Sunday, August 15, 2010

मिट्टी का रंग ही है भारत का रंग



प्रसून जोशी, प्रसिद्ध गीतकार

हर शख्स की जिंदगी का विस्तार ही उसका देश है। कोई एक विचार नहीं है। हर व्यक्ति देश को अपने तरीके से परिभाषित करता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो देश था, उसमें विभाजन बिलकुल साफ था। लेकिन आज आजादी के ६३ सालों के बाद भी बहुत से लोगों के लिए देश की परिभाषा बहुत नहीं बदली है। 

हजारों सालों में हमने जो सभ्यता ईजाद की है, बेशक उसमें बहुत सारे रंग हैं, इतनी विविधता है कि किसी एक रंग से आज के हिंदुस्तान के नक्शे को भरा नहीं जा सकता। इस विविधता को देखने की भी कई नजर हो सकती है। एक नजर इतने रंगों में इंद्रधनुष का सौंदर्य देख सकती है, लेकिन एक नजर यह भी हो सकती है, जो देख पाए कि ये सारे रंग आपस में उस तरह घुले-मिले नहीं हैं, जैसा किताबों में लिखा जाता है।

आज के भारत में जो साथ होकर भी साथ नहीं हैं, वे सब अपने ही हैं और अपनों के बीच विभाजन की लंबी खाई है। ग्लोबलाइजेशन और पूंजीवाद का समर्थन करने वालों का तर्क है कि पूंजीवाद एक तालाब की तरह है, जिसमें फेंके गए हर पत्थर का प्रभाव तालाब के आखिरी सिरे तक होता है।

बेशक जहां पत्थर फेंका गया है, वहां लहरें ज्यादा होंगी और आखिरी सिरे तक पहुंचते-पहुंचते उसका असर कम हो जाएगा, लेकिन होगा जरूर। मुमकिन है यह तर्क किसी और देश पर लागू होता हो, जहां एकीकृत समाज है, लेकिन हिंदुस्तान पर लागू नहीं होता क्योंकि यहां सिर्फ एक तालाब नहीं है।

यहां अनेकों तालाब हैं और सिर्फ तालाब ही नहीं, तलैया, पोखर, बावड़ियां और जाने क्या-क्या हैं। ऐसे में सिर्फ एक पत्थर इस देश की तस्वीर नहीं बदल सकता। लेकिन अब भी कुछ उम्मीद है, जो यकीन दिलाती है कि दुनिया अब भी खूबसूरत है और वह उम्मीद है आज के हिंदुस्तान के युवा। वे ज्यादा ईमानदार, सक्षम और राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। उनका एक्सपोजर ज्यादा है और दृष्टि भी व्यापक है। आज का युवा देश के बारे में सोचता है, क्षुद्रताओं पर दुखी होता है और दुनिया को बदलने का जज्बा रखता है।

आज हिंदुस्तान का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि हमारे पास एक ठोस और स्थाई सरकार है। सबसे मजबूत लोकतंत्र है। हमारे पास चुनने की आजादी है। मेरी आंखों के सामने भारत का एक नक्शा है। इसमें बहुत से रंग हैं, लेकिन जो रंग सबसे मुखर है, वह है मिट्टी का रंग, इस देश की धरती का रंग। और कुछ चटख रंग उभर आते हैं, ऐसे रंग जो विभाजन की लकीर खींचते जान पड़ते हैं, जो मिट्टी के रंग को दबा देते हैं। फिर भी क्या असली रंग को दबाया जा सकता है? मिट्टी का रंग हर रंग पर भारी है और हमेशा रहेगा। यह रंग और रंगों को ढंक ले, बांटने वाले तमाम रंगों को मिटा दे और बस एक रंग बचा रहे - एकता का रंग, अमन का रंग और उन्नति का रंग। - प्रसून जोशी, प्रसिद्ध गीतकार

1 comment:

  1. बहुत सरलता से आप ढेर सरे प्रश्नों की उकेरा है
    यहाँ सही है कि आज का नोजवान देश के लिए सोचता है
    पर भोतिक वाद के इस दौर में हम अपनी मोलिक्क जरूरतों
    को पूरा करने में ही जुटे हैं सोह सही है पर कुछ कर गुजरने का वक़्त कि बहुत कमी है .....
    दिन भर office में थक कर जब स्याम को हर पहुँचते है तो आज कि न्यूज़ हेड लाइन देखने का भी वक़्त नहीं ............फिर आप ही बताओ....?????

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--- संजय सेन सागर

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