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१० मिनट १० गोलिया और सारी दिल्ली झावनी मै तब्दील


              '' १० मिनट १० गोलिया और सारी दिल्ली झावनी मै तब्दील  '' कहने और सुनने मै कितना आसन सा लगता है ये सब ,  पर पत्रकारों का ये  काम है रोज़ी रोटी है, लिखना तो पड़ेगा ही नहीं तो देश में हो रहे गति विधियों का पता  केसे चल पायेगा ! ये हमारे देश के वो नोजवान हैं जो जान हथेली मै रख कर ये सब खबर हम तक पहुचाते हैं और हम अपने घर मै बैठ कर सुबह की चाय के साथ इसका आनंद उठाते हैं ! कल जेसे ही हमने भी कुच्छ इसी अंदाज़ मै चाय के कप के साथ ये खबर पड़ी दुख तो हुआ पर उतना नहीं जिनके साथ ये हादसा हुआ होगा जितना वो मिनट मै १० गोलियों ने उनके साथ हकीकत  मै किया होगा ! क्या हो गया है हमारे देश की जनता को की सिर्फ दो लोग थोड़े २ समय मै हमारे देश के अलग २ कोने मै हलचल सी मचा देते हैं और वो कोई और नहीं हमारे ही देश मै रहने वालो मै से होते हैं अगर ये भी कह दिया जाये की हमारे ही देश के नागरिक तो ये भी गलत नहीं हो होगा  और हम इतनी बड़ी तादात मै उन्हें कोई सबक नहीं सिखा पाते और इसी कमजोरी का फायदा वो हर बार उठाते हैं और हम दुसरो की इंतजार मै रह कर उन्हें आगे बढ कर रोक भी नहीं पाते ! ये कोई और नहीं हमारे ही देश का एक एसा युवावर्ग है जो हमारी वजह से समय न दे पाने की वजह से किसी येसे लोगो के  पास पहुँच गई है जिनका मकसद सिर्फ दहशत फेलाना और अराजकता फेलाकर देश को कमजोर बनाना है ! और हमारा एसा युवावर्ग जो अपनी भावनाओ को किसी के सामने रखने मै हिचकिचाता  है अपनी परेशानी को किसी से बाँट नहीं पाता उस  युवावर्ग का इस्तेमाल एसे  लोग बखूबी उनकी भावनाओ से खेल कर करते हैं जिनका अंदाज़ा उन्हें उस वक़्त चलता है जब वे अपना सब कुच्छ गवां बैठते हैं ! क्युकी उस वक़्त का गरम खून और और लालच उनकी आखो मै थोड़ी देर के लिए पर्दा कर देती है और बिना सोचे समझे किसी भी अंजाम तक पहुँचने के लिए तैयार हो जाते हैं क्युकी उनकी नीव इतनी कमज़ोर होती है की वो किसी के सामने आने से घबराते हैं और अपनी कुंठित  भावनाओ का बदला वो जनता से लेने के लिए ये रास्ता चुन लेते हैं और जब होश आती है तो बहुत देर हो गई होती है ! जिसकी नीव ही इतनी कमजोर हो जो खुल कर हमारे सामने आने से पहले अपनी सुरक्षा  के बारे मै सोचता हो वो हमसे ताक़तवर केसे हो सकता है होता तो वो भी हममे  से एक ही  है तो क्यु  न हिम्मत से मिलकर उसका सामना करे और देश के प्रति हम भी अपना फ़र्ज़ अदा करे ! इसी घटना के दोरान एक व्यक्ति ने कहा , की वो २ लोग थे जिन्होंने गोलिया चलाई जब मैने उन्हें देखा तो मै पत्थर ले कर उनकी तरफ भगा और वो भाग खड़े हुए कितना जोश था इन शब्दों मै अगर उस के साथ मिलकर कुच्छ और लोग हिम्मत दीखते तो शायद इस तरह की वारदातों मै कमी आ जाये ! इस बात से ये बात तो साफ़ है की मरने का खोफ तो उनमे भी उतना ही है जितना हम लोगो मै तो हम भी क्यु न उन्ही की तरह हिम्मत से काम ल़े 
                                                                                जब भी एसी घटना होती है हम दुसरे देशो पर उंगली उठाना शुरू कर देते हैं बाहर  झांकने से पहले हमे अपने घर अपने देश के नागरिको पर नज़र डालनी चाहिए !  रामायण मै एक बहुत  ही सुन्दर पंक्ति लिखी गई है  '' घर का भेदी लंका ढाहे '' सुनने मै बहुत बुरा लगता है पर ये शब्द हकीकत बयान भी करता है ! जब तक हम अपने देश की खबर बहार जाने से नहीं रोकेंगे तब तक एसी वारदातों को होने से कोई नहीं रोक सकता !  क्युकी दूसरा देश तो सिर्फ योजना बनाता  हैं और उसी  देश के नागरिको का इस्तेमाल उसी के देश मै करता है और इसका शिकार बनते हैं हमारे   देश के वही भोले भाले युवावर्ग जो अपनी बात किसी से नहीं कह पाते हैं और उन्ही की भावनाए दाव पर लग जाती हैं ! वह युवा कोई और नहीं आपके या हमारे ही घर का सदस्य होता है बस हमे उन्ही का विश्वास जितना है उन्हें प्यार दुलार से बड़ा करना है उनके अन्दर अच्छे २ संस्कारो को जनम देना है जिससे वो गलत राह पकड़ने से पहले अच्छे और बुरे का फर्क कर सके वो हर सदस्य की भावनाओ को समझ सके और एक दुसरे से अपनी बात को कहने की हिम्मत कर सके हमे जरुरत सिर्फ और सिर्फ उन सदस्यों की तरफ ध्यान देना हैं जो आज के युग मै ५ या ६ लोगो से बना है अगर हम इनकी परवरिश अच्छे संस्कारो से करते  हैं तो फिर हम सभी परिवारों  को जोड़  कर एक अच्छे देश , अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं और ये २ मिनट मै १० गोली का काम हमेशा के लिए तमाम कर सकते हैं !
                                                                                                                           

Comments

  1. बहुत सही कहाँ है आपने , बाहर जाकर वे प्रशिक्षित भी होकर आ जाते हैं और हमें खबर तक नहीं होती. कमी तो हमारी परवरिश में है न, हम उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहे हैं पेट की भूख बातों और वादों से नहीं बुझती है. हमारे देश में संसद में बैठकर राजनीति करने वालों के पेट खाली हैं पहले वे तो भर लें फिर देश को युवकों को देखें. मैं नहीं मानती की सारी गलती किसी दूसरे की हैं , हम अपनी अंगुली उठते हैं दूसरों की तरफ , खुद अपनी तरफ उठे अँगुलियों को भूल जाते हैं.
    करोड़ों की जनसंख्या पर सैनिक और पुलिस नजर नहीं रख सकती है. नीचे से शुरुआत कीजिये नहीं तो नींव में पलीता रखा होगा तो इमारत का खुदा ही मालिक होगा.

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  2. आपका बहुत २ धन्यवाद की आपने अपना कीमती समय निकल कर हमारे लेख को पड़ा !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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