Saturday, July 3, 2010

एक पेड़ की कथा..


दिल्ली के दील्काश बाग़ में गली नंबर सात और कोठी नंबर १७ एक आलीशान शान कोठी थी उस कोठी के अन्दर वैसे तो बहुत छोटे मोटे पेड़ थे लेकिन एक पेड़ उसमे श्रमजिव्नी का था जिसकी कुछ बात ही निराली थी लेकिन वह अपनी दशा देख कर ग्लानी करता था॥ वह पेड़ मुख्या फाटक से दस कदम की दूरी पर था॥ कोठी का मालिक व्यवसाइक था वह अपने व्यवसाय में बाहर ज्यादा ही रहता वह कभी ५ या ७ महीने में एक दो दिन के लिए आते थे। उस कोठी में दो सुरक्षा कर्मी अपनी द्युति बजा रहे थे। उसमे से एक बहुत क्रूर और चालाक था दुआसरा शांत मन था॥ दुसरे की द्युति शाम को रहती थी चालाक जो था उसकी दिन में रहती थी। शाम के समय शांत मन वाला सुरख्षा कर्मी पौधों की हालात देख कर पानी देने लगा क्यों की कोठी में कोई माली नहीं था पानी देते देते वह श्रमजिवानी पेड़ को बढ़िया से धुलाई किया और पानी से खूब सीच दिया इसी दिशा में वह पेड़ के सात चक्कर भी लगा लिया उसके बाद जब वह कुर्सी लेके पेड़ नीचे बैठा उर कुछ सोचने लगा सोचते सोचते उसे लगा की जैसे कुर्शी के साथ उसे कोई झुला रहा हो। और वह सो गया सुबह प्रात: काल ४ बजे जब वह जागा तो भी देखा की उसकी कुर्सी को झुला रहा है। वह उठाने की कोशिश करने लगा तो कुर्सी सही स्थान पर अपने आप रूक गयी॥ वह कुर्शी से उठ गया। इस अचरज भरी बात को सुरख्सा कर्मी सोचता रहा र उस पेड़ की पूजा पाठ विधि विधान से क्या और दूध भी४ पेड़ पर चढ़ाया॥ जिससे पेड़ प्रकाशं हो गया और पेड़ बोल पडा हे वत्स तुमने आज दूध चढ़ा के हमें अधिक प्रकाश मान बना दिया अब हमें तुम्हे रोज़ रात को थकी देकर के यही पर झूला झुलाए गे और तुम सो जाया करोगे॥ तुम्हे अद्भुत शक्तिया मेलेगी और शान्ति और सुखी के साथ जीवन व्यतीत कर सकते हो। यह बात सारी जगह आग की तरह फ़ैल गयी॥ कुछ दिन के बाद उसका मालिक आया तो फाटक के पास सुरक्षा कर्मी को नहीं देखा क्यों की रात को १२ बज रहे थे जब उन्धोने आगे देखा तो क्या देख रहे की उनका सुरक्षा गार्ड कुर्सी पर बैठे बैठे झूल रहा है जैसे उसे कोई झुला रहा हो॥ लेकिन मालिक साहब ने आवाज़ लगाई सुरखा कर्मी भी जाग गया वह भागने की कोशिश करने लगा तभी कुर्सी अपनी उचित स्थान पर टिक गयी वह भाग करके फाटक खोल दिया॥ मालिक उस पेड़ नीचे गया और बोला हे देव आप कौन है जो इस सुरख्षा कर्मी को झूला ल्जुला रहे थी पेड़ के पीची से घोड़े के हिनहिनाने की आवाज़ आयी दोनों पेड़ के पीछे गए वहा पर उन्हें कुछ नहीं मिला मतलब दिखाई दिया। फिर दोनों ने साथ में आवाज़ लगाई आप कौन है कहा है आप कथा का वर्णन कीजिये॥ तभी पेड़ से आवाज़ आयी हे वत्स मै एक पेड़ हूँ मेरा नाम श्रमजिव्नी है जो आदमी हमें दुःख न पहुचा कर हमारी शाखाओं के नीचे रात में सोता है वह बहुत ही भाग्यशाली होता है आप इस आदमी को नौकरी से नहीं निकलना क्यों की यही व्यक्ति के द्वारे मै बोल रहा हूँ। और प्रकाश पुन्ज्य हूँ॥ मै किशोरावस्था में ही बुढापे की तरह दिखाई दे रहा था। दुसरा जो क्रूर सुरक्षा कर्मी है वह हमें चोट पहुचाता था। और यह वेचारा शान सौकत से सुसज्जित हमारी सेवा में व्यस्त रहता था। वार्तालाप समाप्त होने के बाद मालिक कोठी के अन्दर गया और सुरक्षा कर्मी को बुलाया और बोला ये ड्रामा हमें पसंद नहीं आया। तुम अपना हिसाब किताब लो और यहाँ से रफू चक्कर हो जाओ॥ वह बिचारा सीधा मन मानुषी बहुत दिनों से अपने गाँव नहीं गया वह गाँव चला गया इशार मालिक शाहब से कोई मतलब नहीं कोई पेड़ सूखे या रहे पता नहीं अचानक एक दिन मालिक साहब दूध लेके पेड़ के पास पहुचे ही थे की तभी मधुमखियो ने हमला कर दिया और पेड़ वहा उड़ करके उस शांत मन सुरक्षा गार्ड के खेत में निवास किया देखते ही शांत शील ने गाय का दूध चढ़ाया और विधि विधान से पूजा हवन किया समस्त सुखो का भूग करते करते जीवन यापन कर रहा है॥

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--- संजय सेन सागर

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