Tuesday, December 7, 2010

पढ़िए सत्ता की सबसे बड़ी दलाली की कहानी

हिन्दुस्तान में आज 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला छाया हुआ जन्हा तंहा इसकी चर्चा चल रही है लोग अपनी अपनी राय देने से नहीं चूक रहे है,तो कही कुछ ऐसे भी है जिन्हें 2 जी स्पेक्ट्रम क्या   है यह समझ ही नहीं आ रहा है तो घोटाला थोड़ी दूर की बात है तो आज हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे है 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की परिभाषा और आखिर इतने बड़े घोटाले को कैसे अंजाम दिया गया इसकी जांच रिपोर्ट,तो 2 जी स्पेक्ट्रम पर दीजिए अपनी राय..




मनमाने तरीके से बदले नियमः
 1995 में जब मोबाइल टेलीफोन सेवा शुरू हुई तो काल दर 16.80 रुपए प्रति मिनट थी। आज यह 25 पैसे तक आ गई है। इस बीच केंद्र में पांच सरकारें बदल गईं। तब मोबाइल ऑपरेटर रेवेन्यू शेयरिंग के आधार पर काम कर रहे थे। सरकार 1998 में नेशनल टेलीकॉम पालिसी लाई।


इसमें आपरेटरों को लाइसेंस देने का प्रावधान किया गया। सरकार को अच्छा पैसा मिला। 2007 में सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम नीलाम करने का फैसला किया। इस नीलामी में सरकार को कुल नौ हजार करोड़ रुपए मिले जबकि सीएजी के अनुमान के अनुसार उसे एक लाख पचासी हजार करोड़ रुपए से अधिक की कमाई होनी चाहिए थी।


राजा पर आरोप है कि उन्होंने नीलामी की शर्तो में मनचाहे बदलाव किए। प्रधानमंत्री, कानून मंत्री और वित्त मंत्री की सलाह को अनदेखा किया। उन्होंने ऐसी कंपनियों को कौड़ियों के भाव स्पेक्ट्रम दिया जिनके पास न तो इस क्षेत्र में काम का कोई अनुभव था और न ही जरूरी पूंजी। उन्होंने चंद कंपनियों को फायदा पहंचाने के लिए बनाई और बदली सरकारी नीतियां। लेकिन गठबंधन की राजनीति की दुहाई देते हुए प्रधानमंत्री राजा के खिलाफ विपक्ष, अदालत और सीएजी के आरोप, शिकायतें, टिप्पणियों और रिपोर्टो के बावजूद पूरे तीन साल तक चुप्पी साधे रहे। भास्कर ने पाठकों के लिए तफसील से समझा पूरे घोटाले को..

क्या है 2 जी?

- सेकंड जनरेशन सेलुलर टेलीकॉम नेटवर्क को 1991 में पहली बार फिनलैंड में लांच किया गया था। यह मोबाइल फोन के पहले से मौजूद नेटवर्क से ज्यादा असरदार तकनीक है। इसमें एसएमएस डाटा सर्विस शुरू की गई।

- राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण ट्राई के नियमों की धज्जियां उड़ाईं।

क्या थे नियम

- लाइसेंस की संख्या की बंदिश नहीं

- इकरारनामे में कोई बदलाव नहीं

- प्रक्रिया के समापन तक विलयन और अधिग्रहण नहीं हो सकता

- बाजार भाव से प्रवेश शुल्क

राजा के कानून

- 575 आवेदनों में से 122 को लाइसेंस

- स्वॉन और यूनिटेक के अधिग्रहण को मंजूरी

- इकरारनामे को बदला गया

- 2001 की दरों पर

क्या तरीके अपनाए

- बिल्डर और ऐसी कंपनियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन लगाए, जिनका टेलीकॉम क्षेत्र में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। रियल स्टेट क्षेत्र की कंपनियों को टेलीकाम लाइसेंस दिया।

- बाहरी निवेशकों को बाहर रखने के लिए अंतिम तिथि को मनमाने ढंग से पहले तय कर दिया गया।

- पहले आओ, पहले पाओ का नियम बना दिया, 575 में से 122 को लाइसेंस दे दिए।

- घोषणा की कि ट्राई की सिफारिशों पर अमल हो रहा है, लेकिन पांच में से चार सिफारिशें बदल दी गईं।

- केबिनेट, टेलीकॉम कमिश्नर और ईजीओएम को दरकिनार किया।

सीएजी रिपोर्ट में

- नुकसान का आंकड़ा 1,76,379 करोड़ रुपए

- लाइसेंस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशों की अनदेखी

- नीलामी से जुड़ी वित्त मंत्री की जरूरी सिफारिशों को सुना नहीं

- 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में टेलीकॉम सचिव के नोट को अनदेखा किया।

- ट्राई के उस पत्र को देखा तक नहीं, जिसमें उसकी सिफारिशों की उपेक्षा नहीं करने को कहा गया।

सात साल पुराने रेट पर स्पेक्ट्रम की बंदरबांट

राजा ने नौ टेलीकॉम कंपनियों को 122 सर्किल में सेवाएं शुरू करने का लाइसेंस दिया। लेकिन प्रक्रिया पर तभी सवाल उठे। आवेदन की अंतिम तारीख एक अक्टूबर घोषित की। बाद में कहा कि स्पेक्ट्रम सीमित होने के कारण 25 सितंबर के बाद मिले आवेदनों पर विचार नहीं होगा। हर कंपनी से 1658 करोड़ रुपए लेकर देश भर में सेवाएं शुरू करने की अनुमति दे दी गई। यह मूल्य सरकार द्वारा 2001 में तय रेट पर लिया गया जबकि 2007 तक टेलीकॉम क्षेत्र कई सौ गुना बढ़ चुका था।

1658 से 10,000 करोड़ बनाए चंद दिनों में

स्वॉन टेलीकॉम को लाइसेंस 1600 करोड़ रुपए में मिला। कुछ दिनों बाद उसने 45 प्रतिशत शेयर सऊदी अरब की इटिसलाट को 4500 करोड़ में बेच दिए। यानी लाइसेंस मिलने के बाद कंपनी का मूल्यांकन 10,000 करोड़ रुपए हो गया। इसी तरह यूनिटेक ने 60 प्रतिशत हिस्सेदारी नार्वे की टेलीनॉर को 6000 करोड़ में बेच दी। तब तक इन दोनों के पास एक भी उपभोक्ता नहीं था। न ही सेवाएं शुरू हुई थीं।
रिपोर्ट भास्कर के लेख पर आधारित एवं साभार प्रकाशित  

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