Monday, October 31, 2011

रा.वन से जलिए मत, उसे जलाइए! जी.वन को अपनाइए!


♦ अविनाश
हले तो रा-वन को लेकर उत्‍साह बना ही नहीं। दिवाली के दिन, जिस दिन ये रीलीज हुई, एनडीटीवी पर प्रशांत सिसोदिया ने इस फिल्‍म को ढाई स्‍टार दिये थे। हालांकि मुझे प्रशांत की सिने-समझ पर कभी भरोसा नहीं रहा और साथ काम करते हुए भी हम उन्‍हें इस मामले में बहुत गंभीरता से कभी नहीं लेते थे। गीतम ने ग्‍वालियर से पूछा कि क्‍या रिपोर्ट है, तो मैंने प्रशांत के ही असर में ही कह दिया कि बहुत उत्‍साहजनक नहीं है। फिर उसने कहा कि सुर को दिखाइएगा – सुना है कि पूरी फिल्‍म एक वीडियो गेम है। अजय ब्रह्मात्‍मज, जो कमर्शियल सिनेमा को बहुत व्‍यावहारिक अंदाज में समझते हैं, उन्‍होंने भी रावन को कोई खास तवज्‍जो नहीं दी बल्कि यहां तक कह दिया शाहरुख कागजी किंग हैं और उन्‍हें भारतीय दर्शकों की समझ नहीं है। कल उनके इस स्‍टैटस मैसेज को मैंने भी अपनी वॉल पर चिपकाया था।
रात में एक मित्र की चैट पर प्रतिक्रिया थी : यार, अजय जी को कैसे पता कि रा-वन फ्लॉप हो गयी है। तीन दिन में साठ करोड़ की कमाई का कोई वैल्‍यू है या नहीं? मतलब हद हो गयी – यार किसी को उठ के कागजी किंग कह देना। यार, ओपिनियन अलग होता है, पर बीस साल की मेहनत को कोई औना-पौना कह दे कि कागजी … और … इंग्लिश मीडिया … और ये, वो … अरे बीस साल का रिकॉर्ड कहां गया?
इस बीच हुआ ये कि मैंने रा-वन देख ली। थ्री डी इफेक्‍ट के साथ। चश्‍मा लगा कर। मेरी चार साल की बेटी एक घंटे के बाद कहने लगी कि चलो, अब नहीं देखना है। पर मैं सिनेमा में घुस चुका था। दृश्‍यों की तीन-तीन परत सामने से गुजर रही थी। और कहानी भी थी ही। नया यूथ, जिसे पुराने हीरो पसंद नहीं। सच्‍चाई की ताकत से ज्‍यादा असरदार इस समय में झूठ है। जो सच्‍चा है, वह अप्रासंगिक है। नया पिता है, जो पुरानी परवरिश और संस्‍कारों के बाद भी अपने बेटे के लिए सब कुछ करना चाहता है, उसे उसकी दुनिया देना चाहता है। चाहे वह दुनिया मूल्‍यहीन और अराजक क्‍यों नहीं है। मूल्‍यहीनता और अराजक जीवन-स्थितियों से बढ़ कर है बेटे की खुशी। लेकिन इस युवा को मूल्‍यहीन आस्‍थाओं की कीमत चुकानी पड़ती है और वह सच्‍चाई के साथ खड़ा होने की ताकत समझता है। रा-वन की मर्मकथा यही है।
र फिल्‍मकार अपनी तरह से कहानी कहने की कोशिश करता है। यही अनुभव सिन्‍हा हैं, जिन्‍होंने तुम बिन से एक अलग तरह की शुरुआत की थी और दस के दरवाजे से रा-वन की तरफ आ गये। हर बार आप देखेंगे कि अनुभव नीली रोशनियों की ओट से दृश्‍य की भव्‍यता में अपनी कहानी को देखने-गढ़ने की कोशिश करते हैं। कहानी कहने की उनकी ये कला है। कोई कहानी अनोखी और नयी नहीं होती, उसे कहने की कला अनोखी और नयी होती है।
हमने अपने मित्र समुदाय में ज्‍यादातर लोगों को रा-वन के बारे में बुरी बातें करते हुए सुनी। पर मुझे लगा कि मैं एक नयी तरह का सिनेमा देख रहा हूं, जो अपने टारगेट ऑडिएंस को लेकर बहुत ही फोकस्‍ड है। हम अभी मीडियम को लेकर बहुत उत्‍सुक समाज नहीं हैं। शमशेर की ये पंक्ति ज्‍यादा खींचती है हमें कि बात बोलेगी, हम नहीं। भले ही हम कोई नयी मौलिक बात कह पाने में बरसों से सक्षम नहीं हैं, लेकिन इस पंक्ति को जबान से चिपकाने से जुड़ी अहंमन्‍यता संजो कर रखने में पूरी तरह सक्षम हैं। यह वो समय है, जब अत्‍याधुनिक फीचर वाला एक मोबाइल हम खरीदते हैं और थोड़ी देर में पता चलता है कि कुछ और नया ईजाद किया जा चुका। हर नयी खरीद के थोड़ी देर बाद हम पुराने हो चुके होते हैं। ऐसे में हम पुराने गाने का सहारा लेते हैं, इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नीयत ठीक नहीं… और हम तकनीक को छोड़ इंसानियत की खोज में निकल पड़ते हैं।
इंसानों का जो नया लॉट आ रहा है, उसका मीडियम में भी उतना ही यकीन है, जितना जीवन में। रा-वन का लक्ष्‍य इसी नये लॉट में अपने ऑडिएंस को खोजना है। हम, आप सत्‍य में जीत खोजने वाले अनुरागी मनुष्‍यों के लिए रा-वन नहीं है। रा-वन वीतरागी मनुष्‍यों के लिए है, जिसकी दिलचस्‍पी मशीनों की दुनिया में है। और हम और आप यह कह कर उस दुनिया को खारिज नहीं कर सकते कि ये हमारे समय पर बोझ की तरह है। और अगर खारिज करना भी चाहते हैं, तो उससे पहले वीडियो पार्लर में जाकर बच्‍चों और किशोरों की भीड़ देख आइए। साथ ही किसी भी न्‍यूज/मनोरंजन चैनल की टीआरपी के मुकाबले पोगो का प्रसार भी देख लीजिए।
मैंने रा-वन दिल्‍ली से सटी गाजियाबाद की एक कॉलोनी, शालीमार गार्डेन, जहां मैं रहता भी हूं, के एक साधारण से मल्‍टीप्‍लेक्‍स एसएम वर्ल्‍ड में देखी। यहां मैंने कई फिल्‍में देखी हैं और कभी मुझे 15 से ज्‍यादा दर्शक पूरे हॉल में नहीं मिले। पहली बार रा-वन में मैंने देखा कि सारी सीटें भरी हुई हैं। जबकि 26 अक्‍टूबर को फिल्‍म रीलीज हुई और 29 अक्‍टूबर को मैं रा-वन देख रहा था। तीन दिन बाद। तीन दिन का बॉक्‍स ऑफिस कलेक्‍शन है, साठ करोड़ रुपये। अगर यह झूठ है, तो मुझे कुछ नहीं कहना, पर अगर सच है तो किसी भी तरह से इसे फ्लॉप कहना नाइंसाफी होगी। दर्शकों से हुई इस कमाई के अलावा रीलीज होने से पहले इसके जितने भी राइट्स इधर-उधर गये होंगे, उससे भी लागत की भरपाई की गयी होगी और मुनाफे की तरफ निर्माताओं के कदम बढ़ गये होंगे।
शायद मैं अपनी बात पूरी तरह से नहीं कह पाया हूं। सिवाय इस एहसास के कि मैं रा-वन की मेकिंग के साथ हूं, जो हमारे सिनेमा में तकनीकी दुनिया के तिलस्‍म को तोड़ने का रास्‍ता दिखा रहा है। रा-वन पर और बातें होनी चाहिए।
(अविनाश। मोहल्‍ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्‍कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्‍था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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