Wednesday, October 20, 2010

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल .....

मिली हवाओं में उड़ने की ये सज़ा यारो।
कि मैं जमीं के रिश्तों से गया कट यारो।

देख परफ्यूम , आई-पोड सजे मालों को,
जी चमेली की गंध से गया हट यारो।

मस्त रेस्त्रां के वो सिज़लर औ विदेशी डिश में,
भूला चौके की वो भीनी सी गंध तक यारो।

पल में उड़कर के हवा में हर शहर जाऊं ,
हमसफ़र, राह औ किस्सों से गया कट यारो।

आधुनिक चलन है, बोतल का नीर पीते हैं ,
नीर नदियों का तो कीचड से गया पट यारो।

जब से उड़ने लगे हम ,श्याम' प्रगति के पथ पर,
अपनी संस्कृति से ही मानव गया नट यारो॥





4 comments:

  1. मिली हवाओं में उड़ने की ये सज़ा यारो।
    कि मैं जमीं के रिश्तों से गया कट यारो।

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  2. बहुत खूब..श्याम जी बहुत सुन्दर रचना...

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  3. mai har-pal us-pal ko jiney key liye gaya taras yaaron...

    Doctor Saab, bohot hi badiyan... dil ko chu gayi aapki rachna...

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--- संजय सेन सागर

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