Wednesday, July 14, 2010

दूर की सोचें भारत-पाक

वेदप्रताप वैदिक

मुंबई हमले के बाद भारत-पाक संवाद में जो रुकावट आ गई थी, वह अब हटती-सी नजर आ रही है। शर्म-अल-शेख में जो चक्का जाम हुआ था, वह अब चल पड़ा है। दोनों देशों के विदेश सचिव पहले मिले, फिर गृहमंत्री मिले और अब विदेश मंत्री मिलेंगे। भारत व पाकिस्तान के लोगों के दिमाग में विदेश मंत्रियों की यह भेंट उतनी महत्वपूर्ण बन गई है, जितनी कि प्रधानमंत्रियों की होती है।

हम यह न भूलें कि यह भेंट कश्मीर के साये में हो रही है। पिछले डेढ़ हफ्ते में कश्मीर में इतना हंगामा हुआ है कि पाकिस्तान में अगर पहले जैसी सरकार होती तो वह इस भेंट को रद्द कर देती। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान अब अपने पुराने दुराग्रहों से चिपटा हुआ नहीं है। इससे आशा बंधती है कि भारतीय विदेश मंत्री को इस्लामाबाद में कश्मीर पर हमेशा की तरह कानफोड़ू राग सुनने को नहीं मिलेगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पाक सरकार कश्मीर मुद्दे को दरी के नीचे सरकाने में सफल हो जाएगी। पाकिस्तान की फौज, गुप्तचर विभाग, कुछ थिंक टैंक और सारे जिहादी अगले दो-तीन दिन में इतना दबाव बनाएंगे कि पाक सरकार यह मुद्दा उठाए बिना नहीं रह पाएगी।

इस मौके पर भारत की तरफ से यदि सच बोल दिया गया तो बात टूट जाएगी। यह मौका वही बात बोलने का है, जिससे बात न टूटे। यह बात क्या है? वही है, जो हमारे प्रधानमंत्री ने कही है, कश्मीर को सीमाविहीन सीमांत बना दें। दोनों तरफ से खोल दें। वाजपेयी सरकार ने जो पहल की थी, मनमोहन सरकार उसे अंजाम दे। अगर कश्मीर खुल जाए तो यह प्रश्न निर्थक हो जाएगा कि कश्मीर का कौन सा हिस्सा पाकिस्तान के साथ है और कौन-सा भारत के? सच यह है कि भारत-पाक के बीच कश्मीर मैत्री का सुदृढ़ सेतु बन जाएगा।

यह काम भारत जितनी आसानी से कर सकता है, पाकिस्तान नहीं कर सकता, क्योंकि कुछ साल पहले तक पाकिस्तान के लिए कश्मीर कामधेनु गाय की तरह था। पाकिस्तान ने कश्मीर को जिस बुरी तरह से दुहा, शायद दुनिया में किसी भी अन्य देश ने ऐसे मुद्दे को नहीं दुहा। कश्मीर का हौवा खड़ा करके पाकिस्तान ने खुद को टूटने से बचाया। पंजाबी, सिंधी, बलूच और पठान लोगों के नकली राष्ट्र को जोड़ने वाले सीमेंट का नाम है इस्लाम। इसी इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान ने कश्मीर का झंडा फहराया।

कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान को शीतयुद्ध के दौरान करोड़ों-अरबों डॉलर और हथियार मिले। इसके अलावा ‘लड़कर लेंगे कश्मीर’ का नारा बुलंद करके पाकिस्तान की फौज ने सर्वोच्च शिखर पर कब्जा कर लिया। अभी तक पाक की जनता को कश्मीर की इतनी ही कीमत चुकानी पड़ी थी कि उनकी छाती पर फौज सवार हो गई थी, लेकिन इधर कुछ वर्र्षो से उसे एक ऐसी कीमत चुकानी पड़ रही है, जो उसकी बर्दाश्त के बाहर है।

वह कीमत क्या है? वह है, दहशतगर्दी! आतंकवाद!! जितने लोग भारत में मारे जा रहे हैं, उससे ज्यादा पाकिस्तान में मारे जाते हैं। जिया-उल-हक मारे गए। बेनजीर मारी गई। मुशर्रफ और जरदारी बाल-बाल बचे। यह सब क्यों हुआ? क्योंकि जो आतंकवादी कश्मीर को छुड़ाने और काबुल को कब्जाने के लिए तैयार किए गए थे, उन्होंने पाकिस्तान को भस्मासुर बना दिया। मियां की जूतियां अब मियां के सिर पड़ने लगीं। पाकिस्तान का आतंकवाद पाकिस्तान को ही भस्म कर रहा है। इसीलिए पाकिस्तान भारत से बात करने के लिए उतना ही उत्सुक है, जितना कि भारत पाकिस्तान से।

इस बातचीत का केंद्रीय मुद्दा तो आतंकवाद ही होगा क्योंकि विश्व राजनीति का भी यह ‘कोर इश्यू’ है। कश्मीर अब ‘कोर इश्यू’ नहीं, ‘बोर इश्यू’ बन गया है। जब ओबामा होलब्रुक को अपना विशेष दूत बनाकर दक्षिण एशिया भेज रहे थे तो स्टेट डिपार्टमेंट ने यह स्पष्ट किया था कि वे कश्मीर पर कोई बात नहीं करेंगे। जो चीन कश्मीर पर पाकिस्तान को हमेशा भड़काता रहता था, उसने भी अब लगभग तटस्थ भाव अपना लिया है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी कश्मीर मुद्दे को दरकिनार कर दिया था। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव अब कश्मीर पर लागू नहीं होता। पाकिस्तान को इस मुद्दे पर मिलने वाला इस्लामी राष्ट्रों का समर्थन भी ढीला पड़ गया है।

हुर्रियत के नेताओं को भी अब यह पता चल गया है कि भारत ने जितनी जोर से कश्मीर को पकड़ रखा है, उससे भी ज्यादा जोर से पाकिस्तान ने पकड़ रखा है। कश्मीर को न पाकिस्तान खाली करने वाला है और न ही हिंदुस्तान। ऐसी हालत में आजादी की बात कोरा हवाई किला है। हां, अलगाव किए बिना ऐसी आजादी हर कश्मीरी को जरूर मिल सकती है, जैसी हर भारतीय को मिली हुई है। पाकिस्तानियों जैसी आजादी लेकर बेचारे कश्मीरी क्या करेंगे? कश्मीर के ज्यादातर लोग भारतीय किस्म की आजादी चाहते हैं। यही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है, जिस पर दोनों देश काम कर सकते हैं।

जहां तक जल-बंटवारा, सर क्रीक, कैदियों की मुक्ति आदि मुद्दे हैं, उन पर सार्थक बातचीत में विशेष अड़चनें दिखाई नहीं देतीं। नदियों के पानी को लेकर क्रोध का जो गुब्बारा फुलाया गया था, उसे तो पाकिस्तानी विदेश मंत्री के अपने बयान ने ही पंचर कर दिया था। सियाचिन जैसे मामलों पर वर्र्षो पहले लगभग सहमति हो चुकी थी। इन छोटे-मोटे मामलों पर ध्यान जरूर दिया जाना चाहिए, लेकिन यह वक्त दोनों मुल्कों के लिए बहुत नाजुक है। इस्लामाबाद वार्ता के दौरान सबसे जरूरी मुद्दा यह बनना चाहिए कि जुलाई 2011 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद क्या होगा? क्या भारत-पाक मिलकर कोई संयुक्त रणनीति बना सकते हैं?

यदि हां तो अभी वे आतंकवाद पर भी एकजुट हो पाएंगे और अगले एक दशक में अफगानिस्तान ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया की ही तस्वीर बदल देंगे। यदि अभी आतंकवाद से लड़ने के लिए वे कोई तात्कालिक सहमति पैदा कर लेंगे तो भी वह टिकाऊ नहीं होगी। अफगान चुनौती उसे चूर-चूर कर देगी। हमारी विदेश सचिव का यह कहना निर्थक है कि भारत-अफगान संबंधों से पाकिस्तान बिल्कुल अलग रहे। यह संभव ही नहीं है।

जरूरी यह है कि अफगानिस्तान के बारे में भारत दूरगामी नीति बनाए और दक्षिण एशियाई शतरंज पर पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण मोहरा बनाए ताकि वे दोनों मिलकर आतंकवाद को तो शिकस्त दे ही सकें, कश्मीर, पख्तूनिस्तान, तिब्बत जैसे ‘उप राष्ट्रीय’ मसलों को भी हल कर सकें। भारत और पाकिस्तान के बीच जब तक कोई दूरगामी स्पष्ट साझा दृष्टि नहीं बनती, तब तक कभी कश्मीर, कभी आतंकवाद, कभी सियाचिन, कभी बलूचिस्तान और कभी कुछ और ‘एकमात्र मुद्दे’ की जगह लेता रहेगा और दोनों देश आंख मिचौली का खेल खेलते रहेंगे। क्या दोनों देशों के सत्ता-प्रतिष्ठानों को इतनी फुर्सत और उनमें इतनी कुव्वत है कि वे तात्कालिक मुद्दों को हल करने के साथ-साथ भारत-पाक संबंधों को उस सांचे में ढाल सकें, जिसमें जर्मनी और फ्रांस तथा अमेरिका और कनाडा के संबंध ढले हैं?

लेखक प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हैं।

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--- संजय सेन सागर

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