Friday, July 23, 2010

एक बार तो पुचकार लो..

आँख से आंसू निकलते आके इसको थाम लो॥
य तो अपने पास बुला लो य तो मुझको मार दो॥
सहन होती नहीं बिरह के आग में जल रही हूँ॥
सब्र अब टूट चुका है बिन तेरे तड़पती हूँ॥
अब आके मेरा हाथ थामो बंधन में मुझको बाँध दो॥
शाम होते ही मातम जवानी पे छा जाता है॥
सावन का सौभाग्य पास अपने बुलाता है॥
मै डूबती हूँ अधर में हे यार मुझे उबार लो॥
मैंने सजाया था जो सपना उसे टूटने मत देना॥
अपने दिल के कोने में हमें ही बसा लेना॥
दिल से जब दिल मिले बस एक बार पुचकार दो॥

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--- संजय सेन सागर

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