Thursday, December 6, 2012

तलाश उर्फ खूबसूरत आत्मा का खूनी बदला !!


आमिर के बारे में कहा जाता है वे पटकथा पढ़कर किसी फिल्म के लिए हां करते हैं, आमिर इस मामले में बहुत सजग माने जाते हैं। आमिर की फिल्में कुछ अलग होती हैं, उनके ट्रीटमेंट, कहानी आदि सब में कुछ नयापन होता है। आमिर पर भरोसा करने वाले तलाश देखने भी इसी उम्मीद से जायेंगे कि आमिर अपने छवि पर खरा उतरेंगे। पर यह फिल्म आमिर की साख के अनुरूप बिलकुल नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में सिनेमा ने दर्शकों की पसंद को समृद्ध भी किया है, आमिर भी अच्छा सिनेमा देने के लिए, दर्शकों की रूचि परिष्कृत करने के लिए जाने जाते हैं, लिहाजा यह फिल्म उल्टी पड़ गयी है। दर्शक को आमिर से यह उम्मीद तो नहीं ही होगी। इस फिल्म में आप कहानी की ‘तलाश’ करते रह जायेंगे। ‘तलाश’ फिल्म एक भुतहा या हारर फिल्म नहीं भी कही जाए पर आत्मा के विश्वास पर केंद्रित तो है ही।

‘तलाश’ की कहानी
फिल्म स्टार अरमान कपूर की कार समन्दर में डूब जाती है। कार खुद अरमान चला रहा था, वह आत्महत्या नहीं कर सकता था फिर ऐसा क्या हुआ कि रात में सुनसान सडक पर तेज गति से दौड़ती हुई गाड़ी अचानक समंदर की ओर घूम गयी और सीढियां तोड़ते हुए समंदर में जा घुसी…! क्यों हुआ ऐसा…! क्या अरमान की किसी ने हत्या की? लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी डूबने के कारण मौत होना बताया गया। अरमान उस रास्ते पर गया ही क्यों जो उसके घर का रास्ता भी नहीं था..और वह कार खुद क्यों चला रहा था जबकि वह कार चलाना पसंद नही करता, हमेशा उसका ड्राइवर ही कार चलाता था..!! इस हाई प्रोफाइल केस को हल करने का जिम्मा है पुलिस अधिकारी सुरजन सिंह शेखावत का। शेखावत का एक अधीनस्थ बताता है, साहब ये केस फाइनल रिपोर्ट लगा कर बंद कर दीजिये। इस रास्ते में कुछ ‘गड़बड़’ है। यहां ऐसी कई मौतें हुई हैं, किसी का पता ही नहीं चल पाया।

शेखावत की पत्नी रोशनी उदास रहती है क्योंकि उसका आठ साल का बेटा करन पानी में डूब कर मर गया। बच्चे की मौत के लिए शेखावत खुद को जिम्मेदार मानता है और रात-रात भर सो नही पाता, न ही बच्चे के बारे में पत्नी से कोई बात करता है। इस डिप्रेशन से उबरने के लिए शेखावत पत्नी को मनोवैज्ञानिक के पास भी भेजता है। रोशनी की पड़ोसन आत्माओं से बात करा सकती है, वह करन की आत्मा से रोशनी की बात कराती है। शेखावत को जब यह पता लगता है वह रोशनी और अपनी पड़ोसन पर बहुत नाराज होता है। और कहता है मरने के बाद कोई वापस नहीं आता, सब खत्म हो जाता है। बहरहाल- इसी बीच करीना कपूर को भी आना है सो वह सिमरन उर्फ रोजी के किरदार में अवतरित होती हैं…। कालगर्ल रोजी की मदद से शेखावत अरमान कपूर की रहस्यमय मौत की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करता है।




फिल्म का अंत पराभौतिक शक्तियों के वजूद को साबित करता है। इन सबमें यकीन नहीं रखने वाले शेखावत को भी मानना पड़ता है कि आत्मा होती है और वह अपनी मौत का बदला ले सकती है, रात-रात भर उसे घुमा सकती है। भीड़ में, अकेले में, समन्दर किनारे, आधी रात में और भरी दोपहरी में उससे मीठी-मीठी बातें कर सकती है… और वह सब कुछ कर सकती है जो रामगोपाल वर्मा की आत्माएं करती हैं ,… अब रहा इसका अच्छा पक्ष – तो निजाम सिद्दीकी का अभिनय अच्छा है, करीना कपूर बेशक बहुत खूबसूरत और आर्कषक लगी हैं, करने को जो मिला वह उन्होंने किया है। गाने कब बजते हैं, कब खामोश हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। फिल्म की गति बेहद धीमी है, आखिरी आधे घंटे की फिल्म ठीक है अगर आप पहले के दो घंटे की फिल्म झेल लें तो…
मामला सिर्फ आत्मा का नहीं है। फिल्म की कहानी पूरे ढाई घंटे अपनी दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखने में काययाब नहीं लगती है। कहानी को बेवजह खींचा गया है। इस कहानी पर एक घंटे का सीरियल कहीं ज्यादा ठीक बनता। आत्मा के अस्तित्व के विशवास को पटकथा में मजबूती से न उतार पाना निर्देशक और पटकथा लेखक की कमजोरी है। हालीवुड की फिल्म ‘ट्यूलाइट’ है जिसमें वैम्पायर की ही कहानी है लेकिन पूरी फिल्म जबरदस्त है। दर्शकों ने ‘सुपरमैन’ भी देखी है। ये फिल्में काल्पनिक कथाओं पर ही आधारित थीं लेकिन फिल्म निर्माण आर प्रस्तुति के लिहाज से तार्किक थीं, जो यह फिल्म बिलकुल नहीं है। मैं आमिर की फिल्मो की प्रशंसक हूं लेकिन इस फिल्म को लेकर एक शिकायत है। जितनी मेहनत उन्होंने फिल्म के प्रचार-प्रसार में की, उसका सौवां हिस्सा भी पटकथा पर करते तो कुछ ठीक-ठाक बन जाता। अगर मुझे इस फिल्म के बारे में कहना हो तो मैं कहूंगी – बेकार।
संध्या नवोदिताकवि, अनुवादक, व्यंग्य लेखक और पत्रकार। छात्र- जीवन से सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। संध्या ने छात्र राजनीति में भी सक्रिय रूप से भाग लिया और वर्तमान में कर्मचारी राजनीति में सक्रिय हैं। आकाशवाणी में बतौर एनाउंसर -कम्पीयर जिम्मेदारी निभाई। फिलहाल समाचार-पत्र, पत्रिकाओं ,ब्लॉग और वेब पत्रिकाओं में लेखन।)
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित 

शाहरुख का विस्तार और नियति की सीमाएं

धन एक अजीब उद्दीपक है। यह हठ को अकड़ देता और बुद्धि को नरम करता है, जबकि इसका उल्टा ज्यादा उपयोगी हो सकता था। इसमें थोड़ी-सी चेहरे की पहचान भी मिला लीजिए, जिसके लिए सेलिब्रिटी बड़े बेकरार रहते हैं और प्रतिमा-भक्त जिसकी पेशकश करते हैं। और फिर जो कॉकटेल बनता है, वह इतना प्रचंड होता है कि ठीक आपके चेहरे पर फटने में इसे बस एक पल ही लगता है। 

चूंकि सेलिब्रिटी दोष स्वीकार करना अपनी सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं, इसलिए ढिठाई भी एक ही कदम दूर होती है। हर सुपरस्टार इस बीमारी का शिकार नहीं होता, लेकिन मौके-बेमौके उन्माद का हमला होने पर बचाव के चंद रास्ते ही होते हैं।

मैं शाहरुख खान से दो बार मिला हूं। एक बार हाल ही में। और तीसरे मौके पर संभवत: कुछ क्षण के लिए। निश्चित तौर पर यह निकटता का सबूत नहीं है, इसलिए इसे बस जान-पहचान ही रहने दीजिए। परंतु मैं जितना भी थोड़ा-बहुत जानता हूं, उससे पहले प्रभाव की पुष्टि होती है। 

वे बेहद दिलकश और बुद्धिमान शख्स हैं। उनका बेहतरीन गुण है मृदु हास्यबोध। तीखी और यहां तक कि कटु टिप्पणी इस हास्यबोध के आड़े आती है। लेकिन वे रिश्तों पर चोट पहुंचाए बगैर दुनिया पर हंस सकते हैं, क्योंकि दुनिया में वे खुद को भी शामिल करते हैं। उनमें न तो विशिष्टता रही, न उन्होंने बादलों के रहवासियों की तरह बातचीत की। यदि उन्हें प्रतिमास्थल पर बिठा दिया जाए, तो वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उस ऊंचे ठिकाने से उनके पैर जमीन को छूते रहें। यही चीज उन्हें गुमनामी से परे ले जाती है। 

उन्होंने वानखेड़े स्टेडियम में अपना आपा क्यों खो दिया, इसके कई स्पष्टीकरण होंगे। इनमें से एक अहम सफाई तनाव हो सकती है। वे अब युवा नहीं रहे। परदे पर उनका पहला गीत एक-चौथाई सदी पहले गाया गया था और जैसा कि टीवी पर कोई भी म्यूजिक चैनल बताएगा कि वे गीत अब पुराने गानों के बीच ही नजर आते हैं। उम्र हर उस अभिनेता के लिए डरावना रसातल है, जिसने अपने चाहनेवालों से चिरयौवन का वादा कर रखा है। स्वभाववश चुगली करने वाली मांसपेशियों की दशा से उम्र छिपाने के लिए कष्टदायक कसरत की जरूरत होती है। 

उम्र को छद्म आवरण में लपेटना एक दुष्कर काम है और यंत्रणा महज इसलिए कम तीखी नहीं हो जाती कि यह स्वयं के द्वारा ही थोपी गई है। गुरुत्वाकर्षण के अनुसार लटकती चर्बी की ओर अपने शरीर के स्वाभाविक झुकाव को नकारने के लिए आपको शरीर पर चाबुक फटकारने होते हैं। 

जब मध्ययुगीन कैथोलिक मठवासी खुद को कोड़े मारते थे, तो इसमें उन्हें यह दिलासा तो रहती थी कि वे ऐसा ईश्वर के लिए कर रहे हैं। मैं नहीं मान सकता कि उस मध्यमवर्गीय बालक के लिए धन अब और कुछ भी अहमियत रखता होगा, जिसने बड़े होकर उतना ज्यादा कमा लिया, जितना कि शाहरुख ने। इसलिए उकसावा तो सिर्फ अहंकार का ही हो सकता है और ऐसे शिखर पर बने रहने की उन्मादी लालसा का, जो महज सबसे ऊंचा न होकर प्रतिस्पर्धा से परे भी हो। 

महत्वाकांक्षा एक खरा गुण है। इसके बगैर हमने ज्यादा तरक्की नहीं की होती। लेकिन जब आप अपने ही उत्पाद होते हैं और आपके मूल्य का पैमाना एक ऐसी छवि से संचालित होता है, जिसे क्षय से नहीं बचाया जा सकता, तो फिर बुद्धिमानी इसी में है कि सीमाओं को पहचान लिया जाए। आह! ऐसा करने की तुलना में लिखना कहीं आसान है। 


कल्पना लोक का हीरो खुशामद के मनमोहक उत्सव पर बहता चला जाता है, भले ही वह निजी दैत्यों से संघर्ष भी करता है, जो उन घंटों में बहुत भयंकर बन जाते हैं, जब किसी व्यक्ति को खुद के साथ ही बने रहना चाहिए। अपराध-बोध के कई आयाम होते हैं। जिनका अस्तित्व औरों की सराहना पर टिका होता है, वे इस बात की सलीब भी ढोते हैं कि उन्होंने दूसरों को कितना ज्यादा प्यार दिया है। 

इन दूसरों में उनके बच्चे भी शामिल होते हैं। आप और आपके बच्चे, दोनों एक साथ बड़े होते हैं और एक बिंदु पर जब बच्चे अपने खुद के बच्चों के लिए आगे बढ़ते हैं, तो भीतरी विभाजन होता ही है। वक्त दोनों ओर के समीकरण को संक्षिप्त करता है। आपके बच्चे की आंखों में संदेहभरा सवाल एक क्षणभंगुर मृगतृष्णा के संसार की चमक-दमक को घटाता है। और शायद चापलूस दुनिया पर ताकत दिखाकर बच्चे का दिल जीतने का प्रलोभन ऐसा हो जाता कि उससे बचा ही न जा सके। 

शाहरुख खान के महान पूर्ववर्तियों ने ऐसे राष्ट्रीय कीमियागरों की तलाश की, जो उन्हें दैत्यों से मुक्त करा सकें। कभी-कभी रातें व्यामोह में गुजर जाती हैं और दिन खुद से छल करते हुए। प्रामाणिक जीनियस, राजकपूर ने वहीदा रहमान के साथ ‘सुनो जी सुनो, हमारी भी सुनो’ गाते हुए बहुत प्रतिभाशाली ढंग से डांस किया था, लेकिन गालों के आसपास के फुलाव ने ‘श्री 420’ में नादिरा और भारत, दोनों को सम्मोहित करने वाले उस चेहरे को बदल दिया था। 

दिलीप कुमार ने पीढ़ियों को अपने पीछे चलाया, लेकिन ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘गंगा जमुना’ में अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी लंबे समय तक चलते रहने से वे खुद को रोक नहीं पाए। देवआनंद ने सोचा कि ऊंचे कॉलर और स्कार्फ से र्झुीदार त्वचा को छुपाकर वे वक्त को हरा सकते हैं। वक्त के पास एक कड़वा जवाब था : 

उपहासजनक नकल। देवआनंद को 80 के पूरे दशक में बड़ी होशियारी से कदम रखने चाहिए थे और 90 के दशक में कभी कदम ही नहीं धरना चाहिए था, फिर 21 सदी को तो अकेला ही छोड़ दीजिए। सदाबहार कही जाने वाली कोई चीज नहीं होती। बस सूखी लकड़ी ही मरने में लंबा समय लेती है। 

जो लोग सीमित जीवन का आधा हिस्सा तय कर चुके हैं, उनके लिए जीवन का उद्देश्य जरूर बदलना चाहिए। शाहरुख खान को यादों में आनंद के प्रतीक के रूप में जिंदा रहना चाहिए, न कि गुस्से के। मैं नहीं मान सकता कि वे दौलत के अहंकार के अधीन हो सकते हैं। यह बहुत ज्यादा मायूसी की बात होगी। 

इंसान जो भी देखता, जांचता-परखता है, वह पूरा कभी भी उसके हाथ में नहीं होता, लेकिन उसे यह समझने की बुद्धि मिली है कि नियति को किसी मंजिल पर ठहरना ही होता है। शाहरुख खान ने ऐसी छवि गढ़ी है, जिसने हमें असाधारण आनंद दिया है। उनके लिए वह क्षण आ गया है कि वे खुद को पुन: गढ़ें।

मोबाशर जावेद अकबर जाने माने पत्रकार और लेखक हैं। वे साप्ताहिक अखबार 'द संडे गार्जियन' अखबार के एडिटर-इन-चीफ हैं और अंग्रेज़ी साप्ताहिक मैगज़ीन 'इंडिया टुडे' के एडिटोरियल डायरेक्टर भी रह चुके हैं। साथ ही वे 'द एशियन एज' अखबार के संस्थापक और पूर्व एडिटर-इन-चीफ भी हैं। उन्होनें कई किताबें भी लिखी हैं जिनमें 'बायलाइन', 'नेहरू:द मेकिंग ऑफ इंडिया', 'कश्मीर:बिहाइंड द वेल, रायट आफ्टर रायट' और 'इंडिया:ए सीज विदइन' जैसी फेमस किताबें शामिल हैं। हाल ही में उनकी किताब 'ब्लड ब्रदर्स' भी प्रकाशित हुई है जो हिंदु-मुसलमान के बदलते रिश्तों पर प्रकाश डालती है।

‘कोल’गेट की काली राजनीति


मान लें कि आप एक विशाल संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के सदस्यों में मतभेद हैं, फिर भी वे एक इकाई की तरह साथ रहते हैं। परिवार एक विशाल ज्वैलरी शॉप का मालिक है, जो बहुमूल्य रत्न-आभूषणों और पारिवारिक खजाने से भरपूर है। इस शॉप को चलाने के लिए परिवार एक मैनेजर को नियुक्त करते हुए उसे इसका पूरा नियंत्रण सौंप देता है। 

यहां तक कि मैनेजर को इन गहनों को बेचना भी नहीं पड़ता। वह तो चयन संबंधी कुछ मानदंडों (जो मैनेजर द्वारा खुद ही तैयार किए गए हैं) की कसौटी पर जिसे चाहे हीरे-मोती जैसे ये बेशकीमती नगीने दे सकता है। इस तरह मैनेजर अपने पसंदीदा लोगों को रेवड़ियां बांट सकता है और चाहे जिसे ठुकरा सकता है। 

जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में कोई भी मैनेजर क्या करेगा? जाहिर तौर पर वह पहले अपने मित्रों व सगे-संबंधियों को बुलाकर यह सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में रत्न-आभूषण मिल जाएं। मैनेजर उन लोगों को भी गहने वगैरह बांटेगा, जो उसे बदले में नकद लाभ या उपहार वगैरह दे सकें। इस तरह जल्द ही दुकान लुट जाएगी और परिवार को भारी घाटा झेलना होगा। इसके बाद, मान लें कि परिवार पहले मैनेजर को बाहर का रास्ता दिखाते हुए दूसरे मैनेजर को नियुक्त करता है। 

नियम पहले जैसे ही रहते हैं, यानी ‘गहनों का वितरण मैनेजर के विवेक पर निर्भर है’। जाहिर तौर पर एक समय के बाद दूसरा मैनेजर भी अपने मित्रों व सगे-संबंधियों की तिजोरियां भरने लगता है। एक दिन परिवार को अपने ऑडिटर के जरिए पता लगता है कि उसका काफी खजाना लुट चुका है। जब वे मौजूदा मैनेजर के समक्ष यह बात रखते हैं तो वह कहता है कि इसकी शुरुआत तो पिछले मैनेजर ने की थी। पहला मैनेजर दूसरे मैनेजर पर ज्यादा लालची होने का आरोप लगाता है। भ्रमित परिवार उनकी टेनिस मैच स्टाइल की बहस को सुनता रहता है, जहां पर दोनों मैनेजर गलती को एक-दूसरे की ओर ठेलने में लगे हैं। जल्द ही परिवार के सदस्य दोनों मैनेजरों के खेमों में बंटते हुए आपस में उलझने लगते हैं। मैनेजरों की लूट चलती रहती है। 

आपको यह स्टोरी हास्यास्पद लग सकती है? खैर, यह है भी। लेकिन कोयला घोटाले के मामले में यही तो हो रहा है। हम भारतीय एक विभाजित मगर फिर भी संयुक्त परिवार जैसे हैं। हमारे कोयले के विशाल भंडार ज्वैलरी शॉप की तरह हैं। भाजपा और कांग्रेस मैनेजर हैं, जिन्हें आप किसी भी क्रम में रख सकते हैं। नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने तो सिर्फ कोयले में नुकसान की मात्रा बताई है। घोटाला तो दशकों से हो रहा है। इसी तरह के घोटाले अन्य प्राकृतिक संसाधनों में भी हो रहे हैं। वैश्विक बाजार में इनकी उच्च कीमतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये संसाधन हमारे लिए बेशकीमती हैं, जिनसे हमारे देश का कायाकल्प हो सकता है। इनके त्रुटिपूर्ण आवंटन से देश को भारी नुकसान होता है। यही कारण है कि खनिज संपदा के लिहाज से दुनिया के सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्रों में से एक होने के बावजूद हमारी गिनती गरीब देशों में होती है। 

हालांकि यह हमारे राजनेता ही हैं, जो इन संसाधनों से सबसे ज्यादा फायदा ले रहे हैं। इनमें अनाप-शनाप पैसा है। फिर भी हमने अपने राजनेताओं को विवेक के आधार पर इन संसाधनों के आवंटन की छूट दे दी। हम उनकी टेनिस मैच स्टाइल में एक-दूसरे पर आरोप ठेलने की राजनीति देखते रहते हैं। कांग्रेस हो या भाजपा, हम सोचते हैं कि हमारी पसंदीदा पार्टी इस समस्या को खत्म कर सकती है। हालांकि यह पार्टी-विशेष की समस्या नहीं है। यह तो संसाधनों के आवंटन के नियमों से जुड़ी है। 

लिहाजा हमें यह देखना होगा कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन बिलकुल निष्पक्ष और सर्वाधिक उत्पादक तरीके से होना कैसे सुनिश्चित किया जाए? नीलामी एक स्वाभाविक तरीका है। हालांकि खनिज भंडारों, इनके अंतिम इस्तेमाल और उत्खनन दरों की अनिश्चितता को देखते हुए कई बार खदान का मूल्यांकन आसान नहीं होता। ऐसी स्थिति में रॉयल्टी साझा करने का मॉडल कारगर हो सकता है। खनिज संपदा से भरपूर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जान लिया है कि कैसे जनहित से समझौता किए बगैर खनन क्षेत्र को विकसित किया जाए। हम भी यह कर सकते हैं। राजनीतिक दल देश की संपदा के मैनेजर हैं, मालिक नहीं। हम देशवासियों और मीडिया को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के ‘यह उसने किया, मैंने नहीं’ के ड्रामे पर ध्यान देने के बजाय भविष्य के लिए सही समाधान तलाशने पर फोकस करना चाहिए। 

इन दलों को भी अपनी नीतियां बदलनी होंगी। कोयला घोटाले के मुद्दे पर भाजपा ने स्मार्ट पॉलिटिक्स खेली। कोयले पर यूपीए सरकार की धांधलियों के बारे में लगातार बोलते हुए उसने यूपीए के मुंह पर कालिख पोत दी। हालांकि उसे पता होना चाहिए कि कहां पर रुकना है। भाजपा ने भी खराब नियमों का फायदा उठाया है। क्या भाजपा खुद को बदलना चाहती है? क्या यह सत्ता में रहने के एक बड़े फायदे यानी बेशकीमती संपदाओं पर पूर्ण नियंत्रण को छोड़ने के लिए तैयार है? अब राजनीतिक अवसर कांग्रेस को चोर साबित करने में नहीं है, बल्कि यह दिखाने में है कि भाजपा राष्ट्रीय हितों के लिए त्याग करने को तैयार है। 

कांग्रेस भी कुछ सकारात्मक कदम उठाते हुए अपने चेहरे की कालिख को थोड़ा साफ कर सकती है। पहला, हालिया कोल आवंटनों को रद्द या कम से कम उनका पुनमरूल्यांकन किया जाए। हां, यह उन निजी उद्यमियों और निवेशकों के साथ नाइंसाफी होगी, जिन्होंने कोल आवंटनों के आधार पर परियोजनाओं की फंडिंग की है। लेकिन यदि कांग्रेस अपना चेहरा बचाना चाहती है तो उसे अपने हाथ खींचने होंगे, अभी। दूसरा, वह प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की नई नीति पेश करे। तीसरा और साधारण उपाय, उसे अपनी अक्खड़ता में कमी लानी होगी। सत्ता में होना और सही होना दो अलग-अलग बातें हैं। सत्ता के शीर्ष में बैठे कुछ कांग्रेसी नेता स्पष्ट तौर पर गलत होते भी बेहद अक्खड़ तरीके से सामने आते हैं। गलती करने के बाद अक्खड़ता दिखाना और बड़ी गलती है। इससे मतदाताओं में चिढ़ पैदा होती है। सत्ता में होने का मतलब यह नहीं कि आप लोकसेवक नहीं हैं। विनम्रता, तार्किकता और संभव हो तो थोड़ी नैतिकता का प्रदर्शन करना होगा। 

कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि कोयला घोटाला नाटकीय घटनाओं से ओत-प्रोत कोई सोप ओपेरा नहीं है। इस ड्रामे को छोड़ें और समाधान के लिए साथ बैठकर चर्चा करें। जो ऐसा नहीं करता, वह २क्१४ के लिए संभवत: खुद ही अपने लिए गहरी खाई खोद लेगा।

चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द कॉल सेंटर', 2008 में 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ', 2009 में 'टू स्टेट्स' और 2011 में 'रेवोल्यूशन 2020' भी रिलीज़ होते ही बेस्टसेलर बनी। आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़े चेतन भगत की पहचान एक लेखक से ज़्यादा यूथ आईकॉन के रूप में है। उनके कॉलम्स अंग्रेज़ी और हिंदी अखबारों में छपते रहते हैं। एक इंवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर उन्होनें अपना करियर शुरू किया था पर 2009 से वे पूर्ण तौर पर लेखन कर रहे हैं। 

Tuesday, November 13, 2012

मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी



मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी
साल 2005 की बात है। फेसबुक हैडक्वार्टर एकदम खाली भूतहा जैसा दिख रहा था। एक लड़की पहली जॉब और इंटरव्यू के लिए ऑफिस में बैठी थी। दोपहर में लगभग दो घंटे इंतजार करने के बाद उसे बुलाया गया। 

लड़की ने फेसबुक प्रमुख 'मार्क जुकरबर्ग' को ऐसा प्रभावित किया कि वह बन गई 'फेसबुक'  की पहली महिला इंजीनियर। यह लड़की थी 'रुचि सांघवी', जिसने फेसबुक की सबसे विवादित फीचर 'न्यूज फीड'  का आइडिया दिया।

उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन आईडिया से फेसबुक को दुनिया की सोशल नेटवर्किंग साइट बनाया. 2005 में नौकरी ज्वाइन करने वाली 23 वर्षीय रुचि ने 2010 में कंपनी में बड़े पद को छोड़कर सबको चौंका दिया।

महाराष्ट्र के पुणे की रहने वाली रुचि सांघवी ने फेसबुक उस समय ज्वाइन किया, जब उसे कोई जानता नहीं था। वह शुरुआत के 10 इंजीनियर्स में अकेली लड़की थी। सिर्फ पांच साल के फेसबुक करियर में उन्होंने कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किग साइट बनते हुए देखा।

अपने पिता की कंपनी से न जुड़कर रुचि कुछ अलग करना चाहती थीं। उन्होंने अमेरिका जाकर 'कार्नेज मेलन यूनीवर्सिटी' से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उन्होंने कहा कि जब मैंने इंजीनियरिंग में जाने के बारे में सोचा तो मेरी हंसी उड़ाई गई. लोग मुझसे कहते कि अब तुम आस्तीन ऊंची कर किसी फैक्ट्री में काम करोगी।

इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के 150 छात्रों की क्लास में रूचि समेत सिर्फ पांच लड़कियां थीं। वह भी अमेरिका जैसे देश में. सच पूछा जाए तो उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में सेंध लगाई। 2005 में 23 वर्षीय रुचि के फेसबुक ज्वाइन करने के बाद फेसबुक संस्थापक जुकरबर्ग और उनके साथी यूजर को साइट पर इंगेज करने के लिए आईडिया ढूंढ रहे थे। तभी रूचि ने एक आइडिया दिया..।


मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी
रुचि ने बताया कि 'हम लगातार मीटिंग कर रहे थे और कोई भी हल नहीं निकल रहा था। तभी, अचानक मैंने कहा कि क्यों न हम एक न्यूज पेपर जैसा 'फीचर' बनाएं, जिसमें यूजर लगातार इंगेज रहे। यह कुछ लत जैसा था.'उन्होंने मार्क से कहा कि जैसे न्यूजपेपर में हम लगातार पेज पलटते जाते हैं और एक स्टोरी से दूसरी स्टोरी पर पहुंच जाते हैं, ऐसी ही  फीचर बनाना होगा, जिसमें यूजर लगातार उलझा रहे।

मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी

मार्क को आईडिया पसंद आ गया. रुचि और उनके साथियों ने 2006 में 'न्यूज फीड' लांच किया, जिसने बाद के सालों में फेसबुक की किस्मत बदल दी. फेसबुक का सबसे विवादित फीचर 'न्यूज फीड' किसी भी यूजर के होमपेज का सेंटर कॉलम होता है। दूसरे लोगों के पेज से नई स्टोरीज और उनके विचार आदि आपको अपने पेज पर 'न्यूज फीड' के जरिए दिखाई देते हैं।

उस समय लोगों का कहना था कि यह प्राइवेसी पर हमला है। कुछ का कहना था कि यह फालतू फीचर जोड़ा गया है। उन दिनों की याद कर रुचि कहती हैं कि लोगों ने फेसबुक पर 'आई हेट फेसबुक' ग्रुप बनाया था। हमारे ऑफिस के बाहर लोग नारे लगाते थे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, लोगों ने इसे बहुत पसंद किया। हमारे फेसबुक पर हर घंटे में करीब 50 हजार नए यूजर आने लगे। बाद के सालों में 'फ्रेंड्सफीड' और 'लिंक्डिन' ने भी इसी आइडिया को कॉपी किया।

'न्यूज फीड' के अलावा फेसबुक के 'प्लेटफॉर्म' (थर्ड पार्टी डेवलपर के लिए) और 'कनेक्ट' (फेसबुक यूजर को अपनी आईडेंटिटी को दुनिया की किसी भी साइट से कनेक्ट करने के लिए) लांच किए। इन फीचर्स के जरिए फेसबुक को इंटरनेट की दुनिया में खुद के नियम गढ़ने का मौका दिया। मार्क कहते हैं कि इन तीन एप्लीकेशन ने फेसबुक पर सोशल नेटवर्किग को आसान और सबसे अलग बनाया।


मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी
रुचि ने एक स्पीच के दौरान कहा कि मैंने अपने पापा से वादा किया था कि मैं 25 साल की उम्र में शादी कर लूंगी, क्योंकि भारत में लड़की की शादी की यही सही उम्र है और 50 साल में उसे दादी भी बन जाना होता है. यह ताज्जुब की बात थी कि रुचि को अपना हमसफर फेसबुक में ही मिला।


मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी
उनके पति 'आदित्य अग्रवाल' ने 2005 में इंजीनियरिंग निदेशक के रूप में फेसबुक ज्वाइन किया था। छह साल डेटिंग के बाद दोनों ने शादी कर ली। शादी में उनके दोस्तों के अलावा खुद 'मार्क जुकरबर्ग' भारतीय परिधान में मौजूद थे। उन्होंने दूल्हे की बारात में हिन्दी गानों पर जमकर ठुमके लगाए।

2010 में 30 साल की उम्र में रुचि ने फेसबुक छोड़कर अपना खुद का काम करने का फैसला किया।फेसबुक में 'लीड प्रॉडक्ट मैनेजर' के पद को छोड़ खुद की कंपनी 'कोव' शुरू की। फरवरी 2012 में 'कोव' को 'ड्रोपबॉक्स' नामक कंप्यूटर डेटा शेयरिंग कपंनी ने खरीद लिया। 'रुचि' कंपनी की वाइस प्रेसीडेंट हैं।

रुचि का कहना है कि कई लोग सोचते हैं कि कोई भी लड़की 'बिल गेट्स' और 'स्टीव जॉब्स' जैसी नहीं बन सकती, लेकिन वे गलत हैं। मेरा कहना है कि लड़कियों को इस फील्ड में आना चाहिए। रुचि ने जब कंपनी ज्वाइन की थी, तब फेसबुक का कोई ब्रांड नहीं था, लेकिन इसी ने 2012 में एक अरब यूजर का आंकड़ा छू लिया।



मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी

 
कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली की स्टार मानी जाने वाली 'रुचि' की सक्सेस को जब दूसरी लड़कियों ने देखा तो और लड़कियों के लिए रास्ते खुले। बकौल रूचि, अब कई सॉफ्टवेयर कंपनियों में महिलाओं को पुरुषों जैसी सुविधाएं मिलने लगी हैं। बच्चों की देखभाल के लिए छुट्टियां, काम की लचीली शिफ्ट और दफ्तर में बच्चों की देखभाल की सुविधाएं बहुत फायदेमंद हैं।

दैनिक भास्कर से साभार :







Thursday, October 25, 2012

कार्टूनलीला का विमोचन करेंगे मशहूर कार्टूनिष्ट इरफ़ान





   ख्यातिप्राप्त कार्टूनिष्ट राजेश दुबे

“डूबेजी” कृत कार्टूनलीला
( त्रैमासिक-पत्रिका ) के प्रवेशांक का लोकार्पण28 अक्टूबर 2012 को रानीदुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में कार्टूनलीला परिवार एवम
सव्यसाची कला ग्रुप जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित है.कार्यक्रम के मुख्य
 अतिथि इरफ़ान (जनसत्ता)  विशिष्ठ अतिथि श्री राजीव मित्तल (लखनऊ) होगें. साहित्यकार
श्री ग्यानरंजन,श्री अमृत लाल वेगड़, श्री दिनेश अवस्थी, चित्रकार श्री सुरेश श्रीवास्तव
कार्टून विधा पर वक्तव्य देंगे. कार्टूनिष्ट राजेश दुबे “डूबेजी” का मानना है कि विज़ुअलिटी
एवम समय की कमी से जूझते पाठकों को रेखाचित्र,कैरीकेचर,कार्टून, व्यंग्यचित्र के ज़रिये
गुदगुदाते हैं. तक़नीकी एवम कला के संयुक्तिकरण का प्रयोग इश्तहारों एवम फ़िल्मों तक
में किया जा रहा है. कार्टून दिलो दिमाग़ पर गहरा असर छोड़ते हैं. कार्टून विधा को आर
के लक्ष्मण, सुधीर दर , अबू अब्राहम, काक, सुधीर तैलंग, अजीत नैनन, इरफ़ान, इस्माइल
लहरी, देवेंद्र, अविषेक जयपुर,काजल कुमार   पवन पटना, हरिओम भोपाल, हाड़ा जयपुर  त्रियंबक शर्मा रायपुर,ने जीवंतता प्रदान की है.
 इस क्रम में कार्टूनिष्ट राजेश दुबे “डूबेजी” भी एक खास मुक़ाम पर हैं. इंटरनेट के पाठकमें राजेश  “डूबेजी” के नाम से लोकप्रिय है. उनके ब्लाग का पता http://doobeyji.blogspot.in
है.
 श्री राजेश दुबे द्वारा बनाए कार्टूनों की प्रदर्शनी दिनांक 28 से 29 अक्टूबर 2012 तक आम जनता
के लिये नि:शुल्क खुली रहेगी. सव्यसाची कला ग्रुप के अध्यक्ष सतीष बिल्लोरे,के.के.बैनर्जी,
नितिन अग्रवाल, एवम कार्टूनलीला परिवार के सदस्यों ने उपस्थिति की अपील की है



      


Saturday, October 20, 2012

टीवी में ब्‍लैकमेलिंग का खेल, बीईए ने सुधीर को सजा दी


♦ रामबहादुर राय
जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी को उनके मालिकानों ने भले ब्‍लैकमेलिंग के एक बड़े आरोप से जरूर बरी कर दिया, लेकिन टीवी संपादकों के संगठन बीईए (ब्रॉडकास्‍ट एडीटर्स एसोसिएशन) ने उन्‍हें उनकी प्राथमिक सदस्‍यता से मुक्‍त कर दिया। यानी बीईए के मुताबिक सुधीर चौधरी दोषी हैं। इस मामले में प्रथम प्रवक्‍ता में छपा राम बहादुर राय की यह टिप्‍पणी गौरतलब है। साथ ही, हम बीईए की प्रेस रीलीज और सुधीर चौधरी की सफाई, दोनों ही प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

Sudhir Chaudhary removed from primary membership of the BEA
New Delhi, 18.10.2012
The Executive Committee of the Broadcast Editors’ Association (BEA) met to discuss and consider the report of the three-member Fact Finding Committee, comprising Mr N. K. Singh, Mr Dibang and Mr. Rahul Kanwal, in the matter of the issues of professional ethics emanating out of the allegations leveled by Jindal Steel and Power Limited against Mr Sudhir Chaudhary, Treasurer, BEA and Editor, Zee News, on October 18, 2012.
As the BEA is a body of editors of electronic news channels which seeks to ensure high standards in journalism, such an exercise had become imperative in the light of allegations made against one of its members.
After having satisfied itself that all possible and credible sources of information had been heard and investigated and all available material on the issue perused, the three-member fact-finding committee arrived at the following unanimously held conclusion “that Mr. Sudhir Chadhary is found to have acted in a manner that is unbecoming of an editor and in a fashion that is prejudicial to the interest and objects of the BEA”.
On the basis of the rules provided in the constitution of the BEA it was decided to arrive at a conclusion by putting the issue to a secret ballot. Subsequent to the vote by members of the Executive Committee, the BEA resolved to remove Mr Sudhir Chaudhary as member of the BEA. Mr Supriya Prasad, Managing Editor, Aajtak was the returning officer for the vote.
The committee also decided to appoint a new treasurer at its next meeting.
Shazi Zaman, President
NK Singh, General Secretary

www.beaindia.org
Sudhir Chaudhary’s Response to BEA
October 18, 2012 (6.45pm)
Mr. Shazi Zaman
President
Broadcast Editor’s Association (BEA)
New Delhi.
Sub: Your letter (via email) today informing me of my removal from the membership of the BEA is a premeditated and prejudicial pronouncement by Ethics Committee in violation of natural justice causing prejudice to me.
Dear Shazi,
Respectfully, I write this letter to you in anguish and pain at the disregard the BEA and the Ethics Committee (Committee) has shown for justice and fairness to fellow Editors in adjudicating on a canard sought to be spread by Naveen Jindal, MP.
The BEA/Committee has chosen, perhaps advertently, to ignore my repeated submissions in black and white and denied me representation and an opportunity to safeguard my Constitutional Rights in a criminal complaint pending against me and Samir Ahluwalia. Instead, BEA/Committee has relied on the false, malicious, and distractive propaganda unleashed by Naveen Jindal against me and Samir Ahluwalia and caused deep prejudice to both of us.
Given the unprecedented and over-reaching mandate trusted in your hands as a self-regulatory body for individual broadcast editors in their personal capacity, this is to place on the record that the BEA/Committee has fallen prey to the distractive machinations of the prime accused in the “Coalgate scam,” now recognized as the biggest abuse of natural resources in the history of the country.
Sadly, the pronouncement is a result of infancy of systems at BEA/Committee and the association’s inability to manage a handful of eager-beaver agendas, including, but not limited to, those of Editors on the Committee who I have removed from appearing on my channel.
The one-sided pronouncement is bad in law and unfair in the eyes of natural justice.It has not only sought to compromise my professional position, but also undermine my legal defence despite the clear forewarning and Constitutional position on the subject shared with you vide letter on October 17. 2012.
The BEA has come into being as a self-appointed self regulatory body with an avowed objective of not succumbing to external powers. The BEA/Committee mandate therefore should have been to examine the journalistic process in the ever-changing milieu of the way the government conducts its business and the way business sometimes works hand-in-glove with the government. The BEA/Committee therefore had to rise above amateurish notions that can be created upon the first-glance of concocted evidence especially when this involves exposing the high and mighty as was the case in the Naveen Jindal episode. This didn’t happen and the evidence wasn’t shared with me and Samir Ahluwalia.
It is in pursuit of larger good that means justify the end. At a time when the mainline media, including channels of Editors on the Committee, had fallen silent on India’s biggest ever scam, attempts by media houses like Zee to bring out the final truth is being muzzled and I am sad to say BEA has chosen to side with the mighty and powerful.
As regards your failure to stick to the process of fairness and due diligence in your suo motu probe, I wish to place again before you my repeated submissions for a fair hearing which the Committee repeatedly denied me and Samir Ahluwalia:
1. Denial of nomination even as BEA Ethics Committee allowed Naveen Jindal the facility: Please refer my letter dated October 16 to you seeking the nomination facility as per the norm of parity. This opportunity was denied to me.
2. Denial for one-on-one hearing and cross-examination with Naveen Jindal: This was sought in a communication addressed to you on 16th October but again the opportunity was denied while I was called for personal hearing again on October 17.
3. Deliberate attempt to tarnish my image by leaking details of Ethics Committee proceedingsinitiating a trial by media: I brought this out in details in my letter on October 16th since a section of the press carried detailed stories on Jindal’s hearing at your end quoting “sources” in the probe committee.
4. Deliberate attempt to prejudice my legal defense: The BEA did not take cognizance of my plea dated October 17 which requested that the proceedings undertaken by you would deserve to be kept in abeyance till such time the investigation in the false allegations made by Naveen Jindal are investigated by the police and we are not prejudiced in any manner by being compelled to share and disclose all such true details and relevant facts in an exercise which is in public domain and as such, any disclosure would not be permissible in law.
5. Denial of my right to see the evidence presented by Naveen Jindal via his nominees.
6. Pressure tactics of summoning me for hearings at a short notice even on the precise dates and timings I was to depose before police authorities as also not being given due notice to participate and talk to the Governing Body including the one conducted today (October 18): Please refer to my communication addressed to you today morning expressing my inability to heed to your request to attend the emergency meeting convened this morning given that there has been insufficient notice given to me.
7. An unseemly hurry to wind up the proceedings well before 15 days enshrined as the suggested time frame at the initial stages.
In view of the above, I fear that the move to pick up the Naveen Jindal case suo motu may have been inspired by the ulterior motive to tarnish me and my colleague Samir Ahluwalia. I chose all along to cooperate in the interest of bringing out the truth and my own commitment to self-regulation, given the fact that I had played my own part in the creation of BEA. Your letter today removing me from the membership has unfortunately confirmed my worst apprehensions. I would like the BEA/Committee to correct the wrong done to me on the above counts. As expressed in my letter of October 18, 2012, Samir Ahluwalia and I request a personal hearing before a Review Committee and the Governing Body and to be allowed appropriate hearing.
Yours sincerely
Sudhir Chaudhary
जीन्यूज चैनल पर नवीन जिंदल की कंपनी ने 100 करोड़ रुपए मांगने का अरोप लगाया है। कंपनी ने इस बाबत एफआईआर भी दर्ज कराया है। आठ दिन बाद बीइए ने एक आपात बैठक बुलाकर मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है, जो दो हफ्तों में रिपोर्ट देगी।
जी न्यूज चैनल और जिंदल की कंपनी में छिड़े विवाद को दो तरह से देखा जा सकता है। एक, यह न्यूज चैनल की बाबत पहला ‘पेड न्यूज’ का उदाहरण माना जा सकता है। दो, अगर सीधे पेड न्यूज न कहें तो यह ब्लैक-मेलिंग का मामला कहा जा सकता है। यह देखने वाले पर निर्भर करता है। नवीन जिंदल की कंपनी ने आरोप लगाया है कि उसके अफसरों से जी न्यूज के प्रतिनिधियों ने 100 करोड़ रुपए मांगे। उस कंपनी ने हवा में आरोप नहीं लगाया। बकायदे दिल्ली की काइम ब्रांच में एक एफआईआर भी दर्ज कराई है। इस मामले ने ब्रॉडकास्टिंग एडिटर्स एसोसिएशन (बीइए) की अंतश्चेतना को झकझोर दिया है। उसने एक आपात बैठक बुलाई। अब यह मामला एक तीन सदस्यीय कमेटी की जांच के अधीन है। और मीडिया में चिंता और चिंतन का विषय बन गई है। चिंता छवि की है और चिंतन इस पर हो रहा है कि मीडिया की साख का क्या होगा? तीन साल पहले अखबारों पर लोकसभा के उम्मीदवारों ने खबरें बेचने के आरोप लगाए। प्रेस परिषद ने जांच की। संसद में सवाल उठा। सरकार ने बहाना बनाया कि उसे जांच रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन सच यह नहीं था। सच यह है कि सरकार मीडिया घरानों को खुली छूट देने के नाम पर कुछ भी कदम नहीं उठा रही है। सवाल बना हुआ है कि मीडिया की नैतिक शक्ति अगर नहीं बचेगी और वह मुनाफे की भेंट चढ़ जाएगी तो लोकतंत्र के एक मजबूत खंभे को ढहने से कौन बचा लेगा?
बीइए के जनरल सेक्रेटरी एनके सिंह का कहना है कि एसोसिएशन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। इसका मानना है कि ‘‘मीडिया किसी के भी खिलाफ कुछ दिखाता है और उसके न दिखाने के एवज में विज्ञापन या कुछ और चाहता है तो इस मामले में संपादक की भूमिका संदेह के घेरे में आती है। यह एसोसिएशन टेलीविजन चैनलों के संपादकों की है। यह इसलिए है कि टेलीविजन में पत्रकारिता के लिए स्थापित मूल्यों की अनदेखी न हो। अगर किसी चैनल में पत्रकारिता के मूल्यों की अनदेखी होती है तो इसके लिए वह सख्त से सख्त कदम उठाएगी।’’
दूसरी तरफ जी न्यूज ने अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया है। लेकिन एफआईआर में जिन सबूतों का जिक्र है उससे जी ग्रुप सवालों के घेरे में है। चुनाव के दौरान अखबारों पर तो पेड न्यूज के आरोप लगे थे, लेकिन किसी न्यूज चैनल पर खबर न दिखाने के नाम उगाही का यह पहला मामला है जो मीडिया के लिए बेहद ही चिंताजनक है। यह चिंता उस समय बढ़ जाती है जब मीडिया के हाल के ही उन गौरव क्षणों को हम याद करते हैं। सबसे करीब का क्षण 1987-89 का है। जब ऊंचे पदों पर बैठे लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उसका संबंध बोफोर्स तोप सौदे की दलाली से था। वह भारतीय राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। इसका श्रेय अखबारों को जाता है। खासकर इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता अखबार को। इन अखबारों ने पहले खबर छापी और फिर उसका लगातार पीछा किया। जिससे एक वातावरण बना। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत तैयार हुआ। परिणाम स्वरूप राजीव गांधी को लोकसभा चुनावों में पराजय का मुख देखना पड़ा। वह मीडिया की नैतिक सत्ता की विजय थी। अब फिर दो दशक बाद यह भ्रष्टाचार टूजी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटाले के रूप में लौटा है। अब जब भ्रष्टाचार एक बार फिर राजनीति का मुद्दा बना है तो उसे मीडिया भी बखूबी उठा रहा है।
इस समय एक और महत्वपूर्ण बात यह हुई है कि मीडिया की भूमिका प्रमुख हो गई। राजनेताओं को यह लगता है कि मीडिया के बिना उनका काम नहीं चल सकता। यह अलग बात है कि इन दिनों पारंपरिक राजनीतिक दल से अलग हटकर अन्ना और अरविंद आ गए हैं। यानी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक नया चेहरा आया है। इस तरह भाजपा और वामपंथी पार्टियों के रूप में पारंपरिक राजनीतिक दल भी हाशिए पर आ गए हैं। इस दौर में मीडिया की जरूरत कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
लेकिन इस समय मीडिया भी सवालों के घेरे में है। लोग किस पर विश्वास करें और अपना मत सुनिश्चित करें, क्योंकि एक भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। जिस मीडिया को अपनी सशक्त व धारदार भूमिका निभानी चाहिए वह आर्थिक सुधार की दौर में पेड़ से गिरे पत्ते की तरह हवा में उड़ रही है। उसकी न कोई दिशा है और न कोई मंजिल। उसे मुनाफा संचालित कर रहा है। जिसका उपकरण बना है- पेड न्यूज। इस दौर की देन है, राडिया टेप। जिसमें बड़े-बड़े मीडिया के चेहरे बेनकाब हुए। इसी दौर में यह खबर आती है कि भ्रष्टाचार को उजागर करने में जो न्यूज चैनल (जी न्यूज) सबसे आगे दिख रहा था वह अब जांच के अधीन है। क्योंकि खबरें न दिखाने के लिए पैसे मांगने के आरोप से वह घिर गया है।
ध्यान रहे कि पहली बार जी न्यूज ने कांग्रेस के एक मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से टकराने की हिम्मत दिखाई। फिर कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल और विजय दर्डा का नंबर आया। लोग जब जी न्यूज की फर्ज अदायगी के कायल हो रहे थे तभी यह बुरी खबर फैली कि वह तो धंधे का हिस्सा था। लोग हैरान भी हैं और परेशान भी हैं कि आखिर हो क्या रहा है? एक नागरिक सच को कैसे जाने, उसके सामने यही सबसे बड़ा सवाल है। यह भी है कि अगर मीडिया घराने ऐसी करतूतों पर उतरते हैं तो उनके ही संपादकों की जांच का क्या कोई मतलब है? यहीं पर प्रेस आयोग की जरूरत एक बार फिर सरकार के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। वह इसलिए कि मीडिया की साख बचाने के लिए कोई ऐसी नियामक संस्था होनी ही चाहिए जो विश्वसनीय हो। इसकी सलाह आज की परिस्थिति में प्रेस आयोग ही दे सकता है।
सवाल किसी औद्योगिक घराने का कम है और मीडिया का ज्यादा है। जिंदल को तो उसी समय से कोल ब्लॉक मिल रहे हैं जब भाजपा और राजग की सरकार थी। सही मायने कहें तो 1995 से ही शुरू होता है। जिंदल भले कांग्रेस के सांसद हैं लेकिन इनकी पहचान उद्योगपति की रही है। उस समय उनके पिता थे। कमोबेस हर राजनीतिक दल ने उद्योगपतियों या प्रभावी राजनेताओं को लाइसेंस बांटे हैं। लेकिन मीडिया के लिहाज से महत्वपूर्ण यह है कि जो एफआईआर की कॉपी बताती है और जो जी न्यूज पर खबरें दिखाई जा रही थी, उसमें विरोधाभास है। जी न्यूज जिस तरह से खबरें ब्रेक कर रहा था। कोल ब्लॉक्स की एक-एक रिपोर्ट दिखाई जा रही थी। इतना ही नहीं कोल ब्लॉक्स को लेकर भारत की पहली सीटीएल परियोजना की पोल खोलता है। इस परियोजना को 2001 में जमीन यह कहकर दी गई कि यह परियोजना देश के लिए जरूरी है। उस प्रोजेक्ट पर दस बरस बाद भी कोई काम नहीं हुआ।
जाहिर है यह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अच्छी खबरें दिखाने की मुहिम थी जो जी न्यूज कर रहा था। मीडिया का यही काम है। निगरानी रखना। जी न्यूज काम कर रहा है। अचानक एक एफआईआर सामने आती है जिसमें यह दर्ज है कि जी न्यूज के संपादक और जी बिजनेस के संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने जिंदल ग्रुप के अधिकारियों के साथ बैठकें की। यह बैठक इसलिए हुई कि नवीन जिंदल से जी ग्रुप 100 करोड़ की मांग कर रहा था। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊपर के मैनेजमेंट को भी यह पता है। इसलिए एफआईआर में जी ग्रुप के मालिक सुभाष चन्द्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका को भी एक पार्टी बनाया गया है। मीडिया के सामने यहीं से मुश्किल शुरू होती है खबर को आप दिखा रहे हैं यह मीडिया की जरूरत है। खबर एक्सक्लूसिव है यह मीडिया की और ज्यादा जरूरत है। खबर तथ्यों पर आधारित हो यह बहुत ही जरूरी है। यानी हर लिहाज से कोयला घोटाले को लेकर जी न्यूज का काम शानदार था, लेकिन क्या यह खबरें इसलिए की जा रही थी कि जिसके खिलाफ यह खबरें की जा रही उससे आज नहीं तो कल सौदेबाजी करेंगे, पैसा वसूलेंगे। यह पेड न्यूज से आगे जाने वाली परिस्थितियां हैं। इस घटना में अगर मैंनेजमेंट भी शामिल है तो मतलब स्पष्ट है कि मीडिया को पूरी तरह धंधे में तब्दील करने की स्थिति आ गई है। यह बड़ा साफ तौर पर उभरता है।
वसूली और ब्लैकमेल की जो धाराएं एफआईआर में है वह किसी आम आदमी पर लगा होता तो क्या होता? उसे 24 घंटे के अंदर नोटिस जाता। उसे पूछताछ के लिए बुलाया जाता। अगर वह नहीं आता तो उसे एक दूसरा नोटिस भेजा जाता। अगर वह हाजिर नहीं होता तो उसे अरेस्ट करने का फरमान जारी होता। फिर उसे अरेस्ट कर पूछताछ होती और पूछताछ के बाद बयान रिकार्ड कर सबूत को जांच में भेजते। रिपोर्ट आने पर पूरा मामला कोर्ट में चला जाता। इस सारी कार्रवाई को करने में 15-20 दिन लगता। लेकिन इस मामले एक मीडिया ग्रुप के संपादक और मालिक के खिलाफ केस है तो उसे कौन छूएगा? क्योंकि मीडिया की जरूरत सत्ता को भी है और भ्रष्ट होते पुलिस अधिकारियों को भी। यहीं पर सोचने की जरूरत है कि जिस तरह के आरोप संपादक पर लगाए गए उसे आम आदमी की तरह ट्रीट नहीं किया गया। क्योंकि मीडिया ग्रुप को एक आम आदमी की तरह नहीं देखा जा रहा। और न ही इसे आम रिपोर्ट की तरह।
यही वजह है कि मीडिया पर नकेल कसने या मीडिया के आत्म-विश्लेषण की कोई स्थिति सामने नहीं आती है। आरोप लगने के बाद भी सुधीर चौधरी सस्पेंड नहीं होते। आरोप लगने के बाद भी अभीतक उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती है, बल्कि मीडिया पर मीडिया के लोगों द्वारा ही निगरानी रखने वाली संस्थाएं भी कोई दबाव नहीं बना पाती कि आपको अपना पद छोड़ देना चाहिए जिससे जांच सही हो सके। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या मीडिया बेलगाम हो गया है? या मीडिया को इसी रूप में रखा जा रहा है। क्या मीडिया ऐसे रहेगा तो सरकार के लिए सहूलियत का काम करेगा? जब भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीति को हिला रहा है, वही भ्रष्टाचार अगर मीडिया में आ जाए तो सत्ता और सरकार का काम और आसान हो जाएगा। या एक तरह की सहमति की स्थिति लाई जा रही है।
सरकार कह सकती है कि मीडिया की निगरानी के लिए मार्कंडेय काटजू की अध्यक्षता में प्रेस परिषद है। वहीं न्यूज चैनलों ने निगरानी के लिए बीइए बना रखा है। कौन नहीं जानता कि प्रेस परिषद काठ का घोड़ा है यानी सजावटी है। इसी तरह बीइए दिखावटी है। असली सवाल यह है कि क्या ये किसी को कानूनी दंड दे सकते हैं। इनकी सुनता कौन है? कोई नहीं, क्योंकि इनके पास कोई अधिकार नहीं है। अगर होता तो जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी बीइए के कोषाध्यक्ष पद से सबसे पहले हटाए जाते। अबतक सुधीर चौधरी से न इस्तीफा दिया, न ही बीइए ने इनसे इस्तीफा लिया। अबतक भ्रष्टाचार के जितने भी मामले सामने आए उसमें शरद पवार (आईपीएल), कलमाडी (कॉमनवेल्थ गेम), ए. राजा (टू जी) सहित चिदंबरम से भी इस्तीफा मांगा गया। कोयला गेट में श्रीप्रकाश जायसवाल से भी इस्तीफा मांगा। इस इस्तीफा मांगने वालों में तमाम मीडिया हाउसों के संपादक हैं जो बीइए से जुड़े हुए हैं। जी न्यूज, टाइम्स नाउ, न्यूज 24, आईबीएन 7 सहित सबने इस्तीफा मांगा था। इसका मतलब यह है कि जांच पूरी होने से पहले ही आप इस्तीफा मांग रहे थे कि गड़बड़ी हुई है और जांच होगी। सुधीर की तरह राजा भी यही कह रहा था कि पहले आप जांच करा लो, पहले मुझसे इस्तीफा क्यों मांग रहे हो? क्या आज मीडिया भी उसी कटघरे में आकर खड़ा हो गया है। मीडिया के सामने बड़ा सवाल यह है कि मीडिया पहले अपने को पाक-साफ दिखाए, क्योंकि मीडिया की जिम्मेदारी तो ज्यादा बड़ी है। मीडिया घराने का मालिक फंस रहा है तो उसे कोई न कोई निर्णय लेना ही होगा। लेना ही चाहिए क्योंकि सवाल पूरे मीडिया इथिक्स का है। मीडिया इथिक्स में मीडिया का काम सत्ता में हिस्सेदारी नहीं है, बल्कि जनता के साथ खड़े होकर निगरानी रखना है। ऐसा पहली बार हुआ है कि मीडिया इसमें डंवाडोल है। ऐसे में सवाल उठता है क्या यह सिर्फ जी न्यूज की जिम्मेदारी है या उन मीडिया संस्थानों की भी जिम्मेदारी है जिन्हें दबाव बनाना चाहिए लेकिन नहीं बना रहे हैं?
वहीं पहली बार जी में यह प्रयोग हुआ कि संपादक बिजनेस हेड भी होगा। बीइए की बैठक में जो बातें सामने आई हैं वह यह है कि मैं संपादक के साथ बिजनेस हेड भी हूं तो बिजनेस हेड के नाते विज्ञापन मांगने जाऊंगा ही। बैठक में यह सवाल उठा कि इसका मतलब कि जिस खबर को आप दिखा रहे हो उसमें दिखाए गए पार्टी से आप विज्ञापन मांगने भी चले जाएंगे। अब सवाल यह है कि क्या दोनों पद पर एक ही आदमी रह सकता है? दोनों पदों पर जी ग्रुप ने एक ही आदमी को रखा यह एक बड़ा सवाल है। कोई संपादक खबर को लेकर निर्णय करे और वही आदमी खबर को लेकर बिजनेस का निर्णय करे तो खबर हावी होगा या बिजनेस? स्पष्ट है बिजनेस के लिए खबर हावी होगा और उस खबर से बिजनेस होगा। जी न्यूज से यही खेल चल पड़ा है और यह खेल पेड न्यूज से आगे का सिलसिला है।
सुधीर चौधरी से पहले भी एक बार सीबीआई और इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट पूछताछ कर चुकी है। इससे पहले सुधीर लाइव इंडिया में उमा खुराना के मामले में भी चर्चा में आए थे। मीडिया में यह खबर है कि सतीश के. सिंह के जमाने में जी न्यूज ने जो साख कायम की थी उसी साख को भुनाने के लिए सुभाष चंद्रा ने जी न्यूज में सुधीर चौधरी लाए, क्योंकि इनकी यही पहचान रही है। इनकी यह पहचान मीडिया और पत्रकारिता के लिहाज से अच्छी नहीं है। फिर भी जी ग्रुप उन्हें संपादक बनाता है। जाहिर है इससे एक समझ तो पैदा होती है कि जी की नीयत ठीक नहीं है।
ऐसे में मीडिया के सामने सवाल उठता है कि आखिर रास्ता क्या है? मीडिया तो साख के भरोसे ही चलती है। जब साख ही नहीं है तो मीडिया क्या है? इस दौर में क्या यह मान लिया गया है कि मीडिया एक धंधा है। इससे पहले मीडिया साख और पत्रकार से जुड़ा होता था, क्या अब यह बिजनेस से जुड़ गया है। दूसरी बात यह है कि इस दौर में बड़े मीडिया घरानों और सरकार में एक अलिखित सहमति भी है। इसलिए सरकार जो भी नीति लाती है उसे पहले मीडिया सहमति प्रदान करती है। वह सहमति इसलिए प्रदान करती है कि इससे उसे भी लाभ मिले। पहले विदेशी पैसा आया, उसके बाद आर्थिक सुधार और अब एफडीआई का मसला आया। आम आदमी पर जो भी बोझ पर रहा है उस पर मीडिया के एक वर्ग की सहमति है।
प्रेस घरानों की सूचनाएं नहीं आ पाती हैं। किसी भी मीडिया घराने में पारदर्शिता का अभाव है। अबतक सिर्फ मंत्रियों की संपत्ति का ब्योरा ही आ पाया है। अगर कोई मीडिया घराना भाजपा या कांग्रेस के सांसद का है तो यह लिखकर आना चाहिए। अगर किसी मीडिया घराने में किसी कॉरपोरेट हाउस का पैसा लगा है तो उसे भी बताया जाना चाहिए। कहने का मतलब है कि मीडिया घराने इसे बिजनेस और सत्ता से जुड़ने का जरिया बना लिया है। यही वजह है कि 20 वर्ष पुराना जी ग्रुप जिसके नौ चैनल हैं। अगर वह कोई निर्णय नहीं लेगा तो बाकी संस्थान भी चुप रहेंगे। अगर सूचना मंत्रालय चाहे तो कल ही जी ग्रुप को नोटिस भेज सकता है कि आप खबरों के नाम पर उगाही कर रहे हैं। अगर यह उगाही इस तरह खुले तौर पर होने लगेगी तो रास्ता कहां बचेगा?
साफ है कि एक विशेष परिस्थिति पैदा हो गई है। आम जन के अलावा उन पत्रकारों के सामने भी बड़ा धर्म संकट है जो पत्रकारिता में आदर्श बोध से प्रेरित होकर आए हैं। वह तभी बच सकेगा जब पारदर्शिता और साख की रक्षा का एक वैधानिक उपाय किया जाए। इसी का दूसरा पहलू एक विकट प्रश्न खड़ा करता है कि सरकार और मीडिया घराने अपने निहित स्वार्थ पर एक आम सहमति बना लेते हैं जब उन्हें इसकी जरूरत पड़ती है। लेकिन सरकार और मीडिया घराने ही देश नहीं हैं। और उन्हें ही लोकतंत्र नहीं माना जा सकता। उनकी स्थिति लोकतंत्र में जरूरी उपकरण के तौर पर है। जिसमें समय-समय पर सुधार होते रहना चाहिए। नहीं तो जनता भी आवाज उठाएगी कि सरकार की तरह मीडिया भी भ्रष्ट है। ऐसे समय में सरकार और मीडिया से ही यह पहल होनी चाहिए कि प्रेस आयोग वक्त का तकाजा है जिसे अब टाला नहीं जा सकता। प्रेस आयोग यानी नीति नियामक सलाह का मंच।
(रामबहादुर राय। पत्रकार। छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिंदी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरुष समझे जाते हैं। कई शीर्ष राजनेताओं के निकट रहे। वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के सलाहकार संपादक।)


लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...