Tuesday, January 4, 2011

पुराने भूले बिसरे देश भक्ति के गीत...स्व-जगन्नाथ प्र.गुप्ता....




कुछ पुराने भूले -बिसरे देश भक्ति के गीत - गायक ---स्व जगन्नाथ प्रसाद गुप्त -----

----पुराने कागज़ खंगालते हुए मुझे अपने पूज्य पिताजी स्व. जगन्नाथ प्रसाद गुप्त जी का एक पुराना कापी का पेज मिला जिसपर स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय का उनका लिखा हुआ बहुत पुराना गीत लिखा था, जिसे पिताजी सदा गुनुगुनाया करते थे | यह गीत वे स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों आज़ादी के दीवानों के साथ टोलियों में जा-जाकर सारे गाँव में गाया करते थे , प्रभात सांध्य फेरी के साथ आज़ादी की अलख जगाते हुए --- प्रस्तुत है उनमें लिखे ये गीत .......
गीत -( गीत १२)---अधूरा....
जब गुरु गोविन्द ने यह देखा धर्म की होरही हानी,....हाँ हानी ..
कूद पड़े सेना लेकरके धर्म पै बलि बलि जावो।.....बलि बलि जावो ..
देखो झांसी वाली नी भी कैसी तेग चलाई,....हाँ कैसी तेग चलाई...
मार गिरावो शत्रु सारे देश की लाज बचावो। ...लाज बचावो...
धर्म पै प्राण न्योछावर करदिये गुरु गोविन्द के लालों ने..... हाँ गुरु....
नित्य ही एसे धर्मवीर के सब मिलि कर गुण गावो....| हाँ गावो
....


गीत -.( गीत . १३)
इतिहास गारहा है दिनरात गुण हमारा ,
दुनिया के लोगो सुनलो यह देश है हमारा |

इस पर जनम लिया है इसका पीया है पानी,
यह माता है हमारी, यह है पिता हमारा

वह देवता हिमालय हमको पहचानता है ,
गुण गा रही है निशि दिन गंगा की नीली धारा

गुजरे समय से पूछो, उसका हमारा नाता ,
रघुकुल की राजधानी और राम राज्य प्यारा।

पोरस की वीरता का जहलम तू ही पता दे,
यूनान का सिकंदर था तेरे तट पै हारा

हर बार याद आये गुप्तों का वह ज़माना ,
कैसे छुपा हुआ है वह स्वर्ण युग हमारा

चित्तौड़ तू ही कह दे क्षत्रान्यों के जौहर,
पद्मा की भसम मैं है जौहर छिपा हमारा।

जंगलों में था बसेरा और घास का था भोजन ,
लोगो भूल जाना परताप वह हमारा॥

गीत - -( गीत सं-१४)- अधूरा ...

हिन्दू राष्ट्र का उज्जवल काल है आता ...|
रैन गयी अब हुआ सवेरा ,
उठो जागो भागा अन्धेरा
नए सूर्य से ह्रदय हमारा,
नव जीवन है पाता ...उज्जवल.......||

निराश मन में आशा छाई,
भूले पथ पर आये।
हितअनहित का ज्ञान हुआ जब,
बढ़ा प्रेम का नाता ---उज्जवल...... ||

2 comments:

  1. श्याम जी उनके इन जोशीलें गीतों का ही कमाल है की आज हम स्वतंत्र सांस लें रहे है,आपके पूज्य पिताजी को मेरा नमस्कार और उनके इतने दुर्लभ गीतों को यहाँ पड़कर काफी अच्छा लगा..

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  2. धन्यवाद, सन्जय....प्रष्ठ भूमि का गीत शानदार है.....आवाज किसकी है?...शानदार है...

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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