Saturday, September 18, 2010

क्रांति ही जीवन

                       मनुष्य हर वक़त विवादों में घिरे रहना पसंद करता है क्युकी यही उसे आगे बड़ने की राह दिखाती है अगर वो एसा  न करे तो आगे का सफ़र उसके लिए मुश्किल हो जाता है ! मानव का स्वभाव  ही कुच्छ एसा है की वो जितनी भी मेहनत करता है तो उसके पिच्छे उसका अपना सवार्थ है ! उसका अंदाज अलग हो सकता है पर  लक्ष्य सिर्फ एक की मुझे ख़ुशी केसे मिलेगी ?  क्या करने से मिलेगी ? हम सब  इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं पर इस सत्य को अपनाने से इंकार करते हैं ! जीवन में हम जितनी मेहनत करते हैं हमे सिर्फ वही वापस मिलता है लेकिन फिर भी हम किसी दुसरे का सहारा खोजते रहते हैं की शायद वो हमसे बेहतर हमारे लिए कर सकेगा ! कहने का तात्पर्य यह है की जब सब कुच्छ हमारे करने पर ही निर्फर है तो फिर क्यु  न खुद आगे बड़  कर उसे अंजाम तक पहुचाया जाये !                                                                                                                  
                                                    अब राजनीति को ही ले लो जो कहती है की भविष्य में इक्सवी सदी लानी है वो खुद यहाँ नहीं है तो इकिस्वी सदी तो बहुत दूर की बात है जिनका आधार ही दुसरो की मेहनत पर टिका हो वो हमे आगे कहाँ तक ले जायेंगे ! हर नेता किसी न किसी ज्योतिष , महात्मा को अपना गुरु बनाये बैठा है जिसे अपने भविष्य की खबर नहीं वो हमारा भविष्य केसे सवार सकता है ! जिसका सारा वक़्त अपने आप को सुरक्षित रखने में ही बीत जाता हो वो हमारी सुरक्षा का इंतजाम केसे जुटा पायेगी ! उनका सारा समय अपने २ सवार्थ के लिए खिंचा तानी में ही बीत जाता है उनके लिए जनता के लिए समय निकल पाना केसे संभव हो सकता है हमे तो इनकी इस मेहनत पर तरस खाना चाहिए की इतनी मेहनत के बाद भी कुच्छ को ही सफलता मिल पाती है और हम हैं की ये सब  जानते हुए भी बार २ अपने भविष्य की डोर इनके हाथो में थाम देते हैं ! जब ये तय है की मनुष्य सिर्फ अपने लिए ही जीता है तो फिर बार २ ये गलती क्यु करे मेहनत खुद करते हैं और उसका इनाम दुसरे  को सोंप देते हैं ! हमे तो गर्व होना चाहिए की हमारी वजह से उनका जीवन इतना सुखमय व्येतित हो हो रहा है !राजनीति तो एसा खेल है की जो इन्सान को कभी मिलकर रहने ही  न दे वो सिर्फ और सिर्फ तोड़ सकती है उसका काम इन्सान को इन्सान से अलग करना है न की जोड़ना ! वो धर्मो को कभी एक जुट रहने ही नहीं दे सकती उनका काम है इंसानों को धर्मो  में बाँटना और उनके बीच  में दूरिय पैदा करना क्युकी अगर वो एसा नहीं करते हैं तो हमारा विश्वास केसे जीत पाएंगे !और अगर हमसब एक हो गए तो  शिकायत कीससे होगी और फिर नेताओ का क्या  काम तब तो हमारा अपना फेसला और अपना जीवन होगा !राजनीति मनष्य को कभी विकसित होते देख ही नहीं सकती क्युकी जितना मनुष्य विकसित होगा , उतना ही उसे गुलाम बनाना मुश्किल हो जायेगा उतना ही उसे सवतंत्र होने से रोकना मुश्किल हो जायेगा ! जरुरत सिर्फ अपनेआप को   समझने की है की में क्या हु और क्या चाहता हु जब में हु तभी तो धरम है ! हर धरम इन्सान को मिलकर रहने की बात कहता है  तो फिर आज देश में इतना शोर क्यु  मचा हुआ है लोग एक दुसरे को मार रहे हैं और दुहाई धरम  की दे रहे हैं  तो ये कोंन  सा धरम है जो एसा करने की इज़ाज़त दे रहा है और हर घर हर रोज मातम माना रहा है और इसे खेलने वाला बेखबर बैठा है ,तो किस काम की वो राजनीति जिसके हाथ में इतने भरोसे से हम अपना जीवन सोंप देते हैं और समय आने पर वो हमारी रक्षा भी नहीं कर पाती ! इनसब बातो से तो इसमें इन सबका अपना ही सवार्थ साफ़ नज़र आता है !जब ये बात सही लगती है तो क्यु  न हम अपना जीवन अपने भरोसे जी कर देखे और  अपने जीवन को अपने आप खुबसूरत बनाये!  
                           
               सवतंत्रता एक क्रांति का नाम है वो हमे भविष्य में आगे ले जा सकती है क्रांति  तभी संभव है हो सकती है जब हम पुराने को छोड़ कर नए को अपनाने की हिमत कर सके पर ये सब  करना हमारे लिए बहुत मुश्किल काम है पर असंभव नहीं ! इसका कारन ये है की हम पुराने से अच्छी तरह से वाकिफ होते हैं हम उसके अच्छे बुरे से भली भांति परिचित होते हैं इसलिए बार २ उसी तरफ बढ जाते हैं बेशक उससे हमे कितनी भी तकलीफ क्यु  न हो रही हो पर हमे उसकी आदत जो पड़ गई है ! नए को अपनाने में हमे घबराहट होती है क्युकी उसके बारे में हम कुच्छ नहीं जानते इसलिए हिम्मत नहीं जुटा पाते और वही घिसी पीटी  जिंदगी जीते चले जाते हैं और उसी में संतोष करते रहते हैं ! जबकि संतोष में सुख नहीं बल्कि सुखी इन्सान में संतोष होता है ! इसलिए हमे अगर जीवन में क्रांति लानी है तो हमे पुराने का त्याग करके नये को धारण करना ही होगा !     

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