Tuesday, April 12, 2011

हड़ताल का अचूक हथियार

जिन्होंने मेरी फिल्म सारांश देखी होगी, उन्हें अनुपम खेर अभिनीत वह दृश्य जरूर याद होगा, जिसमें वह विदेश में मारे गए अपने इकलौते बेटे का अस्थि कलश लेने कस्टम के दफ्तर आता है और उससे घूस मांगी जाती है। 1983-84 का वह समय एशियाड का समय था, जब घर में टीवी होना बड़ी बात थी। हर व्यक्ति को मनोरंजन के उस जादू के बक्से की तलाश थी। कस्टम के दफ्तरों में टीवी के आयात को लेकर काफी गोरखधंधे होते थे। महाराष्ट्र के एक स्कूल का अवकाश प्राप्त गांधीवादी शिक्षक अनुपम खेर निराशा के दलदल में डूबकर कस्टम अधिकारी पर चिल्लाता है, ‘मैं यहां टीवी लेने नहीं, अपने मरे हुए बेटे की चिता की राख लेने आया हूं। क्या मैं बेटे की अस्थियों के लिए भी घूस दूं?’ कस्टम अधिकारी कहता है कि उससे गलती हो गई। वह शिक्षक को बताता है कि वह उनका शिष्य रह चुका है। उसके बाद अनुपम का संवाद है कि ‘भूल तो हमसे ही हो गई। मैं ही तुम्हें सही शिक्षा नहीं दे पाया।’ सारांश का वह दृश्य मेरे सबसे प्रिय दृश्यों में से एक है, जिसने मुल्क को उसका बदसूरत चेहरा दिखाया था।

कुछ लोगों ने गांधीवादी अन्ना हजारे के आंदोलन को शत्रुता की धारणा से जोड़ दिया, जो गांधीवादी नीतियों के खिलाफ है। इसमें मीडिया समेत कई लोगों को युद्ध का रस मिलने लगा। शत्रुता को घृणा का रूप देना आसान है। वल्र्ड कप के दौरान जिस तरह से पाकिस्तान के खिलाफ शत्रुता का माहौल बनाकर मीडिया ने स्वांग रचा, वही तरीका जंग के दौरान राजनीतिक नेतागण अपनाते हैं। दंगों के दौरान भी यही शत्रु भाव पैदा किया जाता है। आंदोलन के दौरान एक मंच पर इतने तरह के लोगों का इकट्ठा होना दरअसल इस बात को प्रमाणित करता है कि मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के दिलों में राजनेताओं के लिए घृणा भाव तो पहले से ही था, इस आंदोलन ने उस नफरत को एक मंच दे दिया। शरद पवार के बारे में सबको मालूम है कि वे किस तरह के व्यक्ति हैं, लेकिन जब अन्ना मंच से कहते हैं कि एक पवार जाता है तो दूसरा चला आता है, तब वे मेरे हिसाब से उन गांधीवादी आदर्शो से जरा हट से जाते हैं, जहां किसी व्यक्ति विशेष के प्रति शत्रुताभाव की गुंजाइश नहीं होती। भ्रष्टों को फांसी देने के उनके विचार भी गांधीवाद के दायरे से बाहर हैं। ‘मैं बड़ा पाक-साफ, बाकी सब राजा, राडिया या कलमाडी’ इस धारणा को बलवती होते मैंने कई बार देखा-सुना। रूस के एक बड़े विचारक-लेखक ने लिखा है कि यह आम खुशफहमी होती है कि पृथ्वी की सारी बुराइयां कुछ लोगों के कारण होती हैं, जबकि अच्छाई और बुराई की लकीरें दिल में से निकलती हैं। गांधी हमेशा अपने से जूझते रहते थे। आत्ममंथन का क्या मतलब है? तू मेरा नहीं बन सकता तो अपना तो बन। अगर कोई लोगों में यह अहसास जगा दे कि भ्रष्टाचार का स्रोत हमारा दिल ही है तो देश से भ्रष्टाचार का नामोनिशां मिट जाएगा।

जब हम कनाट प्लेस के पास ठंड से सिकुड़ रहे एक गरीब व्यक्ति को देखकर मुंह फेरते हैं तो हमारे अंदर का कुछ मरता है। हीटर जलाने के लिए बिजली विभाग के कर्मचारी को घूस देकर मीटर को सुस्त करवाने वाला व्यक्ति और गरीब को देखकर मुंह फेरने वाला व्यक्ति एक ही है। दोनों समान सोच के हैं। क्या हर हिंदुस्तानी ने भ्रष्टाचार की बुलंद इमारत में एक-एक ईंट नहीं जोड़ी है? क्या भ्रष्टाचार के राक्षस को हर हिंदुस्तानी ने अपने हाथों से निवाला नहीं खिलाया है? तो मेरा मानना है कि लोकपाल बिल या किसी बिल की जरूरत नहीं। बुराई को बढ़ावा देना बंद कर दो तो यह देश फिर से ऋषि-मुनियों का देश बन जाएगा। ऐसा नहीं है कि मैं अन्ना के साथ नहीं। मैंने स्वामी अग्निवेश को फोन किया कि वे अन्ना को बता दें कि मेरा पूरा समर्थन उनके अभियान को है। मैं ट्विटर पर लगातार समर्थन में अपनी राय देता रहा। लेकिन वहां जाकर भीड़ के बीच भाषणबाजी करने की मेरी दिली इच्छा नहीं रही। भीड़ को किसी की जरूरत नहीं होती। मैंने तो उनसे यह भी कहा कि अन्ना की लड़ाई के जो औजार हैं, उनके अंदर भी भ्रष्टाचार है। मैं चाहता था कि वे उस औजार के कुछ ऐसे ठेकेदारों पर भी आक्रमण करें, जो नैतिकता के ठेकेदार बन गए हैं।

अमेरिका में एक समय सोचा जाता था कि अगर कोई घटना टीवी पर नहीं दिख रही है तो इसका मतलब यह है कि वह हो ही नहीं रही। भारत में मौजूदा परिदृश्य वैसा ही है। यह गलत है। हमारी जमात (सिनेमा) के कुछ लोग अपने पीआरओ लेकर अन्ना के मंच के आसपास पहुंच गए। मुझे हंसी आई कि ये वही लोग हैं, जो मुंबई में शिवसेना या मनसे की दादागिरी पर चुप रहते हैं। अन्ना की लड़ाई में शामिल होना कुछ लोगों के लिए वल्र्ड कप के फाइनल जैसा था। मैंने वहां उन लोगों को बड़ी-बड़ी बातें करते सुना, जिन्हें आप रोजमर्रा की जिंदगियों में नहीं देखते-सुनते। अन्ना की जिंदगी मेरे लिए एक मिसाल है। प्रशांत भूषण मेरे लिए एक मिसाल हैं। केजरीवाल, अग्निवेश जैसे लोग बेदाग रहे हैं।
एक फिल्मकार के तौर पर मेरी भूमिका के बारे में साफ तौर पर बोलूं कि फिल्में सामाजिक क्रांति का हथियार नहीं बन सकतीं। ऋषिकेश मुखर्जी की एक फिल्म आई थी सत्यकाम । फिल्म का मुख्य किरदार धर्मेद्र भ्रष्ट तौर-तरीकों से ताउम्र लड़ता है। अपनी लड़ाई में वह हमेशा मात खाता है और अंत में एक दुखदायी मौत का शिकार हो जाता है। सत्यकाम बेहतरीन फिल्म थी, लेकिन बुरी तरह फ्लॉप हुई। उस दौरान मैं बतौर सहायक निर्देशक उदयपुर की गलियों में राज खोसला साहब की मेरा गांव मेरा देश की शूटिंग कर रहा था। मुझे याद है खोसला साहब ने कहा था कि बेटा फिल्मों में सामाजिक मुद्दे को उठाओगे तो पब्लिक जूते मारेगी। इस बात को अब लगभग 40 साल बीत चुके हैं। आज लगता है कि फिल्मों के जरिये न सही, टीवी के जरिये तो क्रांति लाई जा सकती है। टेलीविजन ने अन्ना आंदोलन को जिस तरह से समर्थन दिया, उससे मैं कह सकता हूं कि कम से कम टीवी पर तो यह मुद्दा हिट हो ही गया। इस बहस ने लोगों को एक नया हथियार दे दिया। मुंबई के कुछ शिक्षक आने वाले दिनों में भूख हड़ताल पर जाने वाले हैं, क्योंकि उनकी पगार सालों से नहीं बढ़ी है। नए दौर में भूख हड़ताल सामाजिक रूप से स्वीकृत हथियार बन गया है और आज के दौर में इस गांधीवादी हथियार को लोकप्रिय करना अन्ना हजारे की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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--- संजय सेन सागर

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