Saturday, July 31, 2010

मुझको भी घर जाना है...


अब छोडो ओढनिया देर भयी॥

हमको भी घर को जाना है...

पूछेगी घर में मम्मी जब॥

बोलूगी क्या बहाना है॥


बहुत देर बहुत भयी बाते करते॥

मन चंचल हो कुछ पूछ रहा॥

तुम मेरे प्राण अधरे हो॥

ये दिल तुमको बतलाय रहा॥

तेरे ही घर की बतिया अब॥

सातो जनम सजाना है॥


चर्चा गलियों में फ़ैल चुकी ॥

किस किसने नहीं जाना है॥

मैंने भी उस अन्धकार में॥

तुमको ही पहचाना है॥

तुम ही मेरी सुख सम्पाती हो॥

ये दिल ही बड़ा खजाना है...


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