Tuesday, June 29, 2010

समझौता और संघर्ष का नाम है सिनेमा

विवेका बाबाजी की मौत ने हमें एक बार फिर गहन चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है, क्या हकीकत में यह आत्महत्या थी? या हत्या ? अब इस बात से बहुत भारी फर्क पड़ने वाला नहीं है क्योंकि हर सवाल का जवाब विवेका के साथ ही दफ़न हो चुका है और जो इसके लिए गुनाहगार है, वो शरीफों की बिसात में सबसे आगे खड़ें होंगे.
विवेका अपने घरवालों से दूर रखकर संघर्ष कर रही थी और सच तो ये है की उसके संघर्ष के दिन अब ख़त्म हुए थे ऐसे में उसके पास जीने की काफी वजह थी.लेकिन इस तरह से सब कुछ ख़त्म कर देना यह विवेका का उठाया कदम कभी नहीं हो सकता.

फ़िल्मी दुनिया बढ़ी ही चमक दमक से लोत पोत है जिसके लिबासों के नीचे अनगिनत लोगों की मिटने के निशाँ है वो कहते है है न की जो चीज़ जितनी जायदा सुन्दर दिखाई देती है उसके बनने की दास्ताँ उतनी ही भयानक होती है.

आज जिस तरह से युवा बर्ग फिल्मों एवं ग्लेमर के प्रति ललायित हो रहा है उसका जीता जागता उदाहरण मैंने 2009 में मुंबई में देखा.

मैं एक न्यूज़ चैनेल के काम से मुंबई गया हुआ था मैंने देखा की हर एक फिल्म स्टूडियो और ऑफिस के बाहर भारी संख्या में ऐसे युवा खड़े थे जिनके पास अन्दर जाने या किसी से मिलने का किसी भी प्रकार का कोई जरिया नहीं था यकीन मानिये इस भीड़ में आप ऋतिक रोशन और कटरीना की तरह खूबसूरत लोगों को भी सड़क पर भटकते देख सकते थे. न जाने सपनो और मंजिल की तलाश में आने वालें इन लोगों में कितनी ही विवेका होंगी ? जो थोडा सा आगे बढ़ने के बाद ही थक कर दम थोड देगी.

फ़िल्मी दुनिया में खुद को देखने वालों की समस्या यह होती है की इनमे वे लोगो भी होते है जिन्हें किसी भी तरह के हुनर से नहीं नबाजा गया है महज ग़लतफ़हमी और बिन आधार और गैर औचित्य वाले सपनो की तलाश उन्हें यहाँ तक ले आती है,मुश्किल तब होती है जब मुंबई के स्टेशन पर फिर रात को रहने नहीं दिया जाता है यही से सपनो के टूटने की दर्दीली सी आवाज़ उठने लगती है क्योंकि मुंबई में कोई किसी का नहीं होता है,कोई सहारा नहीं होता!

एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद क्या खोया और क्या पाया की बात आती है तो हम खुद को ठगा हुआ और हारा महसूस करते है जिसके बाद होंसला जवाब दे जाता है नतीजा गलत कदम.
इस दुनिया का एक सच यह भी है की देश में होने वाले देह व्यापार को गति मुंबई में आने वाली इन कम अनुभव और कम उम्र वाली लड़कियों के द्वारा ही दी जाती है,जिनकी सिसकियाँ हर बार दबा दी जाती है अगर कोई चीख हमारे कानो तक पहुँचती है तो उसे परदे पर एक डायलोग के रूप में पेश कर दिया जाता है यही आकर दूसरी दुनिया का विरोध भी ख़त्म होता नजर आता है.

हर रोज पहुँचने वालें सैकड़ों लोगों में कोई एक भी बड़ी मुश्किल से होता है जो अपना मुकाम बनाने में कामयाब होता है,कोई आज इस दुनिया में प्रतिभा ही सब कुछ नहीं होती है उससे ऊपर उठकर है अवसर और समझौता . जितना बड़ा समझौता उतना बड़ा काम ,उतना बड़ा नाम.
अगर आज की पीढ़ी महज फिल्मों को अपना मुकाम मानती है तो यह गलत है पहले खुद को परखिये की क्या आप उस चीज़ के हकदार है?क्या आप उस चीज़ का उतनी देर इंतज़ार कर सकते है?क्या आप बिना गिरे वहा तक चल सकते है? क्या अपना स्वाभिमान आखिरी कदम तक जिंदा रख सकते है ?
अगर आप खुद को इन मापदंडों पर खरा पाते है तो आप इस दिशा में आगे बढ़ सकते है अन्यथा खुद को एक और विवेका मत बनने दीजिये,आप अपने सपनो की तलाश में अपने माता पिता की सपने मत तोड़िए क्योंकि उनके सपने आप हो, जो आपके सपनो से हमेशा बढ़ें है.



युवा शक्ति संगठन मध्यप्रदेश के प्रदेश सचिव है और हिन्दुस्तान का दर्द के संपादक भी है,साथ ही साथ फिल्म लेखन के प्रति भी सक्रिय है.
email- mr.sanjaysagar@gmail.com
mo.09907048438

1 comment:

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--- संजय सेन सागर

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