Wednesday, August 4, 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल...कितने दूर हैं....




पास भी है किन्तु कितने दूर है ।
आपकी चाहों से भी अब दूर हैं |


आप चाहें या नहीं चाहें हमें ,
आप इस प्यासी नज़र के नूर हैं |


आप को है भूल जाने का सुरूर ,
हम भी इस दिल से मगर मज़बूर हैं |


चाह कर भी हम मना पाए नहीं ,
आपसे समझे यह कि हम मगरूर हैं |

आपको ही सिर्फ यह शिकवा नहीं ,
हम भी शिकवे-गिलों से भरपूर हैं |


आप मानें या न मानें 'श्याम हम,
आपके ख्यालों में ही मशरूर हैं ||

3 comments:

  1. Ek bahut hi ghatiya gajal hai ye.

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  2. aapne apne dil ki aakaankshaaon ko kuchh anmane bhaaw se vyakt kiyaa hai ,aapki gajal me naa lay hai naahi saroor hai ,or shabdon ko vyakt karne kaa tareekaa bhi bahut achchhaa nahin hai ,krpyaa thodaa sudhaar ho jaaye to bas majaa aa jaayegaa

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  3. बहुत ही सुंदर ..!!

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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