Saturday, June 30, 2012

सिने बहसतलब : अनुराग के गीत जिंदा रहेंगे ?

सिने बहसतलब के पहले दिन बहुत देर से पहुंचा अनुराग कश्यप बस उठकर जाने ही वाले थे। मंच पर डॉ.चन्द्र प्रकाश द्रिवेदी,अभिषेक शर्मा और स्वानंद किरकिरे मुख्य रूप से उपस्तिथ थे। वहा होने वाली जायदा बातें तो याद नहीं रही बस स्वानंद की एक बात याद रह गयी,स्वानंद ने कहा की आज गानों की हालत फिल्म में उतनी ठीक नहीं है,कोर्पोरेट कंपनी को आज संगीत और म्यूजिक की जरुरत बस उतनी है जितनी की मोबाइल कंपनी को कॉलर टियून की। स्वानंद की बात ने गहरा प्रभाव छोड़ा की आज लेखक की स्वतंत्रता प्रोडूसर और कंपनी के मुनाफे में कैद है,लेखक की कलम उनके ही इशारे पर चलती है। 

अनुराग की फिल्मो की बात करें तो अनुराग की फिल्मों के गीतों में हमेशा एक वीर रस और उल्लास्ता को महसूस किया जा सकता है लेकिन यह दोनों चीज़ें कोर्पोरेट कंपनी के फॉर्मेट में बहुत जायदा जगह पाती हो ऐसा नहीं है तो ऐसे में मेरे जेहन में यह सवाल अगले दिन तक कौंधता रहा की क्या कुछ दिन बाद अनुराग की फिल्मो से गीत गायब हो जाएँगे क्योंकि जब गीत बिकेंगे ही नहीं तो उन पर बहुत अधिक समय तक पैसा खर्च करना  शायद इतनी समझदारी की बात नहीं मानी जाएगी 

इस सवाल ने मेरी फ़िक्र बड़ा दी थी,बहुत देर तक मैं सोचता रहा बहसतलब के पहले दिन का आखिरी दौर शुरू हुआ,मंच पर मैंने एक शक्श को देखा जिसके बारे में अविनाश जी अभी बताकर गए थे,यह शक्श राज शेखर थे राज शेखर को देखा तो यकीन नहीं हो रहा था की मैं जिस रंगरेज़ पर तब से झूम रहा हूँ वह इस शक्श की कलम का जादू है बात करने से राज शेखर बिलकुल अपनी तरह लगे,'' सा को श ''बोलने वाले ! 

राज शेखर ने आज मेरा सालों से कायम एक मिथ थोड दिया था  दरअसल पिछले कुछ सालों पहले मैंने सुना था की हमारे सागर के गीतकार और भूतपूर्व मंत्री विट्ठल भाई पटेल जिन्होंने ''ना माँगू सोना चाँदी'' और ''  ''झूठ बोले कौआ काटे'' जैसे गीतों को लिखा है,वो खुद ना लिखकर,जो उनके यहाँ एक नौकर काम करता था उससे लिखवाते थे और खुद के नाम से फिल्मो में देते थे यह खबर सागर में कही भी सुनी जा सकती थी,इस जानकारी ने मेरे ऊपर ऐसा असर किया की मुझे अधिकतर लेखक चोर नजर आने लगे थे .

जब स्वानंद और राज शेखर को सुना,उनके भीतर के लेखक को समझा और उनकी संजीदगी को महसूस किया तो लगा की कही ना कही लेखक सबके अन्दर होता है वहा से मैंने कोशिश की विट्ठल भाई पटेल जी को लेकर जो खबर है शायद अफवाह है उसे अब धुंधला कर देना चाहिए मेरी कोशिश पता नहीं कब तक कामयाब रहती है,लेकिन अभी तक कामयाब है 

बहसतलब के दौरान स्वरा भास्कर की उपस्तिथि ने मुझे प्रभावित किया क्योंकि अधिकतर ग्लेमरस एक्टर इस तरह के आयोजनों से कन्नी काटते है उन्हें सिनेमा के सरोकार या उसके विकास पर बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती.ऐसे में स्वरा ने बहसतलब में आकर यह आस जगाई है की आगे आने वाले समय में बहसतलब में ऐसे कई और लोग जुड़ेंगे,जिनसे सिनेमा प्रभावित होता है 

दिल्ली की गर्मी में बहसतलब से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह का सुकून नसीब हुआ कुल मिलाकार पिछले बार के बहसतलब से कई कदम आगे एक दर्शक और श्रोता की हैसियत से आशा करता हूँ की अगली बार बह निर्माता निर्देशक हिम्मत जुटाकर हमारे बीच पहुँच पायेंगे जो कचरा फिल्मो को भी बड़ा गौरवान्तित महसूस करते हुए हमारे बीच परोस रहे है 

जाते जाते सुधीर मिश्रा जी की मीडिया पर की गयी टिप्पड़ी ने सिनेमा पर मीडिया के चिंतन की पोल खोल दी की मीडिया हमसे तो चाहता है की सिनेमा के विकास और वजूद के लिए हम लोग जान दे दें लेकिन वह अपने  चैनलों पर २४ घंटे सलमान खान और मुन्नी बदनाम ही दिखाना चाहता है सिने बहसतलब एक सार्थक मंच साबित हुआ है उम्मीद है आने वाले समय में इसकी महत्वत्ता और जरुरत बहुत जायदा बढेगी       


संजय सेन सागर हिन्दुस्तान का दर्द ब्लॉग के मोडरेटर है एम.बी.ए.के स्टुडेंट है,साथ साथ फिल्म लेखन में प्रयासरत है mr.sanjaysagar@gmail.com या 09907048438 पर संपर्क किया जा सकता है      

                  

Friday, June 29, 2012

सिनेमा क्‍या है? चलती हुई तस्‍वीरें या सपनों का कारखाना?


♦ तत्याना षुर्लेई
भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएं हैं। लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूं? जबकि यूरोप में तो यह 1995 में मनाया जा चुका है। इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं, क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है। सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं : उदय शंकर
यह लेख मोहल्‍ला लाइव की सिने बहसतलब के लिए तैयार की जा रही स्‍मारिका से लिया गया है। स्‍मारिका का संपादन प्रकाश के रे कर रहे हैं : मॉडरेटर
सिनेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है। उसका जन्म 28 दिसंबर 1895 को हुआ, जब लिमिएर (Lumière) बंधु ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सबसे बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Australia) जाते हुए लिमिएर-बंधुओं के सहयोगियों ने मुंबई में रुक कर, 7 जून 1896 को पहली बार भारत में फिल्मों का शो किया।
इस शो के बाद पश्चिम देशों की ही तरह भारत में भी यह नया आविष्कार लोगों को बहुत अच्छा लगा। कुछ सालों बाद पहली भारतीय फिल्म 19वीं शताब्दी के अंत से पहले बनायी गयी (अलग-अलग स्रोतों में पहली भारतीय फिल्म बनने का काल अलग-अलग लिखा जाता है, 1897 साल से 1900 तक।) भारतीय सिनेमा के जनक सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा हैं, जो महाराष्ट्र में रहने वाले एक फोटोग्राफर थे। लिमिएर-बंधुओं के मशीन से मोहित होकर उन्‍होंने एक कैमरा खरीदा और आस-पास में जो भी दिलचस्प लगा, उसे अपने कैमरे में कैद करने लगे। इस समय की भारतीय फिल्में पश्चिम से मिलती-जुलती थीं, जो कि सिर्फ वास्तविकता दिखा रही थीं।
तथापि भारत और पश्चिम के देशों में एक बड़ा अंतर है। यूरोप और इंग्लैंड में सिनेमा का सौ साल 1995 को मनाया जा रहा था। जिसका मतलब यह है कि पश्चिम के विचार से पहली फिल्म लिमिएर-बंधुओं की चलती हुई तस्वीर थी। भारत की स्थिति बिल्कुल अलग है। राजा हरिश्चंद्र के पहले की किसी भी फिल्म को, जिसे सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सवे दादा ने या दादा साहेब फाल्के ने बनाया था, फिल्म नहीं मानी जाती है। सिनेमा का सौ साल राजा हरिश्चंद्र का सौ साल है, जिसमें पहली बार एक कहानी दिखायी गयी। ऐसा अंतर क्यों? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें सबसे पहले फिल्म के तत्‍वों के बारे में सोचना चाहिए। अपने इतिहास के आरंभ में फिल्म, सभी लोगों के लिए, तस्वीर उतारने का नया तरीका माना जाता था। चलती हुई तस्वीरें इसलिए महत्त्वपूर्ण मानी गयीं क्योंकि वह दर्शकों को फोटो से ज्यादा वास्तविक लगती थीं। ऐसी तस्वीरें जीवन के प्रलेख मानी जाती थीं, जो सालों बाद पुराने जमाने के बारे में अगली पीढ़ियों को सब कुछ बोलेंगी। इसीलिए, लोग मानते थे कि फिल्मों का भविष्य सिर्फ दस्तावेजीकरण से संबंधित है। आज भी कभी न कभी कहा जाता है कि फिल्मों में दस्तावेजीकरण बहुत आवश्यक है और कुछ लोगों के लिए यह सिनेमा का आधार भी है। फिर भी यहां एक समस्या पैदा हो जाती है, और हम यह सवाल पूछ सकते हैं कि फिल्मों में यथार्थ है क्या? और, ऐसी चीज संभव है? हर फिल्म अपने रचयिता की दृष्टि के आधार पर बनती है और निर्देशक की भावना को दिखाती है। सवे दादा को अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले शायद ही किसी कहानी के बारे में सोचना था, या फिर जो कुश्ती-दंगल उन्होंने दिखाया, वे दोनों वास्तविक और उनकी – दृष्टि की थीं, कोई यथार्थवाद नहीं। और, इसी तरह सारी फिल्में बनायी जाती हैं। वे दर्शकों को सिर्फ वह देखने की अनुमति देती हैं, जो उनको दिखायी जाती हैं। लोगों की आंखें वास्तव में फिल्म की आंखें हैं, निर्देशक की आंखें हैं।
सिनेमा के इसी शुरुआती दौर में, एक दूसरा विचार पैदा हुआ, भारत और पश्चिम दोनों जगहों पर, जो लिमिएर-बंधु द्वारा बनी फिल्मों से बिल्कुल अलग था। यूरोप के फ्रांस में रहते हुए जॉर्ज मेलियेस (Gorges Méliès) सिनेमा का एक जादूगर बन गया और भारत मेंदादा साहब फाल्के ने वही काम किया, जो मेलियेस ने फ्रांस में किया। दोनों के लिए फिल्म इसलिए महत्त्वपूर्ण थी कि इसकी मदद से वे अपने दर्शकों को सपने दिखा सकते थे। इसी विचार से यूरोप में भी कुछ लोगों के लिए लिमिएर-बंधु सिर्फ कैमरे का आविष्कारक था, जबकि असल फिल्में मेलियेस के काम से संबंधित थीं। फिल्म की शुरुआत तब हुई, जब इसमें कहानी आ गयी और इस तरह फिल्म का विकास बिलकुल नये रास्ते से होने लगा। सिनेमा के इन शुरुआती महारथियों ने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों की यह योग्यता सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाएगी। फिल्में लोगों के लिए सबक भी है तो यथार्थ भी, लेकिन सबसे पहले दर्शकों को सपनों की एक दुनिया में ले जाने वाली वह नानी है, जिसकी उम्र सौ साल या उससे ज्यादा हो गयी है, साथ ही साथ सपनों की दुनिया में ले जाने के उसके कौशल में भी इजाफा हुआ है। फिल्मों में कुछ चीजें ऐसी हो सकती हैं जो आसपास वास्तव में नहीं होती हैं और यह सब करतब दर्शकों के लिए कभी-कभी यथार्थ से ज्यादा आकर्षक होता है। हमने देखा कि चलती हुर्इ तस्वीरें हमेशा कोई न कोई कहानी दिखाती हैं, तो शायद भारत में फिल्मों का इतिहास इसलिए राजा हरिश्चंद्र के समय से शुरू होता है क्योंकि पहली बार, इसमें दिखायी गयी कहानी लोगों को अदभुत लगी। क्या यही कहानीपन महत्त्वपूर्ण फिल्मों की प्रवीणता है? क्या हमारे प्रश्न का उत्तर यहां है?
नहीं। दादा साहब फाल्के नेराजा हरिश्चंद्र से पहले भी कुछ ऐसी फिल्में बनायीं थीं, जहां जादूगरी से भरे करतब थे, जिन्हें लोग वास्तविक दुनिया में नहीं देख पाते। उन सबमें शायद कोई कहानी नहीं थी लेकिन अदभुत चीजें थीं इसलिए हम पूछ सकते हैं कि उनकी कोई और फिल्म पहली भारतीय फिल्म क्यों नहीं कही जाती? मुझे लगता है कि ऐसा इसलिए हुआ कि दर्शकों के लिए आज भी इन दो चीजों की आवश्यकता है। पहला कोई अदभुत कहानी, और इसके अतिरिक्त ऐसी दुनिया जो हमारे आसपास नहीं है। अगर भारत में फिल्मों का सौ साल, पहली फीचर फिल्म का सौ साल माना जा रहा है, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि भारतीयों के लिए फिल्म में जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह यह कि इसमें सपना बुनने की शक्ति है।
यूरोप में कुछ लोगों के लिए सिनेमा का आधार पुराने जमाने के दर्शन से संबंधित है, जो प्लेटो की गुफा की तरह है। प्लटो ने जीवन और दुनिया की वास्तविकता के बारे में लिख कर एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया, जहां कुछ लोग गुफा में बैठे हैं। वे प्रवेश-द्वार से विमुख होकर बाहर नहीं, दीवार को देखते हैं। उन लोगों के पीछे कुछ हो रहा है, वास्तविक दुनिया है, वास्तविक चीजें और वास्तविक जीवन भी। लेकिन लोग जो देख पाते हैं, वह केवल इस यथार्थ की छाया है, जो दीवार पर दिखायी जाती है। यथार्थ लोगों के पीछे है। और, जिसे वे देख सकते हैं वह यथार्थ से मिलता-जुलता होकर भी उससे अलग ही है। सिनेमा घर कुछ लोगों के लिए ऐसी ही गुफा है। चित्रपट पर कुछ न कुछ तो दिख जाता है, जो सच्चाई जैसा है। लेकिन वास्तव में, दर्शक सिनेमा के परदे पर वैसे ही देख सकते हैं, जैसे गुफा में लोग दीवार पर देख सकते हैं, जो कि सच्चाई से बहुत दूर है। फिर भी यूरोप में फिल्म के दर्शकों के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण है कि फिल्म जिंदगी से मिलती-जुलती चीज है। जो फिल्म सपनों की तरह कहानी दिखाती है, बहुत लोगों के विचार में वह कोई कला नहीं है। फिल्मों के इतिहास की शुरुआत से ही यह सबसे बड़ी समस्या थी। दो तरह के विचारों के बीच टकराहट थी। आज भी उन दोनों विचारों में से एक ऐसा है, जो यह मानता है कि फिल्मों को सिर्फ यथार्थ दिखाना चाहिए और दूसरा यह कि फिल्मों में सबसे अच्छी वह दूसरी दुनिया है, जो वास्तविक दुनिया से बहुत अलग है।
प्‍लेटो का विचार लेकर हम फिल्मों के बारे में यह कह सकते हैं कि वह दुनिया जो चित्रपट पर दिखायी जाती है सही नहीं है और वास्तव से कुछ बेकार भी है क्योंकि वास्तव से अच्छा कुछ नहीं हो सकता। भारतीय फिल्मों की स्थिति यूरोप से अलग है क्योंकि इसका दार्शनिक आधार भी कुछ और है। भारतीय सिनेमा का दार्शनिक आधार जो कि प्लेटो की गुफा से मिलता-जुलता भी है और अलग भी है। हम कह सकते हैं कि अगर यह सब कुछ जो आसपास है सिर्फ माया है और फिल्मों का यथार्थ, दुनिया से इतना अलग होता है तो शायद सिनेमा में रचा गया यथार्थ ही मूल यथार्थ है। शायद, सिनेमा लोगों के लिए इतना मजेदार इसलिए है क्योंकि जो वे फिल्मों में देखते हैं वह यथार्थ है, माया नहीं। यह तो सिर्फ रूपक है लेकिन इसका एक छोटा दार्शनिक आधार तो हो ही सकता है। भारत का सिनेमा जब सपनों का कारखाना बन गया, तब इसे सिनेमा माना गया।
जैसे पहले बताया कि सब फिल्मों की कोई कहानी होती है और कोई फिल्म शुद्ध यथार्थ दिखा नहीं सकती। अगर सारी दुनिया माया है, तो वास्तविकता ढूंढने के लिए कुछ ऐसा चाहिए था जो लोगों के आसपास से बिलकुल अलग था। इसलिए फिल्मों का इतिहास फाल्के की फिल्म से शुरू हुआ। क्योंकि, सच्चा यथार्थ सिर्फ कुछ ऐसा ही हो सकता है, जिसे दर्शकों के आसपास से विरोध हो। मुझे आशा है कि इस तरह की फिल्मों का अंत कभी नहीं आएगा क्योंकि मनोरंजन और चमत्कार आज भी सिनेमा में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
(तत्याना षुर्लेई। इंडोलोजिस्‍ट और फिल्म-आलोचक। फिलहाल पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित Jagiellonian University में The Courtesan Figure in the Iconography on Indian Popular Cinema:Tradition, Stereotype, Manipulation नामक विषय पर पीएचडी कर रही हैं। उनका यह आलेख हमें जेएनयू के पीएचडी छात्र और तत्‍याना के दोस्‍त उदय शंकर के सौजन्‍य से मिला है।
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित 

Wednesday, June 20, 2012

सिनेमा के सौ बरस पर बहसतलब, 23-24 को दिल्‍ली पधारें।


तीन साल पहले सिनेमा पर बहसतलब का सिलसिला शुरू हुआ था। फिल्‍म महोत्‍सवों की समृद्ध परंपरा के बीच सिर्फ बातचीत का एक आयोजन करने का विचार इसलिए भी आया था, क्‍योंकि सिनेमा देखना पहले की तुलना में अब बहुत आसान हो गया है। अब कोई भी फिल्‍म ऐसी एक्‍सक्‍लूसिव नहीं रह जाती है, जैसे पहले हुआ करती थी। इसलिए फिल्‍म महोत्‍सवों का पहले जितना क्रेज था, अब उतना नहीं है। कम से कम भारत में तो नहीं है। हमारी समझ थी कि जो सिनेमा बनाते हैं, उन्‍हें अपने सिनेमा और सिनेमा के अलावा अपने समय की दूसरी गतिविधियों के बारे में बातचीत करनी चाहिए।
फिल्‍मकारों का एक तेज-तर्रार समूह बहसतलब को समर्थन देने की मुद्रा में आ गया। अनुराग कश्‍यप, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी और मनोज बाजपेयी एक तरह से संरक्षक की भूमिका में आ गये और जब भी मौका मिला, अपना कीमती समय बहसतलब के बारे में सोचने और बहसतलब के आयोजनों को संभव बनाने में लगाते रहे। पटना के आयोजन में पैसा जुटाने के लिए मनोज वाजपेयी ने एक जूते की दुकान के फीते काटे, एक होटल में जाकर शाम का खाना खाया और एक टेलीकॉम कंपनी के उपभोक्‍ताओं से एक घंटे तक बातचीत की। डॉक्‍ट साहब किसी न किसी बहाने बुलाते रहे और जेब में पैसे ठूंसते रहे कि उत्‍साह को हमेशा जिंदाबाद रहना चाहिए। अनुराग ने हर साल के चार बेशकीमती दिन मोहल्‍ला लाइव को डोनेट करने का वादा किया। हंसल मेहता जैसे जहीन फिल्‍मकार ने ट्वीट किया कि बहसतलब जैसे आयोजनों की बहुत जरूरत है।
लिहाजा सिनेमा के सौ साल पर हमने सोचा कि एक जोरदार बहसतलब करते हैं। इस बहसतलब को करने उत्‍साह तब और बढ़ गया, जब हमारे गार्जियन सरीखे हरिवंश चतुर्वेदी ने शुरुआती तैयारियों का सारा भार उठा लिया। जो जमीन उन्‍होंने तैयार करके दी, उसी पर आज हम ये बहसतलब कर पा रहे हैं। हरिवंश जी बिरला इंस्‍टीच्‍यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्‍नॉलॉजी के डायरेक्‍टर हैं।
ऊपर इनविटेशन कार्ड हमने चिपका दिया है। सबके घर पर आकर देना तो संभव नहीं, कृपया इसे ही न्‍यौता मान लें। इनविटेशन कार्ड में कुछ वक्‍ताओं और मॉडरेटर के नाम रह गये हैं, लेकिन वे सब अपने हैं और हमारी मजबूरी समझ सकते हैं। क्‍यों मिहिर पंड्या, प्रकाश के रे, रामकुमार सिंह, अनुराग आर्या, चंदन श्रीवास्‍तव, दिनेश श्रीनेत, हेमंत कुमार गाबा, शीलादित्‍य बोरा…?
इस बार कई सेशन हैं, जिनमें गांव, गीत, साहित्‍य, इतिहास से लेकर हम सिनेमा के अगले सौ साल के एजेंडे पर बात करना चाहते हैं। ये सारे विषय बहुत सोच समझ कर हमने तय किये हैं। मसलन हिंदी सिनेमा गांवों की कहानी क्‍यों नहीं कहता। यह विचार इफको के कुछ साथियों के साथ बात करते हुए आया। मुल्‍क की सत्तर-अस्‍सी फीसदी आबादी जहां रहती है, क्‍या वहां सब कुछ सामान्‍य है? क्‍या वहां कोई उतार-चढ़ाव नहीं है, जो कहानी में ढल सके? या ऐसी क्‍या बात है, जो हमारे फिल्‍मकारों को गांवों की कहानी कहने से रोकता है?
इसी तरह एक सत्र हिंदी सिनेमा और बहुजन वाला है। फॉरवार्ड प्रेस के संपादक द्वय प्रमोद रंजन और आयवन कॉस्‍का से बात करते हुए इस विषय का खयाल आया। साहित्‍य और राजनीति में बहुजन धारा ने अपनी जगह बना ली है और यकीनन मुख्‍यधारा की जगह ले ली है। लेकिन सिनेमा अभी भी बहुजन को स्‍वायत्त और स्‍वतंत्र तरीके से नहीं रच पा रहा। अभी भी दलित या ओबीसी नाटकीय तरीके से सिनेमा में जगह पाते हैं। तो क्‍या आने वाले समय में सिनेमा के भीतर भी कोई बहुजन हस्‍तक्षेप संभव है? और क्‍या वह हस्‍तक्षेप सिनेमा की मौजूदा मुख्‍यधारा को खारिज करते हुए होगा?
गीतकारों के साथ बहसतलब करने का विचार सबसे पहले नम्रता जोशी के मन में आया और मशहूर गीत-संगीत समीक्षक पवन झा को इस सत्र की रचना-संरचना तय करने की जिम्‍मेदारी देने की बात सोची गयी। लेकिन अफसोस कि इस बार दोनों ही अपनी जरूरी घरेलू मशरूफियत में कैद हैं। संभवत: इरशाद कामिल भी इस सत्र में शामिल हों।
इंट्री फ्री है। लेकिन आप चाहें, तो बहसतलब जैसे आयोजनों की निरंतरता के लिए मोहल्‍ला लाइव के एकाउंट में यथासंभव राशि जमा कर सकते हैं। ऑनलाइन राशि जमा करने के लिए जरूरी डीटेल ये रहा…
A/c Name : Mohalla Live
A/c No. : 158711100000502
IFC Code ANDB0001587
MICR Code 110011040
Bank Name & Address : Andhra Bank
1587-Shalimar Garden Branch: S C – 47, C – Block
Shalimar Garden, EXT 2, Sahibabad, Ghaziabad 201005
♦ अविनाश

Tuesday, June 19, 2012

जनसंघर्षों के साथ भद्दा मजाक है शांघाई-समर अनार्य

शांघाई शहर नहीं एक सपने का नाम है. उस सपने का जो पूंजीवाद के नवउदारवादी संस्करण के वैश्विक नेताओं की आँखों से धीरे धीरे विकासशील देशों में मजबूत हो रहे दलाल शासक वर्गों की आँखों में उतर आया है. उस सपने का भी जिसने नंदीग्राम, नोएडा और खम्मम जैसे हजारों कस्बों के सादे से नामों को हादसों के मील पत्थर में तब्दील के लिए इन शासक वर्गों ने हरसूद जैसे तमाम जिन्दा कस्बों को जबरिया जल समाधि दे दी. 

क्या है यह सपना फिर? यह सपना है हमारे खेतों, खलिहानों के सीने में ऊँची ईमारतों के नश्तर उतार उन्हें पश्चिमी दुनिया की जरूरतों को पूरा करने वाले कारखानों में तब्दील कर देना. यह सपना है हमारे किसानों को सिक्योरिटी गार्ड्स में बदल देने का. यह सपना है हमारे देशों को वैश्विक बाजारवादी व्यवस्था के जूनियर पार्टनर्स में बदल देने का. 

पर फिर, दुनिया के अब तक के इतिहास में कोई सपना अकेला सपना नहीं रहा है. हर सपने के बरक्स कुछ और आँखों ने आजादी, अमन और बराबरी के सपने देखे हैं और अपनी जान पे खेल उन्हें पूरा करने के जतन भी किये हैं. वो सपने जो ग्राम्शी को याद करें तो वर्चस्ववाद (हेजेमनी) के खिलाफ खड़े हैं. वे सपने जो लड़ते रहे हैं, रणवीर सेनाओं के खिलाफ खड़े दलित बहुजन भूमिहीन किसानों के सशस्त्र प्रतिरोधों से लेकर नर्मदा बचाओं आंदोलन जैसे अहिंसक लोकतान्त्रिक आन्दोलनों तक की शक्ल में. 

बाहर से देखें तो लगेगा इन सपनों और इनके लिए लड़ने वाले जियालों का कुल जमा हासिल तमाम मोर्चों पर हार है. आप नर्मदा घाटी में लड़ते रहें, बाँध ऊंचा होता जाएगा. आप नंदीग्राम में लड़ते रहें, जमीनें छीनी जाती रहेंगी. पर थोड़ा और कुरेदिये और साफ़ दिखेगा कि मोर्चों पर मिली इन्ही हारों से मुस्तकबिल की जीतों के रास्ते भी खुले हैं. उन सवालों की मार्फ़त जो इन लड़ाइयों ने खड़े किये, उस प्रतिरोध की मार्फ़त जिसने हुक्मरानों को अगली बार ऐसा कदम उठाने से पहले दस दस बार सोचने को मजबूर किया. हम भले एक नर्मदा हार आये हों, शासकों की फिर कोई और बाँध बनाने की हिम्मत न होना जीत नहीं तो और क्या है? 

यही वह जगह है जहाँ दिबाकर बनर्जी की फिल्म शांघाई न केवल बुरी तरह से चूकती है बल्कि संघर्ष के सपनों के खिलाफ खड़े शांघाई के सपनों के साथ खड़ी दीखती है. इस फिल्म ने भूमि अधिग्रहण, एसईजेड्स जैसे सुलगते सवालों का सतहीकरण भर नहीं बल्कि सजग दर्शकों के साथ एक भद्दा मजाक भी किया है. 

याद करें कि हिन्दुस्तान के किस शहर को शांघाई बना देने के सपनों के साथ उस शहर का गरीब तबका खड़ा है? भारतनगर की झुग्गी झोपड़ियों से निकलने वाले भग्गू जैसे लोग किस शहर में रहते हैं भला? हम तो यही जानते हैं कि रायगढ़ हो या सिंगूर इस मुल्क का कोई किसान अपने खेतों, गाँवों, कस्बों की लाश पर शांघाई बनाने के खिलाफ लड़ रहा है, उसके साथ नहीं. फिर बनर्जी साहब का भारतनगर कहाँ है भाई? और अगर कहीं है भी तो इन भग्गुओं के पास कोई वजह भी तो होगी. क्या हैं वह वजहें? 

पूछने को तो उन हजार संयोगों पर भी हजार सवाल पूछ सकता हूँ जो इस फिल्म में ठुंसे हुए से हैं. जैसे अहमदी की हत्या की साजिश में शालिनी (उनकी प्रेमिका) की नौकरानी के पति की केन्द्रीय भूमिका होने का संयोग. जैसे जोगी और उसके दोस्त द्वारा इत्तेफाकन अहमदी की हत्या की साजिश रिकार्ड कर लेना, बावजूद इस सच के की जब फोन टेप्स ही प्रामाणिक सबूत नहीं माने जाते तो एक मुख्यमंत्री द्वारा किये गए फोन की रिकार्डिंग इतना बड़ा सबूत कैसे बन जाते हैं. 

फिर भी इतना तो पूछना बनता ही है कि कौन है वह एक्टिविस्ट जो चार्टर्ड जहाज से उतरते हैं, वह भी एक सिने तारिका के साथ? क्या इतिहास है उनका? संघर्षों के सर्टिफिकेट भले न बनते हों, संघर्षों की स्मृतियाँ लोकगाथाओं सी तो बन ही जाती हैं. और ये (किस मामले में) जेल भेज दिए गए एक जनरल की रहस्यमयी सी बेटी कौन है? उसे डिपोर्ट करने की नोटिस क्यों आती है? और अगर नोटिस आती है तो काफी ताकतवर से लगते अहमदी साहब के उस ‘हादसे’ में घायल हो जाने के बाद सरकार उसे डिपोर्ट कर क्यों नहीं देती? 

और हाँ, यह भारतनगर हिन्दुस्तान के किस इलाके में पड़ता है जहाँ किसी विपक्षी राजनैतिक दल की प्रतीकात्मक उपस्थिति तक नहीं है. बेशक इस देश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहाँ माफिया-राजनैतिक गठजोड़ के चलते प्रतिपक्ष की राजनीति मुश्किल हुई है पर बिलकुल खत्म? यह सिर्फ दिबाकर बनर्जी के भारत नगर में ही हो सकता है. और ये जोगी? वह आदमी जो दूसरी जाति के प्रेमिका के परिवार वालों के दौड़ाने पर लड़ने और भागने में से एक का चुनाव कर इस शहर में पंहुचा है दरअसल कौन है? क्या है जो उसे अंत में लड़ने की, जान पर खेल जाने की प्रेरणा देता है? शालिनी उर्फ कल्कि का यह पूछ लेना कि ‘खत्म हो गयी राजपूत मर्दानगी’?

कोई कह ही सकता है कि फ़िल्में तो बस समाज का सच ही दर्ज करती है पर फिर प्रकाश झा के साधू यादव और तबरेज आलमों की मर्दानगी भी तो याद आ सकती थी शालिनी को? यह सत्या के सत्या जैसी जातिविहीन सी मर्दानगी? फिर उसे राजपूती मर्दानगी ही क्यों याद आई? रही बात जोगी कि तो उसे तो जागना ही था. भले ही वह भाई जैसे दोस्त की मौत की वजह से हो या इस मर्दानगी की वजह से. 

एक ईमानदार अफसर भी है इस फिल्म में. वह इतना ईमानदार है कि लगभग बदतमीजी कर रहे पुलिस अधिकारी को डांट भी नहीं पाता. उसे एक के बाद एक हो रही मौतों के तार जुड़ते नहीं दीखते. पर अब उस अफसर को भी क्या कोसना जब इतने बड़े, चार्टर्ड प्लेन से चलने वाले एक्टिविस्ट की ऐसी संदिग्ध अवस्था में हुई मौत की सीबीआई जांच की मांग तक मुश्किल से ही सुनने में आती है. उस देश में, जहाँ किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या की प्रतिक्रिया इतनी हल्की तो नहीं ही होती. 

यह न समझें कि मैंने इस फिल्म को प्रशंसात्मक नजरिये से देखने की कोशिश नहीं की. काफी कोशिश की झोल के अंदर भरी जरा जरा सी कहानी को लिटरेरी डिवाइस, ट्रोप्स, या ऐसे कुछ अन्य सिने सिद्धांतों से भी देखने की कोशिश की, कि कहीं से तारीफ़ के कुछ नुक्ते समझ आयें. आखिर तमाम फिल्म समीक्षक यूं ही तो इस फिल्म को चार, साढ़े चार और पांच स्टार तो नहीं दे रहे होंगे. पर एक तो ऐसा कुछ समझ आया नहीं, और फिर न्याय का रास्ता एक प्रतिद्वंदी कारपोरेट टायकून से निकलता दिखा तो बची खुची हिम्मत भी टूट गयी. लगा कि काश किसी मेधा पाटकर को भी एक अदद जग्गू, एक अदद कृष्णन और एक अदद बड़ा उद्योगपति मिल जाता, फिर तो बस न्याय ही न्याय होता. 

तमाम किरदारों के अभिनय के लिए बेशक इस फिल्म की तारीफ़ की जानी चाहिए पर फिर फ़िल्में, वह भी सरोकारी दिखने का प्रयास करने वाली फिल्मों के लिए अभिनय ही तो सब कुछ नहीं होता. खास तौर पर तब जब यह एक व्यावसायिक फिल्म हो और फिर भी इसमें नॅशनल फिल्म डेवेलपमेंट कार्पोरेशन के रास्ते भारतीय करदाताओं का पैसा भी लगा हो.

Monday, June 18, 2012

सिनेमा को नए रंग दे रही स्त्रियां।

‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं। 


लाइट, कैमरा, एक्शन..

फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई की फिल्में आम जीवन को गहरे छूती हैं। इन फिल्मों में कहीं नहीं लगता कि हम वास्तविक जीवन से इतर कुछ देख सुन रहे हैं। सिनेमा में योगदान के लिए सई परांजप को 1996 में पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है। अगला नाम अपर्णा सेन का है। अपर्णा बंगाली सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री रही हैं। एक अभिनेत्री केवल अभिनय के लायक होती है.., इस मिथक की धज्जियां अपर्णा ने निर्देशन की कमान संभालकर उड़ाईं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन से यह भी साबित कर दिया कि निर्देशन के मामले में महिलाएं कहीं कमतर नहीं। अपर्णा की परोमा, मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, 15 पार्क एवेन्यू, द जैपनीज वाइफ और इति मृणालिनी जैसी नायाब फिल्में सिनेमा प्रेमियों के सर चढ़कर बोली हंै। अपर्णा की हर आने वाली फिल्म का शिद्दत से इंतजार रहता है उनके प्रशंसकों को।


अब उस महिला की बात, जो न सिर्फ फिल्में बनाती है, बल्कि फिल्मी कलाकारों को अपने इशारों पर भी नचाती है। वे सरोज खान के बाद इंडस्ट्री की लोकप्रिय कोरियोग्राफर हैं। यहां बात फराह खान की हो रही है, जो एक अच्छी फिल्म निर्देशक भी हैं। फराह अपने खास अंदाज और बेबाक शैली के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मैं हूं ना और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। उनकी फिल्में व्यावसायिक स्तर पर भी अच्छी साबित हुई हैं।


जोया अख्तर असीम संभावनाओं से भरी हैं। रचनात्मकता भले उन्हें विरासत में मिली हो, लेकिन केवल दो फिल्मों से वे खुद को काबिल फिल्मकार के रूप में स्थापित कर चुकी हैं। लक बाय चांस और ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ऐसी फिल्में हैं, जो शायद जोया जैसी युवा महिला निर्देशक ही सोच बुन सकती हैं। जोया ने फिल्मों को एक नए विस्तार के साथ सामने रखा है, खासकर रिश्तों के यथार्थ को। इस मामले में जोया का कोई सानी नहीं। हाल में हुए फिल्मफेयर अवॉर्डस में उनकी फिल्म ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ने सर्वश्रेठ निर्देशन समेत सात पुरस्कार हासिल किए हैं। मुंबई के सोफिया कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट रीमा कागती ने पहली फिल्म हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड से लोगों का दिल जीत लिया था। शुरुआत में वो इतने सारे फिल्मी सितारों के साथ काम करने, उन्हें निर्देशित करने की कल्पना मात्र से आशंकित हो गई थीं। पहले दिन बोमन ईरानी और शबाना के साथ शूटिंग थी। वे घबराई हुई थीं, लेकिन जल्द ही सबकुछ ठीक हो गया। बतौर निर्देशक उनकी दूसरी फिल्म तलाश है। इसमें आमिर खानकरीना कपूर और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में हैं।


अहा जिंदगी से साभार प्रकाशित. 

Sunday, June 17, 2012

पवित्र कानों की परवाह किये बिना “वासेपुर” गुलजार है



♦ अविनाश
सेंसर बोर्ड गैंग्‍स ऑफ वासेपुर को लेकर जिस असमंजस में था, वह खत्‍म हो गया और कल शाम साफ हो गया कि इस फिल्‍म की रीलीज में अब कोई अड़चन नहीं है। कल रात भी भोजपुरी फिल्‍मों के निर्देशक किरणकांत वर्मा इस बात को लेकर तंज कर रहे थे कि फिल्‍मों में थोड़ी मर्यादा तो बाकी रहे। मेरी लाइन यह थी कि क्‍या हम सब इतने बड़े तोप हैं कि समाज को सिखाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते? रचना में समाज जैसा है, वैसा आता है। वैसा लाने की हिम्‍मत भी कम लोगों में होती है। मंटो, राजकमल चौधरी, राही मासूम रजा का विरोध करने वाले, उनके साहित्‍य को सड़कछाप बताने वाले साहित्‍य और रचना के नैतिक सिपाही उनके समय में भी कम नहीं थे।
अनुराग कश्‍यप ने वासेपुर की मनोहर गालियों को जितने सुरुचिपूर्ण ढंग से संयोजित किया है, वह यथार्थ से भी ज्‍यादा यथार्थ लगता है। क्‍या यह गलत है? रचना और समाज के बीच में लेखक या निर्देशक को परदे का काम करना चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर अरसे से अदब के हर मंच पर बात होती रही है और हमेशा से ही इस मसले पर लोगों के बीच दो राय रही है।
चंद लोग, जो परदा होने की जगह बेपरदा होने के हामिल रहे हैं, हैं, उन्‍हें इस विनिमय केंद्रित समय में संदेह की निगाह से देखा जाता है कि वे समाज की गंदगी बेचते हैं। लोग जैसे चाहें, देखें… रचनाकार किसी की निगाहों की परवाह नहीं करता। अनुराग कश्‍यप को बधाई दीजिए कि उन्‍होंने गैंग्‍स ऑफ वासेपुर बनाते हुए समाज के चरित्रवान लोगों के कानों की परवाह नहीं की है।
थोड़ी झलकी देखिए
(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Thursday, June 14, 2012

खिलाडी की धमाकेदार बापसी


 सराहना और विवेचना से अधिक श्रद्धांजलि लिखने में सक्रिय फिल्म पत्रकारों ने अक्षय कुमार के करिअर का अंत कर दिया था। उनके अनुसार खिलाड़ी अक्षय कुमार की वापसी असंभव है। उनकी फिल्में लगातार पिट रही थीं। उसी दरम्यान एक-एक कर सारे लोकप्रिय स्टार की फिल्में 100 करोड़ क्लब में पहुंच रही थीं। सलमान खानआमिर खानअजय देवगन और शाहरुख खान के बाद सीधे रितिक रोशनरणबीर कपूरइमरान खान और इमरान हाशमी का जिक्र किया जाने लगा था। निरंतर असफलता के बावजूद अक्षय कुमार में कटुता नहीं आई थी। वे खिन्न जरूर रहने लगे थे। इस खिन्नता में उन्होंने अपने आलोचकों को आड़े हाथों लिया। अपनी बुरी फिल्मों की बुराई भी उन्हें पसंद नहीं आई। यह स्वाभाविक था। स्टार एक बार फिसलता है तो रुकने-थमने और फिर से उठने तक वह यों ही अपनी नाकामी पर चिल्लाता है। अक्षय कुमार अपवाद नहीं रहे।

 एक अच्छी बात रही कि फिर से शीर्ष पर आने की बेताबी में उन्होंने ऊलजलूल फिल्म नहीं कीं। वे अपनी सीमाओं और खूबियों को अच्छी तरह जानते हैं। देश का आम दर्शक उन्हें पसंद करता है। प्रशंसक और दर्शक दुखी थे कि उनके प्रिय स्टार की फिल्में क्यों नहीं चल रही हैउन्होंने इशारे में बताना शुरू कर दिया था कि वे नाखुश हैं। यही वजह है कि वे थिएटरों में नहीं जाते थे। निराशा की इस घड़ी में भी अक्षय कुमार ने अपना जोश बनाए रखा। वे लगातार फिल्में साइन करते रहे। मजेदार तथ्य है कि फ्लॉप फिल्मों की लाइन लगा देने के बाद भी उन्हें नई फिल्में मिलती रही। दर्शकों का विश्वास डगमगा गया थालेकिन फिल्म इंडस्ट्री का भरोसा बना रहा। खास कर निर्देशकों ने अक्षय कुमार का साथ दिया। साजिद खान की सभी फिल्मों के हीरो अक्षय कुमार रहे हैं। साजिद खान ने उन्हें हाउसफुल 2’ से पुन: खड़ा कर दिया। यह फिल्म सफल रही। अक्षय कुमार भी 100 करोड़ क्लब में पहुंच गए।
            
हाउसफुल 2’ की कामयाबी का श्रेय अक्षय कुमार को दूसरों के साथ शेयर करना पड़ा। ज्यादातर आलोचकों की निगाह में यह कामयाबी साजिद खान फार्मूले की कामयाबी थी। संयोग है कि उस फिल्म में अक्षय कुमार ने कोई दूसरा स्टार होता तो भी फिल्म चलती। फ्लॉप की कतार लगा चुके स्टार के बारे में ऐसी ही निगेटिव बातें होती हैं। बहरहाल, ‘राउडी राठोड़’ आई। यह फिल्म भी दर्शकों ने पसंद की। इस बार भी कुछ आलोचकों ने अक्षय कुमार को नीचा दिखाने के लिए फिल्म की कामयाबी का सेहरा प्रभु देवा के सिर बांधने की कोशिश की। उनकी वांटेड’ का उदाहरण देकर इसे दक्षिण भारतीय शैली का प्रभाव माना। निस्संदेह राउडी राठेड़’  में प्रभु देवा ने पिछली फिल्म का फार्मूला आजमाया। कामेडी और एक्शन को आम दर्शकों की समझ में आने लायक अंदाज में पेश किया। फिल्म के गाने लोकप्रिय हुए। दर्शकों ने राउडी’ मिजाज के नेकदिल हीरो को पसंद किया। गौर करें तो अक्षय कुमार ने पर्दे पर राउडी राठोड़’ के नायक को संतुलित रूप में पेश किया। इस साल की दोनों फिल्मों में अक्षय कुमार लाउडनेस से बचे हैं। प्रियदर्शन की फिल्मों में काम करते-करते उन्हें चीखने-चिल्लाने और हास्यास्पद हरकतें करने की आदत सी पड़ गई थी। दोहराव की वजह से एक ही तरह की भावमुद्रा में उन्हें देखते-देखते दर्शक भी ऊब गए थे। न किरदार नया होता था और न अक्षय कुमार को कुछ नया करने या दिखाने का मौका मिलता था।

  यों हाउसफुल 2’ और राउडी राठोड़ अक्षय कुमार के करिअर का बड़ा शिफ्ट नहीं है। उन्होंने अपने भाव और अंदाज को पुराने ढांचे में थोड़ा परिष्कृत और संयमित किया है। दोनों ही फिल्मों में उन्हें आम दर्शकों के करीब पहुंचने का मौका मिला। अब देखना है कि इस साल आ रही अन्य फिल्मों में वे इस कामयाबी को बनाए रखते हैं या फिर से डगमगाते हैं। फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि क्या खूब लौटे हैं अक्षय कुमार। उन्होंने अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी है और अपने प्रशंसकों को खुश कर दिया है। जिस इंडस्ट्री में कामयाबी का सीधा रिश्ता कलेक्शन से है। वहां प्रतिभा, फिल्म और काम के स्तर पर कितना ध्यान जाता है?

(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

Friday, June 8, 2012

दिबाकर बनर्जी की पॉलिटिकल थ्रिलर ‘शांघाई’


-अजय ब्रह्मात्‍मज 
 हर फिल्म पर्दे पर आने के पहले कागज पर लिखी जाती है। लेखक किसी विचार, विषय, मुद्दे, संबंध, भावना, ड्रामा आदि से प्रेरित होकर कुछ किरदारों के जरिए अपनी बात पहले शब्दों में लिखता है। बाद में उन शब्दों को निर्देशक विजुअलाइज करता है और उन्हें कैमरामैन एवं अन्य तकनीशियनों की मदद से पर्दे पर रचता है। ‘शांघाई’ दिबाकर बनर्जी की अगली फिल्म है। उन्होंने उर्मी जुवेकर के साथ मिल कर इसका लेखन किया है। झंकार के लिए दोनों ने ‘शांघाई’ के लेखन के संबंध में बातें कीं।  

पृष्ठभूमि 

उर्मी - ‘शांघाई’ एक इंसान की जर्नी है। वह एक पाइंट से अगले पाइंट तक यात्रा करता है। दिबाकर से अक्सर बातें होती रहती थीं कि हो गया न ! समाज खराब है, पॉलिटिशियन करप्ट हैं, पढ़े-लिखे लोग विवश और दुखी हैं। ऐसी बातों से भी ऊब हो गई है। आगे क्या बात करती है? 

दिबाकर - अभी तो पॉलीटिशयन बेशर्म भी हो गए हैं। वे कहते हैं कि तुम ने मुझे बुरा या चोर क्यों कहा? अभी अन्ना आंदोलन में इस तरह की बहस चल रही थी। ‘शांघाई’ में तीन किरदार हैं। वे एक सिचुएशन में अपने ढंग से सोचते और कुछ करते हैं। ‘लव सेक्स और धोखा’ के बाद मैंने उर्मी से चालू अंदाज में कहा कि भारत में पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्में नहीं बनतीं। चलो हम बनाते हैं। कोस्टा गवारस की ‘जी’ (1969) जैसी फिल्म बनाते है। उर्मी ने उसी समय मुझ से पूछा कि तुम ने किताब पढ़ी है क्या? वसिलिस वसिलिकोस ने वह किताब लिखी थी। मुझे तब तक पता नहीं था कि ऐसी कोई किताब भी है। उर्मी के पास वह किताब बीस सालों से है।  

उर्मी - मैंने दिबाकर को वह किताब दी।  दिबाकर ने किताब पढऩे के बाद कहा कि हम इसे आज के समय में लिखेंगे। आज की कहानी लिखने में हम एक लेयर नीचे उतरे कि कैसे नियम-कानून में रह कर भारत में भ्रष्टाचार चल रहा है। हम सभी अच्छी दुनिया में जीना चाहते हैं, लेकिन एक समय के बाद सिनिकल हो जाते हैं कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता।  

दिबाकर - यहां से हमारी फिल्म का विचार बढ़ा। उस समय मैंने पॉलिटिक्स को समझने की कोशिश की। क्या है पॉलिटिक्स? फिल्मों और टीवी ने बताया है कि कुछ सफेदपोश लोग सफेद घरों में कुछ कर रहे होते हैं। मेरे खयाल में अगर आप को अपने घर से दफ्तर की आधे घंटे की दूरी ढाई घंटे में तय करनी पड़ती है तो वह पॉलिटिक्स है। इसका मतलब है किसी ने कहीं बैठ कर कुछ ऐसा किया है या नहीं किया है, जिसकी वजह से आपकी यात्रा ढाई घंटे की हो गई है। रात के दस बजे आपका सोने का मन कर रहा है, लेकिन बिल्डिंग के नीचे या पड़ोस में इतनी जोर से लाउडस्पीकर बज रहा है कि आप को नींद नहीं आ रही है ... फिर भी आप कुछ कर नहीं सकते। यह पॉलिटिक्स है। मुंबई में कभी बिजली नहीं जाती, लेकिन कुछ इलाकों में कभी बिजली नहीं आती। यह पॉलिटिक्स है।  पॉलिटिक्स का सीधा असर हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है। इसे ज्यादातर लोग नहीं समझ पाते। हम सभी पॉलिटिकल एनीमल हैं और राजनीति के परिणाम हैं। हमारी जिंदगी राजनीति तय करती है। यह फिल्म उस पॉलिटिक्स की बात कर रही है।  

उर्मी - फिल्ममेकर ऐसे मुद्दों को नहीं छूते। राजनीति पर फिल्म बनाते समय हम एक बुरा पॉलीटिशियन रख लेते हैं और उसे अंत में मार देते हैं।  दिबाकर - उससे राहत मिल जाती है। पहले बुरा पॉलिटिशियन दिखाओ। फिल्म के अंत में हीरो उसे मार देगा। इस से बहुत राहत मिलती है कि देखो बुरे का अंत हो गया।   

फिल्म के तीन मुख्य किरदार  

टी ए कृष्णन 
टी ए कृष्‍णन(अभय देओल)- शहर के आला अफसर हैं। टी ए कृष्णन बहुत पावरफुल अधिकारी है। उसके कलम से शहर का नक्शा बदल सकता है। इस शहर में अरबों डॉलर का निवेश हो रहा है। शहर को विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया जा रहा है। उस शहर का विकास राज्य की सत्ताधारी पार्टी के लिए उस साल के चुनाव का झंडा है। उन्हें बताना है कि हम ने इंडिया बिजनेश पार्क बना कर दिखा दिया। और कोई पार्टी अभी तक यह नहीं कर सकी। केंद्र सरकार भी नहीं कर सकी। कृष्णन को आईबीपी की विशेष जिम्मेदारी उसे मिली है। मुख्यमंत्री उस पर बहुत भरोसा करती हैं। वह आईबीपी के इनवेस्टमेंट और वेंचर की सारी डील देख रहा है। कृष्णन भी विकास पर विश्वास करता है। कृष्णन 91-92 के बाद के विकास में यकीन रखता है। वह आईआईटी से निकला है और सिविल सर्विसेज की परीक्षा देकर आईएएस ऑफिसर बना है। उसने एमबीए भी किया। उसके हाथ में पावर है। उसके हाथ में इंडिया की डेस्टिनी है। वह नेहरू के प्रभाव के अपने पिता से आगे है। वह इंडिया शाइनिंग का नमूना है। वह ‘ट्रिकल डाउन इफेक्ट’ को कारगर मानता है। ऊपर की तरक्की चूकर नीचे आ जाएगी।  

जोगिन्दर परमार 
जोगिन्‍दर परमार(इमरान हाशमी)जोधपुर के भगोड़े राजपूत हैं। जोगी परमार को इस दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता। आज उसे महीने में 8000 मिल रहे हैं। उसको अगले महीने से दो लाख बनाने हैं। वह आम भारतीय है। उसे जल्दी से अमीर होना है। उसके लिए कोई भी तरीका गलत नहीं है। वह कुछ भी कर सकता है। रोमांटिक लडक़ा है। रोमांटिक घपले की वजह से ही उसे जोधपुर छोडऩा पड़ा था। सात-आठ साल से यहां है। अगर आप से मिलेगा तो सबसे पहले अपने परिचय में कहेगा कि मैं पत्रकार हूं। फिर शाम को दारू पीने के बाद फोटोग्राफर हो जाएगा। कभी कहेगा कि वीडियोग्राफर हूं। कोई लडक़ी आ जाए तो उसे फोटो शूट का ऑफर देगा। कभी कहेगा कि रात में आ जाओ तो ऑडिशन कर दूंगा। उसमें कुछ और शूट हो जाता है और डीवीडी बन जाती है। वह हर तरह का काम करता है।  उसके पास 3-4 विजिटिंग कार्ड हैं। 

 शालिनी सहाय
शलिनी सहाय (कल्कि कोइचलिन)-आधी फिरंग और आधी हिंदुस्तानी है , मतलब न घर की न घाट की। इस शहर में उसके पिता का पुश्तैनी घर है। वह विदेश में पढ़ती है। यहां सारा मामला संभालने आई है। उसके पिता जनरल थे। वे एक गबन के मामले में दिल्ली की जेल में है। वह आधी भारतीय है, लेकिन बाहर जाकर पढ़ाई की है। उसकी गोरी चमड़ी है। बोलती हिंदी है, लेकिन उसकी चाल-ढाल और भाषा में भिन्नता है। कस्बे में सभी उसे विदेशी ही समझते हैं। सभी उससे अंग्रेजी में बात की शुरुआत करते है। वे सभी उसे बाहर की ही मिर्ची मानते हैं। उसे ज्यादा सीरियसली भी नहीं लेते। शहर में सभी जानते हैं कि वह जनरल सहाय की बेटी है। वह इस शहर और दुनिया से बहुत नाराज है। उसके अंदर गुस्सा उबल रहा है। 24 साल की शालिनी अभी तक आदर्श ख्यालों में जीती है। 

 ... और डा अली अहमदी 
डॉ. अली अहमदी (प्रसेनजीत) सोशल वर्कर है। यह भूमिका प्रसेनजीत निभा रहे हैं। वे डायनैमिक इंसान हैं। देश में जिस तेजी से करपशन बढ़ा है, उसी तेजी से ऐसे विद्रोही नेता बढ़े हैं। उनकी प्रतिष्ठा यही है कि वे झटपट विकास के कई प्रोजेक्ट बंद करवा चुके हैं। वे इस शहर में आने वाले हैं। उनके आने की खबर से सरगर्मी है। शहर के प्रशासन में खलबली है। वे एहतियात बरत रहे हैं। डॉ. अहमदी आते हैं। भाषण देते हैं। यहां एक पेंच है कि शालिनी सहाय न्यूयार्क में डॉ ़ अहमदी की स्टूडेंट रही हैं। उनके बीच एक अजीब सा अट्रैक्शन और केमिस्ट्री है। शालिनी अपने जज्बात कह नहीं पाती। डॉ. अहमदी ऊर्जावान और जुझारू सोशल रिफार्मर हैं। ऐसे लोग पॉलिटिशयन और फिल्म स्टार के मिक्स होते हैं। उनका चमत्कारी व्यक्तित्व है। एक स्टार पावर है उनमें। डॉ. अहमदी की बातों का शहर में असर हुआ है। स्थानीय लोग मान जाते हैं कि आईबीपी के लिए मिला मुआवजा उचित नहीं है। वह कम नहीं है। डॉ. अहमदी इस मुहिम में हैं। तभी एक्सीडेंट होता है और डॉ. अहमदी कोमा में चले जाते हैं।  शहर उस शहर में अनेक गतिविधियां जारी हैं। आईबीपी बन चुका है। पैसे लग रहे हैं। एक लोकल पार्टी यहां मजबूत है, जो राज्य की सरकार में भी शामिल है। दोनों पार्टियों का गठबंधन है। आईबीपी उनके लिए मंदिर है। वे उसे बनाने की ठान चुके हैं। उन्होंने शहर, राज्य और देश को सपना दिया है कि यह शहर रातों रात शांघाई बन जाएगा। मॉल, फ्लायओवर, स्काई स्क्रैपर सब आ जाएंगे। सबके लिए नौकरी होगी। हर घर में खुशहाली होगी। हर घर में चार टीवी होंगे। हर कमरे के लिए एक। इस तरह के सपने सभी देख रहे हैं। राजधानी में कुछ नया करना थोड़ा मुश्किल रहता है। सबकी नजर रहती है। ऐसे स्पेशल जो ना छोटे शहरों या कस्बे में ही खोले जाते हैं। स्थानीय पार्टी की सांठगांठ से सब होता है। जंगल कटते, बस्ती बसते, खान-खदान चालू होते और स्पेशल जोन बनने के किससे आप जानते ही हैं। स्थानीय पार्टी जन जागरण मोर्चा  इस मुहिम में है। राज्य सरकार तरक्की चाहती है। एक महिला मुख्यमंत्री हैं। उनका इंटरनेशनल आउटलुक है। प्रो बिजनेश हैं। किसी कारपोरेट कंपनी की सीईओ जैसी हैं। विकास चाहती हैं। देश में उनके प्रति धारणा है कि यह सीएम तो एक दिन पीएम बनेंगी।     

ड्रामा   
हमारी फिल्म की वास्तविक शुरुआत यहां से है। शालिनी सहाय को कहीं से भनक लगी थी कि अगर डॉ . अहमदी आए तो उन्हें वापस नहीं जाने दिया जाएगा। इस भनक की वजह से शालिनी मानती हैं कि यह हत्या है। चूंकि दुर्घटना सभी के सामने हुई है और ड्रायवर ने मान लिया है कि वह नशे में था। वह किसी भी सजा के लिए तैयार है। डॉ . अहमदी की पत्नी यहां आती हैं। वह पेशे से वकील हैं। यहां आईबीपी का उद्घाटन होने वाला है। डॉ . अहमदी की बीवी इनक्वायरी की मांग करती है। राज्य सरकार मान लेती है। कृष्णन को जांच की जिम्मेदारी दी जाती है। मुख्यमंत्री लोकप्रिय फैसला लेती हैं कि जांच होगी। कृष्णन उलझन में आ जाता है। यहां तक तो हम ने सोचा था  ...इसके बाद तीनों की क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं सिचुएशन और सीन से तैयार होता है। कृष्णन कहता है कि यह तो पॉलिटिकल मामला है। वह द्वंद्व में है। कृष्णन को मुख्यमंत्री ने जिम्मेदारी दे दी है। वह एक स्कूल में जांच कमेटी की मीटिंग कर रहा है, जहां बाहर में बच्चे वालीबाल खेल रहे हैं। कृष्णन का पाला गंदे अविकसित भारत के लोगों से होता है। उसे वहां भी कूलर, कछुआ छाप, मिनरल वाटर और गुडनाइट चाहिए।   यहां से हम रियल कहानी में प्रवेश करते हैं। हमने सभी किरदारों को रियल इंडिया में रखा है। कोई भी किरदार फिल्मी और हीरोइक नहीं है। रियल इंडिया की समस्या उठायी जा रही है। 

(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...