Thursday, March 17, 2011

कभी सोचा नहीं, क्यों और कैसे मिल रही है सफलता :अमिताभ बच्चन

ऐसा शख्स, जो चालीस साल से लगातार काम कर रहा है, नई-नई परिभाषा गढ़ रहा है, जिसकी सफलता की भूख अभी भी खत्म नहीं हुई है। अमिताभ बच्चन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे मानते हैं कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो सबकी नियति तय करती है। अमिताभ बच्चन से फिल्मों से लेकर आध्यात्मिकता तक, रचनात्मकता से लेकर ट्विटर-वॉयस ब्लॉग तक, लंबी बातचीत की। इसके प्रमुख अंश- चालीस साल तक लगातार काम, कामयाबी की अभी भी लालसा, गजब का अनुशासन। आखिर क्या है ड्राइविंग फोर्स?कुछ ऐसा खास नहीं है। बस काम करना है। यह लोगों की उदारता है कि वे हमें काम लायक समझते हैं। अच्छे-अच्छे किरदार लाते हैं। सब्जेक्ट लिखे जाते हैं। ईश्वर की कृपा रही है
ईश्वर की कृपा..! क्या नियति तय है?इतनी गहराई से हमने नहीं सोचा कि क्यों मिल रहा है, कैसे मिल रहा है। जितना आता है, उसे पूरी निष्ठा से करते हैं। यदि यह लोगों को पसंद आता है, तो और काम मिल जाता है। कोई एक ऐसी शक्ति है, जो हमारी-आपकी किस्मत तय करती है।

यानी आप भाग्य पर भरोसा करते हैं?

कोई एक ताकत तो है, जो संसार चला रही है। भले ही उसका नाम ईश्वर हो या गॉड। आपने, हमने कभी यह ताकत देखी नहीं है, लेकिन फिर भी हो तो रहा ही है। भाग्य का हाथ होता ही है। अपने को भाग्यशाली समझता हूं।

आपके लिए आध्यात्मिकता के क्या मायने हैं?

देखिए! आध्यात्मिकता बड़ी व्यक्तिगत होती है। इस पर चर्चा नहीं करना चाहता। क्योंकि हम जो व्यक्तिगत बात भी करेंगे, आप उसे छापेंगे। वह सार्वजनिक हो जाएगा। लोग सार्वजनिक बातों को सत्य मान लेते हैं।

आपके जो शब्द होंगे, वही लिखे जाएंगे।

यह जो मेरा चरित्र है, दिनचर्या है, वह निजी है। मैंने कभी यह नहीं कहा कि यहां जाना चाहिए। न मैं कभी यह कहूंगा, क्योंकि यह मेरा निजी कार्यक्रम है। निजी ही रखूंगा। मंदिर तो जाता हूं, पर प्रचार के लिए नहीं। हमारा भी मंदिर घर के अंदर ही है। पूजा-पाठ भी वहीं होता रहता है। वैसे, मैं मेडीटेशन वगैरह कुछ नहीं करता।

रचनात्मकता के आपके लिए क्या मायने हैं?

यही, जो हम कैमरे के सामने करते हैं। उसके दरमियान, उसके दायरे में जो कुछ भी होता है। (आसमान की ओर निहारते हुए) हां! यह क्रिएटिव है। वैसे हमारे हाथ में रचनात्मकता होती नहीं। यह निर्देशक ही बताता है कि रोल को लेकर उसके मन में क्या है, कैसे निभाना है।

लगभग रोज ही ब्लॉगिंग, ट्विटिंग। क्या कोई मददगार टीम है?

बिल्कुल नहीं। मैं खुद लिखता हूं। ऐसा लोग सोचते हैं कि एक टीम बैठती है। मैं उसे बोलता हूं कि इस विषय पर छाप दो और वह लिख देती है। ‘बिगबीबिगअड्डाडॉटकॉम’ पर लिखते हुए 1,052 दिन और ट्विटर पर भी 200 दिन हो गए हैं। बगैर नागा! आपको बता दूं कि तस्वीर मैं खुद खींचता हूं। बाहर से मिलती है, तो उसे एडजस्ट करके लगा देता हूं।

इसके पीछे प्रेरणा क्या है?

मेरे जो भी गिने-चुने प्रशंसक हैं, उनसे सीधे बात कर सकूं, उनकी विचारधारा जान सकूं।

ब्लॉग के विस्तारित परिवार से आपका मिलना हो पाता है?

बिल्कुल। मेरे ब्लॉग पर आनेवाले विस्तारित परिवार के हिस्से हैं। मैं उन्हें उसी तरह से संबोधित करता हूं। सारे टिप्पणीकारों की आपस में बात भी होती रहती है। मुझे खोजते हैं। भोपाल में तीन-चार (ब्लॉग वाले) लोग मुझसे मिलने आए थे। पेरिस में बाबूजी की कविताओं का पाठ हुआ। टिप्पणी करने वाले कई लोग छोटी-मोटी नौकरियां करते हैं। साधन न होने के बावजूद न्यूयॉर्क, स्पेन, जर्मनी, साउथ अफ्रीका, रूस से काव्य पाठ सुनने पेरिस आए। आप यकीन नहीं करेंगे कि वहां आने के लिए उन लोगों ने छह महीने तक तैयारियां कीं।

क्या सभी हिंदुस्तानी थे?

नहीं। सब विदेशी थे। मिस्र की एक टूरिस्ट गाइड थी। पर्यटन वगैरह बंद हो जाने के कारण आर्थिक हालात खराब हो गई। उसकी दादी आईसीयू में थी। ब्लॉग के सारे लोग मिलकर उसे पैसा दे रहे हैं। इन लोगों ने अलग-अलग जगह ग्रुप बना लिए हैं। दुबई से यहां आए शख्स ने बताया कि ग्रुप समाज सेवा के काम में जुटेगा। एक बात साफ कर दूं कि मैंने उनसे कुछ नहीं कहा है। अपने आप ही सब करते रहते हैं।

क्या अपने ब्लॉग पर सब पढ़ते हैं?हां। औसतन 400 से 500 टिप्पणी करने वाले और रोजाना दस लाख हिट्स। अब मैंने वॉयस ब्लॉग, यानी वॉग भी शुरू किया है। इसका नाम है-बोल यानी बच्चन ऑनलाइन। रोजाना सुबह मैं एक-दो मिनट इस माध्यम पर बोलता हूं। यहां भी कुछ 23 लाख सब्सक्राइबर्स हो गए हैं।

अमिताभ बच्चन

जन्म- 11 अक्टूबर 1942, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक, विश्व प्रसिद्ध अभिनेता

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