Thursday, May 31, 2012

अभय और इमरान,जुदा-जुदा रंगों से सजी 'शांघाई’।


फिल्म देखने के बाद दिबाकर बनर्जी के इस अहम फैसले का परिणाम नजर आएगा। फिलहाल अभय देओल और इमरान हाशमी का एक फिल्म में साथ आना दर्शकों को हैरत में डाल रहा है। फिल्म के प्रोमो से जिज्ञासा भी बढ़ रही है। कुछ धमाल होने की उम्मीद है। अभय देओल हिंदी फिल्मों के विशिष्ट अभिनेता हैं। इमरान हाशमी हिंदी फिल्मों के आम अभिनेता हैं। दोनों के दर्शक और प्रशंसक अलग हैं। दिबाकर बनर्जी ने ‘शांघाई’ में दोनों को साथ लाकर अपनी कास्टिंग से चौंका दिया है। 


 ‘सोचा न था’ से अभय देओल की शुरुआत हुई। देओल परिवार के इस हीरो की लांचिंग पर किसी का ध्यान भी नहीं गया। उनके पीठ पीछे सनी देओल के होने के बावजूद फिल्म की साधारण रिलीज हुई। फिर भी अभय देओल ने पहले समीक्षकों और फिर दर्शकों का ध्यान खींचा। कुछ फिल्मों की रिलीज के पहले से ही चर्चा रहती है। ऐसी फिल्म रिलीज के बाद ठंडी पड़ जाती हैं। जिन फिल्मों पर उनकी रिलीज के बाद निगाह जाती है, उन्हें दर्शक और समीक्षकों की सराहना बड़ी कर देती है। ‘सोचा न था’ ऐसी ही फिल्म थी। इस फिल्म ने इंडस्ट्री को तीन प्रतिभाएं दीं - अभय देओल, आएशा और इम्तियाज अली। 


इसके विपरीत भट्ट परिवार से संबद्ध फिल्मों में विक्रम भट्ट के सहायक के तौर पर आए। उनमें महेश भट्ट को कुछ खास दिखा। उन्होंने उन्हें कैमरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। आरंभिक फिल्मों में इमरान हाशमी के लुक, प्रेजेंस और एक्टिंग की तीखी आलोचना हुई, लेकिन महेश भट्ट की बदौलत इमरान हाशमी टिके रहे। भट्ट परिवार उन्हें फिल्म दर फिल्म दोहराता रहा। विशेष प्रयास से उनकी सभी फिल्मों के कुछ गाने पॉपुलर होते गए और उन गानों के सहारे इमरान हाशमी भी देश के चवन्नी छाप दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाते गए। ‘मर्डर’ फिल्म की कामयाबी ने इमरान हाशमी को ‘किसिंग स्टार’ का खिताब दिया। इस फिल्म के बाद इमरान हाशमी के पास उन्नति के सिवा कोई चारा नहीं रह गया। वे अपनी रफ्तार से लोकप्रियता की सीढियां चढ़ते गए। उन्होंने लगन, मेहनत और एकाग्रता से खास जगह बना ली। 


दरअसल, इमरान हाशमी की कामयाबी फिल्म अध्येताओं के पाठ और अध्ययन का विषय हो सकती है। देश के बदलते दर्शकों से इमरान हाशमी की लोकप्रियता का सीधा संबंध है। फिल्म ट्रेड में जिसे बी और सी सेंटर कहते हैं, वहां इमरान खासे पॉपुलर हैं। उनकी हर फिल्म बिहार में अच्छा बिजनेश करती है। इसके साथ ही वे पाकिस्तान में हिंदी फिल्मों के खान से पॉपुलर स्टार हैं। फिलहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े बैनर उनमें खास रुचि ले रहे हैं। निर्देशकों और दर्शकों की बढ़ती मांग की वजह से उन्हें भट्ट कैंप की चहारदीवारी छलांगनी पड़ी है। 

दूसरी तरफ अभय देओल ने ‘आउट ऑफ बाक्स’ फिल्मों में जगह बनाने के बाद मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी प्रवेश किया है। ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ में फरहान अख्तर और रितिक रोशन के साथ उनकी तिगड़ी पसंद की गई। फिलहाल वे प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’ की शूटिंग कर रहे हैं। अपने दोनों बड़े भाइयों (सनी और बॉबी) से अलग छवि और फिल्मों में उनकी रुचि है। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा है कि स्टारसन हमेशा कमर्शिल फिल्मों में कैद रहते हैं। 


अब इन दोनों को साथ लाकर दिबाकर बनर्जी दर्शकों के विशाल समुदाय को ‘शांघाई’ के लिए थिएटर में लाएंगे। दिबाकर बनर्जी की फिल्में अभी तक शहरी दर्शकों के बीच चर्चित और प्रशंसित रही हैं। इस बार उन्होंने इमरान हाशमी के साथ अपना दायरा तोड़ा है। इससे उन्हें फायदा होगा और अप्रत्यक्ष रूप से दर्शक भी फायदे में रहेंगे। इमरान हाशमी के प्रशंसक और दर्शक इसी बहाने दिबाकर बनर्जी की फिल्म से परिचित होंगे। 




(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)



Tuesday, May 29, 2012

जेनेरिक दवाओं के रास्‍ते में भी गड्ढे हैं आमिर, संभल के


♦ अजित कुमार
अजित न तो पत्रकार हैं, न साहित्‍यकार। शुद्ध नौकरी-पेशा आदमी हैं। सत्‍यमेव जयते के बाद जब इस साइट के मॉडरेटर ने अपनी एफबी वॉल पर यह टिप्‍पणी की कि सत्‍यमेव जयते देखते हुए आंसू नहीं, आज आंखों में खून उतर आया, तो अजित ने वहां कुछ टिप्‍पणियां की। हमने उनसे अनुरोध किया कि आप अपने अनुभव विस्‍तार से लिखें। उन्‍होंने इस बात की परवाह किये बिना हामी भर दी कि उनके लिखने से उनकी पेशागत जिंदगी पर असर पड़ सकता है। हमने उन्‍हें अतिरिक्‍त सावधानी के लिए किसी और नाम के इस्‍तेमाल की सलाह भी दी, लेकिन उन्‍होंने कहा कि नाम जाने दीजिए। सच के साथ खड़ा होना ज्‍यादा मायने रखता है। आप पढ़िए कि अजित अपने अनुभव की गठरी से स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के कितने भयावह पहलू सामने रख रहे हैं : मॉडरेटर

मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव … बचपन में ये नाम सुनते ही एक ऐसे व्यक्ति की तस्वीर आंखों के सामने आती थी जो कि प्रेस किये हुए कपड़े, चमकते जूते और गले में टाई लगाता है, हाथों में चमड़े का लाल रंग का अटैचीनुमा बैग लेकर डॉक्टरों से मिलने जाता है। अंग्रेजी में बातें करता है और डॉक्टरों को नवीनतम औषधियों की खोज और विभिन्न बीमारियों में उनके प्रयोग की जानकारी देता है। मेरे एक रिश्तेदार मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। जब उनके घर जाते थे तो उनके बच्चे बड़े सलीके से उनसे अंग्रेजी में बात-चीत करते दीखते थे। वो बताते कि डॉक्टर उनके जैसे लोगों की काफी इज्जत करते हैं और बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनते हैं। फिर जिस दवा पर बातचीत होती है, उसे डॉक्टर अपने मरीजों को लिखते हैं और अगर दवा का असर संतोषप्रद रहा तो फिर वो डॉक्टर उस खास ब्रांड की दवा के स्‍थायी प्रेस्क्राइबर बन जाते हैं। बदले में कंपनी उस डॉक्टर को उस दवा के नियमित शोध, ट्रायल और अन्य प्रयोगों के बारे में समय-समय पर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के जरिये अवगत कराती रहती है। कभी-कभार उस डॉक्टर के प्रति व्यापारिक आभार प्रकट करने के लिए कुछ गिफ्ट भी देती है जिसमें पेन, डायरी, पर्स या फिर स्टेथोस्कोप जैसी चिकित्सकीय व्यवहार में आने वाली चीजें शामिल रहती हैं।
समय तेजी से बीता और स्कूल, कॉलेज सब पास करके मैं भी बेरोजगारों की अथाह फौज में शामिल हो गया। बचपन से जिंदगी का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया था कि बड़े होकर क्या करना है, सो घरवालों की सलाह और दबाव में सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की जो कि शुरुआत में ही भटक गयी और उसके बदले आवारागर्दी शुरू हो गयी। बीच-बीच में घर में आर्थिक सहयोग के लिए अस्‍थायी रूप से कई काम किये। फिर लगा कि बढ़ती महंगाई में केवल पिताजी और भैया का प्राइवेट नौकरी करना घर कि जरूरतें पूरी नहीं कर सकता तो एक कंज्यूमर कंपनी में सेल्स में ज्वाइन कर लिया। कुछ दिन बीते तो एक रिश्तेदार ने सलाह दी कि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव बन जाओ, ज्यादा पैसा मिलेगा और उन्हीं की सिफारिश पर एक दवा कंपनी में नौकरी मिल गयी। ये 2004 की बात है।
जब काम शुरू किया तो सबकुछ ठीक ही लगा, फिर धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि दवाओं का बाजार और व्यापार के तरीके मेरे बचपन की कल्पनाओं से काफी आगे निकल चुके हैं। देखकर संवेदनशील मन को कुछ झटका भी लगा लेकिन अच्छी तनख्वाह, टार्गेट इंसेंटिव और घर की आर्थिक जरूरतों के आगे संवेदनशीलता दब गयी और फिर सब कुछ स्वाभाविक लगने लगा। डॉक्टर द्वारा दवा लिखने के लिए कंपनी के साथ सौदेबाजी और उस लागत को वसूल करने के लिए कंपनी के द्वारा दवा के दामों में वृद्धि जायज लगने लगी। फिर अनुभव बढ़ा और जानकारी हुई कि दवाओं को बनाने की अनुमानित लागत क्या है और लागत तथा MRP के बीच का भारी अंतर कहां-कहां जाता है। सारी जानकारी होते हुए भी बेहद संवेदनहीनता के साथ पिछले आठ सालों में तीन नियोक्ता बदल कर इसी व्यवसाय का हिस्सा बना हुआ हूं और अच्छे परफोर्मेंस के लिए तरक्की भी पा चुका हूं।
मन में अक्सर इस लूट के खिलाफ विद्रोह के भाव आते थे लेकिन दबाये रखता था। आज आमिर के शो के केवल आखिरी कुछ दृश्य देखे और दबी संवेदनशीलता कुछ हरकत में आयी है। पता नहीं कल सुबह तक रहेगी या नहीं, सो कुछ अपनी तरफ से भी जोड़ना चाहता हूं। इन बातों को मैं प्रमाणित नहीं कर सकता हूं, केवल अपना अनुभव साझा कर रहा हूं। यदि कोई प्रमाण जुटाना चाहे तो अप्रत्यक्ष सहयोग जरूर कर सकता हूं।
(1) मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के साफ-साफ निर्देश आज से चार-पांच साल पहले जारी हुए थे, जिनमें ये सख्त निर्देश दिये गये थे कि कोई भी चिकित्सक किसी भी व्यक्ति या संगठन से किसी भी रूप में कोई गिफ्ट, वाहन सुविधा, यात्रा टिकट, होटल या अन्य सुविधा स्वीकार नहीं करेगा। इसके उल्लंघन पर चिकित्सक की मान्यता रद्द करने तक का प्रावधान किया गया है। इस निर्देश के बावजूद स्थिति ये है कि चिकित्सक वर्ग को चड्डी से लेकर पैंट, शर्ट, जूते, वाहन, होटल, यात्रा टिकट, विदेश दौरे, बच्चों की फीस, शराब और यहां तक कि नगद पैसे वो भी डॉक्टर के नाम से दवा कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे हैं। हमारे पटना में हर हफ्ते विभिन्न होटलों और रेस्तराओं में शराब की पार्टियों का आयोजन दवा कंपनियों के द्वारा किया जाता है, जिसमें पोस्ट-ग्रेजुएट छात्रों से लेकर शहर के वरिष्ठ चिकित्सक तक शामिल होते हैं। जाहिर है कि ये सब खर्चे दवा कंपनियां धर्म-कर्म के नाम पर तो करेंगी नहीं। इसके अलावा प्रतिवर्ष राज्यस्तर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग विभागों के संगठनों द्वारा कांफ्रेंस का आयोजन किया जाता है, जिसमें प्रमुख हैं APICON (फिजिसियन), PEDICON (शिशु रोग), ASICON (सर्जन), AICOG ( स्त्री रोग), ORTHOCON (हड्डी रोग)। इन आयोजनों में शामिल होने वाले 75% डॉक्टर (अनुमानित) दवा कंपनियों के खर्च पर शामिल होते हैं। इन खर्चों में पंजीकरण से लेकर सपरिवार यात्रा टिकट, होटल, वाहन और कुछ कंपनियों द्वारा मार्केट में खरीदारी की सुविधा भी उपलब्ध करायी जाती है। इन आयोजनों का भी सारा खर्च दवा कंपनियों द्वारा वाहन किया जाता है, जिसका भुगतान कंपनियों द्वारा आयोजन सचिव के नाम से चेक द्वारा किया जाता है। अब व्यावसायिक संगठन ये खर्च धर्मार्थ तो करेंगे नहीं।

Major Rai shares the horrific account of a hospital trying to perform a pancreas transplant just so that it could acquire name and fame if the surgery was a success. They concurred that if things didn’t go well, all they would end up losing is the life of a patient. Do you think Major Rai’s story reflects the current state of affairs of our healthcare system?
(2) आमिर ने आज के कार्यक्रम में सरकार द्वारा जेनेरिक दवाओं की बिक्री की वकालत की है। शायद उन्हें जानकारी नहीं दी गयी है कि खुदरा बाजार में दवाएं MRP पर बिकती हैं, चाहे वो ब्रांडेड हों या जेनेरिक। थोक बाजार में जो जेनेरिक दवा 35 रुपये में 100 गोली बिकती हैं वो खुदरा दुकान पर MRP पर बिकती हैं जो प्रति गोली एक-दो रुपये यानि सौ से दो सौ रुपये में बिकती है। इसके अलावा सरकारी ठेके पर जेनेरिक सप्लाई में गुणवत्ता का भी प्रश्न है। हमारे बिहार में भी सरकार ने हर सरकारी अस्पताल के कैंपस में जेनेरिक दवा की दुकान खोली है। इन दुकानों में जिन कंपनियों की दवाएं उपलब्ध करायी गयी हैं, उनकी दवाएं बाजार में कहीं और देखने को नहीं मिलती हैं। जाहिर है सिर्फ सरकारी आपूर्ति के लिए ही इन कंपनियों का गठन हुआ है। ये कंपनियां किन लोगों की हैं और जेनेरिक उद्योग में एक से एक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रहने के बावजूद इन्हें कैसे ठेका मिल जाता है, ये तो जांच का विषय है, गुणवत्ता की तो बात ही छोड़ दीजिए।
(3) जेनेरिक दवाओं की कीमत की बात करेंगे तो एक छोटा सा उदाहरण है। इंजेक्टेबल एंटीबायोटिक के रूप में इस्तेमाल होने वाले Ceftriaxone की वास्तविक कीमत थोक बाजार में 18-25 रुपये है। चाहे वो ब्रांडेड हो या जेनेरिक। बिहार सरकार की जेनेरिक दुकानों में इनकी MRP 120-140 रुपये है जिन्हें वो आधी कीमत पर बेचती है यानी साठ से सत्तर रुपये में। यही दवा अच्छी ब्रांडेड कंपनियां भी विभिन्न नामों से बेचती हैं, जिनकी MRP ही साठ से सत्तर रुपये के बीच होती है। हाल ही में एक बड़ी कंपनी ने तो इसकी कीमत घटाकर 32 रुपये कर दी है। अब बताएं कि सरकार द्वारा उपलब्ध जेनेरिक दवाएं सस्ती कैसे है? जहां तक ब्रांडेड दवाओं की बात है तो एक इंजेक्शन आता है अमिकासिन का, जिसके ब्रांड लीडर ने अपने ब्रांड की कीमत सत्तर रुपये रखी है। दो साल पहले ही एक अन्य कंपनी ने 26 रुपये में अपना अमिकासिन का ब्रांड लांच किया और अभी अच्छा बेच ले रही है और मुनाफा भी कम रही है। दोनों कंपनियों के मुनाफे में बहुत ज्यादा अंतर भी नहीं है प्रति इकाई के हिसाब से, तो सवाल ये है कि कीमत का ये अंतर जाता कहां है? दरअसल पहली कंपनी खुदरा दुकानदारों को सौ प्रतिशत से एक सौ पच्चीस प्रतिशत तक मार्जिन देती है, जिसके कारण खुदरा दुकानदार उसकी दवा बेचने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं और वो ब्रांड लीडर है जबकि दूसरी कंपनी केवल 40% मुनाफा देकर अपनी कीमत को हाईलाईट करके डॉक्टर से पुर्जा लिखवाने की कोशिश करती है, जिसमें कुछ मरीजों के प्रति संवेदनशील डॉक्टर उसकी दवा लिख देते हैं।

तो फिर उपाय क्या है? आमिर ने अपने कार्यक्रम में इसके उपाय के रूप में सुझाया है कि सरकार को जेनेरिक दवा की दुकानें खोलनी चाहिए या लोगों को जेनेरिक दवाओं की जानकारी रहनी चाहिए, लेकिन इसमें काफी व्यावहारिक समस्याएं हैं। मेरे हिसाब से इसका सबसे सरल उपाय और हथियार हमारी केंद्र सरकार के पास मौजूद है, जिसका कि वो कभी-कभार उपयोग भी करती है। वो है औषधि मूल्‍य नियंत्रण यानि DPCO, जिसमें सरकार दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य को नियंत्रित कर सकती हैं। अभी पिछले साल ही सरकार ने कुछ दवाओं की कीमत नियंत्रित की थी जिसके फलस्वरूप Ciprofloxacin + Tinidazole कॉम्बिनेशन की दवा दो रुपये सत्तर पैसे में बिकने लगी, जिसकी कीमत नियंत्रण से पहले सात से लेकर ग्यारह रुपये तक थी। इससे स्पष्ट है कि सरकार चाहे तो दवाएं सस्ती हो सकती हैं लेकिन इसके लिए सरकार और राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को अपनी विभिन्न आर्थिक जरूरतों के लिए औद्योगिक घरानों पर निर्भरता छोड़नी होगी जो कि वर्तमान में मुश्किल है। अब आमिर तो अन्ना की तरह कह नहीं सकते हैं कि सरकार कि ‘नीयत’ ही ठीक नहीं है। शेष जनता खुद ही समझे ये शो देखने के बाद कि महंगी दवाओं के लिए कौन जिम्मेवार है। लेकिन एक अनुरोध है कि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव को दोषी न ठहराएं। वो तो बेचारा एक फुटबाल की तरह होता है, जिसे डॉक्टर और कंपनी दोनों ठोकर लगाते रहते हैं।
चलते-चलते एक किस्सा जो दवा उद्योग में खूब मशहूर हुआ था। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने एक बार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लोगों को बुलाकर पांच सौ करोड़ की मांग की और न देने की सूरत में उनकी एक दवा जो कि एक बहुत बड़ा ब्रांड है, उसे नियंत्रित मूल्य की सूची में डाल देने की धमकी दी। जवाब में कंपनी के अधिकारी ने कहा कि जहां से आपकी सरकार नियंत्रित होती है, हम वहीं दो सौ करोड़ दे देंगे और दवा की कीमत भी बढ़ा लेंगे। कुछ ही दिनों में उस दवा की कीमत भी बढ़ गयी और मंत्री महोदय भी चले गये। ये मात्र एक किस्सा है। सच क्या है भगवान जाने। खैर स्वास्थ्य उद्योग में केवल दवा कंपनियां और डॉक्टर ही नहीं हैं, बहुत सारे पहलू हैं इलाज महंगा होने के पीछे, जो कि फिर कभी… नौकरी रही तो…
(अजित कुमार। महाराजगंज, सीवान में जन्‍म। पटना के एएन कॉलेज से ग्रैजुएट। समाज और राजनीति की गतिविधियों पर नजर भी रखते हैं और नजरिया भी। पटना में एक फार्मास्‍युटिकल कंपनी से जुड़े हैं। उनसे ajeet8860@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Saturday, May 26, 2012

इस शख्स के एक आइडिए ने बदल दिया दुनिया का 'चेहरा'!

आप फेसबुक तो जरूर इस्तेमाल करते होंगे। लेकिन क्या आप मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) को जानते हैं। अगर नहीं, तो हम बताते हैं, जुकरबर्ग फेसबुक के संस्थापक हैं। आज उनका 28वां जन्मदिन समारोह मनाया जा रहा है। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जिंदगी के 28 सालों में ही जुकरबर्ग की निजी संपत्ति करीब 18 अरब डॉलर हो चुकी है।
 
जुकरबर्ग का जन्म 14 मई 1984 को हुआ था। प्रोग्रामिंग में उनकी रूचि के कारण छोटी सी उम्र में ही जुकरबर्ग के अंदर छुपी प्रतिभा नजर आने लगी थी। जिस समय लोग अन्य कामों में अपना टाइमपास करते थे उस समय जुकरबर्ग कंप्यूटर प्रोग्राम बनाने में बिजी रहते थे। इसी मेहनत ने उनको एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाने की प्रेरणा दी जिसकी मदद से आप कहीं दूर देश बैठे अपने मित्र से अपने दिल की बात शेयर कर सकें।
 
मार्क की योग्यता को माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। अधिकतर कंपनियां जुकरबर्ग को अपने यहां नौकरी पर रखने के साथ-साथ उनके बनाए प्रोजेक्ट्स को खरीदने में भी दिलचस्पी रखती थीं।
 
मार्क ने सभी ऑफर ठुकरा दिए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जाने का फैसला किया। ये मार्क की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पल था। जिसने उन्हें फेसबुक बनाने के लिए प्रेरित किया। फेसबुक आज सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में सबसे जाना पहचाना नाम है। अपनों से जुड़े रहने के लिए आज लोग सबसे ज्यादा फेसबुक का ही इस्तेमाल करते हैं।
 
आपको बता दें कि जून 2011 के अंतिम सप्ताह में जीएसवी कैपिटल ने फेसबुक में निवेश किया था। इस निवेश के बाद नेटवर्किंग साइट के संस्थापक मार्क जुकेरबर्ग की संपत्ति इंटरनेट सर्च इंजन गूगल के संस्थापकों सर्गे ब्रिन और लैरी पेज (Sergey Brin and Larry Page) से ज्यादा हो गई।
 
दरअसल जीएसवी कैपिटल कारपोरेशन ने 29.28 डॉलर प्रति शेयर के हिसाब से फेसबुक के 2,25,000 शेयरों को खरीदा। इस खरीद के बाद फेसबुक का मूल्य करीब 70 अरब डॉलर हो गया है। नए निवेश के बाद स्वयं मार्क जुकरबर्ग की निजी संपत्ति करीब 18 अरब डॉलर हो गई। इसके साथ ही जुकरबर्ग प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विश्व के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। 

Thursday, May 24, 2012

जिद और जिन्दादिली से बनता है अनुराग।


फिल्म फेस्टिवल देख कर फिल्मों में आए अनुराग कश्यप के लिए इस से बड़ी खुशी क्या होगी कि उनकी दो खंडों में बनी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ विश्व के एक प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी गई है। 16 मई से आरंभ हो रहे कान फिल्म फेस्टिवल के ‘डायरेक्टर फोर्टनाइट’ सेक्शन में उनकी दोनों फिल्में दिखाई जाएंगी। इसके अलावा उनकी प्रोडक्शन कंपनी अनुराग कश्यप फिल्म्स की वासन वाला निर्देशित ‘पेडलर्स’ भी कान फिल्म फेस्टिवल के क्रिटिक वीक्स के लिए चुनी गई है। इस साल चार फिल्मों को कान फिल्म फेस्टिवल में आधिकारिक एंट्री मिली है। चौथी फिल्म अयिाम आहलूवालिया की ‘मिस लवली’ है। इनमें से तीन फिल्मों से अनुराग कश्यप जुड़े हुए हैं। 

युवा पीढ़ी के सारे निर्देशक अनुराग कश्यप की इस उपलब्धि से खुश है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज खामोश हैं। उन्हें लग रहा है कि बाहर से आया दो टके का छोकरा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व कर रहा है।   इस ऊंचाई तक आने में अनुराग कश्यप की कड़ी मेहनत, लगन और एकाग्रता है। ‘सत्या’ से मिली पहचान के बाद अनुराग कश्यप ने पीछे पलट कर नहीं देखा। मुश्किलों और दिक्कतों में कई बार वे ठिठके और कुछ सालों तक एक कदम भी नहीं बढ़ सके। ‘पांच’ के रिलीज न होने पर उनकी निराशा उन्हें अलकोहल और अराजकता की तरफ ले गई। टूटे हारे अनुराग कश्यप में किसी को कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी। फिर भी जिद्दी अनुराग कश्यप मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ‘ब्लैक फ्रायडे’ बनाई। यह फिल्म प्रतिबंधित कर दी गई। अपनी फिल्मों को दर्शकों तक नहीं ले जा पाने केा दुख बढ़ता गया। निराशा और दुख के उस दौर में भी अनुराग की क्रिएटिविटी खत्म नहीं हुई। बहुत कम लोग जानते हैं कि अनुराग कश्यप को बचाए और बनाए रखने में उनके छोटे भाई और ‘दबंग’ के निर्देशक अभिनव कश्यप का बहुत बड़ा हाथ रहा है। भाई के पैशन को देख कर अभिनव ने सारी पारिवारिक जिम्मेदारियां अपने कंधे पर ले लीं। पैसों के लिए टीवी शो और लेखन किया। बड़े भाई को अपने पांव पर खड़े होने और अपने मन की फिल्म बनाने की राह आसान की।   अनुराग की कई खूबियां हैं। वे सीधे और मुंहफट हैं। उन्हें हिपोक्रेसी बिल्कुल पसंद नहीं है। फिल्मों के लिए वे हर समय किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। तिनका-तिनका जोड़ कर चिडिय़ा अपना घोंसला बनाती है। अनुराग ने छोटी-छोटी कोशिशों से अपनी प्रोडक्शन कंपनी खड़ी की है।

 इस कंपनी के तहत वे नए फिल्मकारों को मौके दे रहे हैं। उनकी कोशिश रहती है कि प्रतिभाशाली युवा निर्देशकों उनकी तरह भटकना न पड़े। ठोकरें न खानी पडें। उनका दफ्तर अनेक महत्वाकांक्षी निर्देशकों का डेरा और बसेरा बना रहता है। देश की बड़ी संस्थाओं से पढ़ कर आए लडक़े-लड़कियां उनके साथ काम कर रहे हैं। अनुराग की यह विशेषता है कि वे अपने सहयोगियों की ‘वैयक्तिता’ को नहीं दबाते। उनके दफ्तर में खुली आलोचना  की छूट है। नया प्रशिक्षु सहायक भी अनुराग कश्यप के काम पर उंगली उठा सकता है। उसके प्रति कोई दुराग्रह नहीं पाला जाता। अनुराग के करीबी मानते हैं कि अनुराग अपने आलोचकों को अपना सब से करीबी मानते हैं। उन्हें सीने से लगा कर रखते हैं। वे ‘निंदक नियरे राखिये’ के दर्शन में यकीन करते हैं।  ‘देव डी’ और ‘गुलाल’ की लोकप्रियता से अनुराग कश्यप को मेनस्ट्रीम में पहचान मिली। खास कर ‘देव डी’ की सफलता के बाद उम्मीद की जा रही थी कि वे बड़े बजट की मल्टी स्टारर फिल्म शुरू करेंगे। कई कारपोरेट कंपनियों के ऑफर भी थे, लेकिन अनुराग ने पिछली सफलता से खुद को बाहर कर लिया और ‘लो बजट’ में ‘दैट गर्ल इन येलो बूट््स’ का निर्माण और निर्देशन किया। उनके इस सिरफिरे व्यवहार से सभी को ताज्जुब हुआ, लेकिन अनुराग का निरालापन चालू रहा। अनेक युवा निर्देशकों को सीमित बजट की फिल्में देने के साथ वे खुद ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ बनाने निकले। उन्होंने तय किया कि वे इसे दो खंडों में बनाएंगे ताकि पूरी कहानी कही जा सके। कलाकारों और तकनीशियनों की टीम ने उन्हें समर्थन दिया। अभी ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ पोस्ट प्रोडक्शन के अंतिम चरण में है।  

 ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की अलग कहानी है। एक दिन सईद जीशान कादरी ने अनुराग कश्यप को संक्षेप में एक कहानी सुनाई। कहानी सुनकर वे हतप्रभ रह गए। उन्होंने पूछा, कहीं तुम मुझे उल्लू तो नहीं बना रहे हो। तुम जो बता रहे हो, वह सचमुच कहीं हुआ है क्या? मैंने उस से यही कहा कि तुम कोई प्रूव दो। वह दो दिनों के बाद अखबार की कतरनें लेकर आया, जिसमें पुश्तैनी दुश्मनी और हत्या की खबरें थी। फिर मैंने अपनी टीम को वहां भेजा। उन्होंने आकर बताया कि ऐसी कहानियां वहां हैं। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रही हैं। सईद जीशान कादरी के साथ सचिन लाडिया और आखिलेश जायसवाल लेखक के तौर पर जुड़े। फिर स्क्रिप्ट तैयार हुई।  तीन पीढिय़ों के बदले की यह कहानी 60 सालों तक चलती है। अनुराग कश्प इस फिल्म की शूटिंग वास्तविक लोकेशन पर करना चाहते थे। लेकिन लाजिस्टिक दिक्कतों के कारण उन्होंने मिर्जापुर और बनारस के आस पास मुख्य शूटिंग की। वे धनबाद भी गए। वहां के धूसरित परिवेश को अपनी फिल्मों में लेकर लौटे। 60 सालों की कहानी को पीरियड के हिसाब से शूट किया गया है। फिल्म के पहले हिस्से की शूटिंग में उस दौर की फिल्मों का स्टाइल रखा गया है, जबकि आज की कहानी के लिए डिजिटल कैमरे के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। हिंदी फिल्मों में उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड को ओरिजनल रंगों में हीं दिखाया गया है। अनुराग ने अपने जमीनी और वास्तविक किरदारों को उनका वास्तविक परिवेश दिया है। कॉस्ट्यूम, भाषा, प्रोपर्टी सभी आवश्यक तत्वों पर पूरा ध्यान दिया गया।  

 इस फिल्म में मनोज बाजपेयी, पियूष मिश्रा, नवाजुद्दीन सिद्दिकी के साथ तिग्मांशु धूलिया भी प्रभावशाली भूमिका में दिखेंगे। फिल्म के मूल लेखक सईद जीशान कादरी ने भी एक रोल किया है। उन्होंने रोल मिलने की शर्त पर ही अनुराग कश्यप को कहानी दी थी। इस फिल्म में ऋचा चड्ढा और हूमा कुरैशी भी खास भूमिकाओं में हैं। यशपाल शर्मा ने बैंड गायक की अनोखी भूमिका निभायी है। इसके साथ म्यूजिक डायरेक्टर स्नेहा खानवलकर ने परिवेश के हिसाब से इसमें 25 गाने गूंथे हैं। इस फिल्म के लिए शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी समेत स्थानीय गायकों और गृहणियों तक से गाने गवाए गए हैं।   ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के दोनों खंडो को ‘डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ सेक्शन में जगह मिलना बड़ी बात है, इसमें पूरे विश्व के वैसे दिग्गज फिल्मकारों की फिल्मों को चुना जाता है, जिनकी अपनी पहचान है। मौलिक, नए और वैयक्तिक पहचान की फिल्मों का यह सेक्शन कान फिल्म फेस्टिवल में विशेष महत्व रखता है। अनुराग कश्यप और उनकी टीम ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को अंतिम टच देने में लगी है। भारत में यह फिल्म जून-जुलाई में रिलीज होगी।   बनारस से वाया दिल्ली फिल्मों की नगरी मुंबई पहुंचे अनुराग कश्यप की यह व्यक्तिगत उपलब्धि वास्तव में उनकी टीम की मेहनत का नतीजा है। अनुराग कश्यप की कामयाबी युवा फिल्मकारों को प्रेरित कर रही है। वे अपनी पीढ़ी के अगुआ फिल्मकार बन गए हैं।   


(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

Wednesday, May 23, 2012

एक दिन के तमाशे के लिए पूरी जिंदगी को बोझिल न बनाएं


♦ आमिर खान  



विवाह जीवन का बेहद महत्वपूर्ण अंग है। यह साझेदारी है। इस मौके पर आप अपना साथी चुनते हैं, संभवत: जीवन भर के लिए। ऐसा साथी जो आपकी मदद करे, आपका समर्थन करे। हम शादी को जिस नजर से देखते हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण है। शादी को लेकर हमारा क्या नजरिया है, इस पर हमारा जीवन निर्भर करता है। आज मैं मुख्य रूप से नौजवानों का ध्यान खींचना चाहता हूं। जो शादीशुदा हैं, वे अच्छा या बुरा पहले ही अपना चुनाव कर चुके हैं।
भारत में हम शादी के नाम पर कितनी भावनाएं, सोच, कितना समय और कितना धन खर्च करते हैं! विवाह के एक दिन के तमाशे पर हम न केवल अपनी जमापूंजी लुटा देते हैं, बल्कि अक्‍सर कर्ज भी लेना पड़ जाता है, किंतु क्या हम ये सारी भावनाएं, समय, प्रयास और धन विवाह में खर्च करते हैं? मेरे ख्याल से नहीं। असल में, हम इन तमाम संसाधनों को अपने विवाह में नहीं, बल्कि अपने विवाह के दिन पर खर्च करते हैं।
बड़े धूमधाम से शादी विवाह के अवसर पर अक्‍सर यह जुमला सुनने को मिलता है। विवाह उत्सव को सफल बनाने के लिए हम तन-मन-धन से जुटे रहते हैं। मैं उस दिन कैसा लगूंगा? समाज मुझे और मेरे साथी को कितना पसंद करेगा? लोग व्यवस्था के बारे में क्या कहेंगे? निमंत्रण पत्र के बारे में क्या कहेंगे? खाने के बारे में लोग क्या कहेंगे? वे कपड़ों के बारे में क्या कहेंगे? ये लोग हमारे दोस्त, नाते-रिश्तेदार और परिजन हैं। इन सबसे हमारी करीबी है और हम इन्हें विवाह में आमंत्रित करते हैं। हमारी ऊर्जा इस खास दिन को सफल बनाने में खप जाती है। यहां तक कि हमारे जीवनसाथी की पसंद भी इस दिन को शानदार बनाने से कहीं न कहीं जुड़ी रहती है। क्या आपने ये बयान नहीं सुने, मेरी बेटी तो इंजीनियर से शादी करेगी। मेरी बेटी तो आइएएस से शादी कर रही है। मेरी बेटी एनआरआइ से शादी कर रही है। हमें लगता है कि लोग ऐसे युवाओं को पसंद करते हैं और उनकी तारीफ से हमें खुशी मिलती है। हम अपने साथी के चुनाव में भी लोगों की पसंद-नापसंद का ध्यान रखते हैं, जबकि कटु सत्य यह है कि वे लोग अपना शेष जीवन वर या वधू के साथ नहीं बिताएंगे। कभी हम खानदान के आधार पर ही चुनाव कर डालते हैं। मेरे बेटे की शादी अमुक व्यक्ति की बेटी से हो रही है। हम वर या वधू के व्यक्तित्व पर ध्यान न देकर उसके परिवार के दर्जे पर लट्टू हो जाते हैं। आइए, हम शादी के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर गौर करें।

तस्‍वीर पर चटका लगाएं और सोना महापात्रा की आवाज में पूरा गाना सुनें, अरे मुझे क्‍या बेचेगा रुपैया
समय ऐसा ही पहलू है। दूसरों की चिंता में अपना अधिकांश समय खपाने के बाद हम खाने-पहनने की व्यवस्था में डूब जाते हैं। फार्म हाउस का चुनाव, मेन्यू, मेहमानों की सूची इन सब पर विचार करने में महीनों लग जाते हैं। यह सब समय उस दिन की तैयारी में लगता है, किंतु सबसे महत्वपूर्ण फैसले – सही जीवनसाथी का चुनाव, पर हम कितना समय लगाते हैं! मैं किस लड़की के साथ शादी कर रहा हूं? वह कैसी है, जिसके साथ मैं अपना पूरा जीवन गुजारने जा रहा हूं। हमारा साथी एक व्यक्ति के रूप में कैसा है? उसकी आदतें कैसी हैं और सोच क्या है? क्या हमारी सोच से उसकी सोच मिलती है? क्या वह विनोदप्रिय है? क्या वह वही व्यक्ति है, जिसके साथ मैं अपना पूरा जीवन बिताना चाहता था। इस नाजुक फैसले को लेने में हम पर्याप्त समय नहीं लगाते। अक्‍सर एक मुलाकात के बाद ही शादी तय हो जाती है। घर वाले चहक कर कहते हैं, चलो, बात पक्की हो गई, मुंह मीठा करो।’
भारत में अधिकांश शादियां घरवाले तय करते हैं। हम वर-वधू के परिवार, जाति, घर, शिक्षा, आय और रंग-रूप पर ध्यान देते हैं, किंतु ये तमाम पहलू सतही हैं। हम उस व्यक्ति को जानने-समझने पर इतना समय क्यों नहीं लगाते, जिसके साथ शेष जीवन गुजारने जा रहे हैं! क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अपना जीवन गुजारने के लिए तैयार हो जाएंगे कि उसके पास इंजीरियरिंग या डॉक्टरी की डिग्री है। क्या उसकी डिग्री से शादी की जा रही है? साझा रुचियां, समान सोच, स्वभाव, संवेदना, विनोदप्रियता – क्या ये सब मायने नहीं रखते?
दूसरा पहलू है धन। हम शादी के दिन भारी धनराशि खर्च करते हैं। अमीरों में एक दूसरे से अधिक खर्च करने की होड़ लगी रहती है। मध्यमवर्गीय और कामकाजी वर्ग अपनी तमाम कमाई और बचत शादी में झोंक देते हैं। अगर आपके पास पैसा है, तो खुशी-खुशी तय कर लेते हैं कि हमें इतना खर्च करना है। किंतु जो अमीर नहीं हैं, जिनके लिए एक-एक रुपये की कीमत है, जिनके लिए बेटी की शादी करने का मतलब है अब तक की पूरी जमा-पूंजी खर्च करना, वे लोग शादी के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वा देते हैं, जमीन-जायदाद बेच डालते हैं और इसके बाद कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। विवाहोत्सव पर सारा पैसा फूंक डालने के बजाय आप यह रकम अलग रखकर बेटी को क्यों नहीं दे देते कि पति के साथ नया जीवन शुरू करो। यह राशि उसके नवजीवन में काम आएगी।
इसके लिए आपको शादी के तामझाम को तिलांजलि देकर शरबत शादी करनी होगी। शरबत शादी से मतलब है कि मेहमानों को बुलाओ, शरबत पिलाकर उनका स्वागत करो और आने के लिए उनका धन्यवाद करो। मौज-मस्ती करो, खुशी मनाओ किंतु सादगी के साथ।
नौजवानो, अपने माता-पिता से कहो, हमें बड़ा फंक्शन नहीं करना। यह राशि हमारे काम आएगी। हमें इस पैसे को अपने सुखी वैवाहिक जीवन की बुनियाद बनाने के काम में लगाने दो। उस खास दिन पर पूरा ध्यान लगाने के बजाय अपने वैवाहिक जीवन के भविष्य के बारे में सोचिए। हमें एक दिन की खुशियों पर अपने शेष जीवन को कुर्बान नहीं करना है। हमारी भावनाएं केवल एक दिन के लिए निवेश न हों, बल्कि शेष जीवन भर के लिए उनका निवेश करें। एक दिन के बजाय पूरे जीवन के बारे में सोचें। अपने शेष जीवन के वित्तीय, भावनात्मक और मानसिक, तीनों पक्षों पर खूब सोच-विचार करो।
शादी से जुड़ी एक बुराई है दहेज। यह प्रतिगामी होने के साथ-साथ अवैध भी है। जरा सोचिए, धन और लालच की बुनियाद पर टिके संबंधों में क्या सार्थकता और सुंदरता हो सकती है? क्या हमें अपनी बेटी के दहेज के लिए धन बचाने के लिए इसे उसकी शिक्षा में निवेश नहीं करना चाहिए था। उसे इतना काबिल और स्वतंत्र बनाइए कि वह अपना भविष्य खुद तराश सके और अपनी खुशियों को खुद हासिल कर सके। तब उसे अपने जीवन को पूरा करने के लिए लालची और नाकारा वर की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसे ऐसे व्यक्ति से शादी करने दें, जो उसकी इज्‍जत करता हो। उसकी शादी ऐसे व्यक्ति से होनी चाहिए, जिसके बारे में वह मानती है कि वह उसके काबिल है। उसी के साथ जीवन बिताकर उसे सच्ची खुशी मिलेगी।
आमिर खान बॉलीवुड एक्‍टर हैं। उन्‍होंने होली नाम की फिल्‍म से अपने कैरियर की शुरुआत की और कयामत से कयामत तक, रंगीला होते हुए फना और गजनी तक आते आते अपनी एक अलग तरह पहचान बनायी। वे हिंदी सिनेमा में नये विषय पर काम करने वाले निर्देशकों को प्रोत्‍साहित भी करते हैं। इसकी शुरुआत उन्‍होंने लगान से की और पीपली लाइव, धोबी घाट और डेल्‍ही बेली जैसी फिल्‍में प्रोड्यूस की। सामाजिक मुद्दों पर आधारित उनके रियलिटी शो सत्‍यमेव जयते की इन दिनों बहुत चर्चा है।

Monday, May 21, 2012

आईपीएल: लव, सेक्‍स, और धोखे का खेल।



आईपीएल यानी क्रिकेट, कैश और कंट्रोवर्सी का कॉकटेल। पर इस बार इसमें लव, सेक्‍स, धोखा का पुट हावी 
होता नजर आ रहा है। मुंबई में एक रेव पार्टी से कथित रूप से आईपील के दो खिलाडियों के पकड़े जाने और चार के फरार हो जाने का मामला विवादों की कड़ी में सबसे ताजा है। आईपीएल पार्टियों और यहां तक कि मैच के दौरान स्‍टेडियमों में भी शराब पीने का मामला तो आम है, लेकिन पिछले सप्‍ताह पार्टी के बाद एक लड़की के साथ छेड़खानी का मामला भी सामने आया।   
यह क्रिकेट से प्रेम करने वालों के साथ भले ही सबसे बड़ा धोखा हो, लेकिन खिलाडि़यों और फ्रेंचाइजी का पैसे, मस्‍ती, रसूख से किसी भी कीमत पर प्रेम निभाने का 'जुनून' ही दिखाता है।  
इस बार के आईपीएल मैचों की टीआरपी रेटिंग भले ही गिरी हो, लेकिन विवादों के चलते आईपीएल लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। विवादों के बीच मैच खेलते हुए दिल्‍ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्‍नई की टीमें प्‍लेऑफ में पहुंच चुकी हैं। खास बात यह है कि सबसे ज्‍यादा विवाद भी इन्‍हीं टीमों (चेन्‍नई को छोड़ कर) के खिलाडियों या फ्रेंचाइजी के चलते हुआ है।
आईपीएल सीजन पांच जिन बड़े विवादों के चलते चर्चा में रहा, उन्‍हें देखते हुए अब आईपीएल पर बैन की मांग तेज हो गई है। नेताओं ने जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया है। लालू प्रसाद यादव, कीर्ति आजाद, शिवराज सिंह चौहान आदि कई नेता खुले आम आईपीएल पर बैन के पक्ष में उठ खड़े हुए हैं। इस सीजन में आईपीएल से जुड़े कुछ बड़े विवादों पर एक नजर: 

फिक्सिंग


समाचार चैनल इंडिया टीवी के स्टिंग ऑपरेशन में आईपीएल से जुड़ा सनसनीखेज खुलासा करते हुए कई खिलाड़ियों को स्पाट फिक्सिंग में लिप्त दिखाया। इस स्टिंग ऑपरेशन में मनीष पांडे, मोहनीश मिश्रा, मनविंदरबिसला ने तय स्लैब से अधिक पैसे लिए। ऐसा करना बीसीसीआई नियमों का उल्लंघन है। इस स्टिंग ऑपरेशन में खिलाड़ी नो बाल फेंकने के लिए पैसे मांगते नजर आए। बीसीसीआई ने इन पांचों खिलाड़ियों को जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया है।    





शाहरुख का हंगामा

कोलकाता नाइटराइडर्स के मालिक और मशहूर बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान पर मुंबई के वानखेडे स्टेडियम शराब पीकर हंगामा करने और सुरक्षाकर्मियों को गालियां और धमकियां देने का आरोप लगा। इन आरोपों के बाद महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने शाहरुख खान पर वानखेडे में घुंसने पर पांच साल का प्रतिबंध लगा दिया।  


आईपीएल खिलाड़ी पर छेड़छाड़ के आरोप  


रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) के आस्ट्रेलियन खिलाड़ी ल्यूक पॉमर्शबैक पर एक अमेरिकी युवती ने छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। जोहल हामिद नाम की अमेरिकी युवती का आरोप है कि दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आईपीएल पार्टी के बाद ल्यूक पॉमर्शबैक ने उसके साथ छेड़छाड़ की और उसके मंगेतर की पिटाई की। ल्यूक पर छेड़खानी के आरोप लगे और उसे दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया। फिलहला मामला अदालत में हैं। ल्यूक को इस मामले में जमानत मिल गई है। छेड़खानी के इस मामले में एक नया विवाद आरसीबी के मालिक सिद्धार्थ माल्या के एक ट्वीट से खड़ा हुआ।   सिद्धार्थ माल्या के एक ट्वीट से जोहल के चरित्र पर सवाल खड़े हुए थे। इस ट्वीट को लेकर भी जोहल ने सिद्धार्थ माल्या के खिलाफ दिल्ली महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। इसी बीच  जोहल के कथित मंगेतर ने उसे अपनी गर्लफ्रैंड बताया है और एक अमेरिकी नागरिक ने जोहल के तार  आर्म्स  डीलर अभिषेक वर्मा से जोड़ दिए हैं। जोहल का राज भी गहरा रहा है
 
 रेव पार्टी में आईपीएल खिलाड़ी  

आईपीएल का सबसे ताजा विवाद मुंबई में एक रेव पार्टी में दो आईपीएल खिलाड़ियों के पकडे जाने का है। मुंबई में जुहू स्थित ओकवुड होटल में चल रहे हाई प्रोफाइल रेव पार्टी में प्रतिबंधित नशीले पदार्थ के सेवन के आरोप में आईपीएल के दो खिलाड़ी व्यान पर्नेल और राहुल शर्मा पकड़े गए हैं। ये दोनों खिलाड़ी पुणे वारियर्स के हैं। चार आईपीएल खिलाड़ी पुलिस के छापा पड़ने के बाद मौके से फरार हो गए।

पुण्यतिथि:राजीव गाँधी,कुछ यादें जेहन में बाकी है


एक  नमन  राजीव  जी  को  आज उनकी पुण्यतिथि के  अवसर पर.राजीव जी बचपन से हमारे प्रिय नेता रहे आज भी याद है कि इंदिरा जी के निधन के समय हम सभी कैसे चाह रहे थे कि राजीव जी आयें और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाएँ क्योंकि ये बच्चों की समझ थी कि जो जल्दी से आकर कुर्सी पर बैठ जायेगा वही प्रधानमंत्री हो जायेगा.तब हमारे दिमाग की क्या कहें वह तो उनके व्यक्तित्व पर ही मोहित था जो एक शायर के शब्दों में यूँ था-

                    ''लताफत राजीव गाँधी,नफासत राजीव गाँधी ,
                     थे सिर से कदम तक एक शराफत राजीव गाँधी ,
                     नज़र आते थे कितने खूबसूरत राजीव गाँधी.''

राजीव जी का  जन्म २० अगस्त १९४४ को हुआ था और राजनीति से कोसों दूर रहने वाले राजीव जी अपनी माता श्रीमती इंदिरा जी के  कारण राजनीति में  आये और देश को पंचायत राज और युवा मताधिकार जैसे उपहार उन्होंने दिए .आज  उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर मैं उन्हें याद करने से स्वयं को नही रोक पाई किन्तु जानती हूँ कि राजीव जी भी राजनीति में आने के कारण बोफोर्स जैसे मुद्दे में बदनामी अपने माथे पर लगाये २१ मई १९९१  को एक आत्मघाती हमले का शिकार होकर हम सभी को छोड़ गए आज भी याद है वह रात जब १०.२० मिनट पर पापा कहीं बाहर से आकर खाना खा रहे थे और  हम कैरम खेल रहे थे कि विविध भारती  का  कार्यक्रम छाया गीत बीच में  बंद हुआ और जैसे ही एक उद्घोषक ने कहा ,''अखिल भारतीय कॉंग्रेस कमेटी के अध्यक्ष....''और इससे पहले कि वह कुछ बोलता कि पापा बोले कि राजीव गाँधी की हत्या हो गयी हम चीख कर पापा से क्या लड़ते क्योंकि अगले पल ही यह समाचार उद्घोषक बोल रहा था और हमारा राजनीति  से सम्बन्ध तोड़ रहा था राजीव जी के साथ हमने राजनीति में रूचि को भी खो दिया बस रह गयी उनकी यादें जो हम आज यहाँ आप सभी से शेयर  कर रहे हैं हालाँकि जानते हैं कि ब्लॉग जगत में अधिकांश उनके खिलाफ हैं किन्तु हम जिनसे आज तक  जुड़े हैं वे राजीव जी ही थे और वे ही रहेंगे.

श्रीमती मुमताज़ मिर्ज़ा के शब्दों में -
''रहबर गया,रफीक गया,हमसफ़र गया,
राजीव पूरी कौम को मगमून कर गया.
सदियाँ भुला सकेंगी न उसके कमाल को,
राजीव चंद सालों में वो काम कर गया.''


शालिनी कौशिक
                      

Saturday, May 19, 2012

देश को आपकी जरूरत है

हममें से अनेक लोग, जो शिक्षित और भावुक हैं और अपने देश को प्यार करते हैं, इन दिनों दुखी हैं। हम देख रहे हैं कि हमारा देश सत्ता में बैठे लोगों की लूट और कुप्रबंधन का शिकार हो रहा है। एक तरफ रुपया गिर रहा है और औद्योगिक उत्पादन दर नकारात्मक हो गई है, वहीं दूसरी तरफ हमारा शीर्ष नेतृत्व संसद में साठ साल पुराने काटरून पर बहस कर रहा है। 


सरकार ने पूरे देश से जिस लोकपाल बिल का वादा किया था, उसकी उम्मीदें धूमिल हो रही हैं। आर्थिक सुधार अब एक विकल्प नहीं, सख्त जरूरत बन चुका है, लेकिन उसे लेकर भी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। 



नीति निर्माण अचेत है। कॉलेज ग्रेजुएट्स और इंजीनियरों को वे जॉब भी नहीं मिल रहे, जो उन्हें दैनिक वेतनभोगियों जितना मेहनताना दे पाएं। भारत के इतिहास के सबसे बड़े घोटाले में लिप्त लगभग सभी लोग जमानत पर छूट चुके हैं और कोई नहीं जानता कि उनका दोष कब सिद्ध होगा, या कभी होगा भी या नहीं।

लोग अक्सर पूछते हैं कि देश की दशा कैसे और कब बदलेगी? इसके लिए क्या किया जाना चाहिए? भूख हड़ताल, क्रांति, मीडिया स्टोरी, मतदाताओं की शिक्षा या कोई नया टीवी रियलिटी शो?

दुर्भाग्य से इन समस्याओं के कोई आसान जवाब नहीं हैं। अपने ध्वस्त हो रहे सिस्टम को जोड़ने के औजार हमारे पास सीमित संख्या में ही हैं। स्वतंत्र मीडिया इन्हीं औजारों में से है। हमारी न्यायपालिका ने भी अन्याय को उजागर करने में अपना योगदान दिया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का अपना महत्व रहा है तो कलाकारों - फिल्मकारों, लेखकों और संगीतकारों - ने भी अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। हर वह व्यक्ति, जो अपनी क्षमतानुसार देश में बदलाव लाने के लिए अपनी ओर से कोई योगदान कर सकता है, कर रहा है।



लेकिन एक वर्ग ऐसा है, जो देश की स्थिति बदलने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर सकता है। ये हैं हमारे लोकसेवक और लोकप्रशासक, जिन्हें प्यार से ‘बाबू’ कहकर पुकारा जाता है। लेकिन दुख की बात है कि इस वर्ग ने अपनी क्षमताओं का उतना उपयोग नहीं किया, जितना वह कर सकता था। देखा जाए तो ये सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ही देश को चलाते हैं। 



देश की प्रशासनिक मशीनरी में हमारे नेताओं की ज्यादा रुचि नहीं रही है। हमारे राजनेता प्रतीकात्मकता पसंद करते हैं, जैसे दलितों के घर भोजन करना, राष्ट्रपति चुनाव या काटरून। या फिर वे वोट बैंक को लुभाने वाले मुद्दों को पसंद करते हैं, जैसे आरक्षण, धर्मस्थलों की स्थापना या राज्यों का विभाजन। लेकिन देश इन लोकसेवकों के कारण ही चल रहा है। 



रेलवे अधिकारी ही यह सुनिश्चित करते हैं कि ट्रेनें सही समय पर चलें, नगर निगम के पार्षद ही यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारी सड़कें साफ रहें, जूनियर आईएएस अधिकारी जिलों का कामकाज संभालते हैं तो सीनियर आईएएस मंत्रालय चलाते हैं।


हमारे देश में आमतौर पर सरकारी कर्मचारी को सुस्त, पुरातनपंथी और भ्रष्ट व्यक्ति माना जाता है। हो सकता है, अनेक बाबू इस धारणा पर खरे भी उतरते हों। लेकिन अनेक अधिकारी-कर्मचारी ऐसे भी हैं, जो ईमानदार और मेहनती हैं। मेरे ही कई कॉलेज बैचमेट्स सिविल सर्विसेज में काम करते हैं। वे दिन में १२ घंटे प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते हैं, जबकि वे निजी क्षेत्र में इससे दस गुना अधिक वेतन पर काम कर सकते थे। 


शायद यह उनका आदर्शवाद है, शायद वे अपने देश को प्यार करते हैं, या शायद वे देश में बदलाव लाना चाहते हैं। वे स्मार्ट लोग हैं। यूपीएससी की परीक्षाएं क्लीयर करना कोई मामूली बात नहीं होती। हमारे लोक प्रशासक सुशिक्षित, मेधावी, प्रभावी और दक्ष होते हैं।


लेकिन इसके बावजूद वे उतनी प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर पाते, जितनी कर सकते हैं। और इसकी वजह है : साहस का अभाव।


मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि तमाम क्षमताओं के बावजूद हमारे अधिकारी साहस का प्रदर्शन नहीं कर पाते। वे अपने राजनीतिक आकाओं से भयभीत रहते हैं, अपने सालाना मूल्यांकन को लेकर चिंतित रहते हैं, अपने प्रमोशन के बारे में जरूरत से ज्यादा फिक्र करते हैं और कभी भी कॅरियर में पिछड़ना नहीं चाहते। उन्हें जॉब सिक्योरिटी पसंद है। 


वे चाहते हैं कि बिना कोई विलक्षण काम किए उन्हें साल-दर-साल तरक्की मिलती रहे। अगर वे कोई हस्तक्षेप करते हैं, कोई रचनात्मक सुझाव देते हैं या किसी गलत चीज की ओर इशारा करते हैं तो हो सकता है कि उन्हें इसका नुकसान झेलना पड़े। 


इसीलिए वे अक्सर यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। नतीजा यह रहता है कि देश के सर्वाधिक मेधावी व्यक्तियों में शुमार, जो सत्ता के गलियारों के निकट हैं और सही-गलत को अच्छी तरह समझते हैं, जरूरत से बहुत कम हस्तक्षेप कर पाते हैं। वे जॉब कर रहे हैं, लेकिन वे बदलाव के लिए लड़ नहीं रहे।


उन्हें कुछ बुनियादी सवालों का जवाब देना चाहिए। वे इतने भयभीत क्यों हैं? इसलिए कि उन्हें पदोन्नति नहीं मिलेगी? वे सचिव नहीं बन पाएंगे? वे किसी सरकारी निवास में एक एक्स्ट्रा बेडरूम फ्लैट पाने का मौका गंवा देंगे? यदि वे भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग के विरुद्ध आवाज उठाते हैं तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है? शायद वे अपनी नौकरी गंवा बैठें और अपनी छद्म सत्ता खो दें। तो क्या उन्हें अपनी प्रतिभा पर इतना भी भरोसा नहीं है कि वे अन्यत्र अपनी आजीविका चला सकें?

महाभारत में कृष्ण ने अजरुन से कहा था कि एक नैतिक लड़ाई में अपने प्रिय परिजनों से युद्ध करना भी धर्म है। हमारी नौकरशाही को विचार करना चाहिए कि आखिर उसका धर्म क्या है। यदि हमारे अधिकारी चाहें तो किसी भी समाजसेवी, कलाकार या मीडियाकर्मी की तुलना में अधिक तेजी से सिस्टम को दुरुस्त कर सकते हैं। वे खुद सिस्टम का हिस्सा हैं और जानते हैं कि कहां पर क्या चल रहा है। वे देश की सबसे ताकतवर लॉबी हैं। यदि वे आंदोलन करेंगे तो सत्ता के गलियारों को सुनने को मजबूर होना ही पड़ेगा।



चुप रहकर अन्याय मत सहन कीजिए, बुराई का हिस्सा मत बनिए, क्योंकि आपमें इतनी प्रतिभा है कि आप अच्छाई का साथ देकर भी कामयाब हो सकते हैं। उठिए और संघर्ष कीजिए। देश को आपकी जरूरत है


दैनिक भास्कर से साभार प्रकाशित: 






चेतन भगत,अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं। इनके उपन्यास युवाओं में खासे चर्चित है,साथ ही साथ इनके उपन्यासों पर हिंदी सिनेमा में लगातार फिल्म निर्माण हो रहा है, 3 इडियट्स जैसी एतिहासिक फिल्म इनके ही उपन्यास का जादू है चेतन भगत जी को पड़ने के शौकीन दैनिक भास्कर में इन्हें लगातार पढ़ सकते है 

Thursday, May 17, 2012

नाराजगी एक अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है!



मुंबई डायरी

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उमेश पंत
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Umesh Pant
सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
♦ उमेश पंत

 डोंगरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता, जिसकी फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे रहे थे, पर उन पर चलने में एक असहजता महसूस हो रही थी। उस अहाते के बीच में एक पेड़ का कंकाल था, जिससे पत्तियां नदारद थीं। उस सूखे नंगे पेड़ को सलेटी रंग से रंग कर उसकी डालियों में कुछ लालटेनें टांक दी गयी थीं। जैसे उस पेड़ से उसकी आत्मा छीन ली गयी हो और उससे कहा गया हो कि तुम अब भी उतने ही अच्छे दिखो, जितने तब दिखते थे, जब तुम हरे-भरे थे। उस अहाते में कुर्सियां बहुत कम थीं और लोग बहुत ज्यादा। इसलिए जो जल्दी आया, वो उन कुर्सियों पर हक जमाकर बैठ गया। किनारे एक 4-5 फीट ऊंची दीवार थी, जिसके एक कोने पर मैंने अपने लिए जगह बना ली।
कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था। मेरे बगल में एक 60-70 साल के बुजुर्ग आकर खड़े हुए। चश्मे के पीछे से झांकती, इधर-उधर तांकती उनकी आंखें कुछ तलाश रही थीं। तभी पूरे अहाते में जैसे एक हलचल सी हुई। सारे पत्रकार पीछे की दिशा में मुड़े। कैमरों के फ्लैश जगमगाने लगे। बिल्कुल वैसा ही दृश्य आंखों के सामने था, जैसा फिल्मों में दिखता है। जॉन अब्राहम की सभा में एंट्री हो रही थी। एक हीरो मंच की ओर बढ़ रहा था। एक आदमी अब भी खुद को तिरस्कृत महसूस कर रहा था। कार्यक्रम शुरू हो चुका था। स्टेज के संचालक, गीतकार नीलेश मिश्र डोंगरी टु दुबई के लेखक हुसैन जैदी से उनकी किताब के बारे में सवाल कर रहे थे। इस किताब पर आधारित अपकमिंग फिल्म शूटआउट एट वडाला के निर्देशक संजय गुप्ता भी मंच पर नीलेश के सवालों के जवाब दे रहे थे। मेरे बगल में खड़ा वो व्यक्ति बगलें झांकते हुए अब भी कुछ तलाश रहा था। कोई ऐसी अदृश्य चीज जो खो जाती है, तो फिर ढूंढे नहीं मिलती। थोड़ी देर में फिर एक हलचल हुई। फिर कैमरे मुड़े। फिर फ्लैश चमके। इस बार अनिल कपूर पार्श्‍व से आते दिखे। झक सफेद कमीज और छाती तक खुले बटन। अनिल मंच की ओर बढ़ रहे थे कि अचानक उनके कदम रुके। उस बूढ़े चेहरे पर उनकी नजर गयी। मुड़कर एक मुस्कुराहट उन्होंने उससे साझा की। उस आदमी से हाथ मिलाया। अपनी पहली मुलाकात का जि़क्र किया। मेरी दांयीं बांह से सटकर खड़ा वो आदमी मुस्कुराते हुए अनिल कपूर के सवालों के जवाब देता रहा और मेरी आखों के 6 इंच आगे अनिल कपूर का वो तेज भरा चेहरा आदर और सम्मान के भाव के साथ कुछ-कुछ बोलता रहा। अनिल कपूर स्टेज पर लौटे और उस आदमी को पूरे सम्मान के साथ स्टेज पे बुलाया। एक अतिरिक्त कुर्सी स्टेज पर लायी गयी। लोगों को पता चल चुका था कि वो आदमी वक्त के किसी हिस्से में जरूरी रहा होगा। और एक रिटायर्ड सीनियर पुलिस आफीसर के तौर पर शायद इस किताब में उसकी भी अहम भूमिका है। उस आदमी की तलाश शायद पूरी हो चुकी थी। वो अदृश्य चीज उसके सम्मान के रूप में उसे मिल चुकी थी। और मेरे लिए एक रील लाइफ हीरो, एक पुराने रीयल लाइफ हीरो को सम्मान देकर एक नया रीयल लाइफ हीरो बन चुका था। एक नायक जो बाकियों से अलग सम्मान देना भी जानता है।
मुंबई की ट्रेनें मुझे छोटे शहर से बड़े शहर आये एक आम भारतीय नागरिक का समाजशास्त्र समझने की किसी गतिशील युक्ति सी लगती हैं। वहां उनके जज्‍बे, उनकी जद्दोजहद, उम्मीदों, हताशाओं और यहां तक कि उनकी मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्थिति तक का एक सतही अध्ययन किया जा सकता है। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच जीवन की कई इकाइयां और उन इकाइयों के कई पहलू निरंतर गतिशील दिखाई देते हैं। वैस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन से दिन रात गुजरती ये ट्रेनें न जाने कितनी भावनाओं के बहाव का एक जरिया बन गयी हैं। जैसे हर दिन इन पटरियों के इर्द गिर्द लाखों जीवनों के अंश एक दूसरे में घुलकर अनंत अदृश्य और अधूरी कहानियों का मिश्रण इन ट्रेनों में जमा कर रहे हों। तय है कि इनसे होकर गुजरे कई सफरनामों को लोग किसी न किसी वजह से याद रखेंगे। कई भावी लेखक, राजनेता, अभिनेत्रियां, बैंकर आंखों में उम्मीदें लिये आम आदमी की शक्ल में अपने अपने पुढ़े स्टेशन तक पहुंचेंगे। और कई बस रोज यूं ही, अपनी पूरी अधूरी यात्राएं करते आम आदमी की तरह शून्य में विलीन हो जाएंगे। जगजीत सिंह की गायी गजल की उन पंक्तियों को सार्थक सी करती… उम्र जलवों में बसर हो, ये जरूरी तो नहीं। हरे शबे गम की सहर हो, ये जरूरी तो नहीं।
दादर से मलाड के बीच का वो सफर लगभग बीस मिनटों का था। और इन बीस मिनटों में एक छोटी सी फिल्म सा था वो एक छोटा सा वाकया। सरसराती ट्रेन में माहौल गर्म था और उस सीट पर हालात शायद नाजुक। पार्श्‍व में यात्रियों के मुखारविंदों से फिसल रही मां-बहन की गालियां मौसम में बह रही गर्माहट की पुष्‍टि कर रही थी। भरी हुई ट्रेन में जगह बहुत कम थी, लेकिन ट्रेन की एक पूरी सीट दो छोटे-छोटे बच्चों और उनके जन्मदाताओं के द्वारा घेर ली गयी थी। भौगोलिक रूप से पास बैठे उन दो वयस्कों के हाव-भाव उनके बीच पनप रही दूरियों को बयां कर रहे थे। किसी बात पर झगड़ कर आये थे शायद। दोनों एक दूसरे से मुंह फेर कर बैठे रहने के बीच कभी अपने बच्चों की हरकतों, तो कभी खिड़की के बाहर गुजरते वक्त में बदलती दुनिया को तिरछी निगाहों से निहारे जा रहे थे। ऐसे जैसे उस दुनिया की हर चीज से उन्हें भारी कोफ्त हो रही हो। बीच बीच में एक दूसरे से आंखें चुराकर एक दूसरे को देखते हुए वो ऐसे लग रहे थे, जैसे किसी चुंबक के दोनों ध्रुव अपनी टूटन के उस आखिरी क्षण का इंतजार कर रहे हों, जिसके बाद वो पलक झपकते ही या तो एक दूसरे से चिपक जाएंगे या फिर कभी पास ही नहीं आएंगे। दोनों बच्चों को उनकी बचकानी हरकतों पर बारी-बारी बेवजह डांटते हुए वो दोनों एक दूसरे के प्रति अपनी नाराजगी को शब्द दे रहे थे। तभी दोनों बच्चों में से एक के हाथ से पानी पीते हुए बोतल का ढक्कन सीट के नीचे गिरा। होंठों से गालों पर लुढ़क आयी पानी की बूंदों को पोंछता बच्चा खिड़की की ओर दुबक गया। पत्नी बोतल का ढक्कन उठाने के लिए सीट पर खिसकी और पति और पत्नी के बीच का रिक्त स्थान जाता रहा। पति ने झुक कर ढक्कन उठा लिया और पत्नी को देखकर ऐसे मुस्कुराया, जैसे वो किसी अजनबी लड़की से पहली बार कोई मुस्कुराहट साझा करना चाहता हो। उसके चेहरे पर पहली ही मुलाकात में एक नवयुवती की मदद कर देने के बाद आने वाले गर्व के भाव ताजा-ताजा मुस्कुराने लगे। पत्नी ने भी अपने चेहरे पर एक ताजा मुस्कुराहट बिखेर कर दूरियों के गणित के सारे समीकरण एक पल में बदल दिये। फिर दोनों बच्चों की ओर देख कर उनकी बाल सुलभ हरकतों पर एक साथ मुस्कुराने लगे। बच्चों की हरकतों में अब कोई कोफ्त न बची थी। हवा शायद उतनी गर्म नहीं रह गयी थी। नजरें मिलाने में हो रही असहजता अब सिरे से गायब हो गयी थी। पुढ़े स्टेशन गोरेगांव कहती हुई उस मशीनी आवाज की ओर ध्यान जाते ही वो बच्चों को लेकर अपनी सीट से उठ खड़े हुए। दूरियों को पाटकर नजदीक आया एक परिवार अपनी मंजिल आ जाने की खबर पा चुका था। और मुझे समझ आ रहा था कि नाराजगी कितनी अर्थहीन और क्षणभंगुर भावना है। एक ऐसी अनावश्यक झिल्ली, जिसका होना बस तब तक ही मतलब रखता है, जब तक उसके गैरजरूरी होने का एहसास न हो जाए।
कल ही देर रात वर्सोवा के किनारे पत्‍थरों पर बैठकर दोस्तों के साथ फिल्मों पर कुछ बातें हो रही थीं। तभी गैंग्स ऑफ वासेपुर का जि़क्र आया। इतने में एक 30-32 साल के आदमी ने बगल में खड़े होकर पूछा… वासेपुर का ट्रेलर आ गया न? हमने हामी भरी और पूछा, आपने देखा? तो वो बोला मैंने तो पूरी फिल्म देख ली है। उसमें तिग्मांशु की जवानी का रोल मैंने ही तो किया है। फिर परिचय हुआ, तो महसूस हुआ कि रजत भगत नाम के उस शख्स की बातों में एक टीस थी कि वो पूरा रोल उन्हें नहीं मिल पाया। उसके लिए अब भी एक पहचान का संकट है और वो लगातार उस संकट से मुक्त होने के संघर्ष में जुटा है। एक स्ट्रगलिंग एक्टर, जिसे लोग तब जान पाते हैं, जब वो खुद लोगों को बताता है कि वो पहले सात साल दिल्ली से थिएटर करके आया और अब 10 साल से मुंबई में है। और स्टाइल से लेकर भिंडी बाजार तक लगभग सात फिल्मों में काम कर चुका है। ऐसे लोगों को देखकर हमें क्या महसूस होता है ये बिल्कुल गैरजरूरी है, जरूरी ये है कि उन्हें इस संघर्ष का हिस्सा होने में कितना मजा है। रात के अंधेरे में बहुत देर तक अकेले समंदर की लहरों को निहारते रजत भगत जब इस संघर्ष को मजेदार बताते हैं, तो मुझ जैसे नये लोगों का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है।
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित :

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