Thursday, December 23, 2010

अपने अपने क्रास



                                                        परम हंस योगानंद ने क्रिसमस के अवसर पर अपने अमेरिका श्रोतओं से कहा था की ' इस ब्रह्माण्ड मै क्राइस्ट- चेतना  विशेष रूप से सक्रीय हो जाती है ! सच्चे  साधक मै विश्वयापी क्राइस्ट की भावना जन्म लेती है ! ध्यान के माध्यम से अज्ञान के बादल छितरा  जाते हैं और बंद आँखों के पीछे के अंधकार मै देवी आलोक के दर्शन होने लगते हैं ! जन - जन मै ये प्रकाश उदित हो यही इस पर्व का उद्देश्य  है !' प्रभु का अंश लेकर जब - जब कोई महान आत्मा इस धरती पर उतरती है , उसका स्वागत  करने के लिए हमे अपने दिल के दरवाजे खोल कर रखने होंगे ! तभी उस चेतना को हम आत्मसात कर पाएंगे ! ईसा मसीह ने कहा है ................' Behold I stand at the door and knock , If any man can hear my voice and open the door , I will come into him sup with him he with me '  अर्थात देखो मै तुम्हारे द्वार  पर खड़ा दस्तक दे रहा हु ! यदि कोई मेरी आवाज़ सुन कर द्वार खोलेगा तो मै अन्दर आकर उसके साथ आ कर भोजन करूँगा और वो मेरे साथ !
                राम और कृष्ण के आह्वान को भी शबरी ने सुदामा ने , विदुर ने सुना था और उनका सानिध्य पाने का सोभाग्य पाया ! ' बड़े दिन ' के झिलमिलाते उत्सव मै जन्म की बधाइयों के बीच से ईसा मसीह की क्रास पर कीलित छवि की करूणा बार - बार उभर कर आ जाती है ! सर्वशक्तिमान होते हुए भी अवतारों , महान आत्माओ को साधारण जन की तरह अपने - अपने क्रास पर लटकना पड़ता है ! यीशु की महिमा केवल मानव जाती के उद्धारक और ईश्वर के पुत्र के रूप के कारण ही नहीं , बल्कि ' सहनशीलता ' की साकार मूर्ति की वजह से भी है ! बाइबल मै कहा गया है ..............की इश्वर हम पर कभी इतना बोझ  नहीं डालता , जिसे हम सहन न कर सके ! उस दुख से  बचने के रास्ते होते हैं , पर बचाव अस्थाई ही होता है ! टाल जाने पर भी वही स्थिति दुबारा आ खड़ी होती है ! इसलिए बचने की कोशिश से कहीं  बेहतर है , उसको पार कर लेना , वश मै कर पाना ! यीशु पर भी जब पीड़ा का समय आया तो उन्होंने कहा ' प्रभु मुझे इस समय से बचाओ फिर साथ ही कहा मै इसी समय के लिए ही तो आया था ' दुख चाहे दूसरों की मुक्ति के लिए सहा जाये , चाहे आत्मविकास  के लिए या दुसरो के कर्मो के कारण सहना पड़े , ईश्वर का प्रसाद समझकर  धीरज से जो व्यक्ति सह लेता है वही कुंदन बनता है ! दुख हमारी साधना , मुक्ति और आस्था की परीक्षा है ! दुख का मातम मनाने , उसे सँभाल कर रखने से वह दुगना हो जाता है ! कष्ट के समय छोटे - छोटे सुखों को याद करने से दुख का प्रभाव कम होता है धेर्य से दुखों  को सहने के बाद पुनरुत्थान मिलता है , जेसे ईसा मसीह को मिला !
                          बुद्धिमान व्यक्ति सदेव आत्मसंतुष्टी   रूपी लो को
                            अपनी इच्छाओं की आहुती से प्रकाशमान
                                     बनाये रखते हैं !

3 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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