Thursday, June 2, 2011

हर पल टूटता-बिखरता पाकिस्तान


किसी भी देश के इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जो निर्णायक होते हैं और उसकी किस्मत तय करते हैं। पाकिस्तान इस वक्त ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। संकट के साये वैसे तो काफी दिनों से बढ़ रहे थे। साये जब छोटे होते हैं, तो मुंह चिढ़ाते हैं, लेकिन जब अपने कद से बड़े हो जाते हैं, तो डराने लगते हैं। पाकिस्तान में साये अब डराने लगे हैं। जेहादी आतंकवाद का खतरा अब पाकिस्तान के वजूद को खत्म करने पर आमादा है। जेहाद पाकिस्तान के लिए नया नहीं है। जनरल जिया उल हक के पहले से ही इसकी जमीन पाकिस्तान में पुख्ता थी। लेकिन जिया के सरकारी संरक्षण ने इसको नई जिंदगी दी। जिया के जमाने में इस्लामीकरण सरकार की राष्ट्रीय नीति हो गई। यह मामूली इस्लामीकरण नहीं था। जिया इसको समझते थे या नहीं, लेकिन सऊदी अरब से जो पैसा आया और उससे जिस तरह के मदरसे बने और उनमें जो पढ़ाई हुई, वह बेहद खतरनाक थी। सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए। जिया उल हक की नीतियों की वजह से ही पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने मदरसों के जरिये अपनी जबर्दस्त पैठ बनाई।

चार्ल्स एलेन अपनी किताब गॉड्स टेररिस्ट्स में लिखते हैं कि भारत के विभाजन यानी 1947 में पाकिस्तान की स्थापना के समय वहां तकरीबन 200 मदरसे थे। 1972 में इन मदरसों की संख्या बढ़कर 893 हो गई। वर्ष 2002 में जो आंकड़े आए, वे तो किसी को भी चौंकाने के लिए काफी हैं और मौजूदा जेहादी आतंकवाद की ताकत का अंदाजा इससे लग जाता है। 2002 में पाकिस्तान के मजहबी मामलों के मंत्री के मुताबिक, वहां मदरसों की संख्या दस हजार के पार निकल गई।

इन तमाम मदरसों में तकरीबन साढ़े सतरह लाख छात्रों ने पढ़ाई की। एलन का मानना है कि साल 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के आगमन के साथ ही सऊदी अरब ने इन मदरसों के प्रसार में पानी की तरह पैसा बहाया। इन मदरसों में सऊदी अरब के प्रभाव में कट्टरपंथी विचारों वाले जेहाद की पढ़ाई पर जोर दिया गया। कहने की जरूरत नहीं कि ये मदरसे धीरे-धीरे जेहाद की फैक्टरी बन गए। और यह सब कुछ हुआ वर्ष 1980 में अफगानिस्तान में सोवियत रूस की सेना के खिलाफ जेहाद छेड़ने के नाम पर। एक अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1979 से लेकर अब तक जेहाद की आड़ में सऊदी अरब ने 79 अरब डॉलर खर्च किए। इसका काफी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के इन दस हजार मदरसों को मिला। इनसे वहां बड़ी संख्या में जेहाद फैलाने के लिए सेमिनार कराए गए।

दरअसल, इस्लाम की सबसे कट्टरपंथी धारा वहाबिज्म को माना जाता है। 1702 में पैदा हुए मोहम्मद बिन अब्द अल वहाब के नाम पर इस स्कूल को वहाबी स्कूल नाम दिया गया। यह स्कूल कुरान की सबसे कट्टर व्याख्या के लिए जाना जाता है। यह कुरान और सिर्फ कुरान को ही मानता है और इसकी व्याख्या में किसी भी तरह का विचलन उसे मंजूर नहीं है। वह किसी भी 'फॉर्म' और किसी भी तरह के 'पॉलीथीज्म' को नहीं स्वीकार करता। उसकी समझ में जो व्यक्ति इसके 'मोनोथीज्म' से जरा भी अलग हटता है, वह इस्लाम का दुश्मन है, यानी इस्लाम को नहीं मानने वाला है, काफिर है।

इस स्कूल की नजर में इस्लाम और इस्लामी कौम की रक्षा करना ही जेहाद है। दरअसल, इस स्कूल के संस्थापक अल वहाब इस्लाम की सबसे कथित कट्टरपंथी और सबसे कम लोकप्रिय व्याख्या करने वाले हनबली स्कूल के समर्थक इब्न तयमिय्या से खासा प्रभावित थे। इब्न तयमिय्या ने जेहाद की नई परिभाषा दी। उनका कहना था कि जेहाद इस्लाम के रास्ते में आने वाली दुश्वारियों के खिलाफ एक सतत संघर्ष है। जेहाद इस्लाम को नहीं मानने वालों या इसके खिलाफ जाने वालों के खिलाफ एक जंग है। इब्न तयमिय्या का मानना था कि इंसान के तौर पर जेहाद सबसे बेहतरीन काम है। सच्चे मुसलमान के लिए जेहाद से बेहतर कुछ नहीं है। जब पाकिस्तान के मदरसों में मासूम बच्चों को दिन-रात यही पढ़ाया जाएगा, तो वे आतंकवादी नहीं बनेंगे, तो फिर क्या बनेंगे? ये तो पाकिस्तान के हुक्मरानों को सोचना था। उस आईएसआई और सेना को सोचना था कि नफरत की सीख देने वाली इस शिक्षा के नतीजे क्या होंगे? पाकिस्तान को तब तक बड़ा मजा आया, जब तक इन मदरसों में पले-बढ़े आंतकवादी कश्मीर में खून-खराबा करते रहे और भारत के शहरों में मासूमों की जान लेते रहे। हिन्दुस्तान में हुए हर धमाके ने इनके हौसले आसमान पर पहुंचाए। आज ये हौसले उस मुकाम पर हैं कि ये पाकिस्तान में इस्लामी हुकूमत का ख्वाब देख रहे हैं।

इतिहास के तजुर्बेकार जानते हैं कि इब्न तयमिय्या ने 13वीं शताब्दी में कहा था कि इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन ईसाई नहीं हैं, न ही वे हैं, जो इस्लाम के रास्ते से भटक गए, न ही वे, जो इस्लाम को मानते हैं, लेकिन इस्लामी तौर-तरीकों को पूरी तरह अपनी जिंदगी में नहीं उतार पाए। असली दुश्मन वो हैं, जो खुद को इस्लाम का बताते है, लेकिन हकीकत में इस्लाम को खारिज करते हैं। तयमिय्या के मुताबिक, पहले तीन पर तो थोड़ी-बहुत दया दिखाई जा सकती है, लेकिन इस चौथे किस्म के शख्स के खिलाफ किसी भी हालत में किसी तरह की दया नहीं की जा सकती।

इन कट्टरपंथी व्याख्याओं को मानने वालों के मुताबिक, पाकिस्तान अपने को कहता तो इस्लामी राज्य है, लेकिन वह असल जिंदगी में इस्लाम को रिजेक्ट करता है। ऐसे में, पाकिस्तान की मौजूदा लड़ाई पाकिस्तान के अस्तित्व की लड़ाई है। उसमें अमेरिका जितनी एबटाबाद जैसी घटनाएं करेगा, जितने ड्रोन फोड़ेगा, उतना ही उसके विघटन का कारण बनेगा। पाकिस्तान के नौसैनिक अड्डे पर हमले के बाद तालिबानियों का बयान इस ओर साफ इशारा करता है। तालिबान ने कहा कि पाकिस्तान की सेकुलर नीतियों और अमेरिका से दोस्ती का बदला है यह हमला। यानी इस्लामी स्टेट गैर इस्लामी रास्ते पर कैसे चल सकता है, और इस्लाम के दुश्मन अमेरिका से कैसे दोस्ती कर सकता है।

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--- संजय सेन सागर

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