Tuesday, October 26, 2010

चाँद


बीते लम्हों की ही तो ये  बात है !
फुर्सत के पलों की ही तो ये  रात  है !
जब चाँद के पहलु मै हम बेठे  रहते थे !
उसे निहारते -२ ही न हम थकते थे !
कितनी हसीन लगती थी वो चांदनी रात !
जब खामोश रात मै उसकी चांदनी बिखरती थी !
हर तरफ नूर ही नूर बरसती थी !
खामोश तन्हाई भी जेसे हसीं लगती थी !
जब कोई न था पर चाँद का दामन हमारे पास था !
वो तो जेसे हरदम हमारे साथ था !
आज तो लगता है जेसे मुदते ही बीत गई!
उसके दीदार को आँखे जेसे तरस गई !
आज कल चाँद के लिए फुर्सत किसके पास है !
ये तो सब  वक़्त वक़्त की बात है !
कल तक हम उसके पहलु से बँधे फिरते थे !
सुना है आज वो हमे अपनी आगोश मै लेने को बेकरार है !


2 comments:

  1. अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां ॰॰॰॰ आपकी रचना की तारीफ को शब्दों के धागों में पिरोना मेरे लिये संभव नहीं

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  2. आपका बहुत बहुत धन्यवाद दोस्त की आप अपना कीमती समय हमारे लेख को देते हो

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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