Friday, September 24, 2010

खुदा

    तेरी रहमत का मुझको कोई गिला नहीं है ये खुदा !

तेरे अंदाजे ब्यान के तो कायल हैं हम सभी  !
तेरे इतने करीब होके भी तुझसे दूर क्यु हैं हम !
तेरी इस हसीं अदा से आज भी वाकिफ क्यु नहीं है हम !
ये हम  जानते की सब कुच्छ तेरे रहमो कर्म पे है !
फिर क्यु  आपस में ही  लड़- झगड़ रहे हैं हम !
इसका एहसास तू सबको करा दे ये मेरे मालिक !
तेरे ही बनाये बन्दों में अक्ल  की थोड़ी कमी क्यु है!
एक बार फिर से आ कर ये एहसास जगा जा तू !
शायद वो भूली याद फिर से कोई कमाल कर जाये !
और तेरी रोज़ की परेशानियों का कुच्छ हल निकल आये !   

3 comments:

  1. मीनीक्षी जी, एक सार्थक रचना का सृजन किया है आपने। बधाई स्वीकारें।
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    प्यार का तावीज..
    सर्प दंश से कैसे बचा जा सकता है?

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  2. धन्यवाद दोस्तों !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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