Friday, July 30, 2010

तुम्हे मिलने को दिल ढूढ़ रहा.

क्या दूर गए हमें भूल गए॥
कुम्हलात कमल यूं रो रहा॥
मै धीरज न रख पाऊगी॥
तुम्हे मिलने को ढूढ़ रहा॥
मै धुप जलाना भूल गयी।
फूलो से कलियाँ रूठी है॥
तरुवर से पत्ते टूट चुके है॥
क्या जानो क्यों भूखी है॥
कानो की तरंग शांत खड़ी है॥
तेरा दिल क्यों मजबूर रहा॥
मै धीरज न रख पाऊगी॥
तुम्हे मिलने को ढूढ़ रहा॥

जब सोने जाती तुम आ जाते॥
हंस हंस के बात बताते हो॥
नींद खुले नहीं रहते तुम॥
क्यों वापस तुम चले जाते हो॥
मै मिल जाऊ उस सागर में॥
जिस सागर में दिल डूब रहा॥
मै धीरज न रख पाऊगी॥
तुम्हे मिलने को ढूढ़ रहा॥

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--- संजय सेन सागर

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