Thursday, May 31, 2012

अभय और इमरान,जुदा-जुदा रंगों से सजी 'शांघाई’।


फिल्म देखने के बाद दिबाकर बनर्जी के इस अहम फैसले का परिणाम नजर आएगा। फिलहाल अभय देओल और इमरान हाशमी का एक फिल्म में साथ आना दर्शकों को हैरत में डाल रहा है। फिल्म के प्रोमो से जिज्ञासा भी बढ़ रही है। कुछ धमाल होने की उम्मीद है। अभय देओल हिंदी फिल्मों के विशिष्ट अभिनेता हैं। इमरान हाशमी हिंदी फिल्मों के आम अभिनेता हैं। दोनों के दर्शक और प्रशंसक अलग हैं। दिबाकर बनर्जी ने ‘शांघाई’ में दोनों को साथ लाकर अपनी कास्टिंग से चौंका दिया है। 


 ‘सोचा न था’ से अभय देओल की शुरुआत हुई। देओल परिवार के इस हीरो की लांचिंग पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। उनके पीठ पीछे सनी देओल के होने के बावजूद फिल्म की साधारण रिलीज हुई। फिर भी अभय देओल ने पहले समीक्षकों और फिर दर्शकों का ध्यान खींचा। कुछ फिल्मों की रिलीज के पहले से ही चर्चा रहती है। ऐसी फिल्म रिलीज के बाद ठंडी पड़ जाती हैं। जिन फिल्मों पर उनकी रिलीज के बाद निगाह जाती है, उन्हें दर्शक और समीक्षकों की सराहना बड़ी कर देती है। ‘सोचा न था’ ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म ने इंडस्ट्री को तीन प्रतिभाएं दीं - अभय देओल, आएशा और इम्तियाज अली। 


इसके विपरीत भट्ट परिवार से संबद्ध फिल्मों में विक्रम भट्ट के सहायक के तौर पर आए। उनमें महेश भट्ट को कुछ खास दिखा। उन्होंने उन्हें कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। आरंभिक फिल्मों में इमरान हाशमी के लुक, प्रेजेंस और एक्टिंग की तीखी आलोचना हुई, लेकिन महेश भट्ट की बदौलत इमरान हाशमी टिके रहे। भट्ट परिवार उन्हें फिल्म दर फिल्म दोहराता रहा। विशेष प्रयास से उनकी सभी फिल्मों के कुछ गाने पॉपुलर होते गए और उन गानों के सहारे इमरान हाशमी भी देश के चवन्नी छाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाते गए। ‘मर्डर’ फिल्म की कामयाबी ने इमरान हाशमी को ‘किसिंग स्टार’ का खिताब दिया। इस फिल्म के बाद इमरान हाशमी के पास उन्नति के सिवा कोई चारा नहीं रह गया। वे अपनी रफ्तार से लोकप्रियता की सीढियां चढ़ते गए। उन्होंने लगन, मेहनत और एकाग्रता से खास जगह बना ली। 


दरअसल, इमरान हाशमी की कामयाबी फिल्म अध्येताओं के पाठ और अध्ययन का विषय हो सकती है। देश के बदलते दर्शकों से इमरान हाशमी की लोकप्रियता का सीधा संबंध है। फिल्म ट्रेड में जिसे बी और सी सेंटर कहते हैं, वहां इमरान खासे पॉपुलर हैं। उनकी हर फिल्म बिहार में अच्छा बिजनेश करती है। इसके साथ ही वे पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के खान से पॉपुलर स्टार हैं। फिलहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े बैनर उनमें खास रुचि ले रहे हैं। निर्देशकों और दर्शकों की बढ़ती मांग की वजह से उन्हें भट्ट कैंप की चहारदीवारी छलांगनी पड़ी है। 

दूसरी तरफ अभय देओल ने ‘आउट ऑफ बाक्स’ फिल्मों में जगह बनाने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी प्रवेश किया है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ में फरहान अख्तर और रितिक रोशन के साथ उनकी तिगड़ी पसंद की गई। फिलहाल वे प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ की शूटिंग कर रहे हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों (सनी और बॉबी) से अलग छवि और फिल्मों में उनकी रुचि है। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा है कि स्टारसन हमेशा कमर्शिल फिल्मों में कैद रहते हैं। 


अब इन दोनों को साथ लाकर दिबाकर बनर्जी दर्शकों के विशाल समुदाय को ‘शांघाई’ के लिए थिएटर में लाएंगे। दिबाकर बनर्जी की फिल्में अभी तक शहरी दर्शकों के बीच चर्चित और प्रशंसित रही हैं। इस बार उन्होंने इमरान हाशमी के साथ अपना दायरा तोड़ा है। इससे उन्हें फायदा होगा और अप्रत्यक्ष रूप से दर्शक भी फायदे में रहेंगे। इमरान हाशमी के प्रशंसक और दर्शक इसी बहाने दिबाकर बनर्जी की फिल्म से परिचित होंगे। 




(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)



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