Tuesday, September 28, 2010

एहसास


क्या कहे केसी हसीं वो शाम थी !
ना जाने किसकी याद हमारे पास थी !
सर्द हवाओ का प्यारा सा एहसास था !
मद मस्त मंद-मंद हवाओ का प्यार था !
जान कर हम ना जाने क्यु अनजान थे !
मीठे -मीठे दर्द से आज भी  बेजान थे !
 सर्द हवाए जेसे बदन को छु रही थी !
प्यारी-२बाते किसी की दिल मै उतर रही थी!
मीठे २ दर्द का एहसास  दिल के करीब था !
कहते भी कीससे हर कोई हमसे जो दूर था !
रात ने भी जेसे २ दस्तक देना शुरू किया !
नीद ने भी अपनी आग़ोश मै लेना शुरू किया !
बात जहां से शुरू हुई वही पर ख़तम हुई !
यादे भी अपने  पंख समेटे हमसे विदा हुई !
अब ना जाने हमको वो अपना कब पैगाम सुनाएगी  !
प्यारे प्यारे छोको से फिर से हमे जगाएगी !

4 comments:

  1. यादे भी अपने पंख समेटे हमसे विदा हुई !
    अब ना जाने हमको वो अपना कब पैगाम सुनाएगी !
    प्यारे प्यारे छोको से फिर से हमे जगाएगी !


    .बहुत ख़ूबसूरत...ख़ासतौर पर आख़िरी की पंक्तियाँ....मेरा ब्लॉग पर आने और हौसलाअफज़ाई के लिए शुक़्रिया..

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  2. bahut khoobsurt
    mahnat safal hui
    yu hi likhate raho tumhe padhana acha lagata hai.

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  3. धन्यवाद दोस्त हमे भी आपके विचारो को इंतजार हमेशा रहता है !

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  4. बात जहां से शुरू हुई वही पर ख़तम हुई !
    यादे भी अपने पंख समेटे हमसे विदा हुई

    इन शब्दों ने सबसे अधिक प्रभावित किया...बहुत खूब..उम्मीद है आगे भी इस तरह की रचनाओं को हमारे सामने परोसेंगी..शुक्रिया

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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