Wednesday, January 5, 2011

बेबसी




लोग रूठ जाते हैं मुझसे ,
                 और मुझे मनाना नहीं आता !
मैं चाहती  हूँ क्या ?
                     मुझे जताना नहीं आता !
आँसुओं को पीना पुरानी आदत है ,
                   .मुझे  आंसू बहाना नहीं आता !
लोग कहते हैं मेरा दिल है पत्थर का ,
            इसलिए इसको पिघलाना नहीं आता !
अब क्या कहूँ मैं............
                 क्या आता है, क्या नहीं आता !
बस मुझे मौसम की तरह ,
           बार - बार बदल जाना नहीं आता !  
अब क्या करे कीससे कहें हम ,
         हमे तो किसी भी तरह मनाना नहीं आता !

5 comments:

  1. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

    ReplyDelete
  2. manane ka yah andaj bhi anokha hai ki yah kahna ki hume to manana hi nahi aata .bahut khoob .

    ReplyDelete
  3. बेहद खूबसूरत रचना…………पसन्द आयी।

    ReplyDelete
  4. अच्छे भाव हैं.....

    ReplyDelete
  5. शुक्रिया दोस्तों !

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...