Saturday, July 10, 2010

हर दिन प्रातः उठ कर वह.. हमें पूजने आता है..




हर दिन प्रातः : : उठ कर के वह॥


मेरे समीप आटा है ॥


अपने नाजुम हाथो से॥वह॥


मेरे पैर दबाता है॥


मै गूंगा बैठा कुछ न बोलू॥


वह अपनी बात बताता है॥


अमृत गंगा के जल से वह॥


रोज़ हमें नहलाता है॥


कितना अद्भुत बालक है वह॥


मेरी ही रट लगाता है॥


कभी कभी वह पूछ बैठता॥


क्या तुम कभी न बोलो गे॥


दादा कहते तुम भोले हो।


आज नहीं कल डोलो गे॥


पाने हाथो से पुष्प पान ला॥


मुझपर रोज़ चढ़ाता॥


उस बालक की छाप निराली॥


जो हमें पूजने आता है॥


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