Saturday, January 8, 2011

संघर्ष की लड़ाई


                           
           एक बीज बड़ते हुए कभी आवाज़ नहीं करता ,
   मगर एक पेड़ जब गिरता है तो .............
               जबरदस्त शोर  और प्रचार के साथ ..........!
 इसलिए विनाश मै शोर है परन्तु ,
                सृजन हमेशा मोन रहकर समृद्धि पाता है !   
                                       
                                     आज लड़कियां तितली बन कर  खुले  आसमान मै उड़ रही है , बुलंदियों को छु रहीं हैं ! लड़कियों का संसार कुच्छ वर्ग मै अब पहले जेसा नहीं रहा ! भारत के गाँव , शहरों  और महानगरों सब जगह वो अपने होने का सबूत  दे रहीं हैं ! अब उनकी आँखों मै नई तरह के सपने  हैं , नई तरह की चुनोतियाँ हैं ! वो अपने होने को रच रहीं हैं ! लड़कियां बदल रही हैं तो समाज भी खुद को बदल रहा है पर दोनों के बदलाव मै जमीं आसमान का अंतर है ! क्युकी हर इन्सान की सोच फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की अलग - अलग है और उसी सोच के आधार पर उसकी तुलना भी हो रही है ! अगर आज नारियों ने इन बुलंदियों को हासिल  किया है तो उनका श्रेय उसकी मेहनत , लगन , द्रिड निश्चय और इन्सान को जाता है ! इन्सान द्वारा  किया गया उसका गलत इस्तेमाल उसकी संकुचित सोच ने उसका इस्तेमाल अलग - अलग ढंग से किया ! किसी ने उसे एसे जंजीरों मै जकड़ा की वो उसे तोड़ने के लिए अमादा हो गई , किसी ने उसकी भावनाओ को इतनी ढेस पहुंचाई की वह टूट गई ! इन सब का ये हश्र हुआ की उसने अपनी मंजिल तलाशनी  शुरू कर दी और अपनी लगन , मेहनत और हिम्मत से अपने  आत्मसम्मान  की रक्षा करने की ठान ली ! आज वो अपना संसार खुद चुन रही है ! उसके अपने दोस्त अपने रिश्ते हैं ! आज वह अकेली रहने मै भी नहीं घबराती उसे अपनी पहचान पर फक्र है ! कुच्छ अच्छे इंसानों की सोच जब खुद हिम्मत दे कर उन्हें उपर  उठाती है  तो  उनके विचारो कुच्छ अलग तरह की क्रांति लाते हैं और जो नारी सताए जाने के बाद ऊपर उठती है तो उसमे नफरत , आक्रोश और घमण होना स्वभाविक है ! क्युकी ये तो तय है की हम इन्सान मै जितने पहरे , बंदिशे लगायेंगे वो बहुत लम्बे समय तक उन मै बंधा नहीं रह पायेगा और उससे बाहर निकलने को छटपटाता रहेगा और जहां जंजीरे नहीं होंगी तो  फिर वो किसे तोड़ कर  भागना  चाहेगा क्युकी वो तो पहले से ही आज़ाद है !
                                          यही वजह है अगर आज लड़कियों मै इतनी हिम्मत आई है तो ये वही जंजीरों की वजह से जिसने हमेशा  अलग - अलग तरह से उसे बांधने  की कोशिश की और उसने उतनी हिम्मत से उसे तोड़ डाला ! उसे जितनी ताक़त से रोकने की कोशिश की गई उसने दुगनी ताकत से उन दहलीजों को लांघना शुरू कर दिया ! सभी अपनी बुलंद सोच से इतिहास के पन्नो मै अपना नाम रचने लगी ! अब उन्हें वापस  लाना बहुत कठिन है पर प्यार और होंसला उन्हें गलत राह मै जाने से जरुर रोक सकता है , क्युकी....................................ये उनके अपने संघर्ष की लड़ाई है और ये संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक वो अपनी एक जगह न बना ले ! अगर एक वर्ग मै ओरत की तस्वीर बदली है तो एक वर्ग अभी भी एसा है जो दर्द , तिरस्कार  और उन जंजीरों को अभी भी झेल रहा है ! और वो दिन दूर नहीं जब ये आग हर तरफ दिखाई देगी   ! अगर हम नारी को प्यार ....... सम्मान ...........और इज्ज़त न देंगे तो ये एक दिन एक भयंकर बारूद  का रूप धारण कर सकती है और जिसका भुगतान हम सब को करना  पड़ सकता है ! क्युकी जो स्थान उसका था जेसे घर परिवार को संभालना , बच्चों को प्यार देना परिवार को जोड़ कर रखना वो ख़ाली होता जायेगा और उसको कोई भी न भर पायेगा क्युकी जितना समर्पण नारी शक्ति मै है शायद किसी मै नहीं ! इसलिय जरूरी यही है की हम उसकी भावनाओं को समझे उसे  जंजीरों न बांध कर उसे प्यार और सम्मान दे कर   हर काम करने  का मोका दे ! उसे समाज मै बराबर का हक प्रदान करें जिससे वो अपने कर्तव्य को बखूबी निभा पाए ! आज जो ये लड़ाई लड़ रही है उससे रोकना बहुत कठिन है क्युकी इसके अनुपात मै दिन प्रतिदिन इजाफा ही हो रहा है !
                                     देश मै 1951 तक 8 .86 % महिलाएं ही पड़ी लिखी थीं और 1961 मै ये बढकर 15 .33 % हुई ! 1971  तक ये बढकर 21 .97 % हुई और 1981 की जनगणना   के मुताबिक 28 .47 % तक पहुँच गई ! 2001 मै  संम्पन जनगणना के मुताबिक 53 .7 % हिस्सा आज पड़ने लिखने के काबिल बन गया था ! हालाँकि साक्षरता शिक्ष का पैमाना नहीं होता फिर भी शिक्षित होने के लिए वांछित आवश्कता तो है ही ! देखने वाली बात की 2001 तक देश के कुल स्नातकों मै एक तिहाई महिलाएं थी और संभवतया स्थिति आज और बेहतर ही हुई होगी !
                  आजादी जिंदगी की आजादी जीने की  ,
                  आजादी ख़ुशी को इज़हार करने की ,
                    क्युकी वो जान गई है ............!
              की आजादी है तो कुच्छ भी असंभव नहीं
                   बिना डर बिना बहकावे ,
                 पुरानी परम्परा को तोड़ते हुए !
          ये लड़कियां भारत की नई इबारत लिख रहीं हैं !

9 comments:

  1. bilkul sehmat hoon aapse Minakshi jee...mere ofice me to mahilaon aur purushon ka anupaat kafi santulit hai.

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  2. बहुत सुन्दर और प्रभावशाली आलेख्।

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  3. bahut achchi rachna ..padhkar ek naya josh jaga ..

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  4. होंसला अफजाई के लिए आप सबका शुक्रिया दोस्त !

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  5. दोस्तों
    आपनी पोस्ट सोमवार(10-1-2011) के चर्चामंच पर देखिये ..........कल वक्त नहीं मिलेगा इसलिए आज ही बता रही हूँ ...........सोमवार को चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराएँगे तो हार्दिक ख़ुशी होगी और हमारा हौसला भी बढेगा.
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  6. शुक्रिया दोस्त !

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  7. --इस जोश में होश न खोयें नारियां..तभी इस बदलाव का समाज को लाभ होपायगा , नहीं तो पाश्चात्य-जगत की भांति....

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  8. नहीं नहीं एसा नहीं होगा श्याम जी हमारा देश संस्कारों से भरा हुआ है और वो एसा कभी नहीं करेंगी क्युकी प्यार और विश्वास तो हर दिशा को सही मोड़ ही देती है न !
    लेख मै आपने विचार देने के लिए आपका शुक्रिया !

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  9. बहुत सुन्दर आलेख्।

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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