Monday, July 16, 2012

कॉकटेल:दिखने में नयी,सोच में पुरानी।


होमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है।

गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है।

पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्कार देता है। बेघर और बेसहारा हो चुकी मीरा को वेरोनिका का सहारा मिलता है। लंदन में कितनी आसानी से सबकुछ हो जाता है। वेरोनिका और मीरा साथ रहने लगते हैं। अपनी भिन्नता की वजह से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वे अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं। इस बीच मीरा के कहने पर गौतम को सबक सिखाने के लिए वेरोनिका उसकी चाल ही उस पर आजमाती है। गौतम को वेरोनिका का अंदाज पसंद आता है। असमर्पित रिश्ते में यकीन रखने वाले दोनों मौज-मस्ती के लिए साथ रहने लगते हैं। मीरा उनके साथ एडजस्ट करती है। अरे हां, गौतम की मां और मामा भी हैं।

मां दिल्ली में रहती हैं और मामा लंदन में। मामा का ही दिलफेंक मिजाज भांजे को मिला है। मां बेटे की शादी के लिए परेशान हैं। न जाने कब हिंदी फिल्मों की माताएं बेटे-बेटियों की शादी की चिंता से मुक्त होंगी? वह बेटे को समझाने के लिए लंदन पहुंच जाती हैं। मां को खुश करने के लिए गौतम संभावित बहु के रूप में मीरा का परिचय करवाता है। कुछ दिनों के लिए भिड़ायी गयी यह तरकीब रिश्तों के नए मायने उजागर करती है। तीनों मुख्य किरदारों के स्वभाव और सोच में परिव‌र्त्तन आता है। लव और इमोशन का कंफ्यूजन आरंभ होता है, जो अंत तक जारी रहता है। थोड़ा खिंच भी जाता है।

सैफ ऐसे खिलंदड़े और दिलफेंक आशिक की भूमिका में जंचते हैं। उन्होंने दिल चाहता है से लेकर लव आज कल तक में निभाई भूमिकाओं में से थोड़ा-थोड़ा याद कर कॉकटेल के गौतम को भी निभा दिया है। कुछ दृश्यों में वे बहुत अच्छे हैं तो कुछ में दोहराव की वजह से बहुत बुरे भी लगे हैं। उन्हें लगता होगा कि वे परफॉर्म कर रहे हैं,जबकि वे बोर करने लगते हैं। दीपिका पादुकोण भी बिगड़ी हुई लड़की का किरदार निभाने के अनुभव बटोर चुकी हैं। यहां उनमें थोड़ा और निखार दिखाई देता है। खास कर छूट जाने, अकेले पड़ने और प्रेमरहित होने के एहसास, भाव और दृश्यों में वह प्रभावशाली लगी हैं। इस फिल्म में उन्हें चरित्र के मुताबिक आकर्षक कॉस्ट्यूम भी मिले हैं।

वेरोनिका को उन्होंने बहुत अच्छी तरह जीवंत किया है। सीधी-सादी मीरा के किरदार में पहली बार पर्दे पर आई डायना पेंटी में आत्मविश्वास है। वह अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। बोमन ईरानी और डिंपल कपाडि़या के किरदार घिसेपिटे हैं, इसलिए उनके अभिनय में नयापन भी नहीं है। रणदीप हुडा का चरित्र अविकसित रह गया है। कॉकटेल हिंदी फिल्मों की पीढि़यों पुरानी सोच को फिर से स्थापित करती है। 

दीपिका पादुकोण जैसी आधुनिक लड़की को कथित भारतीय नारी में तब्दील करने की कोशिश लेखक-निर्देशक के वैचारिक दायरे को जाहिर करती है। एक-दूसरे के लिए त्याग कर रही लड़कियों के व्यवहार को देख कर हंसी आती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि वेरोनिका और मीरा के बीच एक अंडरस्टैंडिंग बनती और दोनों लात मार कर गौतम को अपनी जिंदगी और घर से बाहर निकाल देतीं। यह फिल्म हर हाल में गौतम यानी नायक के फैसलों को उचित ठहराती चलती है। फिल्म के कुछ संवाद अंग्रेजी में हैं। हिंदीभाषी दर्शकों को दिक्कत हो सकती है।

(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखते हुए उसके विपुल प्रभाव को समझने की कोशिश में वे फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आये। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

Friday, July 13, 2012

उत्‍सवधर्मी भारतीय समाज में उत्‍सव के सोलह प्रसंग क्‍या हैं?


♦ अजय ब्रह्मात्‍मज
भारतीय दर्शन और जीवनशैली में गर्भधारण से मृत्‍यु तक के विभिन्‍न चरणों को रेखांकित करने के साथ उत्‍सव का प्रावधान है। आरंभ में हम इसे चालीस संस्‍कारों के नाम से जानते थे। गौतम स्‍मृति में चालीस संस्‍कारों का उल्‍लेख मिलता है। महर्षि अंगिरा ने इन्‍हें पहले 25 संस्‍कारों में सीमित किया। उसके बाद व्‍यास स्‍मृति में 16 संस्‍कारों का वर्णन मिलता है।
इन संस्‍कारों का किसी धर्म, जाति, संप्रदाय से सीधा संबंध नहीं हैं। वास्‍तव में ये संस्‍कार मनुष्‍य जीवन के सभी चरणों के उत्‍सव हैं। इन उत्‍सवों के बहाने परिजन एकत्रित होते हैं। उनमें परस्‍पर सहयोग, सामूहिकता और एकता की भावना बढ़ती है। जीवन का सामूहिक उल्‍लास उन्‍हें जोड़ता है। आधुनिक जीवन पद्धति के विकास के साथ वर्तमान में संयुक्‍त परिवार टूट रहे हैं। फिर भी 16 संस्‍कारों में से प्रचलित कुछ संस्‍कारों के अवसर पर विस्‍तृत परिवार के सभी सदस्‍यों और मित्रों के एकत्रित होने की परंपरा नहीं टूटी है। शहरों में न्‍यूक्लियर परिवार के सदस्‍य अपने मित्रों और पड़ोसियों के साथ इन संस्‍कारों का उत्‍सव मनाते हैं। देहातों और कस्‍बों में अभी भी संस्‍कारों का आयोजन का पारिवारिक और सामुदायि‍क रूप बचा हुआ है।
देखें तो गर्भधारण से लेकर मृत्‍यु तक के ये 16 संस्‍कार मनुष्‍य के जीवन के मील के पत्‍थर हैं। जीवन यात्रा के हर मोड़ पर ये संस्‍कार हमें उत्‍सव का अवसर देते हैं और विकास क्रम को चिन्हित करते हैं। इन संस्‍कारों का प्राचीन आशय आज खो गया है, लेकिन ध्‍यान दें तो परिवर्त्तित रूप में ही इनकी प्रासंगिकता बनी हुई है। इन संस्‍कारों के नाम और लक्षण बदल गये हैं, लेकिन हम आधुनिक जीवन शैली में भी इन संस्‍कारों के निर्वाह से नहीं चूकते। अधिकांश परिवारों में इन संस्‍कारों की परिपाटी चली आ रही है। आज भी गोद भराई, जन्‍म, नामकरण, अन्‍नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह और मृत्‍यु के संस्‍कारों का पालन किसी न किसी रूप में भारतीय परिवारों में जारी है। इन संस्‍कारों का धार्मिक संदर्भ नहीं है। ये संस्‍कार सांसारिक हैं। इसी कारण इनका चलन जारी है।
चिन्मय मिशन द्वारा निर्मित धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ की 15 जुलाई से आरंभ अगली तीन कड़ियों में मनुष्‍य जीवन के सोलह संस्‍कारों का वर्णन सूरदास के जीवन प्रसंगों के माध्‍यम से किया गया है। सूरदास ने अपने पदों में कृष्‍ण चरित का बखान किया है। उन पदों में हमें कुछ संस्‍कारों के उल्‍लेख मिलते हैं। डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इन कड़ियों में 16 संस्‍कारों के चित्रण के साथ-साथ सूरदास के जीवन का आकलन भी किया है।
(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। लोकप्रिय हिंदी सिनेमा के प्रति गंभीर दृष्टिकोण रखते हुए उसके विपुल प्रभाव को समझने की कोशिश में वे फिल्मी हस्तियों के संपर्क में आये। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...