Thursday, July 1, 2010

दिशा भटके लोग..

धुल भरी आंधी का झोका॥
आँखों में भर दिया धुल॥
मै पछताया अपनी गलती पर॥
बना समय क्यों इतना क्रूर॥
आँखों में सूजन चढ़ी॥
कुछ भी नहीं दिखाता॥
जो जाता इस रास्ते से॥
मुझे धक्के लगाता॥
साल नाटक कर रहा है॥
बीच रास्ते में मर रहा है॥
को तो ताव दिखाता ॥
लातो से मार कर॥
फिर गड्ढे में गिराते है॥
मै रोता अपने कर्म पर॥
रीति और विपरीत की ॥
दिशा भटक गए लोग है॥

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--- संजय सेन सागर

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