Sunday, October 17, 2010

क्या वाकई जयपुर के लिए 12.5 हजार करोड़ लागत की मेट्रो रेल जरूरी है?

यह रकम इतनी बड़ी है कि शहर के पांच लाख परिवारों को एक-एक मारुति कार दी जा सकती है। इस भारी भरकम खर्च पर सवाल उठाते हुए राजस्थान के पूर्व वित्त मंत्री मानिकचंद सुराणा ने जयपुर मेट्रो परियोजना को अव्यावहारिक करार दिया है। सुराणा का कहना है कि जयपुर मेट्रो रेल के बजाय राज्य के बाकी सभी 165 छोटे शहरों में 70-70 करोड़ रु. के विकास कार्य कर इनका कायाकल्प किया जा सकता है।

उनका तर्क है कि मेट्रो के पहले चरण में मानसरोवर से चांदपोल के बीच 2 लाख और दूसरे चरण में सीतापुरा-अंबाबाड़ी रूट पर 4 लाख यात्रियों को आधार मानकर परियोजना शुरू की जा रही है जबकि इन रूट पर चल रही लो-फ्लोर बसों में रोजाना औसतन 10-12 हजार यात्री ही सफर करते हैं। ऐसे में यहां मेट्रो के लिए 6 लाख यात्री कहां से आएंगे?

मेट्रो के प्रस्तावित रूटों पर यहां सिर्फ 12 करोड़ रुपये खर्च कर 46 नई लो फ्लोर बसें लगाई जा सकती हैं, जिससे आवागमन की समस्या काफी हद तक सुलझ जाएगी। सुराणा का आरोप है कि राजस्थान सरकार ने अपनी नाकामियां छिपाने के लिए मेट्रो का ख्वाब दिखाया है। शहर में हाल में शुरू की गई लो-फ्लोर बसों का इस्तेमाल करने वाली आबादी को आधार माने तो शहर में मेट्रो चलाना घाटे का सौदा साबित होगा। अगर मेट्रो को लो-फ्लोर बस के मुकाबले दो गुना यात्री भी मिलें तो भी उसे साल में 10-15 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाई नहीं होगी।

मेट्रो रेल और बस की क्या तुलना

जयपुर मेट्रो की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने वाली दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन-डीएमआरसी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ललित मेघनानी का कहना है कि मेट्रो रेल और बस के बीच तुलना नहीं की जा सकती। जयपुर मेट्रो परियोजना को तैयार करने में इसकी उपयोगिता और शहर की जरूरत का पूरा ध्यान रखा गया है। मेघनानी का दावा है कि शहर के 10 हजार लोगों की राय लेने के बाद ही मेट्रो परियोजना तैयार की गई है।

जयपुर में दो रूटों पर 36.2 किलोमीटर लंबी मेट्रो रेल परियोजना का पूरा खर्च राज्य सरकार को उठाना है जिसके लिए करों में बढ़ोतरी और नए कर लगाए जाने की आशंका है। दिल्ली मेट्रो के लिए जहां भारत सरकार को जापान की आर्थिक और तकनीकी सहायता मिली है वहीं जयपुर मेट्रो के बजट पूरा दारोमदार राज्य सरकार पर ही रहेगा और तकनीकी सहयोग दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन से मिलेगा। 

क्या कहते हैं शहरी विकास मंत्री? 

मेट्रो पर खर्च

कुल लागत : 12000 करोड़ रुपये 
प्रथम चरण: मानसरोवर-चांदपोल - 9.2 किलोमीटर- 1250 करोड़ रुपये 
दूसरा चरण: सीतापुरा-अंबाबाड़ी- 27 किलोमीटर- 7850 करोड़ रुपये 
जमीन: 120 एकड़ - करीब 1600 करोड़ रुपये 
कौन खर्च करेगा कितना: 
प्रथम चरण का खर्च: 1250 करोड़ रुपये 
राज्य सरकार: 600 करोड़ रुपये 
जेडीए: 150 करोड़ रुपये 
हाउसिंग बोर्ड: 100 करोड़ रुपये 
रीको: 100 करोड़ रुपये 
कर्ज: 300 करोड़ रुपये 

पब्लिक ट्रांसपोर्ट की वायबिलिटी होती ही नहीं है : धारीवाल

कभी भी कोई भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की इकॉनोमिक वायबिलिटी नहीं होती। दिल्ली की मेट्रो भी नुकसान में है और वहां भी वायबिलिटी गैप है। पांचों जगहों की मेट्रो भी नुकसान में रहेंगी। जिन राज्यों में रोडवेज की बसें चल रही हैं, वे भी नुकसान में हैं। यह तो सरकार का सामाजिक दायित्व है। इसमें नफा या नुकसान नहीं देखा जाता। मेट्रो आगे 10 साल बाद जब यातायात बढ़ेगा तो वायबल हो जाएगी। उनके पास इसकी स्टडी क्या है कि मेट्रो में लोग नहीं बैठेंगे।

हमारे पास तो डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर)है। डीएमआरसी की डीपीआर अलग है। इसके लिए पीपीपी मोड पर जो भी कंसलटेंट आएगा वो अपना अलग सर्वे कराएगा। - शांति धारीवाल, नगरीय विकास मंत्री


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