Wednesday, December 15, 2010

पेड़



इंसानों से बड़ा पेड़
                      मगर ज़मी से जुड़ा पेड़ !
इंसानों की खातिर फिर
                       कितने तुफानो से लड़ा पेड़ !
धरती  की भूमि पर .............
                         चित्र सरीखे खड़ा पेड़ !
जाने किसके इंतजार मै ............
                         सड़क किनारे खड़ा पेड़ !
पंडित और मोलवी की बाते सुन
                            पल भर न डिगा पेड़.!..
धूप रोक फिर छाया देकर ........
                          फ़र्ज़ निभा फिर झड़ा पेड़ !
सीने मै रख हवा बसंती
                           आंधी मै फिर उड़ा पेड़ !
खेतो मै पानी लाने को
                           बादल से जा भीड़ा  पेड़ !
फल खाए जिसने उसने ही काटा 
                           जान शर्म से गड़ा पेड़ !
इंसा की जरूरतों को पूरा करते  ...........
                           कटा ज़मी पर पड़ा पेड़ !

6 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति ,बधाई !

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  2. गहन भावों की अभिव्यक्ति !

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  3. पेड़ के प्रति आपकी भाव-पूर्ण कविता सराहनीय है....

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  4. पेड़ की आत्मकथा आपने बेहतरीन तरीके हे कही , बधाई। ,

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति....

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  6. प्रक्रति के प्रति आपका इस कदर प्यार देख कर बहुत ख़ुशी हुई दोस्तों !
    अपना कीमती समय देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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