Saturday, August 21, 2010

साहित्य में खत्म होते गांव


विश्वनाथ त्रिपाठी 

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ग्रामीण जन-जीवन और किसानों की समस्या पर आजकल हमारे साहित्यकारों और पत्रकारों का कम ही ध्यान जाता है। बड़ी तेजी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद भारत की अधिकांश जनता अब भी गांवों में ही रह रही है और खेती-बाड़ी एवं पशुपालन ही उसकी रोजी-रोटी का मुख्य जरिया है।
 

हमारे देश में वातावरण, मौसम, जमीन, अनाज, खेती-बाड़ी के तौर-तरीके आदि में इतनी विविधता (जो हमारी कृषि संस्कृति का निर्माण करते हैं) है कि यदि हम यहां कृषि को उद्योग बनाना चाहें, तो हमारा देश संसार के सवरेत्तम देशों में एक होगा। बहुत प्रयासों के बाद और तमाम गुण-दोषों के बावजूद हमने खाद्यान्न के मामले में स्वावलंबन पा लिया था, लेकिन गलत सरकारी नीतियों के कारण देश में फिर से खाद्यान्न संकट और महंगाई पैदा हो रही है। 

इसका मूल कारण यह है कि हमारे देश में विकास और वृद्धि के अंतर को ठीक से समझा नहीं जा रहा है। वृद्धि को विकास नहीं कहा जा सकता। देश में जीडीपी के ग्रोथ और अरबपतियों के बढ़ने का मतलब यह नहीं कि यहां विकास हो रहा है, बल्कि इन सबके कारण गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ रह रही है। वृद्धि का जब जनता के बीच ठीक से वितरण होता है, तब वह विकास कहलाता है। पी. वी. नरसिंह राव के समय से जब से मनमोहन सिंह ने इस देश का वित्त संभाला है, तब से समाजवादी सपनों को सरकारी नीतियों के माध्यम से एक-एक कर तोड़ा जा रहा है। 

हमारे यहां आजादी के बाद से देखे जा रहे इस समाजवादी सपने को गांधी, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश, मौलाना आजाद, आंबेडकर, डांगे, नम्बूदरीपाद जैसे नेताओं ने गढ़ा था। आज देश की जमीन और जनता से सरोकार रखने वाला कोई नेता नहीं है। बड़े सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रच कर समाजवादी नीतियों के तहत दिए गए अधिकार और सुविधाएं देश की जनता से एक-एक कर छीने जा रहे हैं। 

गांव और खेती की जमीन का जबरन अधिग्रहण कर शहर और राजमार्ग बनाए जा रहे हैं और कॉरपोरेट घरानों को दिया जा रहा है। सबको गांव और खेती छोड़कर शहर आने के लिए बाध्य किया जा रहा है। 

गांव की तरफ बिल्कुल ध्यान न देने का मतलब है किसानों पर ध्यान न देना। नंदीग्राम, सिंगूर से लेकर मथुरा-अलीगढ़, हर जगह किसानों से खेती की जमीन छीनी जा रही है। देश के हर जगह पर छोटा-छोटा कस्बा भी शहर बनने का स्वप्न देख रहा है। महानगरों के आसपास के किसानों की जमीनें ली जा रही हैं। 

फिर जमीन जाने के बाद वे आत्महत्या कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बीज और नई-नई कृषि टेक्नोलॉजी भी आयात की जा रही है। सरकार को न किसान से मतलब है, न पर्याप्त अनाज उत्पादन की, न गोदामों में अनाज सड़ने की, और न ही महंगाई बढ़ने की चिंता है। शहरों में फलों और सब्जियों को इतना प्रदूषित कर दिया गया है कि वे खाने लायक नहीं रह गए हैं। 

अब गांव और खेती-बाड़ी जब सुनियोजित ढंग से खत्म किए जा रहे हैं तो लोग रोजी-रोटी की खोज में शहरों और महानगरों में आ रहे हैं। अन्य पढ़े-लिखे लोगों की तरह हिंदी के साहित्यकारों का एक तबका भी दिल्ली की ओर देख रहा है। दिल्ली के अलावा भोपाल, मुंबई आदि महानगर आजकल साहित्य के केंद्र हैं। इस समय हिंदी साहित्य में नया ट्रेंड यह आया है कि ऐसा साहित्य लिखा जाए, जो ग्लोबल हो यानी जो अंग्रेजी में अनूदित हो, जो अमेरिका और यूरोप में रहने वाले लोगों को पसंद आए। 

इस समय अचानक विदेश में हिंदी के पुरस्कारों की बाढ़ आ गई है। हमारे गांव, हमारी जड़, हमारी बोलियां-भाषाएं, हमारे आदिवासी, खानाबदोश जनजातियों के विविधतापूर्ण जनजीवन और उनकी जीवन स्थितियों को लेकर कितना नया और उत्कृष्ट साहित्य लिखा जा सकता है। लेकिन इसकी उपेक्षा की जा रही है। दरअसल, पूंजीवादी गिरफ्त में आ गए हैं हमारे लेखक। सब कुछ चाहिए उन्हें। यश भी। सिर्फ पैसा और पॉलिटिकल पोस्ट ही पावर नहीं होता, यश भी पावर है। 

गांधी कहते थे कि हमारा भगवान गांवों में रहता है। प्रेमचंद का लगभग पूरा साहित्य गांव और किसानी जन-जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों और कहानियों में किसानी और ग्रामीण संस्कृति को व्यापक अभिव्यक्ति मिली। ग्राम-कथाओं और ग्राम-कविताओं का भी दौर आया। हिंदी की उन रचनाओं में गांव और किसानी जन-जीवन के साथ-साथ ऋतुओं, फसलों, नदियों, इनसे जुड़े गीतों, पर्व-त्योहारों आदि का भी वर्णन मिलता था, लेकिन हमारे हिंदी साहित्य से ये सब धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। 

दलित और स्त्री लेखन को मैं आजादी के बाद हिंदी साहित्य की दो बड़ी उपलब्धियां मानता हूं, लेकिन ताज्जुब है कि उनके लेखन में भी गांव, ग्रामीण और किसानी संस्कृति आदि नहीं के बराबर आ रहे हैं। दलित साहित्य में स्त्री विचित्र रूप में आ रही है। असल में दलित और गरीब स्त्रियां अभी लिख नहीं रही हैं। 

आलो आंधारि अपवाद हैं। आज जो लिख रही हैं, वे अच्छी-अच्छी साड़ियां पहनने वाली औरतें हैं। जब दलित और गरीब औरतें लिखने लगेंगी, तब वे ये सब भी दर्ज करेंगी, ऐसी मुझे उम्मीद है। प्रेमचंद किसानों की जमीन चले जाने की वेदना को गहराई से समझते थे। प्रेमचंद का होरी जमीन बेच कर बेटी की शादी करता है। 

‘रंगभूमि’ उपन्यास का सूरदास जमीन के लिए काफी संघर्ष करता है। सूरदास दलित है, किसान और विकलांग है। इस लिहाज से देखें तो आज के दलित चित्रण और प्रेमचंद के दलित चित्रण में कितना फर्क है। ‘रंगभूमि’ के सूरदास का संघर्ष बहुत बड़ा सांस्कृतिक संदेश है। 

यह बहुत चिंता की बात है कि आज हमारे कथा साहित्य, कविता और खास तौर पर नाटकों से किसानी जन-जीवन पूरी तरह से खत्म होता जा रहा है। हमारे नाटककारों ने लोरिकायन, चनैनी, नाचा सब छोड़ दिया है। गांव की कहानी जब जाएगी, तो गांव भी चला जाएगा। जो जमीनी समस्या है, यदि हमारे लेखक उस पर ध्यान देंगे तो किसानों की समस्या, उसका हर्ष-विषाद, वहां के चरित्र सब कुछ आ जाएंगे। 

इस देश का सिर्फ आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक विकास भी होना चाहिए। वह तभी संभव है जब यहां की किसानी संस्कृति का विकास हो। यह समझ हमारे वर्तमान और भविष्य के भारत के लिए जितना पथ निर्देशक बनी रहे, उतना अच्छा है

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--- संजय सेन सागर

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