Wednesday, January 12, 2011

जिंदगी




हथेलियों मै पानी सी कभी ठहरती ही नहीं , 
मुठ्ठी मै रेत बन के फिसल जाती है ! 
पकड़ना तो कई बार चाहा है मैने उसे , 
बंद आँखों के खुलते ही खो जाती है ! 
मस्त पवन सी  झूमती सी आती है , 
आंधी की तरह सब कुच्छ उड़ा ले जाती है !  
कडकती धूप मै जब पांव मेरे जलते हैं , 
झट से  बदलों की छाँव वो  बन जाती है !   
ख़ुशी मिले मुझे तो वो दूर मुझसे होती है  
गम के आते ही वो मरहम का काम करती है ! 
हर राह मै वो  साथ मेरे चलती है , 
सुख - दुःख का लेखा - जोखा रखती है ! 
मेरे दुःख मै बिन बादल ये बरसती है , 
ख़ुशी मिले तो ये  धूप बनके खिलती है !
 जब एक हसीन ख्वाब मै बुनती हु , 
तुझको तो मै साथ लेके   चलती हु ! 
हर ख्वाब सच भी तो नहीं होता ...........
उस वक्त बढकर तेरा हाथ थाम लेती हु !
तेरी हिम्मत से नया ख्वाब में बुनती  हु !
फिर बेखोफ आगे का सफ़र तय  करती  हु !

3 comments:

  1. teri himmat se naya khwab main bunti hoon,
    phir bekhauf aage ka safar tay karti hoon.
    dheere dheer aapki lekhni me kafi saundarya aata ja raha hai bahut achchhi lagi aapki kavita...

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  2. मीनाक्षी जी आपकी हर कविता padh kar ye महसूस होता है की अब अगली का कैसे इंतजार करूँ...

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  3. आपकी मै बहुत- बहुत शुक्रगुजार हु दोस्त जो आप हर बार मेरी हिम्मत बडाती हैं मेरी लेखनी मै सूधार लाने के हकदार मुझसे ज्यादा आप सब हैं दोस्त अगर आप हिम्मत न दें तो मै कुच्छ भी नहीं !
    बहुत बहुत शुक्रिया दोस्त !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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