Friday, June 25, 2010

कैसी घटा निहार रही है..

कैसी घटा निहार रही है॥
अबतो अम्बर टूटेगा॥
धरती के इस मल मूत्र को॥
वर्षा ऋतू अब लूटेगा॥
पग पग पर हरियाली होगी॥
बाग़ में कोयल बोलेगी॥
हर खेतो में धान की कलियाँ॥
पहन के घुघरू डोलेगी ॥
हर किसान के मन के अन्दर॥
खुशिया नहीं समाएगी॥
अब सुहागिन घर मंदिर में॥
बारिश के गीत सुनाएगी॥
जब बुराई को समय का बौडर॥
चलती राह घसीटेगा॥
धरती के इस मल मूत्र को॥
वर्षा ऋतू अब लूटेगा॥
प्यास बुझेगी पशु प्राणी की॥
हर गड्ढो में जल का वास॥
कोई भूखा नहीं मरेगा॥
न डालेगा गले में फांस॥
हर जंगल में मंगल होगा॥
लोरी नानी सुनाएगी॥
घटी कहानी जो रिम-झिम में॥
उसको हमें बताएगी॥
अब दुखियो का दुःख जाएगा॥
ख़ुशी न कोई लूटेगा॥
धरती के इस मल मूत्र को॥
वर्षा ऋतू अब लूटेगा॥

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--- संजय सेन सागर

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