Tuesday, March 8, 2011

आधी रात का सच...गैस त्रासदी का दस्तावेज़

tuesday, march 08, 2011

आधी रात का सच...गैस त्रासदी का दस्तावेज़

logo_thumb202_thumb6_thumb3रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार शामिल किया है वरिष्ठ पत्रकार विजयमनोहर तिवारी की हाल में प्रकाशित पुस्तक-भोपाल गैस त्रासदी-आधी रात का सच को। हिन्दी में इस विषय पर लिखी गई अपने ढंग कीVMT_ यह अनूठी पुस्तक है। इसके पैपरबैक, पॉकेटबुक साईज के संस्करण का मूल्य 195 रु है और पृष्ठ संख्या 300 है ।
भोपाल गैस त्रासदी पर यूँ तो बीते पच्चीस बरसों में हज़ारों दस्तावेज़gas विभिन्न संगठनों ने जुटाए और उन्हें न्यायालय ने देखा-परखा। बहुत सामान्य सी, नितांत भारतीय परम्परा के तहत इस मामले में दर्ज़ आपराधिक मुकदमे का फैसला दुर्घटना या हादसे के ठीक पच्चीस साल छह महिने बाद आया। आधी रात का सच एक ऐसी क़िताब है जो हिन्दी में शायद अपनी क़िस्म का अनूठा और पहला दस्तावेज़ है जो भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े तमाम पहलुओं पर बेबाकी से नज़र डालता सा लगता है। त्रासदी के जिम्मेदार लोगों और सरकार के बीच के आपराधिक-षड्यंत्रों, प्रशासन और पुलिस की शर्मनाक लापरवाहियों, पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर सामाजिक संगठनों की बेशर्म खींचतान के बीच मीडिया के सकारात्मक रोल की पड़ताल है यह क़िताब, जिसका महत्व इस त्रासदी पर अब तक लिखी गई तमाम पुस्तकों से किसी मायने में कम इसलिए नहीं है, क्योंकि यही इसके लिखे जाने का सही वक़्त था। यह अलग बात है कि त्रासदी के वक़्त भोपाल में मौजूद तमाम जाने-माने पत्रकारों-सम्पादकों नें टीवी चैनलों, विदेशी अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं को आधिकारिक रूप से इस त्रासदी के विभिन्व पहलुओं के बारे में बताया। कभी साक्षात्कारों के जरिए तो कभी खुद की कलम से, मगर सिलसिलेवार कथानक वाली कोई पुस्तक हिन्दी के पत्रकारों ने नहीं लिखी। जो अगर लिखी जाती तो आधी रात का सच जैसी क़िताब अपने मुकाम पर बहुत पहले पहुँच चुकी होती।
फ़ैसला आने के दो हफ़्तों का यह कवरेज इस हादसे से जुड़ी तमाम साजिशों और जानबूझकर की गई लापरवाहियों और अनदेखियों का एक सिलसिलेवार दस्तावेज़ है। यह दस्तावेज़ पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक ऐसी अभ्यास-पुस्तिका है जो उन्हें उस पत्रकारिता के माएने समझा पाने में कामयाब होगी, जिसे कई बाबूसिफ़तgasमानसिकता के नवागत पत्रकारों ने सिर्फ़ नौकरी का ज़रिया समझ लिया है। इस किताब में विजय बताते हैं कि सौद्देश्य पत्रकारिता से जुड़े संस्थान का न्यूज़ रूम विशिष्ट अवसरों पर किस तरह काम करता है। विजय की लेखकीय प्रतिभा ने यह साबित किया है कि वे एक सिद्धहस्त लेखक हैं और कवितेतर साहित्य की तमाम विधाओं पर उनकी प्रतिभा की सफल आजमाइश के अवसर निकट भविष्य में हमें मिलेंगे। लेखक के रूप में विजय के भीतर का सजग पत्रकार हमेशा हस्तक्षेप करता चलता है फिर चाहे वे साध्वी की सत्ता कथा जैसा उपन्यास लिख रहे हों या हरसूद के विस्थापितों की पीड़ा का लेखाजोखा पेश कर रहे हों।
ताज़ा किताब आधी रात का सच में भी विजय मूलतः एक पत्रकार के रूप में सामने आते हैं। विजय न तो गैस पीड़ित हैं और न ही गैस रिसाव और उसके बाद के दौर के वे कभी चश्मदीद रहे हैं। इसके बावजूद इस भीषणतम औद्योगिक त्रासदी की चौथाई सदी बीतने के बाद जब उन्हें इस त्रासदी के भुक्तभोगियों से रूबरू होने का मौका मिला, उनके भीतर का पत्रकार कसमसा उठा। भोपाल गैस त्रासदी पर यूँ तो कई किताबें बीते ढाई दशक में सामने आई हैं, पर यह विडम्बना ही है कि भोपाल के किसी हिन्दी पत्रकार ने इसे दस्तावेजी रूप देने की कोशिश नहीं की, मानवीय संवेदनाओं को उकेरते हुए किसी और फॉर्मेट में लिखने की तो बात ही अलग है। इसीलिए विजय ने गैस त्रासदी का विलम्बित फैसला आने पर दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूज़ रूम की टीम का एक हिस्सा रहते हुए इस त्रासदी को जिस तरह समझा, उसे किताब की शक्ल में पेश किया है।
क रचनाधर्मी, चाहे वह किसी भी क्षेत्र या विधा से संबंधित हो, किसी घटना विशेष पर भावग्रहण के स्तर पर उसकी संवेदनाएं सामान्यजन से कहीं अधिक सघन और संप्रेषण के स्तर पर कहीं अधिक तरल होती हैं। संवेदनशील रचनाधर्मी के मनोमस्तिष्क में हमेशा एक टाईममशीन रहती है जिसके जरिए वह घटना से जुड़े पहलुओं को परखने के लिए कालातीत यात्रा करता है और फिर उसकी कलम इस निराली यायावरी को किसी भी रूप में अभिव्यक्त करती है। विजय ने भी पच्चीस सालों कें घटनाक्रम को टाइममशीन में बैठकर एकबारगी देखा, समझा और फिर एक पत्रकार की डायरी की शक्ल में बेबाकी से सबके सामने ला रखा है। किताब लिखते हुए जो अनुभूति विजय को हुई उसे विजय खुद बयान करते हैं-
"सत्ता के शिखरों पर चलनेवाली धोखेबाजी, सौदेबाजी, साजिशो और बईमानी की अंतहीन कहानी का यह एक नमूना भर है। इसमें एक हाईप्रोफाइल सनसनीखेज धारावाहिक का पूरा पक्का मसाल है। गैस त्रासदी आज़ाद भारत का अकेला ऐसा मामला है, जिसने लोकतंत्र के तीनो स्तंभों को सरे बाज़ार नंगा किया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कई अहम ओहदेदार एक ही हमाम के निर्लज्ज नंगों की क़तार में खड़े साफ़ नज़र आए।"
gasविजय इस किताब को दो सप्ताह की डायरी कहते हैं। सच है। डायरी में सचाई पैबस्त होती है और इस किताब की हर इबारत सच्ची है। मगर फ़ारमेट के स्तर पर यह किताब डायरी से अलहदा एक ऐसी विधा है जिसका नामकरण करने के लिए समालोचकों को शायद माथापच्ची करनी पड़े, मगर रचनाकर्म से जुड़े लोगों के लिए अभिव्यक्ति का एक रास्ता और खुल गया है। तीनसौ पृष्ठ की इस किताब को प्रकाशित किया है भोपाल के ही बेन्तेन बुक्स ने जो प्रकाशन की दुनिया में एकदम नया नाम है। बेन्तेन के प्रवर्तक, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की साज-सज्जा और सुरुचि के साथ पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरे हैं। इनके पास अत्याधुनिक मुद्रण तकनीक, उच्चस्तरीय डिज़ाइनिंग भी है और ये जानी-मानी पुस्तक वितरण व्यवस्था से जुड़े हैं। संस्थान से भविष्य में इसी तरह के सुरुचिपूर्ण प्रकाशनों की उम्मीद की जानी चाहिए.
शब्दों का सफ़र से साभार

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--- संजय सेन सागर

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