Saturday, November 26, 2011

कब se

कुछ गीत है मेरे कल के...
कुछ मीत है मेरे पल के
वे खुसी रहे हरदम
मै दुआ हूँ करता रब से...
गीत मुझे आनंदित करते
मीत मेरा दुःख हारते है...
साथ साथ दोनों रहते है
मेरा कहना करते है...
उनसे मिलता हूँ
मौक़ा मिलते ही तब से...

Friday, November 25, 2011

अभिज्ञात: सुपर ब्लास्ट

अभिज्ञात: सुपर ब्लास्ट: कहानी साभारःकथादेश, नवम्बर 2011 दुनिया भर में दिमागी तनाव से मरने वालों की संख्या में लगातार इज़ाफा हो रहा था। युवाओं और छात्रों में दिमागी...

मेरी कविताओं का संग्रह: माँ कुछ दिन तू और न जाती,

मेरी कविताओं का संग्रह: माँ कुछ दिन तू और न जाती,: माँ! कुछ दिन माँ! कुछ दिन तू और न जाती, मैं ही नहीं बहू भी कहती, कहते सारे पोते नाती, माँ! कुछ दिन तू और न जाती। रोज़ सबेरे मुझे जगाना,...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

क्यों नेता थप्पड़ खा रहे है...


क्यों नेता थप्पड़ खा रहे है...?
क्यों नेता फट कारे जा रहे है?
क्यों गली गली दौडाए जाते
क्यों मंडप से भगाए जाते
क्यों नेता मान घटा रहे..है:?
क्यों नेता थप्पड़ खा रहे है...?
...................................................
नेताओं की कुछ गलती है...
जो भ्रष्टाचार मिलतीहै
मह्गायी का खूंटा टूट चुका है
लोगो का गुस्सा फूट चुका है
बेईमानी से लोगो का मन ऊब चुकाहै
अब नेता थप्पड़ खा रहे है
बीच सभा चिल्ला रहे है...

अभिज्ञात: अभिज्ञात ने कई विलक्षण कविताएं लिखी हैं-केदारनाथ स...

अभिज्ञात: अभिज्ञात ने कई विलक्षण कविताएं लिखी हैं-केदारनाथ स...: हिन्दी-बंगला के दो शीर्ष कवियों ने किया ‘ खुशी ठहरती है कितनी देर ’ का लोकार्पण कोलकाताः अभिज्ञात कविता में गद्य और गद्य में कविता का...

Sunday, November 20, 2011

मनुष्य बीते हुए दिनों को इस लिए याद आती है .क्यों की उसे भविष्य का पता नहीं होता
अगर भविष्य का पता लगे तो आगे क्या करे ये तो खुशिया के समय ही पता चलता है

Saturday, November 19, 2011

प्रतिष्ठित समाचार पत्रों की वेबसाइट्स पर महिलाओं की अशालीन तस्वीरों -वीडियों व् ख़बरों का प्रदर्शन




 [अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों की वेबसाइट्स पर जिस प्रकार महिलाओं के अशालीन तस्वीरों ,विडियोस व् ख़बरों का प्रदर्शन किया जा रहा वह अत्यंत निंदनीय है .मैंने नीचे दिए इ मेल पर अपनी  शिकायत भेजी है .देखते हैं क्या होता है ? पूनम पाण्डेय जैसी विक्षिप्त मॉडल के विडियोस और तस्वीरों को अपनी वेबसाईट पर स्थान देना इन प्रतिष्ठित समाचार पत्रों को शोभा नहीं देता पर ये बिना किसी मर्यादित सोच के ऐसे विडियोस व् तस्वीरों को प्रदर्शित कर रहे हैं .आप भी अपने स्तर से आवाज उठाएं और जो भी सकारात्मक पहल इस सम्बन्ध में की जा सकती है उससे सभी को अवगत  कराएँ  .]


.[विषय-प्रतिष्ठित समाचार पत्रों की वेबसाइट्स पर महिलाओं की अशालीन तस्वीरों -वीडियों व् ख़बरों का  प्रदर्शन   ]    

सेवा में 


The Secretary,
Press Council of India,
Soochna Bhavan, 8-C.G.O. Complex,
Lodhi Road, New Delhi-110003

     
                                                                

                महोदय 
                                        सविनय निवेदन है कि अनेक प्रतिष्ठित समाचार  पत्रों की वेबसाइट्स पर जिस प्रकार  महिलाओं की अशालीन तस्वीरों -वीडियों व् ख़बरों का  प्रदर्शन किया जा रहा है उस पर तुरंत रोक लगाने  की कृपा करें  . इन पर प्रदर्शित अशालीन सामग्री तो पोर्न वेबसाइट्स को भी मात कर रही है . मीडिया समाज को सही दिशा में अग्रसर करने  में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है .यदि वह ही मर्यादाओं का उल्लंघन स्वार्थ  के वशीभूत होकर करेगा तो उसपर भी नियंत्रण की कार्यवाही होनी ही चाहिए .''भारतीय नारी '' ब्लॉग की और से यह मेरी प्रार्थना है की आप शीघ्र अति शीघ्र इस विषय में संज्ञान लेकर कार्यवाही करें 
                                                                                               भवदीय 
                                                                          शिखा कौशिक 
                                                    [व्यवस्थापक -भारतीय नारी ब्लॉग ]

[इस ई मेल पर भेजी है शिकायत -,pcibppcomplaint@gmail.com,   ]

अभिज्ञात: खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण 22 नवम्बर 2011...

अभिज्ञात: खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण 22 नवम्बर 2011...: कोलकाताः अभिज्ञात के काव्य संग्रह खुशी ठहरती है कितनी देर का लोकार्पण 22 नवम्बर 2011 को सायं 5 बजे होगा। महात्मा गांधी अंतर्राष्टीय हिन्दी व...

Sunday, November 13, 2011

कला बाज़ार: समाज के स्थापित मूल्यों से बार-बार टकराता उपन्यास

कला बाज़ार: समाज के स्थापित मूल्यों से बार-बार टकराता उपन्यास: पुस्तक समीक्षा - बद्री नाथ वर्मा ' कला बाजार ' जैसा कि नाम से ही आभास होता है कि कला आज पूरी तरह से बाजार की जकड़ में आ गयी है। वह पूरी ...

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Saturday, November 12, 2011

श्रीमद्भगवत गीता का भी श्लोकशः पद्यानुवाद

श्रीमद्भगवत गीता विश्व का अप्रतिम ग्रंथ है !
धार्मिक भावना के साथ साथ दिशा दर्शन हेतु सदैव पठनीय है !
जीवन दर्शन का मैनेजमेंट सिखाती है ! पर संस्कृत में है !
हममें से कितने ही हैं जो गीता पढ़ना समझना तो चाहते हैं पर संस्कृत नहीं जानते !
मेरे ८४ वर्षीय पूज्य पिता प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध जी संस्कृत व हिन्दी के विद्वान तो हैं ही , बहुत ही अच्छे कवि भी हैं , उन्होने महाकवि कालिदास कृत मेघदूत तथा रघुवंश के श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद किये , वे अनुवाद बहुत सराहे गये हैं . हाल ही उन्होने श्रीमद्भगवत गीता का भी श्लोकशः पद्यानुवाद पूर्ण किया . जिसे वे भगवान की कृपा ही मानते हैं .
उनका यह महान कार्य http://vikasprakashan.blogspot.com/ पर सुलभ है . रसास्वादन करें . व अपने अभिमत से सूचित करें . कृति को पुस्तकाकार प्रकाशित करवाना चाहता हूं जिससे इस पद्यानुवाद का हिन्दी जानने वाले किन्तु संस्कृत न समझने वाले पाठक अधिकतम सदुपयोग कर सकें . नई पीढ़ी तक गीता उसी काव्यगत व भावगत आनन्द के साथ पहुंच सके .
प्रसन्नता होगी यदि इस लिंक का विस्तार आपके वेब पन्ने पर भी करेंगे . यदि कोई प्रकाशक जो कृति को छापना चाहें , इसे देखें तो संपर्क करें ..०९४२५८०६२५२, विवेक रंजन श्रीवास्तव

Friday, November 11, 2011

सैनिक देश के..

मै डटा रहा था मोहड़े पर॥
लेकर पूरी लश्कर को॥
आंच न आने देता था॥
अपने प्यारे चमन को॥
कोई चिंगारी भेद न पाती॥
न घबराते सैनिक साथी॥
आत्म बल से भरे हुए थे॥
कभी हटाते नहीं थे छाती॥
मिटना सीखा देश के खातिर॥
आन मान का ख्याल किया था॥
अपने प्यारे देश के खातिर॥
हमने भी तो बलि दिया था॥

भंवरी देवी के भंवर ने आखिर राजस्थान की राजनीति और पत्रकारों को नंगा कर ही दिया


भंवरी देवी के भंवर ने आखिर राजस्थान की राजनीति और पत्रकारों को नंगा कर ही दिया ..इतना ही नहीं इस भंवर ने जाट सभा का एक नया चेहरा चोरी और सीना जोरी वाला उजागर कर दिया है ............. कहने को तो बात आम है एक नर्स के साथ एक नेता जी के अवेध रिश्ते कायम होते है नेता जी मंत्री बनते है और फिर नेता जी इस प्रेमिका को सेक्स बम बनाकर सभी को परोसना चाहते है .....खुबसूरत सी दिखने वाली एक तुच्छ महिला जब उब जाती है तो फिर वोह इन मंत्री जी की सीडी बनाती है और इस मामले में मंत्री जी को ब्लेकमेल करने के लियें सीडी मुख्यमंत्री जी को देकर आती है राजस्थान के मुख्यमंत्री जी सी डी का सच देखते है मंत्री को मामला सेटलमेंट करने की हिदायत देते है यानी उनकी निगाह में अय्याश मंत्री को हटाने का मन नहीं था और वोह किसी महिला अस्मत का कोई मोल नहीं समझते थे ..बस मामला भड़क गया भंवरी देवी और उसके साथियों ने सी डी का सच अख़बारों और मिडिया चेनलों में पहुंचाया अख़बार तो अखबार है और चेनलों का सच सभी जान गये है इस सीडी को प्रकाशित कर अय्याश मंत्री को सजा दिलवाने की जगह उन्हें बचाया जाता रहा और एक नंगा सच अपने दफ्तर में इन मिडिया वालों ने छुपा कर रखा आप अंदाजा लगा सकते है ऐसी ना जाने कितने लोगों की अय्याशियाँ और बेईमानियाँ इन मिडिया कर्मियों ने अपने दफ्तरों में छुपा कर रखे होंगे .अब जब भंवरी गायब हुई तब भी अख़बार वाले और मिडिया कर्मी सच जानकर चुप रहे सरकार जो न्याय दिलवाती है वोह इस सच को जानकार भी नोटंकी करती रही अदालतों ने सरकार को लताड़ा लेकिन सरकार ने सी बी आई को जान्च देकर अपना पल्लू झाड लिया ..अब एक मिडिया कर्मी जिसे सीडी मिली जब उसने भन्दा फोड़ किया तो सरकार और विपक्ष जो इस मुद्दे पर खामोश थे बोलने लगे भाजपा की वसुंधरा और दुसरे नेता जिनके पास यह सीडी थी वोह भी इसे छुपाये बेठे थे बस सीडी को मिडिया चेनल ने चलाया और पता चला के सोदेबाज़ नेताओं और मिडिया दलालों के पेरों तले ज़मीं खिसक गयी सी बी आई को मजबूरी में सी डी के लियें इंकार के बाद स्वीकारोक्ति देना पढ़ी .इधर जाट समाज से ऐसे अय्याश नेता को निकलने के स्थान पर सभी जाट समुदाय के लोग इक्खत्ते होते है और मंत्री महिपाल मदेरणा को दूध का साबित करते है कोंग्रेस और भाजपा के नेता एक ही मंच पर जाकर चोरी और सीना जोरी की तर्ज़ पर सेक्सी मंत्री को बचाने की बात करते है इस कहानी ने देश के सामने राजस्थान और राजस्थान की राजनीति पक्ष विपक्ष और पत्रकारिता का सर शर्म से झुका दिया है वहीं यह साबित कर दिया है के जाती समाज की पंचायते गरीबों के साथ नहीं न्याय के साथ नहीं अमीर और प्रभावशाली लोगों की बंधक गुलाम है .....अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

Saturday, November 5, 2011

चिंता का बिषय ....

उत्तर प्रदेश में ख़ास कर प्राइमरी की हालत॥
प्रताप गढ़,सुल्तानपुर,रायबरेली.जौनपुर.कौसम्बी,सोनभद्र,फैजाबाद,इलाहबाद, और भी पिछड़े और दिहाती इलाको में शिक्षा की स्थिति बड़ी ही दयनीय है॥ यहाँ पर पढ़ाने वाले अध्यापिकाए सब अपनी बातो में समय गवाते है । अपना दुःख दर्द सुनाते है बच्चे घुमाते रहते है। और मास्टर साहब गप्पे मारते है ॥ क्या होगा हमारे बच्चो का भविष्य कैसे पढेगे बच्चे॥ क्या होगा॥ हमारे॥ देश के बच्चो का क्या सरकार॥ कुछ कर नहीं सकती इन गप्पे बाजो पर कब लगाम लगेगा। कई मास्टर तो स्कूल ही नहीं जाते अपने काम से रहते है अपनी जगह दूसरो को पढ़ाने भेजते है उन्हें केवल १५००। से ३००० के बीच में तानुख्वाह देते है ॥

Friday, November 4, 2011

बिखराव के रास्ते पर अन्ना टीम

सलीम अख्तर सिद्दीकी
कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अगस्त में अन्ना आंदोलन से जो उबाल जनता में आया था, नवंबर आते-आते वह इस तरह बैठ जाएगा, जैसे दूध में आया उबाल बैठ जाता है। अन्ना आंदोलन जितनी तेजी के साथ ऊंचाइयों पर गया था, उतनी तेजी के साथ नीचे आता जा रहा है। अन्ना टीम के बिखराव का दौर शुरू हो गया है। बिखराव का ही नतीजा है कि आंदोलन की धार कुंद पड़ने लगी है। यह इस बात से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश का दौरा कर रही अन्ना टीम के कार्यक्रमों में भीड़ नहीं जुट रही है। जब कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर शुरूआत की जाती है, तो ऐसा ही होता है। कई विचारधाराओं के लोग मिले और जल्दबाजी में एक ऐसी मुहिम छेड़ दी, जिसके लिए जबरदस्त ‘होमवर्क’ की जरूरत थी।

भ्रष्टाचार से उकताई जनता को अन्ना हजारे का चेहरा मिला और रामलीला मैदान में चले आमरण अनशन के दौरान मिले व्यापक जनसमर्थन से अन्ना टीम एक तरह से घमंड का शिकार होकर संसद से ऊपर होने का भ्रम पाल बैठी। यही भ्रम उसके बिखराव का कारण बना और उसके अंत की शुरूआत हो गई।

टीम के विचित्र बयानों ने बिखराव को तेज किया। टीम में तब वैचारिक मतभेद भी उभरकर आए, जब प्रशांत भूषण के कश्मीर संबंधी बयान से टीम ने अपने आपको अलग कर लिया। इससे पता चला कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भले ही टीम अन्ना एकजुट नजर आती हो, लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर एक नहीं है। प्रशांत भूषण के बयान से अपने आप को अलग करने का एक नुकसान सबसे ज्यादा यह हुआ कि उस पर आरएसएस का समर्थन लेने के आरोप की एक तरह से पुष्टि हो गई। क्योंकि कश्मीर मुद्दे पर संघ परिवार की राय वही है, जो अन्ना टीम की तरफ से आई है।

सवाल यह है कि टीम का ‘गठन’ करते समय ‘विचारधारा की समानता’ का ख्याल क्यों नहीं रखा गया? प्रशांत भूषण के बयान से अलग करने की एक वजह दक्षिणपंथी ताकतों का समर्थन खोने का डर भी अन्ना टीम को रहा होगा।

सबसे ज्यादा ‘घातक’ हिसार उपचुनाव में कांग्रेस को हराने की अपील रही। इससे टीम के उन नारों की धज्जियां उड़ गईं, जिनमें कहा जाता था कि ‘न हाथ, न हाथी, हम हैं अन्ना के साथी’ और ‘न साइकिल, न कमल, हम करेंगे अन्ना पर अमल’।

ऐसे नारों को जल्द ही भुलाकर इस मिथक को तोड़ दिया गया कि अन्ना आंदोलन गैरराजनीतिक है। हिसार में अन्ना टीम की अपील से यह भी पता नहीं चला कि कांग्रेस नहीं, तो फिर कौन? अधिकतर लोगों ने इसका मतलब यही निकाला कि ‘हाथ नहीं, कमल’ के साथ जाना है। लोग यह भी जानते हैं कि कमल पर भी तो ‘कीचड़’ लगी है। बात कमल की भी नहीं है, कौनसा ऐसा ‘निशान’ है, जो पाक-साफ है? आंदोलन के राजनीतिक होने से सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि जो लोग भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना के साथ आए थे, वे अलग होते जा रहे हैं।

मतभेदों, बयानबाजियों और आर्थिक विवादों में घिरने से अन्ना टीम की साख पर सवालिया निशान लगे हैं। टीम अन्ना के दो सदस्यों राजेंद्र सिंह और पीवी राजगोपाल ने अन्ना की कोर कमेटी से अलग होकर यह बता दिया कि वे आंदोलन के राजनीतिक होने के खिलाफ हैं। किरण बेदी का छूट के टिकट पर हवाई यात्राएं करना और आयोजकों से टिकट का पूरा पैसा वसूलना भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? इस पर उनका मासूमियत भरा यह जवाब भी गला नहीं उतरता कि वे पूरा किराया वसूल करके गरीबों के लिए चल रहे एनजीओ में लगाती थीं। यह ऐसा ही हुआ, जैसे लुटेरा यह कहे कि मैं तो अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता हूं। अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने आंदोलन के लिए मिले चंदे का पैसा अपनी निजी संस्था के खाते में जमा किया है। कुमार विश्वास का का ‘विश्वास’ भी कठघरे में आ गया है।

सवाल यही है कि जो लोग भ्रष्टाचार खत्म करने का लक्ष्य मैदान में उतरें और उन्हीं का अतीत और वर्तमान काला नजर आने लगे तो जनता की उम्मीदें क्यों नहीं टूटेगीं? दरअसल, अन्ना ‘दूसरे जेपी’ बनने का सपना पाल बैठे थे, तो उनके सिपहासालार अन्ना के कंधों पर बैठकर 1977 दोहराने की कल्पना करने लगे थे। लेकिन अन्ना टीम कुछ ज्यादा ही जल्दी में थी। इसीलिए हिसार में वह ऐतिहासिक गलती कर बैठी। वह यह भी भूल गई कि 1977 और 2011 में बहुत अंतर आ गया है।

1977 का आंदोलन भ्रष्टाचार को लेकर नहीं था। वह इमरजैंसी में हुई ज्यादतियों के खिलाफ ऐसा जनआंदोलन था, अन्ना आंदोलन जिसके आसपास भी नहीं ठहरता है। जेपी आंदोलन का ‘हिडन एजेंडा’ भी नहीं था यानी पूर्ण रूप से राजनीतिक था। जेपी आंदोलन में भी एकदम विपरीत विचारधाराओं के लोग थे, जिनका कम से कम आंदोलन के दौरान टकराव नहीं हुआ था। लक्ष्य पूरा हो जाने के बाद जरूर विचारधाराओं का टकराव हुआ, जिसकी परिणति जनता पार्टी के टूटने के रूप में हुई। अन्ना टीम लक्ष्य प्राप्त करने से पहले टूटने के कगार पर है। भले ही अन्ना टीम की कोर कमेटी को भंग न करने का फैसला लेकर एकजुटता दिखाने की कोशिश की गई हो, लेकिन आंदोलन की दरकती दीवारों को गिरने से रोकना मुश्किल नजर आ रहा है।
(1 नवंबर को जनवाणी में प्रकाशित)

Tuesday, November 1, 2011

.बात त्यौहार और खासकर इस्लाम से जुड़े क़ुरबानी के त्यौहार ईदुज्जुहा की है दोस्तों छोटा मुंह बढ़ी बात है ..बात त्यौहार और खासकर इस्लाम से जुड़े क़ुरबानी के


दोस्तों छोटा मुंह बढ़ी बात है ..बात त्यौहार और खासकर इस्लाम से जुड़े क़ुरबानी के त्यौहार ईदुज्जुहा की है जिसमे हज के अरकान के साथ ही खुदा बंदे से क़ुरबानी मांगता है और मुसलमान जो बहेसियत है वोह एक दुम्बा बकरा या पाड़ा कुर्बान करके सवाब कमाने के बारे में सोचता है ..इस्लाम का हुक्म है के इस दिन कोई भी मुसलमान खुद को जो सबसे ज्यादा पसंद हो उसे खुदा की राह में कुर्बान करे और उसके बाद इसकी रस्म एक जानवर की कुर्बानी के रूप में मनायी जाने लगी ..इस्लामिक रिवायत के तहत खुद बकरा या दुम्बा या कोई भी जानवर पालता था उसे प्यार और दुलार से रख कर बढ़ा करता था और फिर साल भर का कमसे कम होने पर उसे खुदा की रह में कुर्बान करता था इस पर यह पाबंदी थी की वोह जानवर कहीं घायल नहीं हो या उसका कोई अंग भंग नहीं हो ..यह सब इसलियें था के उसे अपने साथ एक परिवार के सदस्य के रूम में रख कर क़ुरबानी के वक्त खुदा की राह में अपनी प्रिय चीज़ के बिछड़ने के गम का एहसास होता था .... खुद जानवर को हलाल करता था फिर खाल उतारता था और फिर उसके तीन हिस्से रख कर एक हिस्सा खुद रखता था दो हिस्से गरीबों और मिलने वालों में बांटता था यही परम्परा यही इस्लामिक नियम रिवायत बनी है और इसे कायम रखना हर मुसलमान का परम कर्तव्य भी है लेकिन दोस्तों ................लेकिन दोस्तों अब बात सच्ची और कडवी का वक्त है और इस सच्चाई को उजागर करने का दुस्साहस करने के पहले में आप से अग्रिम माफ़ी चाहता हूँ सब जानते है जो कुरान में लिखा है और हो हदीस सुन्नत है उसे ना तो बदला जा सकता है और ना ही किसी भी तरह से उस मामले में कोई समझोता क्या जा सकता है यही वजह है के आज इंटरनेट के युग में चाहे मोसम खराब हो या अच्छा हो ईद और मुस्लिम त्यौहार चाँद दिखने या फिर चाँद दिखने की शहादत मिलने पर ही घोषित होते है तो जनाब ऐसे नियमों पर मुस्लिमों को चलने का हुक्म देने वाले इस्लाम में अब बकराईद का स्वरूप बदल गया है ...इसे केवल वाहवाही और रस्म दिखावा बना दिया गया है ..आज अधिकतम लोग जानवरों को पालने से बचते है और बकराईद के दो तीन दिन पहले बाज़ार से बकरे खरीद कर लाते है हालत यह है के वोह दो हजार के बकरे के पांच हजार दस हजार रूपये देकर खुद को गोरवान्वित समझते है और उनकी इस हरकत से दुसरे गरीबों के लियें मुसीबत खड़ी हो जाती है .....खेर खरीद फरोख्त के इस बाज़ार में लाखों तक के बकरे बिक जाते है और फिर कुर्बानी के दिन यह जनाब सभी लोग कसाई के घर के बाहर कतार लगाकर खड़े देखे जा सकते है पहले हमारा बकरा कर दे ऐसा कहकर इन्हें कसाइयों के आगे गिड गिडाता हुआ देखा जा सकता है जबकि एक आम मुसलमान को कुर्बानी करवाने के पीछे मकसद यह भी है के वोह किसी भी जानवर को हलाल करना उसकी खाल वगेरा साफ़ करना सीख़ ले ..जब क़ुरबानी की बारी आती है तो घर के कई लोग ओरत और मर्द जिन्हें कुर्बानी देखना जायज़ है वोह चीख पुकार कर घर से भाग जाते है और कसाई इस रस्म को निभाता है अच्छा अच्छा मीट खुद रखा जाता है और दूसरों को खराब मीट के टुकड़े हिस्सा बना कर बांटा जाता है किसी गरीब यतीम को बस्तियों में जाकर कुछ अपवादों को छोड़ दे तो कोई नहीं बांटता है अपने फ्रीज़ लोग भर लेते है और फिर हफ्तों रईस लोगों को बुलाकर दावतें उड़ाते है ....बाद में खाल के बटवारे को लेकर चंदेबज़ इदारे झगड़ा करते है और जो लोग हिस्सा देकर क़ुरबानी करने की दुकान चला रहे लोगों में रसीद कटवाकर क़ुरबानी की रस्म अदा करते है उन्हें तो यह भी पता नहीं होता के उनके नाम की कुर्बानी भी हुई या नहीं तो दोस्तों अब आप ही बताइए ऐसी क़ुरबानी से क्या फायदा जो एक पिकनिक पार्टी की तरह रस्मन मीट बनाने और लाने का मामला हो ..मेरी बात कितनी सच है आप भी जानते है और में समझता हूँ के लोग क़ुरबानी की सही अहमियत समझे जो लोग भटक गये है वोह क़ुरबानी तो क़ुरबानी की तरह से करें इसे खेल ना बनाये अमीरी गरीबी के बीच खाई ना पैदा ना करे क्योंकि कोई देखे ना देखे अल्लाह देख रहा है .......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...