श्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात

दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्श्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात

आज से 75 साल पहले सन 1936 में लखनऊ शहर प्रगतिषील लेखक संघ के प्रथम अधिवेषन का गवाह बना था, जिसकी गूंज आज तक सुनाई पड़ रही है। उसी प्रकार आज जो लखनऊ में ब्लॉग लेखकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है, इसकी गूंज भी आने वाले 75 सालों तक सुनाई पड़ेगी।

उपरोक्त विचार बली प्रेक्षागृह, कैसरबाग, लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत ने व्यक्त किये। सकारात्मक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देष्य से यह सम्मेलन तस्लीम एवं परिकल्पना समूह द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पूर्णिमा वर्मन (षारजाह) रवि रतलामी (भोपाल), षिखा वार्ष्णेय (लंदन), डॉ0 अरविंद मिश्र (वाराणसी), अविनाष वाचस्पति (दिल्ली), मनीष मिश्र (पुणे), इस्मत जैदी (गोवा), आदि ब्लॉगरों ने अपने उद्गार व्यक्त किये। कार्यक्रम को मुद्राराक्षस, शैलेन्द्र सागर, वीरेन्द्र यादव, राकेष, शकील सिद्दीकी, शहंषाह आलम, डॉ. सुभाष राय, डॉ. सुधाकर अदीब, विनय दास आदि वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी सम्बोधित किया।

मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि
मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि
वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इंटरनेट एक ऐसी तकनीक है, जो व्यक्ति को अभिव्यक्ति का जबरदस्त साधन उपलब्ध कराती है, लोगों में सकारात्मक भावना का विकास करती है, दुनिया के कोने-कोने में बैठे लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का अवसर उपलब्ध कराती है और सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों के विरूद्ध जागरूक करने का जरिया भी बनती है। इसकी पहुँच और प्रभाव इतना जबरदस्त है कि यह दूरियों को पाट देता है, संवाद को सरल बना देता है और संचार के उत्कृष्ट साधन के रूप में उभर कर सामने आता है। लेकिन इसके साथ ही साथ जब यह अभिव्यक्ति के विस्फोट के रूप में सामने आती है, तो उसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलते हैं। ये परिणाम हमें दंगों और पलायन के रूप में झेलने पड़ते हैं। यही कारण है कि जब तक यह सकारात्मक रूप में उपयोग में लाया जाता है, तो समाज के लिए अलादीन के चिराग की तरह काम करता है, लेकिन जब यही अवसर नकारात्मक स्वरूप अख्तियार कर लेता है, तो समाज में विद्वेष और घृणा की भावना पनपने लगती है और नतजीतन सरकारें बंदिषें का हंटर सामने लेकर सामने आ जाती हैं। लेकिन यदि रचनाकार अथवा लेखक सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इस इंटरनेट का उपयोग करे, तो कोई कारण नहीं कि उसके सामने किसी तरह का खतरा मंडराए। इससे समाज में प्रेम और सौहार्द्र का विकास भी होगा और देष तरक्की की सढ़ियाँ भी चढ़ सकेगा।

परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान
दशक के ब्लॉगर: (१) पूर्णिमा वर्मन (२) समीर लाल समीर (३) रवि रतलामी(४) रश्मि प्रभा (५) अविनाश वाचस्पति
दशक के ब्लॉग: (१) उड़न तश्तरी: ब्लॉगर समीर लाल समीर (२) ब्लोग्स इन मिडिया: ब्लॉगर बी एस पावला (३) नारी: ब्लॉगर रचना (४) साई ब्लॉगः ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र (५) साइंस ब्लोगर असोसिएशन: ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र डॉ जाकिर अली रजनीश
दशक के ब्लॉगर दंपति:
कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव

तस्लीम परिकल्पना सम्मान-2011

मुकेश कुमार सिन्हा, देवघर, झारखंड ( वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि) , संतोष त्रिवेदी, रायबरेली, उत्तर प्रदेश (वर्ष के उदीयमान ब्लॉगर), प्रेम जनमेजय, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार ),राजेश कुमारी, देहरादून, उत्तराखंड (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, यात्रा वृतांत ), नवीन प्रकाश,रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के युवा तकनीकी ब्लॉगर),अनीता मन्ना,कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),डॉ. मनीष मिश्र, कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),सीमा सहगल(रीवा,मध्यप्रदेश) रू रश्मि प्रभा ( वर्ष की श्रेष्ठ टिप्पणीकार, महिला ), शाहनवाज,दिल्ली (वर्ष के चर्चित ब्लॉगर, पुरुष ), डॉ जय प्रकाश तिवारी (वर्ष के यशस्वी ब्लॉगर),नीरज जाट, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, यात्रा वृतांत),गिरीश बिललोरे मुकुल,जबलपुर (मध्यप्रदेश) (वर्ष के श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर), दर्शन लाल बवेजा,यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक),शिखा वार्ष्णेय, लंदन ( वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, संस्मरण), इस्मत जैदी,पणजी (गोवा) (वर्ष का श्रेष्ठ गजलकार),राहुल सिंह, रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक),बाबूशा कोहली, लंदन (यूनाइटेड किंगडम) (वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री ), रंजना (रंजू) भाटिया,दिल्ली (वर्ष की चर्चित ब्लॉगर, महिला),सिद्धेश्वर सिंह, खटीमा (उत्तराखंड) (वर्ष के श्रेष्ठ अनुवादक), कैलाश चन्द्र शर्मा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ वाल कथा लेखक ),धीरेंद्र सिंह भदौरोया (वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार, पुरुष),शैलेश भारतवासी, दिल्ली (वर्ष के तकनीकी ब्लॉगर),अरविंद श्रीवास्तव, मधेपुरा (बिहार) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक),अजय कुमार झा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग खबरी),सुमित प्रताप सिंह, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ युवा व्यंग्यकार),रविन्द्र पुंज, यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के नवोदित ब्लॉगर), अर्चना चाव जी, इंदोर (एम पी) (वर्ष की श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर),पल्लवी सक्सेना,भोपाल (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, सकारात्मक पोस्ट) ,अपराजिता कल्याणी, पुणे (वर्ष की श्रेष्ठ युवा कवयित्री ) ,चंडी दत्त शुक्ल, जयपुर (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, कथा कहानी ),दिनेश कुमार माली,बलराजपुर (उड़ीसा) वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (संस्मरण ),डॉ रूप चंद शास्त्री मयंक (खटीमा) वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार, सुधा भार्गव,वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, डॉ हरीश अरोड़ा, दिल्ली ( वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक ) आदि

तस्लीम परिकल्पना विशेष ब्लॉग प्रतिभा सम्मान-2011

कुँवर कुसुमेश, लखनऊ, प्रीत अरोड़ा, चंडीगढ़, सुनीता शानू, दिल्ली, कनिष्क कश्यप, दिल्ली, निर्मल गुप्त, मेरठ, मुकेश कुमार तिवारी, इंदोर,अल्का सैनी,चंडीगढ़,प्रवीण त्रिवेदी, फ़तहपुर आदि



वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,डॉ अरविंद मिश्रा, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,डॉ अरविंद मिश्रा, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

इस अवसर पर देष के कोने-कोने से आए 200 से अधिक ब्लॉगर, लेखक, संस्कृतिकर्मी और विज्ञान संचारक भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में तीन चर्चा सत्रों (न्यू मीडिया की भाषाई चुनौतियाँ, न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार, हिन्दी ब्लॉगिंगः दषा, दिषा एवं दृष्टि) में रचनाकारों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगरों की सर्वसम्मति से सरकार से ब्लॉग अकादमी के गठन की मांग की, जिससे ब्लॉगरों को संरक्षण प्राप्त हो सके और वे समाज के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकें।

इस अवसर पर ‘वटवृक्ष‘ पत्रिका के ब्लॉगर दषक विषेषांक का लोकार्पण किया गया, जिसमें हिन्दी के सभी महत्वपूर्ण ब्लॉगरों के योगदान को रेखांकित किया गया है। इसके साथ ही साथ कार्यक्रम के सह संयोजक डॉ0 जाकिर अली रजनीष की पुस्तक ‘भारत के महान वैज्ञानिक‘ एवं अल्का सैनी के कहानी संग्रह ‘लाक्षागृह‘ तथा मनीष मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंगः स्वरूप व्याप्ति और संभावनाएं‘ का भी लोकार्पण इस अवसर पर किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ब्लॉग जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, बी एस पावला, रचना, डॉ अरविंद मिश्र, समीर लाल समीर, कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को ‘परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान‘ से विभूषित किया गया।

इसके साथ ही साथ अविनाश वाचस्पति को प्रब्लेस चिट्ठाकारिता शिखर सम्मान, रश्मि प्रभा को शमशेर जन्मशती काव्य सम्मान, डॉ सुभाष राय को अज्ञेय जन्मशती पत्रकारिता सम्मान, अरविंद श्रीवास्तव को

“लखनऊ में स्थापित होगा डॉ राम मनोहर लोहिया ब्लॉगर पीठ, इस आशय का प्रस्ताव संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने सभा पटल पर रखा जिसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। साथ इस अवसर पर रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगर कोश बनाने की बात कही ।”

केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती साहित्य सम्मान, शहंशाह आलम को गोपाल सिंह नेपाली जन्मशती काव्य सम्मान, शिखा वार्ष्णेय को जानकी बल्लभ शास्त्री स्मृति साहित्य सम्मान, गिरीश पंकज को श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य सम्मान, डॉ. जाकिर अली रजनीश को फैज अहमद फैज जन्मशती सम्मान तथा 51 अन्य ब्लॉगरों को ‘तस्लीम-परिकल्पना सम्मान‘ प्रदान किये गये।

Sunday, August 26, 2012

'49 साल का हूं और अब तक सच्चे प्यार की तलाश कर रहा हूं'



 
सुभाष के झा के साथ संजय लीला भंसाली की खास बातचीत 

आपकी बहन बेला को अपनी पहली फिल्म (शिरीं फरहाद की तो निकल पड़ी) बनाने में दस साल लग गए। सुना है लोग इसके लिए आपको जिम्मेदार कह रहे हैं!

चीजें तभी होती हैं जब उन्हें होना होता है। मैं जानता हूं कि लोग मुझे उस बरगद के पेड़ की तरह समझते हैं जिसकी छाया में कोई दूसरा पेड़ उग नहीं सकता। जब मुझ पर अपनी ही बहन के कॅरियर को खराब करने के इल्जाम लगाए जाते हैं तो मैं आहत हो जाता हूं। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि उसी ने मुझे फिल्मी दुनिया के कद्दावर लोगों से परिचित करवाया। वे मुझे एफ टीआईआई ले गईं और फि ल्म इंडस्ट्री में इंट्रोड्यूस किया। मैं आज जो भी हूं उसका पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है। शायद मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं उनसे पहले कोई फि ल्म बना पाया, पर ऐसा मौका उन्हें मिलना चाहिए था।

आप उन्हें पहले फिल्म बनाने के लिए मदद कर सकते थे।
कई बार मुझे लगा कि मेरी फिल्मों की एडिटिंग की वजह से वे अपनी कोई फिल्म नहीं बना पा रहीं। इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता था। बेला हमेशा मेरी क्रिएटिव टीम का हिस्सा थीं। उन्होंने फिल्म ब्लैक के पहले मेरी हर फिल्म एडिट की। तब जा कर उन्हें लगा कि अब वे अपनी फिल्म डायरेक्ट करने को तैयार हैं। वे हमेशा से ही एडिटिंग में एक्सपर्ट होने के बाद ही डायरेक्शन में उतरना चाहती थीं। फिल्म देवदास के बाद उन्हें लगा कि उन्हें भी फिल्म बनानी चाहिए। अंदर ही अंदर मुझे यह बात सता रही थी कि शायद मैं उनकी क्रिएटिविटी को सीमित कर रहा हूं।

पता चला है कि आप दोनों के बीच एडिटिंग के दौरान हाथापाई भी होती थी!
ओह हां, हंसते हुए। मैं किसी शेर की तरह अपनी फुटेज को बचाना चाहता था। वे बिल्कुल निर्दयी थीं। वे सीधे मुझे कह देती थीं कि कुछ सीन्स तो कटेंगे ही। तब वे एक बहन नहीं, बस एडिटर होती थीं। हम जंगली बिल्लियों की तरह लड़ते थे। उधर, हमारे असिस्टेंट डरे-सहमे एक-दूसरे से अलग करने की कोशिश में लगे रहते थे।

अब जब उनकी फिल्म बन कर तैयार है तो आपको कैसा लग रहा है।
मेरी पहली फिल्म खामोशी द म्यूजिकल से यह लाखों गुना अच्छी बनी है उनकी फिल्म। काश, मैंने यह फिल्म बनाई होती। मैं क्या कहूं पिछले कुछ हफ्तों से मैं काफी बिजी रहा हूं। अब मुझे अपनी फिल्म भी शुरू करनी है। ऐसा लग रहा है जैसे जुड़वा भाई-बहनों का जन्म हुआ हो। मैं सुपर-एक्साइटेडए सुपर-हैपी और सुपर-नर्वस भी हूं।

आप मैरीकॉम की जिंदगी के ऊपर भी फिल्म बना रहे हैं।
यह मेरी पहली बायोग्राफिकल फिल्म है। यह उनकी कहानी है जो बेहद खास इंसान है और जिन्होंने देश को गौरवान्वित किया है। इसके पहले यहां किसी ने महिला बॉक्सर के ऊपर कोई फिल्म नहीं बनाई है। हालांकि, हॉलीवुड में क्लिंट ईस्टवुड मिलियन डॉलर बेबी जैसी शानदार फिल्में बना चुके हैं। इसे मैं इसे जल्द ही शुरू करना चाहता हूं। मेरे आर्ट डायरेक्टर मेरे पास इस सब्जेक्ट को लेकर आए। वे लगभग एक साल से मैरी की लाइफ के ऊपर रिसर्च कर रहे थे। मैरी कॉम के कैरेक्टर को सूट करती कोई हीरोइन ढूंढना एक मुश्किल टास्क होगा।

आपकी बहन की फिल्म तभी रिलीज हो रही है जब आप अपनी फिल्म राम लीला के लिए बिल्कुल तैयार हैं।
पहली बात तो यह कि फिल्म का टाइटल अभी तक डिसाइड नहीं किया गया है। दूसरी कि मैं काफ ी थक चुका हूं पर मैं इंज्वॉय बहुत कर रहा हूं। बेला की फिल्म में तो मैं बिजी हूं ही पर मैं अपनी फिल्म पर भी काम कर रहा हूं।

आपकी अगली फिल्म देवदास, ब्लैक और गुजारिश जैसी सीरियस इशूज से हट कर एक लाइट-हार्टेड फिल्म है। क्या यह महज इत्तेफाक है।

मेरी अगली फिल्म काफी यंग और ब्रीजी है। शेक्सपीयर के रोमियो और जूलिएट को काफी अलग अंदाज में ट्रीट किया गया है। पर देवदास, ब्लैक और गुजारिश सीरियस फिल्में नहीं थीं। हां, उनका शराब की लत, मौत और आत्मघात से लेना-देना जरूर था। वे खुशगवार फिल्में थीं। उन्होंने सीरियस मुद्दों को जरूर उठाया पर हंसी और खुशमिजाजी को भी दिखाया। ब्लैक की शूटिंग के दौरान मैं और रानी ठहाके लगा कर हंसते थे।

बेला की फिल्म बताती है कि प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती। लेकिन हमारे समाज में इस तरह के प्यार को स्वीकार नहीं किया जाता। क्या आपको लगता है कि प्यार 45 का पड़ाव पार करने के बाद भी हो सकता है।

क्यों नहीं मुझे बेला का यह कॉन्सेप्ट बहुत पसंद आया। प्यार 45 क्या 85 की उम्र में भी हो सकता है। मैं 49 साल का हूं और अब तक सच्चे प्यार की तलाश कर रहा हूं।


दैनिक भास्कर से साभार प्रकाशित 

Thursday, August 23, 2012

शोले - 37 वर्षो का सफर


भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्म शोले' ने इस माह अपने 37 वर्षो का सफर पूरा कर लिया है। फिल्म 15 अगस्त 1975 में रिलीज हुई थी। तब किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि यह भारतीय फिल्मी जगत में मील का ऐसा पत्थर साबित होगी कि जिस तक कोई दूसरी कोई फिल्म पहुंच ही नहीं पाएगी। शोले की प्रसिद्धि का आलम ही तो है कि इसके सारे पात्र इतिहास के पन्नों में अमर हो गए हैं। फिल्म का ऐसा कोई पात्र नहीं, ऐसा कोई दृश्य नहीं, जिसकी नकल न की गई हो या जिसकी चर्चा न की जाती हो।


आईए आपको रू-ब-रू करवाते हैं..अपनी 37वीं वषर्गांठ मना रही फिल्म ‘शोले’ की कुछ हसीन यादों से। ये लेख गुजरात के प्रसिद्ध लेखक व डॉ. शरद ठाकर ने लिखा है। शरद ठाकर, अमिताभ बच्चन पर एक किताब लिख रहे हैं। यह लेख उसी किताब का अंश है।


शरद ठाकर। बॉलीवुड की महानतम फिल्मों में से एक ‘शोले’ एक महान पिता के होनहार बेटे द्वारा बनाई गई फिल्म थी। रमेश सिप्पी के पिता जी.पी. सिप्पी खुद एक धुरंधर फिल्म निर्माता थे। ‘शोले’ फिल्म बनाने से पहले रमेश सिप्पी कई सफल फिल्में बना चुके थे, जिसमें सीता और गीता मुख्य थी। सन् 1973 में रिलीज हुई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाकर रख दी थी। मैं तो खुद ही तीन बार ‘सीता और गीता’ देखने गया था और तीनों बार सिनेमा हॉल में हाउस फुल की स्थिति थी।


आमतौर पर किसी निर्माता-दिग्दर्शक की एक फिल्म जब सुपरहिट हो जाती है तो आगामी फिल्म में निर्माता अपने कलाकारों को बदलते नहीं हैं। रमेश सिप्पी ने भी कुछ ऐसा ही किया और ‘शोले’ फिल्म के लिए उन्होंने संजीव कुमार, धर्मेद्र और हेमा मालिनी को यथावत रखा। (ये सभी कलाकार फिल्म सीता और गीता में थे।) इसके बाद इन कलाकारों की भूमिका पर विचार शुरू हुआ।


फिल्म ‘शोले’ जब विचाराधीन थी, तब अमिताभ बच्चन एक सुपर फ्लॉप अभिनेता की स्टेज पर थे। ‘विचार’ और ‘निर्माण’ इन दो घटनाओं के बीच अमिताभ की ‘जंजीर’ पिस गई थी।


यह एक शुभ संजोग ही था कि ‘जंजीर’ और ‘शोले’ दोनों फिल्मों के लेखकों के रूप में सलीम-जावेद की जोड़ी थी। आज के सुपर स्टार सलमान खान के पिता सलीम खान और फरहान अख्तर के पिता जावेद अख्तर ये दोनों इस समय के फिल्मी इतिहास के महान लेखकों में से थे। दोनों लेखकों के लिए फिल्म निर्माता ने मुंबई की ताज होटल में दो लक्जुरियस स्यूट्स महीनों के लिए बुक करवा रखे थे। सलीम-जावेद यहां बैठकर फिल्म की कहानी लिखते थे और फोन पर फिल्म निर्माता का मार्गदर्शन करते रहते थे। समय का खेल है कि अब इन्हीं दोनों लेखकों की पटरी फिट नहीं बैठती।


इस समय सलीम-जावेद की मंशा थी कि ‘शोले’ में जय के पात्र के लिए अमिताभ को लिया जाए। लेकिन फिल्म निर्माता रमेश सिप्पी शत्रुघ्न सिन्हा को लेना चाहते थे। उन्होंने तो इस बारे में शत्रुघ्न से बात तक कर ली थी। लेकिन शत्रुघन इन दिनों फिल्म ‘सोलो’ की धुन में मस्त थे। जिस फिल्म में आसमान की ‘गैलेक्सी’ जैसे सितारों की भरमार हो, उसमें उनकी भूमिका कितनी काम आएगी? यही सोचकर उन्होंने फिल्म ‘शोले’ में काम करने का ऑफर ठुकरा दिया था। कह सकते हैं कि ‘जय’ की भूमिका न निभाकर उन्होंने ‘जय-वीरू’ जैसे पात्र के महानतम इतिहास पर ही लात मार दी थी।


शत्रुघ्न के इंकार के बाद रमेश सिप्पी की भी नजर अब अमिताभ पर टिकने लगी थी। इसी बीच सलीम-जावेद ने अमिताभ के कान में फूंक मार दी कि हमारे हाथ में जो था, हमने वो तुम्हारे लिए कर दिया। अब अधिक वजन बढ़ान के लिए तुम धरमजी (धर्मेद्र) से मुलाकात कर लो।


इस समय धर्मेद भी नंबर वन स्टारों में शुमार थे और राजेश खन्ना की ही तरह उनकी भी तूती बोलती थी। जबकि अमिताभ फिल्मी दुनिया की ऊंचाई पर पहुंचने के लिए सीढ़ी तलाश रहे थे। इसलिए धर्मेद की बात कोई भी निर्माता टालता नहीं था।


सलीम-जावेद की सलाह मानकर एक सुबह अमिताभ सीधे धर्मेद के बंगले पर जा पहुंचे। धरम पाजी से विनती करते हुए शोले में काम करने की मंशा जाहिर की। पंजाब द पुत्तर यानी की धर्मेद्र इस युवक की विनम्रता पर मोहित हो गए और बोले.. ‘साले..!’ मैं देखता हूं कि अब तुझे कौन ‘शोले’ में नहीं लेता है।


कालचक्र घूमा, और ऐसा घूमा कि अब शत्रु को लगता होगा कि उन्होंने जय न बनकर बहुत बड़ी भूल की थी तो धर्मेद को लगता होगा कि उन्होंने अमिताभ को जय बनाकर बड़ी भूल कर दी थी। क्योंकि वर्तमान इतिहास के पन्नों पर लिखे शब्द तो कुछ ऐसा ही इशारा करते हैं।
 
 

Monday, August 13, 2012

असम दंगों से जुड़े पूर्वाग्रह


भावनाओं से संचालित और ध्रुवीकृत व्यवस्था में दंगों की राजनीति भी सापेक्ष तरीके से चलती है। इसीलिए गुजरात दंगों के बारे में होने वाली किसी टेलीविजन बहस में 1984 के सिख-विरोधी दंगों का पक्ष भी रखा जाता है। ऐसा न करने पर आप पर पक्षपाती होने का आरोप लग सकता है। यह लगभग वैसा ही है मानो विरोधी पक्ष यह कहे कि ‘दंगों से निपटने में हमारा रिकॉर्ड आपसे बेहतर है क्योंकि ‘हमारे दंगों’ में अपेक्षाकृत कम लोग मारे गए।’ यह देखकर लगता है मानो हिंसा जैसे भयावह कृत्य का अपराधबोध किसी ऐसे ही दूसरे कृत्य से जोड़ने से मिट जाएगा। हमें दंगे की भेंट चढ़ने वाली हरेक जिंदगी को देश पर एक दाग की तरह देखना चाहिए, लेकिन यह बात टीवी बहस के गरमागरम माहौल में गुम होकर रह जाती है।


फिलहाल गुजरात और असम के दंगों के बीच ऐसी ही तुलना हो रही है। हाल के हफ्तों में अनेक मंचों से इस तरह के सवाल उठे कि ‘आखिर मीडिया ने असम की हिंसा को उतनी ही तीव्रता से कवर क्यों नहीं किया, जैसा गुजरात को किया गया था?’ एक लिहाज से चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों के दौर में यह सवाल जायज भी है, लेकिन इसमें कहीं न कहीं यह कुटिल संदेश भी छिपा है कि कोई ‘छद्म-धर्मनिरपेक्ष’ मीडिया असम को इसलिए कवर नहीं करेगा क्योंकि इससे बोडो जुड़े हैं, जबकि गुजरात को इसलिए कवर किया गया क्योंकि वहां पर मुस्लिम मारे जा रहे थे।


हकीकत कुछ और है। गुवाहाटी से कोकराझार कम से कम डेढ़ सौ किमी दूर है। किसी भी राष्ट्रीय चैनल की ओबी वैन गुवाहाटी में नहीं है। यही कारण है कि जब तक चैनलों के रिपोर्टर दंगा प्रभावित जिलों तक पहुंचे, तब तक ज्यादातर हिंसा थम चुकी थी। इसके उलट 2002 में गुजरात दंगे अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों के बीचोंबीच हुए थे और कई हिंसक वारदातें खबरिया संस्थान के कार्यालयों से महज कुछ किमी दूर हुईं। ऐसे में मीडिया के लिए इस विभीषिका तक पहुंचना और कवर करना ज्यादा आसान था। जहां तक चौरासी के दंगों के कवरेज का सवाल है, तो उस वक्त चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों का दौर नहीं आया था।


हालांकि यह असम दंगों के सीमित कवरेज को लेकर कोई बहाना नहीं है, बल्कि हम तो सिर्फ यह समझाना चाहते हैं कि न सिर्फ कोकराझार, बल्कि समूचा पूर्वोत्तर ‘दूरी’ की मार झेल रहा है। हालिया हिंसक वारदातों से कुछ हफ्ते पूर्व ही वहां पर सौ से ज्यादा लोग बाढ़ के चलते मारे गए और असम का आधे से ज्यादा इलाका पानी में डूब गया। लेकिन क्या हमने इसका वैसा ही कवरेज देखा, जैसा हम किसी महानगर या उसके आसपास नन्हे बच्चे के बोरवेल में गिरने का देखते हैं? मणिपुर को राष्ट्रीय नक्शे पर उभरने के लिए किसी मेरीकॉम या फिर 100 दिनों की नाकाबंदी की जरूरत होती है, जिसके चलते इंफाल में पेट्रोल की दरें 140 रुपए प्रतिलीटर और एलपीजी सिलेंडर की कीमत 2000 रुपए तक पहुंच गईं, लेकिन इसका भी ज्यादा उल्लेख नहीं हुआ। इसके अलावा मीडिया पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि उसने असम की हिंसा के संदर्भ में अपने एडिटोरियल विकल्प ‘पीड़ित’ की धार्मिक पहचान के आधार पर तय किए।

लेकिन यहां पर भी कुत्सित मानसिकता के लोग हमें जैसा यकीन दिलाना चाहते हैं, असम उससे कहीं ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है। राहत शिविरों में मौजूद हजारों लोगों के भयाक्रांत चेहरों को देखकर साफ पता लगता है यह कोई एकतरफा दंगा नहीं था। इस विविधतापूर्ण, बहु-जातीय समाज में रहने वाले बोडो, बंगाली हिंदुओं, आदिवासियों और मुस्लिमों समेत सब हिंसा के शिकार हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राहत शिविरों में अन्य समुदायों के लोगों के बनिस्बत कहीं ज्यादा मुसलमान शरण लिए हुए हैं। यदि बोडो समुदाय के लोगों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ा है, तो मुस्लिमों के साथ भी यही हुआ है। लेकिन लोकप्रिय तौर पर यही समझा जाता है कि वहां सिर्फ एक आक्रांता वर्ग है।


वास्तव में जो चीज तमाम दंगों को साथ जोड़ती है, वह है ‘दुश्मन’ की सतत तलाश। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद तमाम सिखों पर राष्ट्र-विरोधी होने का ठप्पा लग गया और तकरीबन रातोंरात एक गौरवशाली और देशभक्त समुदाय ने खुद को दूसरों के निशाने पर पाया। वर्ष 2002 में साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवकों की हत्या से उपजी बदले की भावना के तहत गुजरात के हरेक मुसलमान को ‘आतंकी’ मान लिया गया। इनकी तुलना में असम का मामला एक बार फिर कहीं ज्यादा जटिल है। यह अब भी साफ नहीं है कि वास्तव में हिंसा भड़कने का मूल कारण क्या था, क्योंकि इस इलाके में रहने वाले बोडो व मुस्लिमों के बीच दुश्मनी का लंबा इतिहास रहा है, जो वर्ष 2003 में बोडो टेरिटोरियल कौंसिल के गठन के बाद और बढ़ी तथा हाल के महीनों में वहां पर दोनों पक्षों की ओर से सशस्त्र उग्रवादी समूहों द्वारा हमलों के कई मामले सामने आए।


लेकिन असम में भी ‘दुश्मन’ मिल गया। ‘अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए’ जैसा जुमला आज निचले असम में हर उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो एक खास धार्मिक समुदाय से जुड़ा हुआ दिखता है। यहां पर इस ऐतिहासिक तथ्य को नजरअंदाज किया जाता है कि २क्वीं सदी की शुरुआत से तत्कालीन पूर्वी बंगाल से श्रमिकों का पलायन होता रहा है। इसके बजाय यह बताने के लिए एक उग्र प्रोपेगंडा रचा जाता है कि असम में मुस्लिमों का ‘सैलाब’ उमड़ आया है।


हां, सीमा की दरारों और घुसपैठ को रोकने के लिए अपेक्षित सुरक्षा बलों और कानून की कमी ने असम को रोजी-रोटी की तलाश में सीमापार से आने वाले घुसपैठियों के आसान चरागाह बना दिया है। हां, वहां ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो धार्मिक समुदायों को वोट बैंक की तरह देखते हैं। हां, वहां पर जमीनों और घटते संसाधनों के लिए मारकाट मची है, जो तब और बढ़ जाती है जब आबादी के पैटर्न में बदलाव होता है। लेकिन नफरत और अविश्वास की भावना भड़काने से इसका समाधान नहीं मिलेगा। दंगा पीड़ितों के घाव संवेदनाओं के मरहम से भरते हैं, न कि पूर्वाग्रहों से। यह जितना चौरासी के दिल्ली दंगों और 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ में सत्य है, उतना ही असम के लिए भी।

लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं।  दैनिक भास्कर से साभार प्रकाशित 

Saturday, August 11, 2012

परपेंडीकूलर मासूम है,घातक है।

किसी ने कहा था की गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 में परपेंडीकूलर की कोई जरुरत नहीं थी लेकिन मुझे यह किरदार सबसे ख़ास लगा,मुझे याद नहीं आता जब कोई इतनी मासूमियत से इतना खतरनाक साबित हुआ हो।जो इतनी मासूमियत बताता हो की उसके बड़े भाई का नाम फैसल खान है वो दूकान लूटने आया है। इसलिए घर आते आते यह किरदार कुछ ख़ास बनकर याद रह गया।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी,पहले पहल जितने आशिक मिजाज नजर आते है,समय निकलते निकलते उतने ही घातक होते जाते है,और बासेपुर की कहानी जिस तरह से सरदार खान और रामाधीर सिंह की लड़ाई की भूमि ना रहते,ऐसे लोगों की कहानी बन जाती है जो फैज़ल की तरह बासेपुर का सरताज बनना चाहते है। 

गैंग्स ऑफ वासेपुर-1 और गैंग्स ऑफ वासेपुर-2  दोनों देखते समय मन में यह सवाल जरुर कौंधता रहा की यशपाल शर्मा जैसे अभिनेता के लिए गैंग्स ऑफ वासेपुर में क्या कोई मजबूत रोल नहीं था ? यशपाल जी की महानता मुझे उस रोल में नजर आयी,जहा मेरे हिसाब से उन्हें बिलकुल भी नहीं होना चाहिए था। 

पीयूष मिश्रा जी के बिना भी काम लिया जा सकता था लेकिन उन्हें फिल्म में खुद के बुजुर्गों की तरह रखा जाना भी जरुरी था क्योंकि अनुराग कश्यप की कोशिश हमेशा यह होती है की वो पीयूष मिश्रा जी को कैसे ना कैसे खुद में जोड़ें रखें। पीयूष मिश्रा जी की आवाज़ हमें एक बार फिर ''आरंभ है प्रचंड '' की याद दिला देती है हालाँकि इस फिल्म के संगीत के मिजाज गुलाल से बिल्कुल जुदा है। 

तिग्मांशु धूलिया,पहले पहल मुझे पहचान में नहीं आये थे। स्क्रीन पर जो था वो कोई मंझा हुआ अभिनेता था और मैं जिस तिग्मांशु को जानता था वो एक निर्देशक है जिसकी पहचान मेरी नजरों में पान सिंह तोमर और साहब बीवी और गैंगस्टर से मजबूत हुई उन्होंने गैंग्स ऑफ वासेपुर के दोनों भागों को बहुत अच्छी तरह से बाँधा रखा,वो एक बहुत अच्छे निर्देशक के साथ साथ एक बहुत अच्छे अभिनेता भी साबित हुए है  

डेफिनेट फिल्म का एक मजबूत स्तंभ रहें,निर्णायक रहें शायद अनुराग कश्यप ने उन्हें पहले ही भांप लिया होगा वरना कोई भी इस निर्णायक किरदार के लिए एक मंझा हुआ अभिनेता लाने की जुगत में रहता, डेफिनेट अनुराग के विश्वास पर कायम रहे      

जाते जाते अनुराग कश्यप के लिए अभिनव कश्यप की बात दोहराना चाहूँगा की वाइलेंस को अब शायद थोडा कम करना ही पड़ेगा,कहानी के हिसाब से गैंग्स ऑफ वासेपुर में यह जरुरी था लेकिन अब इंतज़ार है अनुराग कश्यप की दिल पर लगने वाली कहानी कारात से अब तक गोलियों की आवाज़ कानो में गूँज रही है और जब यह आवाज़ कम होने की कोशिश करती हैटेलीविजन पर गैंग्स ऑफ वासेपुर की मची धूम उस आवाज़ में जान लौटा देती है,अनुराग कश्यप को गैंग्स ऑफ वासेपुर की सफलता की हार्दिक बधाई। अनुराग से ना जाने कितनों ने मेरी तरह सार्थक सिनेमा देखना सीखा है  



संजय सेन सागर हिन्दुस्तान का दर्द ब्लॉग के मोडरेटर है एम.बी.ए.के स्टुडेंट है,साथ साथ फिल्म लेखन में प्रयासरत है mr.sanjaysagar@gmail.com या 09907048438 पर संपर्क किया जा सकता है      


  









Friday, August 10, 2012

सत्यजित ना होते तो सत्यमेव जयते ना होता।


आमिर खान की प्रस्तुति सत्यमेव जयते के 13 एपीसोड पूरे हो गए। इस शो के इंपैक्ट के ऊपर भी उन्होंने एक एपिसोड शूट किया है, जो जल्द प्रसारित होगा। सत्यमेव जयते की पूर्णाहुति कर आमिर खान अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए निकल चुके हैं। वे शिकागो में धूम-3 की शूटिंग करेंगे। सत्यमेव जयते के निर्देशक सत्यजित भटकल का काम अभी समाप्त नहीं हुआ है। वे इसे समेटने में लगे हैं। सत्यमेव जयते से निकलने में उन्हें और उनकी टीम को वक्त लगेगा। पिछले ढाई-तीन सालों से वे अपनी टीम के साथ इस स्पेशल शो की तैयारियों, शोध, अध्ययन और प्रस्तुति में लगे रहे। उनकी मेहनत और सोच का ही यह फल है कि सत्यमेव जयते टीवी का असरकारी प्रोग्राम साबित हुआ। हालांकि ऊपरी तौर पर सारा क्रेडिट आमिर खान ले गए और यही होता भी है। टीवी हो या फिल्म,उसके ऐंकर और कलाकारों को ही श्रेय मिलता है।

सत्यमेव जयते भारतीय टीवी परिदृश्य का ऐसा पहला शो है, जिसने दर्शकों समेत ब्यूरोक्रेसी, सरकार और राजनीतिज्ञों को झकझोरा। सामाजिक मुद्दों और विषयों पर पहले भी शो आते रहे हैं, लेकिन सत्यमेव जयते की तरह सारगर्भित और प्रभावकारी शो और कोई नहीं आ पाया। शो में रखी गई बातें छिछली नहीं थीं। आमतौर पर टीवी चैनलों के प्राइम टाइम पर गंभीर मुद्दों की पड़ताल के बहाने छीछालेदर होती है। सत्यमेव जयते में हर मुद्दे पर विचार करते समय उम्मीद की लौ नहीं बुझने दी गई। निराशा में छिपी आशा का संकेत दिया गया। सत्यजित भटकल और आमिर खान के सकारात्मक व्यक्तित्व का सीधा असर रहा सत्यमेव जयते पर। आमिर खान ने बार-बार कहा कि अगर सत्यजित भटकल ने सत्यमेव जयते की जिम्मेदारी नहीं ली होती, तो मैं इस शो के लिए हां ही नहीं करता। सत्यजित पर आमिर को पूरा भरोसा था।

सत्यजित और आमिर की दोस्ती 33 साल पुरानी है। दोनों स्कूल में साथ पढ़ते थे। सत्यजित अपनी क्लास के मेधावी छात्र थे। अन्य सहपाठियों की तरह आमिर भी उनसे प्रभावित थे। बाद में आमिर फिल्मों में आ गए और सत्यजित पत्रकारिता, सामाजिक कार्य और वकालत में उलझे रहे। उन्होंने हमेशा समाज के व्यापक हित में कार्य किया। आमिर और सत्या (सत्यजित को सभी सत्या ही पुकारते हैं) की दोस्ती बनी रही। आशुतोष गोवारीकर की फिल्म लगान के निर्माण के लिए हां कहने पर आमिर ने सत्यजित को अपने प्रोडक्शन से जोड़ा। उन्होंने सत्या को फिल्मों की तरफ मोड़ा। आरंभ में सत्या प्रोडक्शन की छोटी-मोटी जिम्मेदारियां निभाते रहे और साथ में दैनंदिन गतिविधियों को पन्ने और कैमरे में दर्ज करते रहे। उन्होंने बाद में इन्हें अपनी पुस्तक ऐसे बनी लगान और फिल्म चले चलो का नाम दिया।

फिल्मों का चस्का लगने के बाद सत्यजित को यह माध्यम अधिक प्रभावशाली और जरूरी लगा। उन्होंने वकालत के दिनों के अनुभवों के आधार पर बॉम्बे लॉयर्स टीवी शो तैयार किया। यह एनडीटीवी पर प्रसारित हुआ। उन्होंने बच्चों के लिए जोकोमन फिल्म बनाई। आमिर ने जब स्टार टीवी के शो के लिए हामी भरी तो उन्हें फिर से सत्या का खयाल आया। उन्होंने सत्या को सत्यमेव जयते की पूरी जिम्मेदारी सौंपी। सत्या ने इसे महत्वपूर्ण दायित्व के रूप में लिया। उन्होंने सत्यमेव जयते के 13 एपिसोड से दर्शकों को झिंझोड़ दिया। 

उन्हें खुशी है कि यह शो अपेक्षा से अधिक लोकप्रिय हुआ। इसे दर्शकों ने सराहा, भारतीय समाज में इस शो ने सामाजिक उत्प्रेरक का काम किया। सत्या अब सत्यमेव जयते के प्रभाव के अध्ययन और विश्लेषण में लगे हैं। साथ ही वे सीजन-2 के बारे में भी सोच रहे हैं, लेकिन उसके पहले वे पूरी टीम के साथ थोड़ा आराम चाहते हैं। सत्यमेव जयते ने उन्हें मानसिक रूप से विचलित कर दिया है। 


(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखते हुए उसके विपुल प्रभाव को समझने की कोशिश में वे फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आये। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क !

Tuesday, August 7, 2012

क्या GOW ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है?


♦ उदय प्रकाश
रात पौने ग्यारह का शो था। डेढ़ के आस-पास छूटा। पूरा हाल ठसा-ठस भरा हुआ था। हर डायलाग पर तालियां और सीटियां। हर डायलाग एक पंचलाइन। शोले के सलीम-जावेद, यहूदी के सोहराब मोदी और अभी हाल वाले कादिरखान के संवादों को बाहर का गेट दिखाती एक डरावनी, हारर, हास्य-फिल्म। एक वायोलेंट कामेडी। फनी … फन-फिल्म।
घर पहुंचते-पहुंचते ढाई बज गये थे।
पिटरौल पंप के पास तड़ातड़ गोलियां। कार के दोनों साइड के कांच तोड़ के, कट्टा और आटोमेटिक तमंचे की नली नीचे करके। गियर बक्सा की साइड पर, सीट की आड़ में भी छुपा हो साला तो छेद डाल।
दाहिनी कनपटी में छेद हो गया है। खून से बायें हाथ का पंजा भीग गया है। दाहिने में पिस्तौल। बनारस में चिरकुट आर्मडीलर यादव को गोली मार कर उड़ाया गया आटोमेटिक पिस्तौल।
कमीज पैंट सब में खून। खूनम खून।
सरदार खान सूरज की चकमक रोशनी के खिलाफ चौंधियाया हुआ, मुंह खोल कर सांस भरता, किसी कदर डगमगाता हुआ ‘जयसवाल बिल्डिंग मेटीरियल’ के छकड़े पर गिर कर ढेर हो जाता है। पंजे से पिस्तौल छूट कर जमीन में गिरती है। छकड़े का पहिया पिस्तौल पर चढ़ता है और उसमें भरी हुई गोली … ढांय …
अपने बाप शाहिद खान के मर्डर का बदला चुकाने लिए सरदार खान ने बचपन में सिर मुंडाया था। उसी सिर में छेद होने से वह छकड़े पर ढेर हो गया है। बदला खतम। जंजीर का एंग्री यंगमैन जो अब कौन बनेगा करोड़पति से लेकर आरो, ब्लैक और चीनी कम है का खसूट बूढ़ा हो चुका है और नवरतन तेल से खोपड़ी की मालिश करता है, उसके शानदार युग का खात्मा हो जाता है। शोले के गब्बर सिंह का भी जमाना फिस्स। ये धनबाद के सुलताना डाकू की पोस्ट-माडर्न छायाएं हैं। प्योर इक्कीसवीं सदी।
मुंबई के अंडरवर्ल्ड का भिकू म्हात्रे अब धनबाद आ गया है। कोयले की माफियागीरी के बाद अब तालाबों की रंगदारी और मछली की ठेकेदारी। 1941 से 2009 तक फैजल खान की तीन पीढ़ियां धनबाद के बहाने पूरबी हिंदुस्तान की हिस्टरी बताती हैं। लेकिन ये इतिहास तो बिलकुल नहीं है, ये इतिहास का सब-आलटर्न है। कहीं भी कैमरा रख दो सब-आलटर्न पैदा हो जाता है। डेमोक्रेसी का, इतिहास का, साहित्य और धर्म वगैरह का…!
एक जगह बीच में 1947 के जीरो आवर वाला क्लिप भी है। नेहरू … आधी रात … वो … ट्रिस्ट विद डेस्टिनी … किस्मत के साथ जुआ…!
क्या ‘गैंग आफ वासेपुर’ मुंबइया ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है? वो क्या बोलते हैं मेट्रो-अंडरवर्ल्ड का रूरलाइजेशन? बालीवुड का झालीवुड? मतलब ‘सत्या’ और ‘शोले’ का रीमिक्स? राजकपूर के श्री 420 में जो लैंड माफिया का बचपन था, वो हमारे टाइम में मिनरल माफिया में मेच्योर हो गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में अब बिमल राय, सत्यजित राय या ऋत्विक घटक आऊर ऋतुपर्णो, सूजोय राय सब गये …! ‘देव-डी’ में थोड़ा लिहाज था। लेकिन कब तक इगनोर करोगे यार … ? जय हो बिहार के लाला … !
जो सत्या और शूल में नहीं हो सका था, उसे यहां मनोज वाजपेयी ने कर दिखाया। गमछा बांध के।
(उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। ‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Friday, August 3, 2012

सिनेमा को मुंबई से छीनने के लिए शटलकॉक ब्‍वॉयज देखिए


♦ अविनाश
ल शटलकॉक ब्‍वॉयज रीलीज हो रही है। चार सालों के संघर्ष के बाद। इससे पहले कुछ फिल्‍म महोत्‍सवों में शटलकॉक ब्‍वॉयज दिखायी गयी है। अच्‍छा ये लग रहा है कि शटलकॉक ब्‍वॉयज उन फिल्‍मों की छोटी सी फेहरिस्‍त में शामिल हो गयी है, जिसने अपनी निर्माण प्रक्रिया में मुंबई का सहारा नहीं लिया। सिनेमा निर्माण के विकेंद्रीकरण को लेकर एक पूरी बहस इन दिनों चल रही है। एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने आधे घंटे की एक डॉक्‍युमेंट्री मेरठ में फिल्‍मों की खेती पर की थी। जैसे जैसे टेक्‍नॉलॉजी सस्‍ती और सुलभ होगी, उसकी विशेषज्ञता का समूह भी बड़ा होगा।
शटलकॉक ब्‍वॉयज इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। युवा उद्यमिता (Youth Entrepreneurship) की एक सामान्‍य सी कहानी को चुस्‍त पटकथा, सहज संवाद और संयमित संपादन के जरिये बेहद रोचक बना दिया गया है। अलग अलग मन-मिजाज के चार दोस्त फॉर्मूला जीवन जीने से इनकार कर देते हैं और नये रास्‍ते पर चलने का जोखिम उठाते हैं।
बहुत पहले अखिलेश की एक कहानी चिट्ठी में चार ऐसे ही दोस्‍त हैं। भारत में उदारीकरण की धमक से पहले अखिलेश ने ये कहानी बुनी थी। विश्‍वविद्यालय के आखिरी दिन सारे दोस्‍त एक दूसरे को फेयरवेल देते हैं। सब एक दूसरे से वादा करते हैं कि जो जैसे जैसे अपने कैरियर में कामयाब होता जाएगा, वह सबको एक चिट्ठी लिखेगा। इस कहानी में लेखक भी एक पात्र है, जो आखिर में लिखता है कि अरसा हुआ, मेरे किसी भी दोस्‍त की चिट्ठी में आज तक मेरे पास नहीं आयी और मैंने भी किसी को चिट्ठी नहीं लिखी।
शटलकॉक ब्‍वॉयज “चिट्ठी” के दोस्‍तों की अगली पीढ़ी की कहानी है और इस बीच युवाओं की पूरी बुनावट बदल चुकी है। प्रचंड आत्‍मविश्‍वास उनके व्‍यक्तित्व का हिस्‍सा बन गया है। रिस्‍क एक कॉमन फेनॉमिना बन कर उभरा है। शटलकॉक ब्‍वॉयज इसी दौर के युवाओं की एक बेहतरीन कहानी है।
शटलकॉक ब्‍वॉयज के निर्देशक हैं, हेमंत गाबा। आईटी प्रोफेशनल हैं। पंकज जौहर के साथ मिल कर उन्‍होंने एक नयी लकीर खींची है। मोहल्‍ला लाइव ऑनलाइन पार्टनर के तौर पर इस फिल्‍म से जुड़ा है, सिर्फ इस वजह से नहीं, बल्कि अपने अपने मन के सिनेमा को संभव बनाने के लिए शटलकॉक ब्‍वॉयज देखने की अपील हम कर रहे हैं।
शटलकॉक ब्‍वॉयज का फेसबुक पेज : http://www.facebook.com/ShuttlecockBoys
शटलकॉक ब्‍वॉयज का इवेंट पेज : http://www.facebook.com/events/434756219898041
दिल्‍ली में जहां जहां फिल्‍म लगेगी : http://www.facebook.com/events/183194438477800

Wednesday, August 1, 2012

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे, तबे एकला चलो रे!


♦ आमिर खान

मैंअकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है।
बिहार में एक छोटा सा गांव गहलोर पहाड़ों से घिरा है। नजदीकी शहर पहुंचने के लिए गांव वालों को पचास किलोमीटर घूम कर जाना पड़ता था, जबकि उसकी वास्तविक दूरी महज पांच किलोमीटर ही थी। दरअसल, शहर और गांव के बीच में एक पहाड़ पड़ता था, जिसका चक्कर लगाकर ही गांव वाले वहां पहुंच पाते थे। इस पहाड़ ने गहलोर के वासियों का जीवन नरक बना दिया था। एक दिन गांव में दशरथ मांझी नाम के व्यक्ति ने फैसला किया कि वह पर्वत को काटकर उसके बीच से रास्ता निकालेगा। अपनी बकरियां बेचकर उन्होंने एक हथौड़ा और कुदाल खरीदी और अपने अभियान में जुट गये। गांव वाले उन पर हंसने लगे। उनकी खिल्ली उड़ायी और यह कहकर उन्हें रोकने की कोशिश की कि यह संभव ही नहीं है। किंतु दशरथ ने उनकी बात नहीं मानी और काम में जुटे रहे। आखिरकार 22 वर्षो के अथक प्रयास के बाद वह सड़क बनाने में कामयाब हो ही गये।
एक क्षण के लिए जरा कल्पना तो करें कि अपने प्रयास के पहले दिन उन पर क्या बीती होगी। विशाल पर्वत के सामने हथौड़ा और कुदाल लिए एक अदना सा आदमी। पहले दिन कितने घन इंच-पत्थर वह काट पाये होंगे? उस शाम को घर जाते समय उनके दिमाग में क्या घूम रहा होगा? एक सप्ताह के काम के बाद उन्हें क्या लगा होगा? तब उनकी क्या मानसिकता रही होगी? इसमें संदेह नहीं, पहले सप्ताह के अंत में उन्हें यह काम और भी मुश्किल लगा होगा। जब लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ायी होगी, उनको हतोत्साहित किया होगा, तो उन पर क्या गुजरी होगी? किस चीज ने उन्हें 22 सालों तक काम में जुटे रहने को प्रेरित किया होगा?
हमें और आपको यह तय करना है कि हम दशरथ मांझी की तरह बनना चाहते हैं या फिर उन गांव वालों की तरह, जिन्होंने उन्हें हतोत्साहित किया, उनका मखौल उड़ाया। हमारे सामने चुनाव स्पष्ट है। दशरथ मांझी जो करने का प्रयास कर रहे थे, वह सबके हित में था। इसके बावजूद उन्हीं के गांव वालों ने उनका मजाक उड़ाया। तो हमें उन गांव वालों की तरह होना चाहिए या फिर दशरथ मांझी की तरह जीना चाहिए, जिन्होंने अकेले अपने दम पर एक असंभव से दिखने वाले काम को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया। हममें से हरेक को अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिए और हमारे जवाब में ही हमारे भविष्य की सच्‍चाई छिपी है। हमारे जवाब में ही इन सवालों का जवाब छुपा है – क्या मैं राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहता हूं? मैं आशावादी बनना चाहता हूं या फिर महज आलोचक? मैं अपने सपने पूरे करने के लिए बिना किसी समझौते के अथक प्रयास करना चाहता हूं या फिर हताश-निराश होना चाहता हूं, जो सकारात्मक काम करने वालों को हतोत्साहित करे?
भारत में मेरा विश्वास है। भारत के लोगों में मेरा विश्वास है। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक भारतवासी अपने देश को प्यार करता है। मेरा विश्वास है कि भारत बदल रहा है। मुङो विश्वास है कि भारत बदलना चाहता है। मैं उस सपने में यकीन रखता हूं जो हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा था। एक स्वप्न जिसका जिक्र भारत के संविधान की प्रस्तावना में है – हम भारत के नागरिक ये तय करते हैं… ये वादा करते हैं कि हम हिंदुस्तान को एक स्वतंत्र, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाएंगे, राष्ट्र बनाएंगे। हम हिंदुस्तान के सारे नागरिकों को चार चीजें दिलवाएंगे…
न्याय… सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।
आजादी… सोच की, बोलने की और अपने-अपने धर्म का पालन करने की।
समानता… यानी सब बराबर हैं, कोई ऊंचा-नीचा नहीं है। और सब नागरिकों को बराबरी मिलेगी अवसर की, मौके की।
और चौथा भाईचारा… हम एकदूसरे में भाईचारा बढ़ाएंगे, हर एक इंसान को इज्‍जत से जीने का हक होगा और अपने देश में हम एकता और अखंडता बढ़ाएंगे, कायम रखेंगे।

दोस्तो यह था हमारे पूर्वजों के भारत का सपना। यह कहने वाले बहुत से व्यक्ति मिल जाएंगे कि यह सपना टूट गया। पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। यह सच है कि सपना पूरा नहीं हो सका है, किंतु इसके साथ यह भी पूरी तरह सच है कि यह अभी टूटा भी नहीं है। आज भी हजारों भारतीय इस सपने को जीते हैं। बहुत से लोगों ने इस सपने को साकार करने में अपना जीवन लगा दिया है। इनमें से बहुत से लोगों को यह भान भी नहीं है कि अपने जीवन में वे भारतीय संविधान में वर्णित सपने को जी रहे हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने देखा था।
मेरा मानना है कि हममें से बहुत से लोग कहीं न कहीं कुछ-कुछ चतुर, व्यावहारिक, हताश, भौतिकवादी और स्वार्थी हो गये हैं। हो सकता है हमें आगे बढ़ने के लिए थोड़े से सहारे की जरूरत हो। हमारे दिल में उम्मीद, आदर्शवाद, भरोसे, आस्था, विश्वास और जुनून के लिए थोड़ी सी जगह होनी चाहिए। अगर एक दशरथ मांझी पहाड़ को हरा सकते हैं, तो कल्पना करो कि 120 करोड़ दशरथ मांझी क्या कर सकते हैं।
सत्यमेव जयते की मेरी यात्रा समाप्त हो रही है, किंतु मेरा विश्वास है कि यह अंत नहीं, बल्कि असल में एक शुरुआत है। और शुरुआत के इस आशा भरे क्षण में, मैं गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा सबसे पहले अभिव्यक्त एक प्रार्थना के आगे अपना सिर झुकाना चाहता हूं…
जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ
और सर हो शान से उठा हुआ
जहां इल्म हो सबके लिए बेरोक
बिना शर्त रखा हुआ
जहां घर की चौखट से छोटी सरहदों में न बंटा हो जहान
जहां सच से सराबोर हो हर बयान
जहां बाजुएं बिना थके लगी रहें कुछ मुक्कमल तलाशें
जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायतें
जहां दिलो-दिमाग तलाशे नया खयाल और उन्हें अंजाम दे
ऐसी आजादी की जन्नत में आये खुदा
मेरे वतन की हो नयी सुबह।

जय हिंद, सत्यमेव जयते!
आमिर खान बॉलीवुड एक्‍टर हैं। उन्‍होंने होली नाम की फिल्‍म से अपने कैरियर की शुरुआत की और कयामत से कयामत तक, रंगीला होते हुए फना और गजनी तक आते आते अपनी एक अलग तरह पहचान बनायी। वे हिंदी सिनेमा में नये विषय पर काम करने वाले निर्देशकों को प्रोत्‍साहित भी करते हैं। इसकी शुरुआत उन्‍होंने लगान से की और पीपली लाइव, धोबी घाट और डेल्‍ही बेली जैसी फिल्‍में प्रोड्यूस की। सामाजिक मुद्दों पर आधारित उनके रियलिटी शो सत्‍यमेव जयते की इन दिनों बहुत चर्चा है।

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...