Tuesday, November 9, 2010

माँ का दुलारा


माँ माँ के इस क्रंदन ने ,
हर माँ को आज जगाया है !
मत रो माँ के दुलारे तू ,
तेरे सर पे तो हर माँ का साया है !
तू क्यु इस कदर बैचेन हो जाता है ,
ये तो सब उसका ही नियम बनाया है !
जो इस धरती  पर आता है ,
उसको तो इक दिन जाना है !
माँ शब्द ही एसा निराला है ,
जो सबके मन को भाता है !
फिर तुम इससे केसे बचते ,
और अपनी बात न फिर कहते !
माँ ने तो अपना फ़र्ज़ अदा किया ,
तेरे हाथो मै देश को सोंप दिया !
अब तुने फ़र्ज़ निभाना है ,
उसका बेटा बन दिखलाना है !
फिर उसकी ही गोदी मै बैठकर ,
अपना ये दर्द मिटाना है !
और हर माँ की दुवाओ को  ,
अपनी ताक़त फिर से बनाना है !

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर और मार्मिक कविता है

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  2. maa shabd hi aisa hai jisme bachche ki sari duniya simti hai .kavita achhi lagi...

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  3. sanjay really a heart touching poem. go ahead without any break. best of luck.

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  4. बहुत बहुत धन्यवाद दोस्तों !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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