Sunday, November 13, 2011

कला बाज़ार: समाज के स्थापित मूल्यों से बार-बार टकराता उपन्यास

कला बाज़ार: समाज के स्थापित मूल्यों से बार-बार टकराता उपन्यास: पुस्तक समीक्षा - बद्री नाथ वर्मा ' कला बाजार ' जैसा कि नाम से ही आभास होता है कि कला आज पूरी तरह से बाजार की जकड़ में आ गयी है। वह पूरी ...

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1 comment:

  1. आपके पोस्ट पर आना बहुत बढ़िया लगा ! मेर नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । बेहतरीन प्रस्तुति । धन्यवाद ।

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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