Tuesday, September 14, 2010

मेरे दिल की जुबान है हिन्दी

62 करोड़ बोलते हैं और आप ?


हिन्दी दिवस पर हर बार की तरह कुछ परंपरागत किस्म की खबरों से आपका साबका होने ही वाला है। हिन्दी के खात्मे का मर्सिया पढ़ने और हिन्दी को बचाने के नाम पर चिंतन की सिर फुटौव्वल करने वाली गतिविधियां, चर्चा, परिचर्चाओं से संचार माध्यम अटने ही वाले हैं। अगले कुछ दिन हिन्दी के नाम पर आंसू बहाने वाले लोग हर ओर दिखने ही वाले हैं। लेकिन असली सवाल इनरस्मी गतिविधियों के बीच कहीं गुम है, क्या हमारी हिन्दी मरणासन्न है? क्या सचमुच हिन्दी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है?

जवाब है बिलकुल नहीं। कम से इस सदी की ताकत के रूप में देखे जा रहे देश के भविष्य़ को देखते हुए तो बिलकुल नहीं। इस शक्तिशाली, संभावनाशील औऱ हमारे बड़े बाजार को देखते हुए तो कतई नहीं, क्योंकि पूरे देश में सहज संचार के लिए आज भी हिन्दी का कोई विकल्प नहीं है। इसे एक तथ्य के नजरिए से देखिए...

आज के वैश्वीकृत बाजार का मूल मंत्र- थिंक ग्लोबल, गो लोकल - भी हिंदी के पक्ष में खड़ा है। शायद इसीलिए कुछ अमेरिकी बिजनेस स्कूल हिंदी सिखाने की पहल भी शुरू कर चुके हैं। कंपनियां हिन्दी पर जोर दे रही हैं। कई विदेशी विश्वविद्यालय हिन्दी में कोर्स शुरू कर रहे हैं। तकनीकी प्रगति और इंटरनेट भी इसके विस्तार में सहायक हो रहा है। ‘गूगल ट्रांसलेट’ के जरिए हिंदी से अंग्रेजी ही नहीं, बल्कि विश्व की कई भाषाओं का दोतरफा अनुवाद संभव हो गया है। इसीलिए हिन्दी भले ही अपने घर में उपेक्षित है, लेकिन इसका विस्तार जारी है। कुछ देशों में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इसे बोलता है। दुनिया के कोने-कोने में पहुंचकर हिन्दी 62 करोड़ लोगों की जुबान बन गई है। जहां विश्व में कईभाषाओं को बोलने वाले अंगुलियों में गिने जा सकते हों, वहां एक भाषा को आधा अरब से ज्‍यादा लोग बोलते हैं। ऐसे में इसके मरणासन्न होने की बात कैसे की जा सकती है।


लेकिन इन ठोस तथ्यों के बीच फिर क्यों हमें लगता है कि हिन्दी की हैसियत दोयम दर्जे की है, इसके साथ कहीं कुछ ठीक नहीं चल रहा है? तो कहीं इसका  जवाब ढूंढा जा सकता है हमारी औपनिवेशिक मानसिकता में, इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिला पाने में विफल सरकारी प्रयास में....आइए कुछ पहलुओं पर नजर  डालते हैं...


यूं तो महात्मा गांधी और महेश भट्ट में कोई समानता नहीं है। बिल्कुल भी नहीं। बस हिंदी के बारे में भट्ट शायद गांधी के अनुयायी लगते हैं। गांधी कहते थे- राष्ट्रभाषा के बिना देश गूंगा है। और भट्ट को लगता है कि हिंदी से नाम और पैसा कमाने वाले फिल्म-टीवी के सितारों के मुंह हिंदी के नाम पर बंद हो जाते हैं। इसके पीछे उनकी गुलामी की मानसिकता ही है, जोसंवाद के लिए विदेशी भाषा की मोहताज है। 

दूसरा, सरकारी प्रयासों में दृढ़ता की कमी। गांधी जी क्षमा करें, हिंदी राष्ट्रभाषा आज भी नहीं है। उसे कुछ राज्यों में राजभाषा का दर्जा जरूर मिला है, लेकिन देश का कामकाज अंग्रेजी में चल रहा है। हिन्दी को आजादी के 10 साल के भीतर राष्ट्रभाषा बनना था। आज 60 साल गुजर गए हैं।

 सहज प्रश्न है - क्या इस वजह से हम शिक्षा-साक्षरता में पिछड़ गए? शायद हां। कारण, विश्व के जिन देशों में 99 फीसदी तक साक्षरता है वहां का
सरकारी काम-पढ़ाई स्थानीय भाषा में होती है। चीन, जापान, रूस, फ्रांस आदि विकसित देश सरकार और शिक्षा को अपनी ही भाषा में बेहतर ढंग से चला रहे  हैं। दूसरी ओर, भारत समेत जिन देशों में साक्षरता दर कम है, वहां अंग्रेजी या अन्य औपनिवेशिक भाषाओं का दबदबा है।

तो, क्या हिंदी अब सिमटती जा रही है? इसका जवाब थोड़ा चौंकाने वाला है। हम सब देख रहे हैं, केंद्र-राज्य सरकारें कठिन-भारी भरकम शब्दों के बोझ तले हिंदी को दबाए बैठीं हैं। मीडिया, फिल्म-टीवी वालों को बोलचाल की हिंदी (हिन्दुस्तानी) का प्रयोग करने पर शुद्धतावादी भाषा पंडित कोस रहे हैं। पर बाजार का गणित कुछ और ही है।  अभी व्यापारिक विश्व का केंद्र अंग्रेजी बोलने वाले देशों में है। पर  जैसे ही यह केंद्र चीन-भारत जैसे देशों की ओर सरकेगा, अंग्रेजी की ऐसी प्रभुता नहीं रहेगी। इसे ऐसे समझिए, अंग्रेजी की स्थिति मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी के ‘बेस्‍ट प्लान’ की तरह ही है। डॉलर-यूरो के उतरते ही संवाद के दूसरे 'बेहतर प्लान' लागू हो जाएंगे और हिन्दी अपने आप केन्द्र में आ जाएगी।
आप सुन रहे हैं न?


 
यदि आप यह सोचते हैं कि केवल अंग्रेजी बोलने से ही आपको सम्मान मिलेगा तो आप शायद गलत हैं। दैनिक भास्कर डॉट कॉम के देश के १७ शहरों में कराए गए सर्वे में ६५ फीसदी लोगों ने यह विचार व्यक्त किए। हिंदी दिवस पर कराए गए इस सर्वे ने आम हिंदुस्तानी के मन में बरसों से बैठी इस मान्यता को ध्वस्त कर दिया है कि केवल फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना ही कहीं भी आपको सम्मान दिलाने की गारंटी बन सकता है। हालांकि, सर्वे में चौंकाने वाली यह बात भी निकल कर आई है कि सत्तर फीसदी लोग विभिन्न सरकारी और निजी कामों के दौरान भरे जाने वाले फॉर्म में हिंदी का विकल्प होने के बावजूद अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली, मुंबई लखनऊ के अलावा मप्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में हुए इस सर्वे में २१७क् से अधिक लोगों ने भागीदारी की। 
दिल से
 
 
हिन्दी की जय हो
* हिन्दी बढ़ रही हैं और बढ़ती रहेगी, हिन्दी हैं हम वतन है हिंदुस्ता हमारा, हिन्दी की जय हो। विवेक कुमार, बिहार
हिन्दी मेरी पहचान है
हिन्दी मेरी पहचान है, मेरा अभिमान है, अपनी भाषा की प्रगति के लिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए। गगन गुर्जर, रायसेन, मप्र
दिल की बात अपनी भाषा में कहें
हिन्दी मेरे दिल के बेहद करीब है और दिल की बात कहने के लिए इससे बेहतर भाषा और क्या हो सकती है।
हिन्दी हमारे दिलों को जोड़ती है 
हिन्दी हमारे दिलों को जोड़ती है और संचार की सबसे बेहतर संप्रेषण के लिए इसका ज्ञान लाभदायक है। प्रेमराम, सागर, मप्र
बढ़ी शान से बढ़ रही है हिन्दी
हिन्दी अन्य दूसरी भाषाओं के जानकार लोगों की जुबान पर भी अपना रंग दिखा रही है और बढ़ी शान से बढ़ रही है, देश के विकास में भाषा का भी उतना ही स्थान होता है जितना किसी और बात का। विकास कुमार, जबलपुर
हिन्दी की बात ही निराली है 
हिन्दी की बात ही निराली है और इसमें हिन्दी की बोली का देसी टोन मिल जाता है तो उस बात का अंदाज ही 
जुदा हो जाता है। रजत अभिनव, पटना




2 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....

    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

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  2. हिंदी दिवस पर हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाये....
    जय हिंद जय हिंदी

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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